गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: वे परमात्मा के साथ (टिके रहने वाले) साथी बन जाते हैं। प्रभू उनको प्यारा लगने लगता है। 2। 1। 23।
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: मलार महला 5 ॥ हे भाई ! (मनुष्य का) मन (संसार-रूपी) सघन जंगल में भटकता रहता है। (पर। (तब यह) उमाह में आ के (आत्मिक) आनंद से (जीवन-चाल) चलता है। जब इसके अंदर) परमात्मा के मिलने की तमन्ना (पैदा होती है) 1। रहाउ। हे भाई ! तीन गुणों वाली माया मेरे ऊपर (भी) हमला करती है। (गुरू के बिना) मैं (और) किसको यह तकलीफ़ बताऊँ। 1। हे नानक ! (कह- हे भाई ! गुरू की शरण आए बिना) और सारे प्रयत्न किए। पर वे उपाय (माया के हाथों मिल रहे) दुखों को दूर नहीं कर सकते। हे भाई ! गुरू की शरण पड़ा रह। और गोबिंद के गुणों में चॅुभी लगा के (गोबिंद में) मिला रह। 2। 2। 24।
मलार महला 5 ॥ प्रिअ की सोभ सुहावनी नीकी ॥ हाहा हूहू गंध्रब अपसरा अनंद मंगल रस गावनी नीकी ॥1॥ रहाउ ॥ धुनित ललित गुनग्य अनिक भांति बहु बिधि रूप दिखावनी नीकी ॥1॥ गिरि तर थल जल भवन भरपुरि घटि घटि लालन छावनी नीकी ॥ साधसंगि रामईआ रसु पाइओ नानक जा कै भावनी नीकी ॥2॥3॥25॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: मलार महला 5 ॥ हे भाई ! प्यारे प्रभू की सिफत-सालाह (हृदय को) अच्छी लगती है। सुखदाई लगती है। (मानो) हाहा हूहू गंधर्व और स्वर्ग की अप्सराएं (मिल के) आनंद देने वाले। खुशी पैदा करने वाले। रस-भरे मन-मोहक गीत गा रहे हैं। 1। रहाउ। हे भाई ! (प्यारे प्रभू की सिफतसालाह हृदय को) अच्छी लगती है। (मानो। संगीत के) गुणी-ज्ञानी अनेकों तरह से मीठी-सुरें (गा रहे हैं। और) कई किस्मों के सुंदर (नाटकीय) रूप दिखा रहे हैं। 1। हे भाई ! (वह प्यारा प्रभू) पहाड़। वृक्ष। धरती। पानी। चौदह भवन (सबमें) लबा-लब मौजूद है। हरेक शरीर में उस सोहणे लाल का सोहणा डेरा बसा हुआ है। पर। हे नानक ! जिस मनुष्य के हृदय में अच्छी श्रद्धा उपजती है। वह साध-संगति में (टिक के) सोहणे राम (के मिलाप) का आनंद प्राप्त करता है। 2। 3। 25।
मलार महला 5 ॥ गुर प्रीति पिआरे चरन कमल रिद अंतरि धारे ॥1॥ रहाउ ॥ दरसु सफलिओ दरसु पेखिओ गए किलबिख गए ॥ मन निरमल उजीआरे ॥1॥ बिसम बिसमै बिसम भई ॥ अघ कोटि हरते नाम लई ॥ गुर चरन मसतकु डारि पही ॥ प्रभ एक तूंही एक तुही ॥ भगत टेक तुहारे ॥ जन नानक सरनि दुआरे ॥2॥4॥26॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: मलार महला 5 ॥ हे भाई ! प्यारे सतिगुरू की बरकति से मैंने सुंदर चरण अपने हृदय में बसा लिए हैं। 1। रहाउ। हे भाई ! गुरू का दर्शन (सदा) फलदायक होता है। (जो मनुष्य गुरू के दर्शन करता है। वह परमात्मा के भी) दर्शन कर लेता है। (उसके) सारे पाप नाश हो जाते हैं। (दर्शन करने वाले मनुष्यों के) मन पवित्र हो जाते हैं। आत्मिक जीवन की सूझ वाले बन जाते हैं। 1। आश्चर्य आश्चर्य आश्चर्यजनक आत्मिक अवस्था बन जाती है। हे भाई ! परमात्मा का नाम सिमरने से करोड़ों पाप दूर हो जाते हैं। (जो मनुष्य) गुरू के चरणों पर माथा रख के गिर जाते हैं। उनके लिए। हे प्रभू ! सिर्फ आप ही सिर्फ आप ही सहारा होता है। हे नानक ! (कह- हे प्रभू ! आपके) भगतों को आपकी ही टेक है। आपके दास आपकी शरण पड़े रहते हैं। 2। 4। 26।
मलार महला 5 ॥ बरसु सरसु आगिआ ॥ होहि आनंद सगल भाग ॥1॥ रहाउ ॥ संत संगे मनु परफड़ै मिलि मेघ धर सुहाग ॥1॥ घनघोर प्रीति मोर ॥ चितु चात्रिक बूंद ओर ॥ ऐसो हरि संगे मन मोह ॥ तिआगि माइआ धोह ॥ मिलि संत नानक जागिआ ॥2॥5॥27॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: मलार महला 5 ॥ (हे नाम-जल से भरपूर गुरू ! परमात्मा की) रज़ा में आनंद से (नाम-जल की) बरखा कर। (जिन पर ये वर्षा होती है। उनके अंदर) आत्मिक आनंद बन जाते हैं। उनके सारे भाग्य (जाग उठते हैं)। 1। हे भाई ! जैसे बादलों की बरखा से मिल के धरती के भाग्य जाग उठते हें। वैसे ही गुरू की संगति में (मनुष्य का) मन टहक उठता है। 1। हे भाई ! (जैसे) मोर की प्रीति बादलों की गरज के साथ है। (जैसे) पपीहे का चित्त (वर्षा की) बूँद की ओर (बना रहता है)। वैसे ही (आप भी) परमात्मा के साथ (अपने) मन की प्रीति जोड़। माया की ठॅगी दूर कर के हे नानक ! गुरू को मिल के (मनुष्य का) मन (माया के मोह की नींद में से) जाग जाता है। 2। 5। 27।
मलार महला 5 ॥ गुन गोुपाल गाउ नीत ॥ राम नाम धारि चीत ॥1॥ रहाउ ॥ छोडि मानु तजि गुमानु मिलि साधूआ कै संगि ॥ हरि सिमरि एक रंगि मिटि जांहि दोख मीत ॥1॥ पारब्रहम भए दइआल ॥ बिनसि गए बिखै जंजाल ॥ साध जनां कै चरन लागि ॥ नानक गावै गोबिंद नीत ॥2॥6॥28॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: मलार महला 5 ॥ हे भाई ! सृष्टि के पालनहार प्रभू के गुण सदा गाया कर। परमात्मा का नाम अपने चित्त में टिकाए रख। 1। रहाउ। हे मित्र ! संत-जनों की संगति में मिल के गुमान छोड़ अहंकार त्याग। एक प्रभू के प्रेम-रंग में (रंगीज के) परमात्मा का नाम सिमरा कर। आपके सारे एैब दूर हैं जाएंगे। 1। प्रभू जी उस पर दयावान हैं जाते हैं। (उसके अंदर से) विषौ-विकारों के फंदे कट जाते हैं। संत जनों के चरणों से जुड़ के हे नानक ! (जो मनुष्य) सदा गोबिंद के गुण गाता रहता है। 2। 6। 28।
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: मलार महला 5 ॥ हे भाई ! (जब) परमात्मा का रूप गुरू। आत्मिक जीवन देने वाले नाम-जल से भरपूर गुरू (नाम-जल की) बरखा करता है। तब प्रभू के गुण गाते हुए सुख मिलता है शांति प्राप्त होती है (जैसे ‘मोर बबीहे बोलदे। वेखि बॅदल काले’)। 1। रहाउ। हे भाई ! (गुरू की कृपा से) परमात्मा के चरणों की शरण (प्राप्त होती है। जो संसार-) समुंद्र (से पार लंघाने के लिए) जहाज़ है। (गुरू की कृपा से आत्मिक पथ के) पथिक (जीव) को तमन्ना पैदा होती है। उसका चित्त (नाम-जल के) सरोवर (गुरू) की ओर (पलटता है)। हे नानक ! (जब नाम-जल से भरपूर गुरू नाम की बरखा करता है। तब) सेवकों के अंदर परमात्मा के दर्शनों की चाहत पैदा होती है। प्रभू मेहर कर के (उनको यह दाति) देता है। 2। 7। 29।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।
अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।
इस अंग पर 7 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “वे परमात्मा के साथ (टिके रहने वाले) साथी बन जाते हैं।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।