हरि हम गावहि हरि हम बोलहि अउरु दुतीआ प्रीति हम तिआगी ॥1॥ मनमोहन मोरो प्रीतम रामु हरि परमानंदु बैरागी ॥ हरि देखे जीवत है नानकु इक निमख पलो मुखि लागी ॥2॥2॥9॥9॥13॥9॥31॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: मैं परमात्मा के सिफत-सालाह के ही गीत गाता हूँ। मैं परमात्मा का नाम ही जपता हूँ। प्रभू के बिना किसी और के प्रति प्यार मैंने छोड़ दिया है। 1। हे भाई ! सबके मन को मोह लेने वाला परमात्मा ही मेरा प्रीतम है। वह परमात्मा सबसे ऊँचे आनंद का मालिक है। माया के प्रभाव से ऊँचा रहने वाला है। हे भाई ! अगर उस परमात्मा के दर्शन आँख झपकने जितने समय के लिए भी हो जाए। एक पल भर के लिए हैं जाए। तो नानक उसके दर्शन करके आत्मिक जीवन हासिल कर लेता है। 2। 2। 9। 9। 13। 9। 31।
रागु मलार महला 5 चउपदे घरु 1 ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ किआ तू सोचहि किआ तू चितवहि किआ तूं करहि उपाए ॥ ता कउ कहहु परवाह काहू की जिह गोपाल सहाए ॥1॥ बरसै मेघु सखी घरि पाहुन आए ॥ मोहि दीन क्रिपा निधि ठाकुर नव निधि नामि समाए ॥1॥ रहाउ ॥ अनिक प्रकार भोजन बहु कीए बहु बिंजन मिसटाए ॥ करी पाकसाल सोच पवित्रा हुणि लावहु भोगु हरि राए ॥2॥ दुसट बिदारे साजन रहसे इहि मंदिर घर अपनाए ॥ जउ ग्रिहि लालु रंगीओ आइआ तउ मै सभि सुख पाए ॥3॥ संत सभा ओट गुर पूरे धुरि मसतकि लेखु लिखाए ॥ जन नानक कंतु रंगीला पाइआ फिरि दूखु न लागै आए ॥4॥1॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: रागु मलार महला 5 चउपदे घरु 1 सतिगुर प्रसादि ॥ हे भाई ! (परमात्मा की शरण छोड़ के) आप और क्या सोचें सोचता है। आप और कौन से उपाय चितवता है। आप और कौन से तरीके अपनाता है। (देख।) जिस (मनुष्य) का सहाई परमात्मा खुद बनता है उसको। बता। किसकी परवाह रह जाती है। 1। हे सहेली ! (मेरे हृदय-) घर में प्रभू-पति जी टिके हैं (मेरे अंदर से तपष मिट गई है। ऐसा प्रतीत होता है जैसे मेरे अंदर उसकी मेहर के) बादल बरस रहे हैं। हे कृपा के खजाने प्रभू ! हे मालिक प्रभू ! मुझ कंगाल को अपने नाम में लीन करे रख (यह नाम ही मेरे वास्ते) नौ खजाने है। 1। रहाउ। जैसे कोई स्त्री अपने पति के लिए अनेकों किसमों के स्वादिष्ट खाने तैयार करती है। बड़ी स्वच्छता से रसोई साफ-सुथरी बनाती है। हे प्रभू पातशाह ! (आपके प्यार में मैंने अपने हृदय की रसोई को तैयार किया है। मेहर कर। और इसको) अब परवान कर। 2। हे सखी ! इन (शरीर रूपी) घर-मंदिरों को (जब प्रभू-पति) अपनाता है (इनमें अपना प्रकाश करता है। तब इनमें से कामादिक) दुष्ट नाश हो जाते हैं (और देवी गुण) सज्जन प्रफुल्लित हो जाते हैं। हे सखी ! जब से मेरे हृदय-घर में सुंदर-लाल (प्रभू) आ बसा है। तब से मैंने सारे सुख हासिल कर लिए हैं। 3। हे दास नानक ! धुर-दरगाह से जिस जीव के माथे पर साध-संगति में पूरे गुरू की ओट का लेख लिखा होता है। उसको सोहाना प्रभू-पति मिल जाता है। उसको फिर कोई दुख पोह नहीं सकता। 4। 1।
मलार महला 5 ॥ खीर अधारि बारिकु जब होता बिनु खीरै रहनु न जाई ॥ सारि सम॑ालि माता मुखि नीरै तब ओहु त्रिपति अघाई ॥1॥ हम बारिक पिता प्रभु दाता ॥ भूलहि बारिक अनिक लख बरीआ अन ठउर नाही जह जाता ॥1॥ रहाउ ॥ चंचल मति बारिक बपुरे की सरप अगनि कर मेलै ॥ माता पिता कंठि लाइ राखै अनद सहजि तब खेलै ॥2॥ जिस का पिता तू है मेरे सुआमी तिसु बारिक भूख कैसी ॥ नव निधि नामु निधानु ग्रिहि तेरै मनि बांछै सो लैसी ॥3॥ पिता क्रिपालि आगिआ इह दीनी बारिकु मुखि मांगै सो देना ॥ नानक बारिकु दरसु प्रभ चाहै मोहि ह्रिदै बसहि नित चरना ॥4॥2॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: मलार महला 5 ॥ हे भाई ! जब (कोई) बच्चा दूध के आसरे होता है (तब वह) दूध के बिना नहीं रह सकता। (जब उसकी) माँ (उसकी) सार ले के (उसकी) संभाल कर के (उसके) मुँह में अपना थन डालती है। तब वह (दूध से) अच्छी तरह तृप्त हो जाता है। 1। हे भाई ! दातार प्रभू (हमारा) पिता है। हम (जीव उस के) बच्चे हैं। बच्चे अनेकों बार लाखों बार भूलें करते हैं (पिता-प्रभू के बिना उनकी कोई) और जगह नहीं। जहाँ वे जा सकें। 1। रहाउ। हे भाई ! बेचारे बच्चे की अकल होछी होती है। वह (जब माता-पिता से परे होता है तब) साँप को हाथ से पकड़ना चाहता है। आग में हाथ डालता है (और। दुखी होता है)। (पर। जब उसको) माँ गले से लगा के रखती है पिता गले से लगा के रखता है (भाव। जब उसके माता-पिता उसका ध्यान रखते हैं) तब वह आनंद से निश्चंत हो के खेलता है। 2। हे मेरे मालिक प्रभू ! जिस (बच्चे) का आप पिता (की तरह रखवाला) है। उस बच्चे को कोई (मायावी) भूख नहीं रह जाती। आपके घर में आपका नाम-खजाना है (यही है) नौ खजाने ! वह जो कुछ अपने मन में (आपसे) माँगता है। वह कुछ हासिल कर लेता है। 3। हे भाई ! कृपालु पिता-प्रभू ने यह हुकम रखा है। कि बालक जो कुछ माँगता है वह उसको दे देता है। हे प्रभू ! आपका बच्चा नानक आपके दर्शन चाहता है (और। कहता है- हे प्रभू !) आपके चरण मेरे हृदय में बसे रहें। 4।
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: मलार महला 5 ॥ हे सखी ! अब मैंने आत्मिक जीवन को सुंदर बनाने का सारा काम शुरू कर दिया है। मुझे अब मालिक प्रभू का (हर वक्त) सहारा है। मैंने अब सारे चिंता-फिक्र खत्म कर दिए हैं। (अब मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि सफलता के) सारे ढंगों ने मिल के (मेरी हरेक सफलता के लिए) उद्यम किया हुआ है। 1। हे सखी ! जब मैंने प्यारे प्रभू जी का मुँह देख लिया (दर्शन कर लिए)। मेरे हृदय-घर में आनंद ही आनंद बन गया। मेरे अंदर शांति पैदा हो गई। मेरे अंदर (आत्मिक जीवन की सूझ का) दिन चढ़ गया। (मेरे अंदर इस तरह का आनंद बन गया। जैसे कि अंदर) कानों को सुंदर लगने वाली (किसी) बाजे कीआवाज़ सुनी जा रही है। 1। रहाउ। हे सखी ! पूरे ध्यान से मैंने अपनी सारी इन्द्रियों को खबसूरत बना लिया है। मैं संतों के पास जा के (प्रभू-पति के मिलाप की बातें) पूछती रहती हूँ। तलाश करते-करते मुझे प्रभू-पति मिल गया है। अब मैं उसके चरणों पर गिर कर उसकी भगती करती रहती हूँ। 2।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।
अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “मैं परमात्मा के सिफत-सालाह के ही गीत गाता हूँ।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।