हरि बोलहु गुर के सिख मेरे भाई हरि भउजलु जगतु तरावै ॥1॥ रहाउ ॥ जो गुर कउ जनु पूजे सेवे सो जनु मेरे हरि प्रभ भावै ॥ हरि की सेवा सतिगुरु पूजहु करि किरपा आपि तरावै ॥2॥ भरमि भूले अगिआनी अंधुले भ्रमि भ्रमि फूल तोरावै ॥ निरजीउ पूजहि मड़ा सरेवहि सभ बिरथी घाल गवावै ॥3॥ ब्रहमु बिंदे सो सतिगुरु कहीऐ हरि हरि कथा सुणावै ॥ तिसु गुर कउ छादन भोजन पाट पटंबर बहु बिधि सति करि मुखि संचहु तिसु पुंन की फिरि तोटि न आवै ॥4॥ सतिगुरु देउ परतखि हरि मूरति जो अंम्रित बचन सुणावै ॥ नानक भाग भले तिसु जन के जो हरि चरणी चितु लावै ॥5॥4॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।
हिन्दी अर्थ: (इसलिए) हे गुरू के सिखो ! हे मेरे भाईयो ! (गुरू की शरण पड़ कर) परमात्मा का नाम जपा करो। परमात्मा संसार-समुंद्र से पार लंघा लेता है। 1। रहाउ। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू का आदर-सत्कार करता है गुरू की शरण पड़ता है। वह मनुष्य परमात्मा को प्यारा लगता है। हे भाई ! परमात्मा की सेवा-भक्ति किया करो। गुरू की शरण पड़े रहो (जो मनुष्य यह उद्यम करता है उसको प्रभू) मेहर करके आप पार लंघा लेता है। 2। हे भाई ! (गुरू-परमेश्वर को भुला के) मनुष्य भटक-भटक के (मूर्ति आदि की पूजा के लिए) फूल तोड़ता फिरता है। (ऐसे मनुष्य) भटकने के कारण गलत राह पर पड़े रहते हैं। आत्मिक जीवन की ओर से बेसमझ बने रहते हैं। उन्हें सही जीवन-मार्ग नहीं दिखाई देता। (वह अंधे मनुष्य) बेजान (मूर्तियों) को पूजते हैं। समाधियों को माथे टेकते रहते हैं। (ऐसा मनुष्य अपनी) सारी मेहनत व्यर्थ गवाता है। 3। हे भाई ! गुरू परमात्मा के साथ गहरी सांझ डाले रखता है। जगत उसको गुरू कहता है। गुरू जगत को परमात्मा की सिफतसालाह का उपदेश सुनाता है। हे भाई ! ऐसे गुरू के आगे कई किस्मों के कपड़े। खाणे। रेश्मी कपड़े श्रद्धा से भेट किया करो। इस भले काम की तोट नहीं आती। 4। हे नानक ! (कह- हे भाई !) जो गुरू आत्मिक जीवन देने वाले (सिफत-सालाह के) बचन सुनाता रहता है। वह तो साफ तौर पर परमात्मा का रूप ही दिखता है। उस मनुष्य के अच्छे भाग्य होते हैं जो (गुरू की शरण पड़ कर) परमात्मा के चरणों में चित्त जोड़े रखता है। 5। 4।
मलार महला 4 ॥ जिन॑ कै हीअरै बसिओ मेरा सतिगुरु ते संत भले भल भांति ॥ तिन॑ देखे मेरा मनु बिगसै हउ तिन कै सद बलि जांत ॥1॥ गिआनी हरि बोलहु दिनु राति ॥ तिन॑ की त्रिसना भूख सभ उतरी जो गुरमति राम रसु खांति ॥1॥ रहाउ ॥ हरि के दास साध सखा जन जिन मिलिआ लहि जाइ भरांति ॥ जिउ जल दुध भिंन भिंन काढै चुणि हंसुला तिउ देही ते चुणि काढै साधू हउमै ताति ॥2॥ जिन कै प्रीति नाही हरि हिरदै ते कपटी नर नित कपटु कमांति ॥ तिन कउ किआ कोई देइ खवालै ओइ आपि बीजि आपे ही खांति ॥3॥ हरि का चिहनु सोई हरि जन का हरि आपे जन महि आपु रखांति ॥ धनु धंनु गुरू नानकु समदरसी जिनि निंदा उसतति तरी तरांति ॥4॥5॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।
हिन्दी अर्थ: मलार महला 4 ॥ हे भाई ! जिनके हृदय में प्यारा गुरू बसा रहता है। वह मनुष्य पूरन तौर पर भले मनुष्य बन जाते हैं। हे भाई ! उनके दर्शन करके मेरा मन खिल उठता है। मैं तो उनसे सदा सदके जाता हूँ। 1। हे ज्ञानवान मनुष्य ! दिन-रात (हर वक्त) परमात्मा का नाम जपा कर। जो मनुष्य गुरू की मति ले के परमात्मा का नाम-रस खाते हैं। उनकी (मायावी) सारी तृष्णा सारी भूख (सारी भूख-प्यास) दूर हो जाती है। 1। रहाउ। हे भाई ! परमात्मा के भगत-जन (ऐसे) साध-मित्र (हैं)। जिनको मिलने से (मन की) भटकना दूर हो जाती है। हे भाई ! जैसे हंस पानी और दूध को (अपनी चोंच से) चुन के अलग-अलग कर देता है। वैसे ही साधु-मनुष्य शरीर में से अहंकार और ईष्या को चुन के बाहर निकाल देता है। 2। हे भाई ! जिन मनुष्यों के हृदय में परमात्मा का प्यार नहीं (बसता)। वे मनुष्य पाखण्डी बन जाते हैं। वे (माया आदि की खातिर) सदा (दूसरों के साथ) ठॅगी करते हैं। उनको और कोई मनुष्य (आत्मिक जीवन की खुराक) ना दे सकता है ना खिला सकता है। वे लोग (ठॅगी का बीज) खुद बीज के खुद ही (उसका फल सदा) खाते हैं। हे भाई ! (ऊँचे आत्मिक जीवन का जो) लक्षण परमात्मा का होता है (सिमरन की बरकति से) वही लक्षण परमात्मा के भगत का हो जाता है। प्रभू आप ही अपने आप को अपने सेवक में टिकाए रखता है। हे भाई ! सब जीवों में एक हरी की ज्योति देखने वाला गुरू नानक (हर वक्त) सलाहने-योग्य है। जिस ने खुद निंदा और खुशामद (की नदी) पार कर ली है और औरों को इसमें से पार लंघा देता है। 4। 5।
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।
हिन्दी अर्थ: मलार महला 4 ॥ हे भाई ! परमात्मा अपहुँच है। परमात्मा ज्ञानेन्द्रियों की पहुँच से परे है। उसका नाम (मनुष्य के जीवन को) ऊँचा (करने वाला) है। (जिस मनुष्य ने) गुरू की कृपा से (यह नाम) जपा है। (जिस मनुष्य ने) बड़े भाग्यों से गुरू की संगति प्राप्त की है। वह गुरू की संगति में रह के संसार-समुंद्र से पार लांघ गया है। 1। (अब) मेरे मन में हर वक्त आनंद बना रहता है। हे भाई ! (जब से) गुरू की कृपा से मैं परमात्मा का नाम जप रहा हूँ। मेरे मन का हरेक भ्रम और डर दूर हो गया है। 1। रहाउ। हे भाई ! जिन मनुष्यों ने परमात्मा की सिफत-सालाह की है। जिन मनुष्यों ने परमात्मा का नाम जपा है। उनके दर्शन करके आत्मिक आनंद मिलता है। हरेक दुख दूर हो जाता है। अहंकार का रोग मिट जाता है। हे हरी ! मेहर करके (मुझे भी) उनकी संगति मिला। 2। हे भाई ! जो मनुष्य हर वक्त (अपने) हृदय में परमात्मा का नाम जपते हैं। उनकी सारी जिंदगी कामयाब हो जाती है। वह मनुष्य खुद (संसार-समुंद्र से) पार लांघ जाते हैं। वे सारी सृष्टि को भी पार लंघा लेते हैं। (उनकी संगति में रह के उनका) सारा खानदान भी पार लांघ जाता है। 3। हे प्रभू ! तूने स्वयं ही ये सारा जगत पैदा किया हुआ है। तूने खुद ही इसको वश में रखा है (और इसको डूबने से बचाता है)।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।
रामदास जी का जीवन-व्यवहार और रचना दोनों एक तरह की संगति में रहीं। अमृतसर का चयन, हरमंदिर साहिब का स्थल, और सूही राग की भावुक रचनाएँ, सब एक ही मनोदशा के अलग-अलग पहलू हैं।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(इसलिए) हे गुरू के सिखो ! हे मेरे भाईयो ! (गुरू की शरण पड़ कर) परमात्मा का नाम जपा करो।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।