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अंग 1261

अंग
1261
राग मलार
राग: मलार · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
हरि जन करणी ऊतम है हरि कीरति जगि बिसथारि ॥3॥
क्रिपा क्रिपा करि ठाकुर मेरे हरि हरि हरि उर धारि ॥
नानक सतिगुरु पूरा पाइआ मनि जपिआ नामु मुरारि ॥4॥9॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: वैसे ही परमात्मा के भक्तों की करणी श्रेष्ठ होती है। (भक्तों ने) परमात्मा की सिफतसालाह (की सुगंधि) जगत में बिखेरी हुई है। 3। हे मेरे मालिक प्रभू ! हे हरी ! (मेरे पर) मेहर कर (मेरे) हृदय में अपना नाम बसाए रख। हे नानक ! जिस मनुष्य ने पूरा गुरू पा लिया। उसने (सदा) अपने मन में परमात्मा का नाम जपा। 4। 9।
मलार महला 3 घरु 2
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
इहु मनु गिरही कि इहु मनु उदासी ॥
कि इहु मनु अवरनु सदा अविनासी ॥
कि इहु मनु चंचलु कि इहु मनु बैरागी ॥
इसु मन कउ ममता किथहु लागी ॥1॥
पंडित इसु मन का करहु बीचारु ॥
अवरु कि बहुता पड़हि उठावहि भारु ॥1॥ रहाउ ॥
माइआ ममता करतै लाई ॥
एहु हुकमु करि स्रिसटि उपाई ॥
गुर परसादी बूझहु भाई ॥
सदा रहहु हरि की सरणाई ॥2॥
सो पंडितु जो तिहां गुणा की पंड उतारै ॥
अनदिनु एको नामु वखाणै ॥
सतिगुर की ओहु दीखिआ लेइ ॥
सतिगुर आगै सीसु धरेइ ॥
सदा अलगु रहै निरबाणु ॥
सो पंडितु दरगह परवाणु ॥3॥
सभनां महि एको एकु वखाणै ॥
जां एको वेखै तां एको जाणै ॥
जा कउ बखसे मेले सोइ ॥
ऐथै ओथै सदा सुखु होइ ॥4॥
कहत नानकु कवन बिधि करे किआ कोइ ॥
सोई मुकति जा कउ किरपा होइ ॥
अनदिनु हरि गुण गावै सोइ ॥
सासत्र बेद की फिरि कूक न होइ ॥5॥1॥10॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: मलार महला 3 घरु 2 सतिगुर प्रसादि ॥ हे पण्डित ! (वेद-शास्त्रों की मर्यादा आदि की चर्चा की जगह ये विचार किया कर कि आपका) यह मन घर के जंजालों में फंसा रहता है अथवा निर्लिप रहता है। हे पण्डित ! (ये सोचा कर कि आपका) यह मन (ब्राहमण खत्री आदि) वर्ण-भेद से ऊपर है और सदा आत्मिक मौत से बचा रहता है। क्या (आपका) यह मन माया की दौड़-भाग के शिकंजे में फसा हुआ है अथवा इससे आजाद है (इससे उपराम है) । हे पण्डित ! (ये विचार भी किया कर कि) इस मन को ममता कहाँ से आ चिपकती है। 1। हे पण्डित ! (वेद-शास्त्र आदि की मर्यादा पर जोर देने की जगह) अपने इस मन के बारे में विचार किया कर। (अपने मन की पड़ताल छोड़ के) और बहुत सारा जो कुछ आप पढ़ता है। वह (अपने सिर पर अहंकार का) भार ही उठाता है। 1। रहाउ। हे पण्डित ! (देख।) करतार ने (खुद इस मन को) माया की ममता चिपकाई हुई है। (करतार ने माया की ममता का) ये हुकम दे के ही जगत पैदा किया हुआ है। हे भाई ! गुरू की कृपा से (इस बात को) समझ। और सदा परमात्मा की शरण पड़ा रह (ताकि माया की ममता आपके ऊपर अपना प्रभाव ना डाल सके)। 2। हे पण्डित ! वह (मनुष्य असल) पण्डित है जो (अपने ऊपर से) माया के तीनों गुणों का भार उतार देता है। और हर वक्त हरी-नाम ही जपता रहता है। ऐसा पंडित गुरू की शिक्षा ग्रहण करता है। गुरू के आगे अपना सिर रखे रखता है (सदा गुरू के हुकम में चलता है)। वह सदा निर्लिप रहता है। माया के मोह से बचा रहता है। ऐसा पण्डित प्रभू की हजूरी में आदर प्राप्त करता है। 3। हे पण्डित ! (जो पण्डित वेद-शास्त्र आदि की चर्चा की जगह अपने मन को पड़तालता है स्वै अवलोकन करता है स्वै-विश्लेषण करता है। वह) यही उपदेश करता है कि सब जीवों में एक ही परमात्मा बसता है (किसी भी तरह के भेद-भाव को नहीं गिनता)। जब वह पण्डित (सब जीवों में) एक प्रभू को ही देखता है। तबवह उस एक प्रभू के साथ गहरी सांझ डाल लेता है। पर। हे पण्डित ! जिस मनुष्य पर करतार बख्शिश करता है। उसी को वह (अपने चरणों में) जोड़ता है। उस मनुष्य को इस लोक और परलोक में आत्मिक आनंद सदा मिला रहता है। 4। हे पण्डित ! नानक कहता है- (माया के बँधनों से निजात हासिल करने के लिए आजादी पाने के लिए अपनी बुद्धि के आसरे) कोई भी मनुष्य कोई जुगति नहीं बरत सकता। जिस मनुष्य पर प्रभू मेहर करता है वही बँधनों से मुक्ति पाता है। वह मनुष्य हर वक्त परमात्मा के गुण गाता रहता है। वह फिर (अपने ऊँचे वर्ण आदि को साबित करने के लिए) वेद-शास्त्रों आदि की मर्यादा का शोर नहीं मचाता फिरता। 5। 1। 10।
मलार महला 3 ॥
भ्रमि भ्रमि जोनि मनमुख भरमाई ॥
जमकालु मारे नित पति गवाई ॥
सतिगुर सेवा जम की काणि चुकाई ॥
हरि प्रभु मिलिआ महलु घरु पाई ॥1॥
प्राणी गुरमुखि नामु धिआइ ॥
जनमु पदारथु दुबिधा खोइआ कउडी बदलै जाइ ॥1॥ रहाउ ॥
करि किरपा गुरमुखि लगै पिआरु ॥
अंतरि भगति हरि हरि उरि धारु ॥
भवजलु सबदि लंघावणहारु ॥
दरि साचै दिसै सचिआरु ॥2॥
बहु करम करे सतिगुरु नही पाइआ ॥
बिनु गुर भरमि भूले बहु माइआ ॥
हउमै ममता बहु मोहु वधाइआ ॥
दूजै भाइ मनमुखि दुखु पाइआ ॥3॥
आपे करता अगम अथाहा ॥
गुर सबदी जपीऐ सचु लाहा ॥
हाजरु हजूरि हरि वेपरवाहा ॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: मलार महला 3 ॥ हे भाई ! अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य सदा भटकता ही रहता है। उसको (आत्मिक) मौत मार लेती है। वह सदा अपनी इज्जत गवाता रहता है। जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है। वह जमों की मुथाजी खत्म कर लेता है (वह जनम-मरण के चक्करों में नहीं पड़ता)। उसको हरी-प्रभू मिल जाता है। वह मनुष्य परमात्मा का महल परमात्मा का घर पा लेता है। 1। हे प्राणी ! गुरू की शरण पड़ कर परमात्मा का नाम सिमरा कर। (जिस मनुष्य ने अपना) कीमती (मनुष्य-) जनम माया की भटकना में गवा लिया। उसका यह जनम कौड़ियों के भाव ही चला जाता है। 1। रहाउ। हे भाई ! प्रभू की मेहर से गुरू के द्वारा (जिस मनुष्य के हृदय में) प्रभू के प्रति प्यार पनप उठता है। उसके अंदर प्रभू की भक्ति पैदा होती है। वह मनुष्य प्रभू को अपने हृदय में बसा लेता है। प्रभू उसको गुरू-शबद के माध्यम से संसार-समुंद्र से पार लंघाता है। वह मनुष्य सदा-स्थिर प्रभू के दर पर सुर्खरू दिखता है। 2। हे भाई ! (जो मनुष्य तीर्थ-यात्रा आदि मिथे हुए धर्म के नाम पर किए जाने वाले) कर्म करता फिरता है। पर गुरू की शरण नहीं पड़ता। वह मनुष्य गुरू के बिना माया की भटकना में पड़ कर गलत रासते पर पड़ा रहता है। वह मनुष्य अपने अंदर अहंकार ममता और मोह को बढ़ाता जाता है। हे भाई ! अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य माया के प्यार में (फस के सदा) दुख ही सहता है। 3। हे भाई ! अपहुँच और अथाह करतार स्वयं ही (ये सारी खेल खेल रहा है)। गुरू के शबद द्वारा (उसका नाम) जपना चाहिए – यही है सदा कायम रहने वाला लाभ। हे भाई ! वह करतार हर जगह हाजर-नाजर है और उसको किसी की मुथाजी नहीं।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।

गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर वर्ष की आयु में गुरु-गद्दी सँभाली, 1552 में, और 1574 तक रहे। उनकी वाणी में बुढ़ापे, समाज की संरचना, और संगति की चिन्ताएँ बार-बार लौटती हैं। उन्होंने ही लंगर (साझा-भोजन) की व्यवस्था मज़बूत की, और देश-भर में बाईस मंजी (केन्द्र) स्थापित किए।

इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “वैसे ही परमात्मा के भक्तों की करणी श्रेष्ठ होती है।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।