Lulla Family

अंग 1265

अंग
1265
राग मलार
राग: मलार · रचयिता: Guru Raam Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
जन नानक कउ प्रभि किरपा धारी बिखु डुबदा काढि लइआ ॥4॥6॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: हे नानक ! (कह- हे भाई !) प्रभू ने जिस सेवक पर मेहर की। उसको आत्मिक मौत लाने वाले (माया के मोह के) जहर-समुंद्र में डूबते को बाहर निकाल लिया। 4। 6।
मलार महला 4 ॥
गुर परसादी अंम्रितु नही पीआ त्रिसना भूख न जाई ॥
मनमुख मूड़॑ जलत अहंकारी हउमै विचि दुखु पाई ॥
आवत जात बिरथा जनमु गवाइआ दुखि लागै पछुताई ॥
जिस ते उपजे तिसहि न चेतहि ध्रिगु जीवणु ध्रिगु खाई ॥1॥
प्राणी गुरमुखि नामु धिआई ॥
हरि हरि क्रिपा करे गुरु मेले हरि हरि नामि समाई ॥1॥ रहाउ ॥
मनमुख जनमु भइआ है बिरथा आवत जात लजाई ॥
कामि क्रोधि डूबे अभिमानी हउमै विचि जलि जाई ॥
तिन सिधि न बुधि भई मति मधिम लोभ लहरि दुखु पाई ॥
गुर बिहून महा दुखु पाइआ जम पकरे बिललाई ॥2॥
हरि का नामु अगोचरु पाइआ गुरमुखि सहजि सुभाई ॥
नामु निधानु वसिआ घट अंतरि रसना हरि गुण गाई ॥
सदा अनंदि रहै दिनु राती एक सबदि लिव लाई ॥
नामु पदारथु सहजे पाइआ इह सतिगुर की वडिआई ॥3॥
सतिगुर ते हरि हरि मनि वसिआ सतिगुर कउ सद बलि जाई ॥
मनु तनु अरपि रखउ सभु आगै गुर चरणी चितु लाई ॥
अपणी क्रिपा करहु गुर पूरे आपे लैहु मिलाई ॥
हम लोह गुर नाव बोहिथा नानक पारि लंघाई ॥4॥7॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: मलार महला 4 ॥ हे भाई ! (जिस मनुष्य ने) गुरू की मेहर से आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल (कभी) नहीं पीया। उसकी (माया वाली) भूख-प्यास दूर नहीं होती। अपने मन के पीछे चलने वाला मूर्ख मनुष्य अहंकार में जलता रहता है। अहमं् में फसा हुआ दुख सहता रहता है। जनम-मरण के चक्करों में पड़ा वह मनुष्य अपना जीवन व्यर्थ गवाता है। दुखी होता है और हाथ मलता है। (ऐसे मनुष्य) जिस (प्रभू) से पैदा हुए हैं उसको (कभी) याद नहीं करते। उनकी जिंदगी धिक्कार-योग्य रहती है। उनका खाया-पीया भी उनके लिए तिरस्कार ही कमाता है। 1। हे प्राणी ! गुरू की शरण पड़ कर परमात्मा का नाम सिमरा कर। हे भाई ! जिस मनुष्य पर हरी कृपा करता है। उसको वह गुरू मिलाता है। और। वह मनुष्य परमात्मा के नाम में लीन रहता है। 1। रहाउ। हे भाई ! अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्यों का जीवन व्यर्थ जाता है। जनम-मरण के चक्करों में फसे हुए ही वे शर्म-सार हुए रहते हैं। वे मनुष्य काम-क्रोध-अहंकार में ही डूबे रहते हैं। अहंकार में फंसे हुओं का आत्मिक जीवन जल (के राख हो) जाता है। (अपने मन के पीछे चलने वाले) उन मनुष्यों को (जीवन में) सफलता हासिल नहीं होती। (सफलता वाली) बुद्धि उनको प्राप्त नहीं होती। उनकी मति नीच ही रहती है। अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य लोभ की लहरों में (फसा हुआ) दुख पाता है। गुरू की शरण आए बिना मनमुख मनुष्य बहुत दुख पाता है। जब उसको जम आ पकड़ते हैं तब वह बिलकता है। 2। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है। वह आत्मिक अडोलता में (टिक के) प्रेम में (लीन हो के) उस परमात्मा का नाम (-खजाना) हासिल कर लेता है जिस तक ज्ञान-इन्द्रियों की पहुँच नहीं हो सकती। उस मनुष्य के हृदय में नाम-खजाना आ बसता है। वह मनुष्य (अपनी) जीभ से परमात्मा के गुण गाता रहता है। एक परमात्मा की सिफत-सालाह के शबद में सुरति जोड़ के वह मनुष्य दिन-रात सदा आनंद में रहता है। आत्मिक अडोलता से वह मनुष्य कीमती हरि-नाम प्राप्त कर लेता है। हे भाई ! यह सारी गुरू की ही बरकति है। 3। हे भाई ! मैं गुरू से सदा बलिहार जाता हूँ। गुरू के द्वारा ही परमात्मा (का नाम मेरे) मन में आ बसा है। मैं अपना मन अपना तन सब कुछ गुरू के आगे भेट रखता हूँ। मैं गुरू के चरणों में अपना चित्त जोड़ता हूँ। हे नानक ! (कह-) हे पूरे गुरू ! (मेरे पर) अपनी मेहर करो। मुझे खुद ही (अपने चरणों में) मिलाए रखो। हे भाई ! हम जीव (विकारों से भरे हो चुके) लोहा हैं। गुरू बेड़ी है गुरू जहाज़ है जो (संसार-समुंद्र से) पार लंघाता है। 4। 7।
मलार महला 4 पड़ताल घरु 3
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
हरि जन बोलत स्रीराम नामा मिलि साधसंगति हरि तोर ॥1॥ रहाउ ॥
हरि धनु बनजहु हरि धनु संचहु जिसु लागत है नही चोर ॥1॥
चात्रिक मोर बोलत दिनु राती सुनि घनिहर की घोर ॥2॥
जो बोलत है म्रिग मीन पंखेरू सु बिनु हरि जापत है नही होर ॥3॥
नानक जन हरि कीरति गाई छूटि गइओ जम का सभ सोर ॥4॥1॥8॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: मलार महला 4 पड़ताल घरु 3 सतिगुर प्रसादि ॥ हे हरी ! आपके भगत आपकी साध-संगति में मिल के आपका नाम जपते हैं। 1। रहाउ। हे भाई ! (आप भी साध-संगति में) परमात्मा का नाम-धन खरीदो। प्रभू का नाम-धन संचित करो। (यह धन ऐसा है) कि इसको चोर चुरा नहीं सकते। 1। हे भाई ! (जैसे) पपीहे और मोर बादलों की गर्जना सुन के दिन-रात बोलते हैं। (वैसे ही आप भी साध-संगति में मिल के हरी का नाम जपा करो)। 2। हे भाई ! (वह परमात्मा ऐसा है कि) पशु-पक्षी-मछलियां आदि (धरती पर चलने वाले। पानी में रहने वाले। आकाश में उड़ने वाले सारे ही) जो बोलते हैं। परमात्मा (की दी हुई सक्ता) के बिना (किसी) और (की सक्ता से) नहीं बोलते। 3। हे नानक ! जिन भी हरी-सेवकों ने परमात्मा की सिफत-सालाह का गीत गाना शुरू कर दिया। (उनके लिए) जमदूतों का सारा शोर समाप्त हो गया (उनको जमदूतों का कोई डर नहीं रह गया)। 4। 1। 8।
मलार महला 4 ॥
राम राम बोलि बोलि खोजते बडभागी ॥
हरि का पंथु कोऊ बतावै हउ ता कै पाइ लागी ॥1॥ रहाउ ॥
हरि हमारो मीतु सखाई हम हरि सिउ प्रीति लागी ॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: मलार महला 4 ॥ हे भाई ! परमात्मा का नाम सदा उचारा कर। बड़े भाग्यों वाले हैं वे मनुष्य जो (परमात्मा के दर्शन करने के लिए) तलाश करते हैं। हे भाई ! मैं (तो) उस मनुष्य के चरणों में लगता हूँ जो मुझे परमात्मा का रास्ता बता दे। 1। रहाउ। हे भाई ! परमात्मा ही मेरा मित्र है मेरा मददगार है। परमात्मा के साथ (ही) मेरा प्यार बना हुआ है।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।

गुरु रामदास जी 1574 में गुरु-गद्दी पर बैठे और 1581 तक रहे। उन्हीं ने अमृतसर शहर बसाया, हरमंदिर साहिब की नींव रखी। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य प्रेम की तस्वीरें बार-बार लौटती हैं। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, उन्हीं की रचना है।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे नानक ! (कह- हे भाई !) प्रभू ने जिस सेवक पर मेहर की।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।