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अंग 1260

अंग
1260
राग मलार
राग: मलार · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
गुर सबदि रते सदा बैरागी हरि दरगह साची पावहि मानु ॥2॥
इहु मनु खेलै हुकम का बाधा इक खिन महि दह दिस फिरि आवै ॥
जां आपे नदरि करे हरि प्रभु साचा तां इहु मनु गुरमुखि ततकाल वसि आवै ॥3॥
इसु मन की बिधि मन हू जाणै बूझै सबदि वीचारि ॥
नानक नामु धिआइ सदा तू भव सागरु जितु पावहि पारि ॥4॥6॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: जो मनुष्य गुरू के शबद में रंगे रहते हैं। वे सदा (माया के मोह से) निर्लिप रहते हैं। वे सदा-स्थिर-प्रभू की हजूरी में आदर पाते हैं। 2। हे भाई ! (मनुष्य का) यह मन (परमात्मा के) हुकम का बंधा हुआ ही (माया की खेल) खेलता रहता है। और एक छिन में ही दसों-दिशाओं में दौड़-भाग आता है। जब सदा-स्थिर प्रभू स्वयं ही (किसी मनुष्य पर) मेहर की निगाह करता है। तब उसका यह मन गुरू की शरण की बरकति से बड़ी जल्दी वश में आ जाता है। 3। हे भाई ! जब मनुष्य गुरू के शबद द्वारा (परमात्मा के गुणों को) अपने मन में बसा के (सही जीवन-राह को) समझता है। तो वह अपने अंदर से ही इस मन को वश में रखने की जाच सीख लेता है। हे नानक ! (कह- हे भाई !) आप सदा परमात्मा का नाम सिमरा कर। जिस नाम के द्वारा आप संसार-समुंद्र से पार लांघ जाएगा। 4। 6।
मलार महला 3 ॥
जीउ पिंडु प्राण सभि तिस के घटि घटि रहिआ समाई ॥
एकसु बिनु मै अवरु न जाणा सतिगुरि दीआ बुझाई ॥1॥
मन मेरे नामि रहउ लिव लाई ॥
अदिसटु अगोचरु अपरंपरु करता गुर कै सबदि हरि धिआई ॥1॥ रहाउ ॥
मनु तनु भीजै एक लिव लागै सहजे रहे समाई ॥
गुर परसादी भ्रमु भउ भागै एक नामि लिव लाई ॥2॥
गुर बचनी सचु कार कमावै गति मति तब ही पाई ॥
कोटि मधे किसहि बुझाए तिनि राम नामि लिव लाई ॥3॥
जह जह देखा तह एको सोई इह गुरमति बुधि पाई ॥
मनु तनु प्रान धरंी तिसु आगै नानक आपु गवाई ॥4॥7॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: मलार महला 3 ॥ हे भाई ! जो परमात्मा हरेक शरीर में समा रहा है। उसके ही दिए हुए ये जिंद ये शरीर ये प्राण ये सारे अंग हैं। हे भाई ! उस एक के बिना मैं किसी और के साथ गहरी सांझ नहीं डालता। गुरू ने (मुझे) समझ बख्शी है 1। हे मेरे मन ! मैं (तो सदा) परमात्मा के नाम में ही लगन लगाए रखता हूँ। जो करतार (इन आँखों से) नहीं दिखता। जिस तक ज्ञानेन्द्रियों की पहुँच हो नहीं सकती। जो बेअंत ही बेअंत है। मैं उसको गुरू के शबद द्वारा ध्याता हूँ। 1। रहाउ। हे भाई ! (जिन मनुष्यों की) लगन एक परमात्मा के साथ लगी रहती है उनका मन उनका तन (नाम-रस से) भीगा रहता है। वे मनुष्य आत्मिक अडोलता में लीन रहते हैं। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू की कृपा से सिर्फ हरी-नाम में सुरति जोड़े रखता है। उसकी भटकना उसका हरेक डर दूर हो जाता है। 2। हे भाई ! (जब मनुष्य) गुरू के बचनों पर चल के सदा-स्थिर हरी-नाम सिमरन की कार करता है। तब ही वह ऊँची आत्मिक अवस्था हासिल कर सकने वाली समझ सीखता है। हे भाई ! करोड़ों में से किसी विरले मनुष्य को (गुरू आत्मिक जीवन की) सूझ देता है। उस मनुष्य ने (सदा के लिए) परमात्मा के नाम में सुरति जोड़ ली। 3। हे नानक ! (कह- हे भाई !) मैं जिधर-जिधर देखता हूँ। उधर-उधर एक परमात्मा ही बसता (दिखाई देता) है – यह बुद्धि मुझे गुरू की मति से आई है। उस (गुरू) के आगे मैं स्वै-भाव गवा के अपना मन अपना शरीर अपने प्राण भेट धरता हूँ। 4। 7।
मलार महला 3 ॥
मेरा प्रभु साचा दूख निवारणु सबदे पाइआ जाई ॥
भगती राते सद बैरागी दरि साचै पति पाई ॥1॥
मन रे मन सिउ रहउ समाई ॥
गुरमुखि राम नामि मनु भीजै हरि सेती लिव लाई ॥1॥ रहाउ ॥
मेरा प्रभु अति अगम अगोचरु गुरमति देइ बुझाई ॥
सचु संजमु करणी हरि कीरति हरि सेती लिव लाई ॥2॥
आपे सबदु सचु साखी आपे जिन॑ जोती जोति मिलाई ॥
देही काची पउणु वजाए गुरमुखि अंम्रितु पाई ॥3॥
आपे साजे सभ कारै लाए सो सचु रहिआ समाई ॥
नानक नाम बिना कोई किछु नाही नामे देइ वडाई ॥4॥8॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: मलार महला 3 ॥ हे भाई ! मेरा प्रभू सदा कायम रहने वाला है। (जीवों के) दुखों को दूर करने वाला है (वह प्रभू गुरू के) शबद द्वारा मिल सकता है। (जो मनुष्य गुरू के शबद द्वारा परमात्मा की) भगती में रंगे रहते हैं। वे सदा निर्लिप रहते हैं। उनको सदा-स्थिर प्रभू के दर पर आदर मिलता है। 1। हे (मेरे) मन ! मैं (तो गुरू के सन्मुख हो के प्रभू के चरणों में) टिका रह सकता हूँ। गुरू की शरण पड़ कर ही (मनुष्य का) मन परमात्मा के नाम में भीगता है। (गुरू के सन्मुख र हके ही मनुष्य) प्रभू के साथ सुरति जोड़े रखता है। 1। रहाउ। हे भाई ! प्यारा प्रभू (तो) बहुत अपहुँच है उस तक ज्ञान-इन्द्रियों की (भी) पहुँच नहीं हो सकती। (पर। जिस मनुष्य को वह प्रभू) गुरू की मति के द्वारा (आत्मिक जीवन की) समझ बख्शता है। वह मनुष्य परमात्मा में सुरति जोड़ के रखता है। सदा-स्थिर हरी-नाम का सिमरन उस मनुष्य का संजम बनता है। प्रभू की सिफत सालाह उसकी कार हो जाती है। 2। हे भाई ! जिन मनुष्यों की सुरति (गुरू के द्वारा) प्रभू की ज्योति में जुड़ती है (उनको यह निष्चय बन जाता है कि) सदा-स्थिर प्रभू स्वयं ही (गुरू का) शबद है प्रभू स्वयं ही (गुरू की) शिक्षा है। हे भाई ! (इस) नाशवंत शरीर में (जिसको) हरेक श्वास चला रही है। गुरू के द्वारा (ही) आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल पड़ता है। 3। हे नानक ! (गुरू के द्वारा ही यह समझ पड़ती है कि) जो प्रभू स्वयं ही सारी सृष्टि को पैदा करता है। और काम काज में लगाए रखता है वह सदा-स्थिर प्रभू सब जगह व्यापक है। प्रभू के नाम के बिना कोई भी जीव कोई अस्तित्व नहीं रखता। (कोई पायां नहीं रखता)। (जीव को) आदर (प्रभू अपने) नाम से ही बख्शता है। 4। 8।
मलार महला 3 ॥
हउमै बिखु मनु मोहिआ लदिआ अजगर भारी ॥
गरुड़ु सबदु मुखि पाइआ हउमै बिखु हरि मारी ॥1॥
मन रे हउमै मोहु दुखु भारी ॥
इहु भवजलु जगतु न जाई तरणा गुरमुखि तरु हरि तारी ॥1॥ रहाउ ॥
त्रै गुण माइआ मोहु पसारा सभ वरतै आकारी ॥
तुरीआ गुणु सतसंगति पाईऐ नदरी पारि उतारी ॥2॥
चंदन गंध सुगंध है बहु बासना बहकारि ॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: मलार महला 3 ॥ हे भाई ! अहंकार (आत्मिक मौत लाने वाला) जहर है। (मनुष्य का) मन (इस जहर के) मोह में फसा रहता है। (इस अहंकार के) बहुत बड़े भार से लदा रहता है। गुरू का शबद (इस जहर को मारने के लिए) गारुड़ी मंत्र है। (जिस मनुष्य ने यह शबद मंत्र अपने) मुँह में रख लिया। परमात्मा ने उसके अंदर से यह अहंकार का जहर खत्म कर दिया। 1। हे (मेरे) मन ! अहंकार एक बड़ा दुख है (माया का) मोह भारी दुख है (अहंकार और मोह के कारण) इस संसार-समुंद्र से पार नहीं लांघा जा सकता। आप गुरू की शरण पड़ के हरी-नाम की बेड़ी में (इस संसार-समुंद्र से) पार लांघ। 1। रहाउ। हे भाई ! त्रै-गुणी माया का मोह (अपना) पसारा (पसार के) सार जीवों पर सारे जीवों पर अपना प्रभाव डाल रहा है। (इन तीन गुणों से ऊपर है) तुरीआ गुण (यह गुण) साध-संगति में से हासिल होता है (जो मनुष्य इस अवस्था को प्राप्त कर लेता है। परमात्मा) मेहर की निगाह करके (उसको) संसार-समुंद्र से पार लंघा लेता है। 2। हे भाई ! जैसे चंदन की सुगंधि है जैसे चँदन में से महक निकलती है।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।

अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “जो मनुष्य गुरू के शबद में रंगे रहते हैं।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।