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अंग 1270

अंग
1270
राग मलार
राग: मलार · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
मलार मः 5 ॥
प्रभ को भगति बछलु बिरदाइओ ॥
निंदक मारि चरन तल दीने अपुनो जसु वरताइओ ॥1॥ रहाउ ॥
जै जै कारु कीनो सभ जग महि दइआ जीअन महि पाइओ ॥
कंठि लाइ अपुनो दासु राखिओ ताती वाउ न लाइओ ॥1॥
अंगीकारु कीओ मेरे सुआमी भ्रमु भउ मेटि सुखाइओ ॥
महा अनंद करहु दास हरि के नानक बिस्वासु मनि आइओ ॥2॥14॥18॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: मलार महला 5 ॥ हे भाई ! (परमात्मा) भकित से प्यार करने वाला (है- यह) परमात्मा का आदि-कदीमी स्वभाव है। (भगती करने वालों की) निंदा करने वालों को आत्मिक तोर पर नीचा रख के (उनके) पैरों के तले रखता है (इस तरह परमात्मा जगत में) अपनी शोभा बिखेरता है। 1। रहाउ। हे भाई ! सारे जगत में (परमात्मा अपने दासों की) शोभा बनाता है। (सब) जीवों के दिल में (अपने सेवकों के लिए) आदर-सत्कार पैदा करता है। प्रभू अपने सेवक को अपने गले से लगा के रखता है। उसको गर्म-हवा नहीं लगने देता (थोड़ी सी भी मुश्किल नहीं आने देता)। 1। हे भाई ! मेरे मालिक प्रभू ने (अपने सेवक की सदा) सहायता की है। (सेवकों के अंदर से) भटकना और डर मिटा के (उसको) आत्मिक आनंद बख्शता है। हे नानक ! (कह-) हे प्रभू के सेवक ! आपके मन में (प्रभू के लिए) श्रद्धा बन चुकी है। आप बेशक आत्मिक आनंद माणता रह (भाव। जिसके अंदर परमात्मा के लिए श्रद्धा-प्यार है। वह अवश्य आनंद पाता है)। 2। 14। 18।
रागु मलार महला 5 चउपदे घरु 2
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
गुरमुखि दीसै ब्रहम पसारु ॥
गुरमुखि त्रै गुणीआं बिसथारु ॥
गुरमुखि नाद बेद बीचारु ॥
बिनु गुर पूरे घोर अंधारु ॥1॥
मेरे मन गुरु गुरु करत सदा सुखु पाईऐ ॥
गुर उपदेसि हरि हिरदै वसिओ सासि गिरासि अपणा खसमु धिआईऐ ॥1॥ रहाउ ॥
गुर के चरण विटहु बलि जाउ ॥
गुर के गुण अनदिनु नित गाउ ॥
गुर की धूड़ि करउ इसनानु ॥
साची दरगह पाईऐ मानु ॥2॥
गुरु बोहिथु भवजल तारणहारु ॥
गुरि भेटिऐ न होइ जोनि अउतारु ॥
गुर की सेवा सो जनु पाए ॥
जा कउ करमि लिखिआ धुरि आए ॥3॥
गुरु मेरी जीवनि गुरु आधारु ॥
गुरु मेरी वरतणि गुरु परवारु ॥
गुरु मेरा खसमु सतिगुर सरणाई ॥
नानक गुरु पारब्रहमु जा की कीम न पाई ॥4॥1॥19॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: रागु मलार महला 5 चउपदे घरु 2 सतिगुर प्रसादि ॥ हे भाई ! गुरू की शरण पड़ने से (यह सारा जगत) परमात्मा का पसारा दिखता है। गुरू की शरण पड़ने से (यह भी दिखाई दे जाता है कि यह) माया के तीन गुणों का खिलारा है। हे भाई ! गुरू की शरण पड़ना ही (जोगियों के) नाद का (और पंडितों के) वेद का विचार है। पूरे गुरू की शरण के बिना (आत्मिक जीवन के पक्ष से) घोर अंधेरा (बना रहता) है। 1। हे मेरे मन ! गुरू को हर वक्त याद करते हुए सदा आत्मिक आनंद पाया जा सकता है। गुरू के उपदेश से परमात्मा हृदय में आ बसता है। हे मन ! (गुरू की शरण पड़ कर) हरेक सांस के साथ हरेक ग्रास के साथ अपने मालिक-प्रभू का नाम-सिमरन करना चाहिए। 1। रहाउ। हे भाई ! मैं गुरू के चरणों पर से कुर्बान जाता हूँ। मैं हर वक्त गुरू के गुण गाता हूँ। मैं गुरू के चरणों की धूड़ में स्नान करता हूँ। हे भाई ! (गुरू की मेहर से ही) सदा कायम रहने वाली दरगाह में आदर हासिल किया जा सकता है। 2। हे भाई ! गुरू संसार-समुंद्र से पार लंघा सकने वाला जहाज है। अगर गुरू मिल जाए तो फिर जूनियों में जन्म नहीं होता। पर वह मनुष्य (ही) गुरू की सेवा (का अवसर) प्राप्त करता है। जिसके माथे पर धुर दरगाह से (प्रभू की) मेहर से (ये लेख) लिखा होता है। 3। हे भाई ! गुरू (ही) मेरी जिंदगी है। गुरू मेरा आसरा है। गुरू ही मेरा हर वक्त सहारा है। गुरू ही (मेरे मन को ढाढस देने वाला) मेरा परिवार है। गुरू मेरा राखवाला है। मैं सदा गुरू की शरण पड़ा रहता हूँ। हे नानक ! (कह- हे भाई !) गुरू परमात्मा (का रूप) है। जिसका मूल्य नहीं पड़ सकता। 4। 1। 19।
मलार महला 5 ॥
गुर के चरन हिरदै वसाए ॥
करि किरपा प्रभि आपि मिलाए ॥
अपने सेवक कउ लए प्रभु लाइ ॥
ता की कीमति कही न जाइ ॥1॥
करि किरपा पूरन सुखदाते ॥
तुम॑री क्रिपा ते तूं चिति आवहि आठ पहर तेरै रंगि राते ॥1॥ रहाउ ॥
गावणु सुनणु सभु तेरा भाणा ॥
हुकमु बूझै सो साचि समाणा ॥
जपि जपि जीवहि तेरा नांउ ॥
तुझ बिनु दूजा नाही थाउ ॥2॥
दुख सुख करते हुकमु रजाइ ॥
भाणै बखस भाणै देइ सजाइ ॥
दुहां सिरिआं का करता आपि ॥
कुरबाणु जांई तेरे परताप ॥3॥
तेरी कीमति तूहै जाणहि ॥
तू आपे बूझहि सुणि आपि वखाणहि ॥
सेई भगत जो तुधु भाणे ॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: मलार महला 5 ॥ हे भाई ! (प्रभू का सेवक) गुरू के चरणों को अपने हृदय में बसाए रखता है (यह भी प्रभू की अपनी ही मेहर होती है) प्रभू ने स्वयं (ही) मेहर कर के (उसको गुरू के चरणों में) जोड़ा होता है। हे भाई ! प्रभू अपने सेवक को (चरणों में) जोड़े रखता है। उस (मालिक का) बड़प्पन बयान नहीं किया जा सकता। 1। हे सर्व-व्यापक ! हे सुख देने वाले प्रभू ! मेहर कर (मेरे चित्त में आ बस)। आप अपनी मेहर से ही (जीवों के) चित्त में आता है। (जिनकी याद में आप आ बसता है। वे) आठों पहर आपके प्रेम-रंग में रंगे रहते हैं। 1। रहाउ। हे प्रभू ! जब आपकी रज़ा होती है तब ही आपकी सिफत-सालाह गाई जा सकती है आपका नाम सुना जा सकता है। (जो मनुष्य आपके) हुकम को समझता है। वह (आपके) सदा-स्थिर नाम में लीन रहता है। हे प्रभू ! (आपके सेवक) आपका नाम जप-जप के आत्मिक जीवन हासिल करते हैं। उनको आपके बिना और कोई सहारा नहीं होता। 2। हे भाई ! यह करतार का हुकम है करतार की रज़ा है (कभी) दुख (कभी) सुख (देता है)। अपनी रज़ा में (किसी पर) बख्शिश (करता है। किसी को) सज़ा देता है। (बख्शिश और सज़ा- इन) दोनों पक्षों का करतार स्वयं ही मालिक है। हे प्रभू ! आपके (इतने बड़े) प्रताप से मैं सदके जाता हूँ। 3। हे प्रभू ! (आप इतना बड़ा है- अपनी यह) कीमत आप खुद ही जानता है। आप खुद ही (अपनी रज़ा को) समझता है। (अपने हुकम को) सुन के आप स्वयं ही (उसकी) व्याख्या करता है। हे प्रभू ! वही मनुष्य आपके (असल) भगत हैं जो आपको अच्छे लगते हैं।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।

अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।

इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “मलार महला 5 ॥ हे भाई ! (परमात्मा) भकित से प्यार करने वाला (है- यह) परमात्मा का आदि-कदीमी स्वभाव है।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।