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अंग 1268

अंग
1268
राग मलार
राग: मलार · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
इसत्री रूप चेरी की निआई सोभ नही बिनु भरतारे ॥1॥
बिनउ सुनिओ जब ठाकुर मेरै बेगि आइओ किरपा धारे ॥
कहु नानक मेरो बनिओ सुहागो पति सोभा भले अचारे ॥2॥3॥7॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: मैं तो स्त्री की तरह (निर्बल) हूँ। दासी की तरह (कमजोर) हूँ। (स्त्री) पति के बिना शोभा नहीं पाती। (दासी) मालिक के बगैर शोभा नहीं पाती। 1। हे नानक ! कह- (हे सखी !) जब से मेरे मालिक-प्रभू ने (मेरी यह) विनती सुनी। तो मेहर करके वह जल्दी (मेरे हृदय में) आ बसा। अब मेरी सौभाग्यता बन गई है। मुझे इज्जत मिल गई है। मुझे शोभा मिल गई है। मेरी करणी भली हो गई। 2। 3। 7।
मलार महला 5 ॥
प्रीतम साचा नामु धिआइ ॥
दूख दरद बिनसै भव सागरु गुर की मूरति रिदै बसाइ ॥1॥ रहाउ ॥
दुसमन हते दोखी सभि विआपे हरि सरणाई आइआ ॥
राखनहारै हाथ दे राखिओ नामु पदारथु पाइआ ॥1॥
करि किरपा किलविख सभि काटे नामु निरमलु मनि दीआ ॥
गुण निधानु नानक मनि वसिआ बाहुड़ि दूख न थीआ ॥2॥4॥8॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: मलार महला 5 ॥ हे भाई ! प्यारे प्रभू का सदा नाम सिमरा कर। हे भाई ! गुरू का शबद (अपने) हृदय में बसाए रख। (जो मनुष्य यह उद्यम करता है। उसके लिए) दुखों-कलेशों से भरा हुआ संसार-समुंद्र समाप्त हो जाता है। 1। रहाउ। हे भाई ! जो मनुष्य परमात्मा की शरण आ पड़ता है। (उससे) वैर करने वाले जगत में धिक्कारे जाते हैं। उससे ईष्या करने वाले (भी) सारे (ईष्या और जलन में ही) फसे रहते हैं (भाव। दोखी। स्वयं ही दुखी होते हैं। उसका कुछ नहीं बिगाड़ते) रक्षा करने में समर्थ प्रभू ने सदा उसकी रक्षा की है। उसने प्रभू का कीमती नाम प्राप्त कर लिया होता है। 1। हे नानक ! जिस मनुष्य के मन में (परमात्मा ने अपना) पवित्र नाम टिका दिया। मेहर करके उसके सारे पाप उसने काट दिए। हे भाई ! जिस मनुष्य के मन में सारे गुणों का खजाना प्रभू आ बसा। उसको कोई दुख पोह नहीं सकते। 2। 4। 8।
मलार महला 5 ॥
प्रभ मेरे प्रीतम प्रान पिआरे ॥
प्रेम भगति अपनो नामु दीजै दइआल अनुग्रहु धारे ॥1॥ रहाउ ॥
सिमरउ चरन तुहारे प्रीतम रिदै तुहारी आसा ॥
संत जना पहि करउ बेनती मनि दरसन की पिआसा ॥1॥
बिछुरत मरनु जीवनु हरि मिलते जन कउ दरसनु दीजै ॥
नाम अधारु जीवन धनु नानक प्रभ मेरे किरपा कीजै ॥2॥5॥9॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: मलार महला 5 ॥ हे मेरे प्रभू ! हे मेरे प्रीतम ! हे मेरी जिंद से प्यारे ! हे दया के श्रोत प्रभू ! (मेरे ऊपर) मेहर कर। मुझे अपना प्यार बख्श। मुझे अपनी भगती दे। मुझे अपना नाम दे। 1। रहाउ। हे प्रीतम ! मैं आपके चरणों का ध्यान धरता रहूँ। मेरे हृदय में आपकी आस टिकी रही। मैं संत जनों के पास बिनती करता हूँ (कि मुझे आपके दर्शन करवा दें। मेरे) मन में (आपके) दर्शनों की बड़ी तमन्ना है। 1। हे प्रीतम प्रभू ! आपसे बिछुड़ने पर आत्मिक मौत हैं जाती है। आपको मिलने से आत्मिक जीवन मिलता है। हे प्रभू ! अपने सेवक को दर्शन दे। हे नानक ! (कह-) हे प्रभू मेहर कर। आपके नाम का आसरा (मुझे मिला रहे। यही है मेरी) जिंदगी का सरमाया। 2। 5। 9।
मलार महला 5 ॥
अब अपने प्रीतम सिउ बनि आई ॥
राजा रामु रमत सुखु पाइओ बरसु मेघ सुखदाई ॥1॥ रहाउ ॥
इकु पलु बिसरत नही सुख सागरु नामु नवै निधि पाई ॥
उदौतु भइओ पूरन भावी को भेटे संत सहाई ॥1॥
सुख उपजे दुख सगल बिनासे पारब्रहम लिव लाई ॥
तरिओ संसारु कठिन भै सागरु हरि नानक चरन धिआई ॥2॥6॥10॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: मलार महला 5 ॥ अब मुझे प्यारे प्रभु से प्रेम हो गया है। हे नाम-जल से भरपूर गुरू ! हे सुख देने वाले गुरू ! (नाम की) बरखा करता रह। 1। रहाउ। (आपकी मेहर से) प्रभू-पातशाह का नाम सिमरते हुए मैंने आत्मिक आनंद हासिल कर लिया है (जो मेरे लिए दुनिया के) नौ ही खजाने हें। अब वह सुखों का समुंद्र प्रभू एक पल के लिए भी नहीं भूलता। 1। हे नानक ! (कह- हे भाई ! गुरू-उपदेश बरसात की बरकति से) मैंने परमात्मा में सुरति जोड़ ली है। मेरे अंदर सुख पैदा हो गए हैं। और। सारे दुख नाश हो गए हैं। हरी के चरणों का ध्यान धर के मैं संसार-समुंद्र से पार लांघ गया हूँ जिसको तैरना मुश्किल है। और। जो अनेकों डरों से भरा हुआ है। 2। 6। 10।
मलार महला 5 ॥
घनिहर बरसि सगल जगु छाइआ ॥
भए क्रिपाल प्रीतम प्रभ मेरे अनद मंगल सुख पाइआ ॥1॥ रहाउ ॥
मिटे कलेस त्रिसन सभ बूझी पारब्रहमु मनि धिआइआ ॥
साधसंगि जनम मरन निवारे बहुरि न कतहू धाइआ ॥1॥
मनु तनु नामि निरंजनि रातउ चरन कमल लिव लाइआ ॥
अंगीकारु कीओ प्रभि अपनै नानक दास सरणाइआ ॥2॥7॥11॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: मलार महला 5 ॥ हे भाई ! (वैसे तो) नाम-जल से भरपूर सतिगुरू (नाम की) बरखा कर के सारे जगत पर प्रभाव डाल रहा है। (पर जिस मनुष्य पर) मेरे प्रीतम प्रभू दयावान होते हैं। वह (उस नाम-बरखा में से) आनंद-खुशियाँ-आत्मिक आनंद प्राप्त करता है। 1। रहाउ। हे भाई ! गुरू की संगति में रह के जो मनुष्य परमात्मा को अपने मन में सिमरता है। उसके सारे दुख-कलेश मिट जाते हैं; उसकी मायावी प्यास बुझ जाती है। उसके जनम-मरण के चक्कर दूर हो जाते हैं। वह दोबारा किसी भी और तरफ नहीं भटकता। 1। हे नानक ! जो मनुष्य प्रभू के दासों की शरण आ पड़ा। प्रभू ने उसकी सहायता की। उसका मन उसका तन निर्लिप प्रभू के नाम (-रंग में) रंगा गया। उसने प्रभू के सुंदर चरणों में सुरति जोड़ ली। 2। 7। 11।
मलार महला 5 ॥
बिछुरत किउ जीवे ओइ जीवन ॥
चितहि उलास आस मिलबे की चरन कमल रस पीवन ॥1॥ रहाउ ॥
जिन कउ पिआस तुमारी प्रीतम तिन कउ अंतरु नाही ॥
जिन कउ बिसरै मेरो रामु पिआरा से मूए मरि जांहीं ॥1॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: मलार महला 5 ॥ वे मनुष्य उससे वियोग का जीवन कभी नहीं जी सकते। हे भाई ! (जिन मनुष्यों के) चित्त में परमात्मा को मिलने की और उसके सुंदर चरण-कमलों का रस पीने की आशा है और चाहत है। 1। रहाउ। हे प्रीतम प्रभू ! जिन मनुष्यों के अंदर आपके दर्शन की तांघ है। उनकी आपके से कोई दूरी नहीं रहती। पर। हे भाई ! जिन मनुष्यों को प्यारा प्रभू भूल जाता है। वे आत्मिक मौत मरे रहते हैं। वे आत्मिक मौत ही मर जाते हैं। 1।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।

गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।

इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “मैं तो स्त्री की तरह (निर्बल) हूँ।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।