Lulla Family

अंग 1263

अंग
1263
राग मलार
राग: मलार · रचयिता: Guru Raam Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
जिनि ऐसा नामु विसारिआ मेरा हरि हरि तिस कै कुलि लागी गारी ॥
हरि तिस कै कुलि परसूति न करीअहु तिसु बिधवा करि महतारी ॥2॥
हरि हरि आनि मिलावहु गुरु साधू जिसु अहिनिसि हरि उरि धारी ॥
गुरि डीठै गुर का सिखु बिगसै जिउ बारिकु देखि महतारी ॥3॥
धन पिर का इक ही संगि वासा विचि हउमै भीति करारी ॥
गुरि पूरै हउमै भीति तोरी जन नानक मिले बनवारी ॥4॥1॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: हे भाई ! जिस मनुष्य ने ऐसा हरी-नाम बिसार दिया। जिस ने हरी-प्रभू की याद भुला दी। उसकी (सारी) कुल में ही गाली लगती है (उसकी सारी कुल ही कलंकित हो जाती है)। हे हरी ! उस (नाम-हीन व्यक्ति) की कुल में (किसी को) जनम ही ना देना। (उस नाम-हीन मनुष्य) की माँ को ही विधवा कर देना (तो बेहतर है ता कि नाम-हीन घर में किसी का जनम ही ना हो)। 2। हे हरी ! (मेहर कर। मुझे वह) साधू गुरू ला के मिला दे। जिसके हृदय में। हे हरी ! दिन-रात आपका नाम बसा रहता है। हे भाई ! अगर गुरू के दर्शन हो जाएं। तो गुरू का सिख यूँ खुश होता है जैसे बच्चा (अपनी) माँ को देख के। 3। हे भाई ! जिस जीव-स्त्री और प्रभू-पति का एक ही (हृदय-) जगह में बसेरा है। पर (दोनों के) दरमियान (जीव-स्त्री की) अहंकार की दीवार (बनी हुई) है। हे नानक ! पूरे गुरू ने जिन सेवकों (के अंदर से यह) अहंकार की दीवार को तोड़ दिया। वे परमात्मा को मिल गए। 4। 1।
मलार महला 4 ॥
गंगा जमुना गोदावरी सरसुती ते करहि उदमु धूरि साधू की ताई ॥
किलविख मैलु भरे परे हमरै विचि हमरी मैलु साधू की धूरि गवाई ॥1॥
तीरथि अठसठि मजनु नाई ॥
सतसंगति की धूरि परी उडि नेत्री सभ दुरमति मैलु गवाई ॥1॥ रहाउ ॥
जाहरनवी तपै भागीरथि आणी केदारु थापिओ महसाई ॥
कांसी क्रिसनु चरावत गाऊ मिलि हरि जन सोभा पाई ॥2॥
जितने तीरथ देवी थापे सभि तितने लोचहि धूरि साधू की ताई ॥
हरि का संतु मिलै गुर साधू लै तिस की धूरि मुखि लाई ॥3॥
जितनी स्रिसटि तुमरी मेरे सुआमी सभ तितनी लोचै धूरि साधू की ताई ॥
नानक लिलाटि होवै जिसु लिखिआ तिसु साधू धूरि दे हरि पारि लंघाई ॥4॥2॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: मलार महला 4 ॥ हे भाई ! गंगा। यमुना। गोदावरी। सरस्वती (आदि पवित्र नदियां) ये सारी संत-जनों के चरणों की धूल हासिल करने का यतन करती रहती हैं। (ये नदियां कहती हैं कि) (अनेकों) विकारों की मैल से लिवड़े हुए (जीव) हमारे में (आ के) डुबकियाँ लगाते हैं (वे अपनी मैल हमें दे जाते हैं) हमारी वह मैल संत-जनों के चरणों की धूड़ दूर करती है। 1। हे भाई ! (परमात्मा की) सिफतसालाह के तीर्थ में (किया हुआ आत्मिक) स्नान (ही) अढ़सठ तीर्थों का स्नान है। जिस मनुष्य की आँखों में साध-संगति के चरणों की धूल उड़ कर पड़ती है (वह धूल उसके अंदर से) विकारों की सारी मैल दूर कर देती है। 1। रहाउ। हे भाई ! गंगा को भगीरथ तपस्वी (स्वर्गों से) ले के आए। शिव जी ने केदार तीर्थ स्थापित किया। काशी (शिव की नगरी)। (वृंदावन जहाँ) कृष्ण गाएं चराता रहा – इन सबने हरी के भक्तों को मिल के ही महानता (वडिआई) हासिल की हुई है। 2। हे भाई ! देवताओं ने जितने भी तीर्थ-स्थान हासिल किए हुए है। वे सारे (तीर्थ) संत-जनों के चरणों की धूड़ की तमन्ना करते रहते हैं। जब उन्हें परमात्मा का संत गुरू साधू मिलता है। वे उसके चरणों की धूड़ माथे पर लगाते हैं। 3। हे मेरे मालिक प्रभू ! आपकी पैदा की हुई जितनी भी सृष्टि है। वह सारी गुरू के चरणों की धूड़ प्राप्त करने की चाहत रखती है। हे नानक ! (कह- हे भाई !) जिस मनुष्य के माथे पर लेख लिखे हों। परमात्मा उसको गुरू-साधू के चरणों की धूड़ दे के उसको संसार-समुंद्र से पार लंघा देता । 4। 2।
मलार महला 4 ॥
तिसु जन कउ हरि मीठ लगाना जिसु हरि हरि क्रिपा करै ॥
तिस की भूख दूख सभि उतरै जो हरि गुण हरि उचरै ॥1॥
जपि मन हरि हरि हरि निसतरै ॥
गुर के बचन करन सुनि धिआवै भव सागरु पारि परै ॥1॥ रहाउ ॥
तिसु जन के हम हाटि बिहाझे जिसु हरि हरि क्रिपा करै ॥
हरि जन कउ मिलिआं सुखु पाईऐ सभ दुरमति मैलु हरै ॥2॥
हरि जन कउ हरि भूख लगानी जनु त्रिपतै जा हरि गुन बिचरै ॥
हरि का जनु हरि जल का मीना हरि बिसरत फूटि मरै ॥3॥
जिनि एह प्रीति लाई सो जानै कै जानै जिसु मनि धरै ॥
जनु नानकु हरि देखि सुखु पावै सभ तन की भूख टरै ॥4॥3॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: मलार महला 4 ॥ हे भाई ! जिस मनुष्य पर परमात्मा मेहर करता है। उस मनुष्य को परमात्मा (का नाम) प्यारा लगता है। जो मनुष्य प्रभू के गुण उचारता रहता है। उसकी (माया की) भूख दूर हो जाती है। उसके सारे दुख (दूर हो जाते हैं)। 1। हे (मेरे) मन ! सदा हरी का नाम जपा कर। (जो मनुष्य जपता है। वह संसार-समुंद्र से) पार लांघ जाता है। (जो मनुष्य) गुरू के बचन कानों से सुन के (परमात्मा का नाम) सिमरता है। वह मनुष्य संसार-समुंद्र से पार लांघ जाता है। 1। रहाउ। हे भाई ! जिस सेवक पर परमात्मा मेहर करता है। मैं उसका मूल्य खरीदा हुआ गुलाम हूँ। परमात्मा के सेवक को मिलने से आत्मिक आनंद प्राप्त होता है (वह आत्मिक आनंद मनुष्य के अंदर से) खोटी मति की सारी मति दूर कर देता है। 2। हे भाई ! परमात्मा के सेवक को परमात्मा (के नाम) की भूख लगी रहती है। जब वह परमात्मा के गुण मन में बसाता है। वह तृप्त हो जाता है। हे भाई ! परमात्मा का भगत इस तरह है जैसे पानी की मछली है (पानी से विछुड़ के तड़फ के मर जाती है। वैसे ही परमात्मा का भगत) हरी-नाम को बिसारने से बहुत दुखी होता है। 3। हे भाई ! जिस (परमात्मा) ने (अपने सेवक के हृदय में अपना) प्यार पैदा किया होता है (उस प्यार की कद्र) वह (स्वयं) जानता है। अथवा (वह सेवक) जानता है जिसके मन में (परमात्मा अपना प्यार) बसाता है। दास नानक उस प्रभू के दर्शन कर के आत्मिक आनंद हासिल करता है (इस आनंद की बरकति से नानक के) शरीर की सारी (मायावी) भूख दूर हो जाती है। 4। 3।
मलार महला 4 ॥
जितने जीअ जंत प्रभि कीने तितने सिरि कार लिखावै ॥
हरि जन कउ हरि दीन॑ वडाई हरि जनु हरि कारै लावै ॥1॥
सतिगुरु हरि हरि नामु द्रिड़ावै ॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: मलार महला 4 ॥ हे भाई ! जितने भी जीव-जंतु प्रभू ने पैदा किए हैं। सारे ही (ऐसे हैं कि) हरेक के सिर पर (करने के लिए) कार लिख रखी है। (अपने) भगत को प्रभू ने यह वडिआइै बख्शी होती है कि प्रभू अपने भक्त को नाम-सिमरन की कार में लगाए रखता है। 1। हे भाई ! गुरू (मनुष्य के) हृदय में परमात्मा का नाम पक्की तरह टिका देता है।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।

गुरु रामदास जी 1574 में गुरु-गद्दी पर बैठे और 1581 तक रहे। उन्हीं ने अमृतसर शहर बसाया, हरमंदिर साहिब की नींव रखी। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य प्रेम की तस्वीरें बार-बार लौटती हैं। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, उन्हीं की रचना है।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! जिस मनुष्य ने ऐसा हरी-नाम बिसार दिया।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।