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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 1267 · मलार

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अंग
1267
मलार
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  1. जब प्रिअ आइ बसे ग्रिहि आसनि तब हम मंगलु गाइआ ॥
  2. राज ते कीट कीट ते सुरपति करि दोख जठर कउ भरते ॥
  3. प्रभ मेरे ओइ बैरागी तिआगी ॥
  4. माई मोहि प्रीतमु देहु मिलाई ॥
  5. बरसु मेघ जी तिलु बिलमु न लाउ ॥

जब प्रिअ आइ बसे ग्रिहि आसनि तब हम मंगलु गाइआ ॥

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जब प्रिअ आइ बसे ग्रिहि आसनि तब हम मंगलु गाइआ ॥
मीत साजन मेरे भए सुहेले प्रभु पूरा गुरू मिलाइआ ॥3॥
सखी सहेली भए अनंदा गुरि कारज हमरे पूरे ॥
कहु नानक वरु मिलिआ सुखदाता छोडि न जाई दूरे ॥4॥3॥

हिन्दी अर्थ: हे सखी ! जब से प्यारे-प्रभू जी मेरे हृदय-घर में आ बसे हैं। मेरे हृदय-तख़्त पर आ बिराजे हैं। तब से मैं उसकी सिफत-सालाह के गीत गाती हूँ। गुरू ने मुझे पूर्ण प्रभू से मिला दिया है। (अब) मेरी सारी इन्द्रियों सुखद (शांत) हो गई हैं। 3। हे नानक ! कह- (हे सखी !) गुरू ने मेरे सारे काम सँवार दिए हैं। मेरी सारी इन्द्रियों को आनंद प्राप्त हो गया है। सारे सुख देने वाला प्रभू-पति मुझे मिल गया है। अब वह मुझे छोड़ के कहीं दूर नहीं जाता। 4। 3।

राज ते कीट कीट ते सुरपति करि दोख जठर कउ भरते ॥

मलार महला 5 ॥
राज ते कीट कीट ते सुरपति करि दोख जठर कउ भरते ॥
क्रिपा निधि छोडि आन कउ पूजहि आतम घाती हरते ॥1॥
हरि बिसरत ते दुखि दुखि मरते ॥
अनिक बार भ्रमहि बहु जोनी टेक न काहू धरते ॥1॥ रहाउ ॥
तिआगि सुआमी आन कउ चितवत मूड़ मुगध खल खर ते ॥
कागर नाव लंघहि कत सागरु ब्रिथा कथत हम तरते ॥2॥
सिव बिरंचि असुर सुर जेते काल अगनि महि जरते ॥
नानक सरनि चरन कमलन की तुम॑ न डारहु प्रभ करते ॥3॥4॥

हिन्दी अर्थ: मलार महला 5 ॥ हे भाई ! राजाओं से लेकर कीड़ियों तक। कीड़ियों से ले के इन्द्र देवता तक (कोई भी हो) पाप कर के (सभी) गर्भ जोनि में पड़ते हैं (किसी का लिहाज नहीं हो सकता)। हे भाई ! जो भी प्राणी दया-के-समुंद्र प्रभू को छोड़ कर और-और को पूजते हैं। वे ईश्वर के चोर हैं वे अपनी आत्मा के साथ घात करते हैं। 1। हे भाई ! जो मनुष्य परमात्मा को भुलाते हैं वे दुखी हो-हो के आत्मिक मौत सहेड़ते रहते हैं। वे मनुष्य अनेकों वार कई जूनियों में भटकते फिरते हैं। (इस चक्कर में से बचने के लिए) वे किसी का भी आसरा प्राप्त नहीं कर सकते। 1। रहाउ। हे भाई ! मालिक प्रभू को छोड़ के जो किसी और को मन में बसाते हैं वे मूर्ख हैं वे गधे हैं। (प्रभू के बिना किसी अन्य की पूजा कागज़ की बेड़ी में चढ़ के समुंद्र से पार लांघने के समान है) कागज़ की बेड़ी पर (चढ़ के) कैसे संसार-समुंद्र से पार लांघ सकते हैं। वे बेकार में ही कहते हैं कि हम पार लांघ रहे हैं। 2। हे नानक ! शिव, ब्रहमा, दैत्य। देवतागण- ये जितने भी हैं (परमात्मा का नाम भुला के सब) आत्मिक मौत की आग में जलते हैं (किसी का भी लिहाज़ नहीं होता)। हे भाई ! प्रभू-दर पर अरदास करते रहो- हे प्रभू ! अपने कमल-फूल जैसे सुंदर चरणों की शरण से (हमें) ना हटाओ। 3। 4।

प्रभ मेरे ओइ बैरागी तिआगी ॥

रागु मलार महला 5 दुपदे घरु 1
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
प्रभ मेरे ओइ बैरागी तिआगी ॥
हउ इकु खिनु तिसु बिनु रहि न सकउ प्रीति हमारी लागी ॥1॥ रहाउ ॥
उन कै संगि मोहि प्रभु चिति आवै संत प्रसादि मोहि जागी ॥
सुनि उपदेसु भए मन निरमल गुन गाए रंगि रांगी ॥1॥
इहु मनु देइ कीए संत मीता क्रिपाल भए बडभागंी ॥
महा सुखु पाइआ बरनि न साकउ रेनु नानक जन पागी ॥2॥1॥5॥

हिन्दी अर्थ: रागु मलार महला 5 दुपदे घरु 1 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे भाई ! जो मनुष्य मेरे प्रभू के प्रीतिवान होते हैं वे माया के मोह से बचे रहते हैं। हे भाई ! (उनकी कृपा से) मैं (भी) उस प्रभू (की याद) के बिना एक छिन भर भी नहीं रह सकता। मेरी (भी उसके साथ) प्रीति लगी हुई है। 1। रहाउ। हे भाई ! (प्रभू के प्रीतवान) उन (संतजनों) की संगति में (रह के) मेरे चित्त में परमात्मा आ बसता है। संत जनों की किरपा से मुझे (माया के मोह की नींद में से) जाग आ गई है। (उनका) उपदेश सुन के मन पवित्र हो जाते हैं (प्रभू के प्रेम-) रंग में रंगीज के (मनुष्य प्रभू के) गुण गाने लग जाते हैं। 1। हे भाई ! (अपना) यह मन हवाले करके संत जनों को मित्र बनाया जा सकता है। (संत जन) बड़े भाग्य वालों पर दयावान हो जाते हैं। हे नानक ! (कह-) मैं संत जनों के चरणों की धूड़ (सदा माँगता हूँ। संत जनों की कृपा से) मैंने इतना महान आनंद प्राप्त किया है कि मैं उसको बयान नहीं कर सकता। 2। 1। 5।

माई मोहि प्रीतमु देहु मिलाई ॥

मलार महला 5 ॥
माई मोहि प्रीतमु देहु मिलाई ॥
सगल सहेली सुख भरि सूती जिह घरि लालु बसाई ॥1॥ रहाउ ॥
मोहि अवगन प्रभु सदा दइआला मोहि निरगुनि किआ चतुराई ॥
करउ बराबरि जो प्रिअ संगि रातंी इह हउमै की ढीठाई ॥1॥
भई निमाणी सरनि इक ताकी गुर सतिगुर पुरख सुखदाई ॥
एक निमख महि मेरा सभु दुखु काटिआ नानक सुखि रैनि बिहाई ॥2॥2॥6॥

हिन्दी अर्थ: मलार महला 5 ॥ हे माँ ! मुझे (भी) प्रीतम प्रभू मिला दे। जिन (संत-जन-सहेलियों) के (हृदय) घर में सुंदर प्रभू आ बसता है वे सारी सखियाँ आत्मिक आनंद में मगन रहती हें। 1। रहाउ। हे माँ ! मेरे में निरे अवगुण हैं (फिर भी वह) प्रभू सदा दयावान (रहता) है। मैं गुण-हीन में कोई ऐसी समझदारी नहीं (कि उस प्रभू को मिल सकूँ। पर ज़बानी हवा में बातें करके) मैं उनकी बराबरी करती हूँ। जो प्यारे (प्रभू) के साथ रति होई हुई हैं- यह तो मेरे अहम् की ढीठता है। 1। हे नानक ! (कह- हे माँ ! अब) मैंने मान त्याग दिया है। मैंने सिर्फ सुखदाते गुरू सतिगुरू पुरख की शरण ताक ली है। (उस गुरू ने) आँख झपकने जितने समय में ही मेरा सारा दुख काट दिया है। (अब) मेरी (जिंदगी की) रात आनंद में बीत रही है। 2। 2। 6।

बरसु मेघ जी तिलु बिलमु न लाउ ॥

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मलार महला 5 ॥
बरसु मेघ जी तिलु बिलमु न लाउ ॥
बरसु पिआरे मनहि सधारे होइ अनदु सदा मनि चाउ ॥1॥ रहाउ ॥
हम तेरी धर सुआमीआ मेरे तू किउ मनहु बिसारे ॥

हिन्दी अर्थ: मलार महला 5 ॥ हे नाम-जल के भण्डार सतिगुरू जी ! (मेरे हृदय में नाम-जल की) बरखा कर। रक्ती भर भी ढील ना कर। हे प्यारे गुरू ! हे मेरे मन को सहारा देने वाले गुरू ! (नाम-जल की) बरखा कर। (इस बरखा से) मेरे मन में सदा खुशी होती है सदा आनंद पैदा होता है। 1। रहाउ। हे मेरे स्वामी प्रभू ! मुझे आपका ही आसरा है। आप मुझे अपने मन से ना बिसार।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1267 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।