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अंग 1269

अंग
1269
राग मलार
राग: मलार · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
मनि तनि रवि रहिआ जगदीसुर पेखत सदा हजूरे ॥
नानक रवि रहिओ सभ अंतरि सरब रहिआ भरपूरे ॥2॥8॥12॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: हे नानक ! (कह- हे भाई !) जगत का मालिक प्रभू जिन मनुष्यों के मन में हृदय में सदा बसा रहता है। वह उसको सदा अपने अंग-संग बसता देखते हैं। (उनको ऐसा प्रतीत होता है कि) परमात्मा सब जीवों भीतर मौजूद है। सब जगह भरपूर बसता है। 2। 8। 12।
मलार महला 5 ॥
हरि कै भजनि कउन कउन न तारे ॥
खग तन मीन तन म्रिग तन बराह तन साधू संगि उधारे ॥1॥ रहाउ ॥
देव कुल दैत कुल जख्य किंनर नर सागर उतरे पारे ॥
जो जो भजनु करै साधू संगि ता के दूख बिदारे ॥1॥
काम करोध महा बिखिआ रस इन ते भए निरारे ॥
दीन दइआल जपहि करुणा मै नानक सद बलिहारे ॥2॥9॥13॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: मलार महला 5 ॥ हे भाई ! (जिन-जिन ने भी हरी का भजन किया) उन सभी को (गुरू ने) परमात्मा के भजन से (संसार-समुंद्र से) पार लंघा दिया। पंछियों के शरीर वाले। मछलियों के से शरीर धारण करने वाले। पशुओं का सा शरीर धारण करने वाले। सूअरों का शरीर धारण करने वाले- यह सब गुरू की संगति में पार लंघा दिए गए हैं। 1। रहाउ। हे भाई ! (साध-संगति में सिमरन की बरकति से) देवताओं की कुलें। दैत्यों की कुलें। जख। किंन्नर। मनुष्य- ये सारे संसार समुंद्र से पार निकल गए। गुरू की संगति में रहके जो-जो प्राणी परमात्मा का भजन करता है। उन सबके सारे दुख नाश हो जाते हैं। हे नानक ! (कह- हे भाई !) दीनों पर दया करने वाले तरस-स्वरूप परमात्मा का नाम जो-जो मनुष्य जपते हैं। मैं उन पर से सदा कुर्बान जाता हँ। वे मनषुय काम। क्रोध। माया के चस्के- इन सबसे निर्लिप रहते हैं। 2। 9। 13।
मलार महला 5 ॥
आजु मै बैसिओ हरि हाट ॥
नामु रासि साझी करि जन सिउ जांउ न जम कै घाट ॥1॥ रहाउ ॥
धारि अनुग्रहु पारब्रहमि राखे भ्रम के खुले॑ कपाट ॥
बेसुमार साहु प्रभु पाइआ लाहा चरन निधि खाट ॥1॥
सरनि गही अचुत अबिनासी किलबिख काढे है छांटि ॥
कलि कलेस मिटे दास नानक बहुरि न जोनी माट ॥2॥10॥14॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: मलार महला 5 ॥ हे भाई ! अब मैं उस हाट (साध-संगति) में आ बैठा हूँ जहाँ हरी-नाम मिलता है। वहाँ मैंने संत-जनों के साथ सांझ डाल के हरी-नाम का सरमाया (इकट्ठा किया है। जिसकी बरकति से) मैं जमदूतों के घाटों पर नहीं जाता (भाव। मैं वह कर्म ही नहीं करता। जिनके कारण जमों के वश में पड़ना पड़े)। 1। रहाउ। हे भाई ! परमात्मा ने मेहर करके जिनकी रक्षा की (साध-संगति की बरकति से उनके) भरम-भटकना के भिक्त खुल गए। उन्होंने बेअंत नाम-राशि के मालिक प्रभू को पा लिया। उन्होंने परमात्मा के चरणों (में टिके रहने) की कमाई कमा ली। जो सारे सुखों का खजाना है। 1। हे नानक ! (कह- हे भाई ! जिन सेवकों ने) अटल अविनाशी परमात्मा का आसरा ले लिया। उन्होंने (अपने अंदर से सारे) पाप चुन-चुन के निकाल दिए। उन दासों के अंदर से सारे झगड़े कलेश समाप्त हो गए। वे फिर जूनियों में नहीं पड़ते। 2। 10। 14।
मलार महला 5 ॥
बहु बिधि माइआ मोह हिरानो ॥
कोटि मधे कोऊ बिरला सेवकु पूरन भगतु चिरानो ॥1॥ रहाउ ॥
इत उत डोलि डोलि स्रमु पाइओ तनु धनु होत बिरानो ॥
लोग दुराइ करत ठगिआई होतौ संगि न जानो ॥1॥
म्रिग पंखी मीन दीन नीच इह संकट फिरि आनो ॥
कहु नानक पाहन प्रभ तारहु साधसंगति सुख मानो ॥2॥11॥15॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: मलार महला 5 ॥ हे भाई ! (जीव) कई तरीकों से माया के मोह में ठॅगे जाते हैं। करोड़ों में से कोई विरला ही (ऐसा) सेवक होता है जो आदि-कदीम से ही पूरा भगत होता है (और माया के हाथों ठॅगा नहीं जाता)। 1। रहाउ। हे भाई ! (माया का ठॅगा मनुष्य) हर तरफ भटक-भटक के थकता फिरता है (जिस शरीर और धन की खातिर भटकता है। वह) शरीर और धन (आखिर) बेगाना हो जाता है। (माया के मोह में फसा हुआ मनुष्य) लोगों से छुपा-छुपा के ठॅगी करता रहता है (जो परमात्मा सदा) साथ रहता है उसके साथ सांझ नहीं डालता। 1। हे भाई ! (माया के मोह में फसे रहने के कारण आखिर) पशु। पक्षी। मछली – इन निम्न जूनियों के चक्करों के दुख में ही भटकता फिरता है। हे नानक ! कह- हे प्रभू ! हम पत्थरों को (पत्थर-दिल जीवों को) पार लंघा ले। हम साध-संगति में (आपकी भगती का) आनंद लेते रहते हैं। 2। 11। 15।
मलार महला 5 ॥
दुसट मुए बिखु खाई री माई ॥
जिस के जीअ तिन ही रखि लीने मेरे प्रभ कउ किरपा आई ॥1॥ रहाउ ॥
अंतरजामी सभ महि वरतै तां भउ कैसा भाई ॥
संगि सहाई छोडि न जाई प्रभु दीसै सभनी ठाइंी ॥1॥
अनाथा नाथु दीन दुख भंजन आपि लीए लड़ि लाई ॥
हरि की ओट जीवहि दास तेरे नानक प्रभ सरणाई ॥2॥12॥16॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: मलार महला 5 ॥ हे माँ ! (मेरे प्रभू को मेरे ऊपर तरस आया है। अब कामादिक) चंदरे वैरी (इस तरह) खत्म हो गए हें (जैसे) जहर खा के। हे माँ ! मेरे प्रभू को (जब) तरस आता है। उसके अपने ही हैं सब जीव। वह स्वयं ही इनकी (कामादिक वैरियों से) रक्षा करता ह। 1। रहाउ। हे भाई ! हरेक के दिल की जानने वाला प्रभू सब जीवों में मौजूद है (जब यह निश्चय हो जाए) तो कोई डर नहीं पोह सकता। हे भाई ! वह प्रभू हरेक का साथी है। वह छोड़ के नहीं जाता। वह सब जगह बसता दिखाई देता है। 1। हे भाई ! परमात्मा निखसमों का खसम है। गरीबों का दुख नाश करने वाला है। वह (जीवों को) खुद अपने लड़ लगाता है। हे नानक (कह-) हे हरी ! हे प्रभू ! आपके दास आपके आसरे जीते हैं। मैं भी आपकी ही शरण पड़ा हूँ। 2। 12। 16।
मलार महला 5 ॥
मन मेरे हरि के चरन रवीजै ॥
दरस पिआस मेरो मनु मोहिओ हरि पंख लगाइ मिलीजै ॥1॥ रहाउ ॥
खोजत खोजत मारगु पाइओ साधू सेव करीजै ॥
धारि अनुग्रहु सुआमी मेरे नामु महा रसु पीजै ॥1॥
त्राहि त्राहि करि सरनी आए जलतउ किरपा कीजै ॥
करु गहि लेहु दास अपुने कउ नानक अपुनो कीजै ॥2॥13॥17॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: मलार महला 5 ॥ हे मेरे मन ! परमात्मा के चरण सिमरने चाहिए (गरीबी स्वभाव में टिक के प्रभू का सिमरन करना चाहिए)। हे भाई ! मेरा मन प्रभू के दीदार की तमन्ना में मगन रहता है। (जी ऐसे करता है कि उस को) उड़ के जा कर मिल लें। 1। रहाउ। हे भाई ! तलाश करते-करते (गुरू से उस प्रभू के मिलाप का मैंने) रास्ता पा लिया है। हे भाई ! गुरू की शरण पड़े रहना चाहिए। हे मेरे मालिक प्रभू ! (मेरे ऊपर) मेहर कर। आपका बहुत ही स्वादिष्ट नाम-जल पीया जा सके। 1। हे प्रभू ! विकारों से ‘बचा ले’ ‘बचा ले’ – यह कह के (जीव) आपकी शरण आते हैं। हे प्रभू ! (विकारों की आग में) जलते हुए पर (आप खुद) मेहर कर। हे नानक ! (कह- हे प्रभू !) दास का हाथ पकड़ ले। मुझे अपना दास बना ले। 2। 13। 17।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।

अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।

इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे नानक ! (कह- हे भाई !) जगत का मालिक प्रभू जिन मनुष्यों के मन में हृदय में सदा बसा रहता है।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।