जब प्रिअ आइ बसे ग्रिहि आसनि तब हम मंगलु गाइआ ॥ मीत साजन मेरे भए सुहेले प्रभु पूरा गुरू मिलाइआ ॥3॥ सखी सहेली भए अनंदा गुरि कारज हमरे पूरे ॥ कहु नानक वरु मिलिआ सुखदाता छोडि न जाई दूरे ॥4॥3॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: हे सखी ! जब से प्यारे-प्रभू जी मेरे हृदय-घर में आ बसे हैं। मेरे हृदय-तख़्त पर आ बिराजे हैं। तब से मैं उसकी सिफत-सालाह के गीत गाती हूँ। गुरू ने मुझे पूर्ण प्रभू से मिला दिया है। (अब) मेरी सारी इन्द्रियों सुखद (शांत) हो गई हैं। 3। हे नानक ! कह- (हे सखी !) गुरू ने मेरे सारे काम सँवार दिए हैं। मेरी सारी इन्द्रियों को आनंद प्राप्त हो गया है। सारे सुख देने वाला प्रभू-पति मुझे मिल गया है। अब वह मुझे छोड़ के कहीं दूर नहीं जाता। 4। 3।
मलार महला 5 ॥ राज ते कीट कीट ते सुरपति करि दोख जठर कउ भरते ॥ क्रिपा निधि छोडि आन कउ पूजहि आतम घाती हरते ॥1॥ हरि बिसरत ते दुखि दुखि मरते ॥ अनिक बार भ्रमहि बहु जोनी टेक न काहू धरते ॥1॥ रहाउ ॥ तिआगि सुआमी आन कउ चितवत मूड़ मुगध खल खर ते ॥ कागर नाव लंघहि कत सागरु ब्रिथा कथत हम तरते ॥2॥ सिव बिरंचि असुर सुर जेते काल अगनि महि जरते ॥ नानक सरनि चरन कमलन की तुम॑ न डारहु प्रभ करते ॥3॥4॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: मलार महला 5 ॥ हे भाई ! राजाओं से लेकर कीड़ियों तक। कीड़ियों से ले के इन्द्र देवता तक (कोई भी हो) पाप कर के (सभी) गर्भ जोनि में पड़ते हैं (किसी का लिहाज नहीं हो सकता)। हे भाई ! जो भी प्राणी दया-के-समुंद्र प्रभू को छोड़ कर और-और को पूजते हैं। वे ईश्वर के चोर हैं वे अपनी आत्मा के साथ घात करते हैं। 1। हे भाई ! जो मनुष्य परमात्मा को भुलाते हैं वे दुखी हो-हो के आत्मिक मौत सहेड़ते रहते हैं। वे मनुष्य अनेकों वार कई जूनियों में भटकते फिरते हैं। (इस चक्कर में से बचने के लिए) वे किसी का भी आसरा प्राप्त नहीं कर सकते। 1। रहाउ। हे भाई ! मालिक प्रभू को छोड़ के जो किसी और को मन में बसाते हैं वे मूर्ख हैं वे गधे हैं। (प्रभू के बिना किसी अन्य की पूजा कागज़ की बेड़ी में चढ़ के समुंद्र से पार लांघने के समान है) कागज़ की बेड़ी पर (चढ़ के) कैसे संसार-समुंद्र से पार लांघ सकते हैं। वे बेकार में ही कहते हैं कि हम पार लांघ रहे हैं। 2। हे नानक ! शिव। ब्रहमा। दैत्य। देवतागण- ये जितने भी हैं (परमात्मा का नाम भुला के सब) आत्मिक मौत की आग में जलते हैं (किसी का भी लिहाज़ नहीं होता)। हे भाई ! प्रभू-दर पर अरदास करते रहो- हे प्रभू ! अपने कमल-फूल जैसे सुंदर चरणों की शरण से (हमें) ना हटाओ। 3। 4।
रागु मलार महला 5 दुपदे घरु 1 ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ प्रभ मेरे ओइ बैरागी तिआगी ॥ हउ इकु खिनु तिसु बिनु रहि न सकउ प्रीति हमारी लागी ॥1॥ रहाउ ॥ उन कै संगि मोहि प्रभु चिति आवै संत प्रसादि मोहि जागी ॥ सुनि उपदेसु भए मन निरमल गुन गाए रंगि रांगी ॥1॥ इहु मनु देइ कीए संत मीता क्रिपाल भए बडभागंी ॥ महा सुखु पाइआ बरनि न साकउ रेनु नानक जन पागी ॥2॥1॥5॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: रागु मलार महला 5 दुपदे घरु 1 सतिगुर प्रसादि ॥ हे भाई ! जो मनुष्य मेरे प्रभू के प्रीतिवान होते हैं वे माया के मोह से बचे रहते हैं। हे भाई ! (उनकी कृपा से) मैं (भी) उस प्रभू (की याद) के बिना एक छिन भर भी नहीं रह सकता। मेरी (भी उसके साथ) प्रीति लगी हुई है। 1। रहाउ। हे भाई ! (प्रभू के प्रीतवान) उन (संतजनों) की संगति में (रह के) मेरे चित्त में परमात्मा आ बसता है। संत जनों की किरपा से मुझे (माया के मोह की नींद में से) जाग आ गई है। (उनका) उपदेश सुन के मन पवित्र हो जाते हैं (प्रभू के प्रेम-) रंग में रंगीज के (मनुष्य प्रभू के) गुण गाने लग जाते हैं। 1। हे भाई ! (अपना) यह मन हवाले करके संत जनों को मित्र बनाया जा सकता है। (संत जन) बड़े भाग्य वालों पर दयावान हो जाते हैं। हे नानक ! (कह-) मैं संत जनों के चरणों की धूड़ (सदा माँगता हूँ। संत जनों की कृपा से) मैंने इतना महान आनंद प्राप्त किया है कि मैं उसको बयान नहीं कर सकता। 2। 1। 5।
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: मलार महला 5 ॥ हे माँ ! मुझे (भी) प्रीतम प्रभू मिला दे। जिन (संत-जन-सहेलियों) के (हृदय) घर में सुंदर प्रभू आ बसता है वे सारी सखियाँ आत्मिक आनंद में मगन रहती हें। 1। रहाउ। हे माँ ! मेरे में निरे अवगुण हैं (फिर भी वह) प्रभू सदा दयावान (रहता) है। मैं गुण-हीन में कोई ऐसी समझदारी नहीं (कि उस प्रभू को मिल सकूँ। पर ज़बानी हवा में बातें करके) मैं उनकी बराबरी करती हूँ। जो प्यारे (प्रभू) के साथ रति होई हुई हैं- यह तो मेरे अहम् की ढीठता है। 1। हे नानक ! (कह- हे माँ ! अब) मैंने मान त्याग दिया है। मैंने सिर्फ सुखदाते गुरू सतिगुरू पुरख की शरण ताक ली है। (उस गुरू ने) आँख झपकने जितने समय में ही मेरा सारा दुख काट दिया है। (अब) मेरी (जिंदगी की) रात आनंद में बीत रही है। 2। 2। 6।
मलार महला 5 ॥ बरसु मेघ जी तिलु बिलमु न लाउ ॥ बरसु पिआरे मनहि सधारे होइ अनदु सदा मनि चाउ ॥1॥ रहाउ ॥ हम तेरी धर सुआमीआ मेरे तू किउ मनहु बिसारे ॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: मलार महला 5 ॥ हे नाम-जल के भण्डार सतिगुरू जी ! (मेरे हृदय में नाम-जल की) बरखा कर। रक्ती भर भी ढील ना कर। हे प्यारे गुरू ! हे मेरे मन को सहारा देने वाले गुरू ! (नाम-जल की) बरखा कर। (इस बरखा से) मेरे मन में सदा खुशी होती है सदा आनंद पैदा होता है। 1। रहाउ। हे मेरे स्वामी प्रभू ! मुझे आपका ही आसरा है। आप मुझे अपने मन से ना बिसार।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।
अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।
इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे सखी ! जब से प्यारे-प्रभू जी मेरे हृदय-घर में आ बसे हैं।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।