लुल्ला परिवारLulla Family
English
सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 1266 · मलार

इस पृष्ठ पर
अंग
1266
मलार
अंग बदलें या अंश चुनें · 4 अंश

1 से 1430 तक कोई अंक लिखिए।

  1. हरि हम गावहि हरि हम बोलहि अउरु दुतीआ प्रीति हम तिआगी ॥1॥
  2. किआ तू सोचहि किआ तू चितवहि किआ तूं करहि उपाए ॥
  3. खीर अधारि बारिकु जब होता बिनु खीरै रहनु न जाई ॥
  4. सगल बिधी जुरि आहरु करिआ तजिओ सगल अंदेसा ॥

हरि हम गावहि हरि हम बोलहि अउरु दुतीआ प्रीति हम तिआगी ॥1॥

अंग 1265 से चला आ रहा अंश

हरि हम गावहि हरि हम बोलहि अउरु दुतीआ प्रीति हम तिआगी ॥1॥
मनमोहन मोरो प्रीतम रामु हरि परमानंदु बैरागी ॥
हरि देखे जीवत है नानकु इक निमख पलो मुखि लागी ॥2॥2॥9॥9॥13॥9॥31॥

हिन्दी अर्थ: मैं परमात्मा के सिफत-सालाह के ही गीत गाता हूँ। मैं परमात्मा का नाम ही जपता हूँ। प्रभू के बिना किसी और के प्रति प्यार मैंने छोड़ दिया है। 1। हे भाई ! सबके मन को मोह लेने वाला परमात्मा ही मेरा प्रीतम है। वह परमात्मा सबसे ऊँचे आनंद का मालिक है। माया के प्रभाव से ऊँचा रहने वाला है। हे भाई ! अगर उस परमात्मा के दर्शन आँख झपकने जितने समय के लिए भी हो जाए। एक पल भर के लिए हो जाए। तो नानक उसके दर्शन करके आत्मिक जीवन हासिल कर लेता है। 2। 2। 9। 9। 13। 9। 31।

किआ तू सोचहि किआ तू चितवहि किआ तूं करहि उपाए ॥

रागु मलार महला 5 चउपदे घरु 1
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
किआ तू सोचहि किआ तू चितवहि किआ तूं करहि उपाए ॥
ता कउ कहहु परवाह काहू की जिह गोपाल सहाए ॥1॥
बरसै मेघु सखी घरि पाहुन आए ॥
मोहि दीन क्रिपा निधि ठाकुर नव निधि नामि समाए ॥1॥ रहाउ ॥
अनिक प्रकार भोजन बहु कीए बहु बिंजन मिसटाए ॥
करी पाकसाल सोच पवित्रा हुणि लावहु भोगु हरि राए ॥2॥
दुसट बिदारे साजन रहसे इहि मंदिर घर अपनाए ॥
जउ ग्रिहि लालु रंगीओ आइआ तउ मै सभि सुख पाए ॥3॥
संत सभा ओट गुर पूरे धुरि मसतकि लेखु लिखाए ॥
जन नानक कंतु रंगीला पाइआ फिरि दूखु न लागै आए ॥4॥1॥

हिन्दी अर्थ: रागु मलार महला 5 चउपदे घरु 1 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे भाई ! (परमात्मा की शरण छोड़ के) आप और क्या-क्या सोचते हैं। आप और कौन से उपाय चितवते हैं। आप और कौन से तरीके अपनाते हैं। (देख।) जिस (मनुष्य) का सहाई परमात्मा खुद बनता है उसको। बता। किसकी परवाह रह जाती है। 1। हे सहेली ! (मेरे हृदय-) घर में प्रभू-पति जी टिके हैं (मेरे अंदर से तपष मिट गई है। ऐसा प्रतीत होता है जैसे मेरे अंदर उसकी मेहर के) बादल बरस रहे हैं। हे कृपा के खजाने प्रभू ! हे मालिक प्रभू ! मुझ कंगाल को अपने नाम में लीन करे रख (यह नाम ही मेरे वास्ते) नौ खजाने है। 1। रहाउ। जैसे कोई स्त्री अपने पति के लिए अनेकों किसमों के स्वादिष्ट खाने तैयार करती है। बड़ी स्वच्छता से रसोई साफ-सुथरी बनाती है। हे प्रभू पातशाह ! (आपके प्यार में मैंने अपने हृदय की रसोई को तैयार किया है। मेहर कर। और इसको) अब परवान कर। 2। हे सखी ! इन (शरीर रूपी) घर-मंदिरों को (जब प्रभू-पति) अपनाता है (इनमें अपना प्रकाश करता है। तब इनमें से कामादिक) दुष्ट नाश हो जाते हैं (और देवी गुण) सज्जन प्रफुल्लित हो जाते हैं। हे सखी ! जब से मेरे हृदय-घर में सुंदर-लाल (प्रभू) आ बसा है। तब से मैंने सारे सुख हासिल कर लिए हैं। 3। हे दास नानक ! धुर-दरगाह से जिस जीव के माथे पर साध-संगति में पूरे गुरू की ओट का लेख लिखा होता है। उसको सोहाना प्रभू-पति मिल जाता है। उसको फिर कोई दुख पोह नहीं सकता। 4। 1।

खीर अधारि बारिकु जब होता बिनु खीरै रहनु न जाई ॥

मलार महला 5 ॥
खीर अधारि बारिकु जब होता बिनु खीरै रहनु न जाई ॥
सारि सम॑ालि माता मुखि नीरै तब ओहु त्रिपति अघाई ॥1॥
हम बारिक पिता प्रभु दाता ॥
भूलहि बारिक अनिक लख बरीआ अन ठउर नाही जह जाता ॥1॥ रहाउ ॥
चंचल मति बारिक बपुरे की सरप अगनि कर मेलै ॥
माता पिता कंठि लाइ राखै अनद सहजि तब खेलै ॥2॥
जिस का पिता तू है मेरे सुआमी तिसु बारिक भूख कैसी ॥
नव निधि नामु निधानु ग्रिहि तेरै मनि बांछै सो लैसी ॥3॥
पिता क्रिपालि आगिआ इह दीनी बारिकु मुखि मांगै सो देना ॥
नानक बारिकु दरसु प्रभ चाहै मोहि ह्रिदै बसहि नित चरना ॥4॥2॥

हिन्दी अर्थ: मलार महला 5 ॥ हे भाई ! जब (कोई) बच्चा दूध के आसरे होता है (तब वह) दूध के बिना नहीं रह सकता। (जब उसकी) माँ (उसकी) सार ले के (उसकी) संभाल कर के (उसके) मुँह में अपना थन डालती है। तब वह (दूध से) अच्छी तरह तृप्त हो जाता है। 1। हे भाई ! दातार प्रभू (हमारा) पिता है। हम (जीव उस के) बच्चे हैं। बच्चे अनेकों बार लाखों बार भूलें करते हैं (पिता-प्रभू के बिना उनकी कोई) और जगह नहीं। जहाँ वे जा सकें। 1। रहाउ। हे भाई ! बेचारे बच्चे की अकल होछी होती है। वह (जब माता-पिता से परे होता है तब) साँप को हाथ से पकड़ना चाहता है। आग में हाथ डालता है (और। दुखी होता है)। (पर। जब उसको) माँ गले से लगा के रखती है पिता गले से लगा के रखता है (भाव। जब उसके माता-पिता उसका ध्यान रखते हैं) तब वह आनंद से निश्चंत हो के खेलता है। 2। हे मेरे मालिक प्रभू ! जिस (बच्चे) के आप पिता (की तरह रखवाले) हैं। उस बच्चे को कोई (मायावी) भूख नहीं रह जाती। आपके घर में आपका नाम-खजाना है (यही है) नौ खजाने ! वह जो कुछ अपने मन में (आपसे) माँगता है। वह कुछ हासिल कर लेता है। 3। हे भाई ! कृपालु पिता-प्रभू ने यह हुकम रखा है। कि बालक जो कुछ माँगता है वह उसको दे देता है। हे प्रभू ! आपका बच्चा नानक आपके दर्शन चाहता है (और। कहता है- हे प्रभू !) आपके चरण मेरे हृदय में बसे रहें। 4।

सगल बिधी जुरि आहरु करिआ तजिओ सगल अंदेसा ॥

अगले अंग पर आगे पढ़िए →

मलार महला 5 ॥
सगल बिधी जुरि आहरु करिआ तजिओ सगल अंदेसा ॥
कारजु सगल अरंभिओ घर का ठाकुर का भारोसा ॥1॥
सुनीऐ बाजै बाज सुहावी ॥
भोरु भइआ मै प्रिअ मुख पेखे ग्रिहि मंगल सुहलावी ॥1॥ रहाउ ॥
मनूआ लाइ सवारे थानां पूछउ संता जाए ॥
खोजत खोजत मै पाहुन मिलिओ भगति करउ निवि पाए ॥2॥

हिन्दी अर्थ: मलार महला 5 ॥ हे सखी ! अब मैंने आत्मिक जीवन को सुंदर बनाने का सारा काम शुरू कर दिया है। मुझे अब मालिक प्रभू का (हर वक्त) सहारा है। मैंने अब सारे चिंता-फिक्र खत्म कर दिए हैं। (अब मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि सफलता के) सारे ढंगों ने मिल के (मेरी हरेक सफलता के लिए) उद्यम किया हुआ है। 1। हे सखी ! जब मैंने प्यारे प्रभू जी का मुँह देख लिया (दर्शन कर लिए)। मेरे हृदय-घर में आनंद ही आनंद बन गया। मेरे अंदर शांति पैदा हो गई। मेरे अंदर (आत्मिक जीवन की सूझ का) दिन चढ़ गया। (मेरे अंदर इस तरह का आनंद बन गया। जैसे कि अंदर) कानों को सुंदर लगने वाली (किसी) बाजे कीआवाज़ सुनी जा रही है। 1। रहाउ। हे सखी ! पूरे ध्यान से मैंने अपनी सारी इन्द्रियों को खबसूरत बना लिया है। मैं संतों के पास जा के (प्रभू-पति के मिलाप की बातें) पूछती रहती हूँ। तलाश करते-करते मुझे प्रभू-पति मिल गया है। अब मैं उसके चरणों पर गिर कर उसकी भगती करती रहती हूँ। 2।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 4: गुरु राम दास जी; महला 5: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1266 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।