बिनउ सुनिओ जब ठाकुर मेरै बेगि आइओ किरपा धारे ॥
कहु नानक मेरो बनिओ सुहागो पति सोभा भले अचारे ॥2॥3॥7॥
प्रीतम साचा नामु धिआइ ॥
दूख दरद बिनसै भव सागरु गुर की मूरति रिदै बसाइ ॥1॥ रहाउ ॥
दुसमन हते दोखी सभि विआपे हरि सरणाई आइआ ॥
राखनहारै हाथ दे राखिओ नामु पदारथु पाइआ ॥1॥
करि किरपा किलविख सभि काटे नामु निरमलु मनि दीआ ॥
गुण निधानु नानक मनि वसिआ बाहुड़ि दूख न थीआ ॥2॥4॥8॥
प्रभ मेरे प्रीतम प्रान पिआरे ॥
प्रेम भगति अपनो नामु दीजै दइआल अनुग्रहु धारे ॥1॥ रहाउ ॥
सिमरउ चरन तुहारे प्रीतम रिदै तुहारी आसा ॥
संत जना पहि करउ बेनती मनि दरसन की पिआसा ॥1॥
बिछुरत मरनु जीवनु हरि मिलते जन कउ दरसनु दीजै ॥
नाम अधारु जीवन धनु नानक प्रभ मेरे किरपा कीजै ॥2॥5॥9॥
अब अपने प्रीतम सिउ बनि आई ॥
राजा रामु रमत सुखु पाइओ बरसु मेघ सुखदाई ॥1॥ रहाउ ॥
इकु पलु बिसरत नही सुख सागरु नामु नवै निधि पाई ॥
उदौतु भइओ पूरन भावी को भेटे संत सहाई ॥1॥
सुख उपजे दुख सगल बिनासे पारब्रहम लिव लाई ॥
तरिओ संसारु कठिन भै सागरु हरि नानक चरन धिआई ॥2॥6॥10॥
घनिहर बरसि सगल जगु छाइआ ॥
भए क्रिपाल प्रीतम प्रभ मेरे अनद मंगल सुख पाइआ ॥1॥ रहाउ ॥
मिटे कलेस त्रिसन सभ बूझी पारब्रहमु मनि धिआइआ ॥
साधसंगि जनम मरन निवारे बहुरि न कतहू धाइआ ॥1॥
मनु तनु नामि निरंजनि रातउ चरन कमल लिव लाइआ ॥
अंगीकारु कीओ प्रभि अपनै नानक दास सरणाइआ ॥2॥7॥11॥
बिछुरत किउ जीवे ओइ जीवन ॥
चितहि उलास आस मिलबे की चरन कमल रस पीवन ॥1॥ रहाउ ॥
जिन कउ पिआस तुमारी प्रीतम तिन कउ अंतरु नाही ॥
जिन कउ बिसरै मेरो रामु पिआरा से मूए मरि जांहीं ॥1॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।
गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।
इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “मैं तो स्त्री की तरह (निर्बल) हूँ।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।