प्रभ को भगति बछलु बिरदाइओ ॥
निंदक मारि चरन तल दीने अपुनो जसु वरताइओ ॥1॥ रहाउ ॥
जै जै कारु कीनो सभ जग महि दइआ जीअन महि पाइओ ॥
कंठि लाइ अपुनो दासु राखिओ ताती वाउ न लाइओ ॥1॥
अंगीकारु कीओ मेरे सुआमी भ्रमु भउ मेटि सुखाइओ ॥
महा अनंद करहु दास हरि के नानक बिस्वासु मनि आइओ ॥2॥14॥18॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
गुरमुखि दीसै ब्रहम पसारु ॥
गुरमुखि त्रै गुणीआं बिसथारु ॥
गुरमुखि नाद बेद बीचारु ॥
बिनु गुर पूरे घोर अंधारु ॥1॥
मेरे मन गुरु गुरु करत सदा सुखु पाईऐ ॥
गुर उपदेसि हरि हिरदै वसिओ सासि गिरासि अपणा खसमु धिआईऐ ॥1॥ रहाउ ॥
गुर के चरण विटहु बलि जाउ ॥
गुर के गुण अनदिनु नित गाउ ॥
गुर की धूड़ि करउ इसनानु ॥
साची दरगह पाईऐ मानु ॥2॥
गुरु बोहिथु भवजल तारणहारु ॥
गुरि भेटिऐ न होइ जोनि अउतारु ॥
गुर की सेवा सो जनु पाए ॥
जा कउ करमि लिखिआ धुरि आए ॥3॥
गुरु मेरी जीवनि गुरु आधारु ॥
गुरु मेरी वरतणि गुरु परवारु ॥
गुरु मेरा खसमु सतिगुर सरणाई ॥
नानक गुरु पारब्रहमु जा की कीम न पाई ॥4॥1॥19॥
गुर के चरन हिरदै वसाए ॥
करि किरपा प्रभि आपि मिलाए ॥
अपने सेवक कउ लए प्रभु लाइ ॥
ता की कीमति कही न जाइ ॥1॥
करि किरपा पूरन सुखदाते ॥
तुम॑री क्रिपा ते तूं चिति आवहि आठ पहर तेरै रंगि राते ॥1॥ रहाउ ॥
गावणु सुनणु सभु तेरा भाणा ॥
हुकमु बूझै सो साचि समाणा ॥
जपि जपि जीवहि तेरा नांउ ॥
तुझ बिनु दूजा नाही थाउ ॥2॥
दुख सुख करते हुकमु रजाइ ॥
भाणै बखस भाणै देइ सजाइ ॥
दुहां सिरिआं का करता आपि ॥
कुरबाणु जांई तेरे परताप ॥3॥
तेरी कीमति तूहै जाणहि ॥
तू आपे बूझहि सुणि आपि वखाणहि ॥
सेई भगत जो तुधु भाणे ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।
अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “मलार महला 5 ॥ हे भाई ! (परमात्मा) भकित से प्यार करने वाला (है- यह) परमात्मा का आदि-कदीमी स्वभाव है।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।