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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 1260 · मलार

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अंग
1260
मलार
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  1. गुर सबदि रते सदा बैरागी हरि दरगह साची पावहि मानु ॥2॥
  2. जीउ पिंडु प्राण सभि तिस के घटि घटि रहिआ समाई ॥
  3. मेरा प्रभु साचा दूख निवारणु सबदे पाइआ जाई ॥
  4. हउमै बिखु मनु मोहिआ लदिआ अजगर भारी ॥

गुर सबदि रते सदा बैरागी हरि दरगह साची पावहि मानु ॥2॥

अंग 1259 से चला आ रहा अंश

गुर सबदि रते सदा बैरागी हरि दरगह साची पावहि मानु ॥2॥
इहु मनु खेलै हुकम का बाधा इक खिन महि दह दिस फिरि आवै ॥
जां आपे नदरि करे हरि प्रभु साचा तां इहु मनु गुरमुखि ततकाल वसि आवै ॥3॥
इसु मन की बिधि मन हू जाणै बूझै सबदि वीचारि ॥
नानक नामु धिआइ सदा तू भव सागरु जितु पावहि पारि ॥4॥6॥

हिन्दी अर्थ: जो मनुष्य गुरू के शबद में रंगे रहते हैं, वे सदा (माया के मोह से) निर्लिप रहते हैं। वे सदा-स्थिर-प्रभू की हजूरी में आदर पाते हैं। 2। हे भाई ! (मनुष्य का) यह मन (परमात्मा के) हुकम का बंधा हुआ ही (माया का खेल) खेलता रहता है और एक छिन में ही दसों-दिशाओं में दौड़-भाग आता है। जब सदा-स्थिर प्रभू स्वयं ही (किसी मनुष्य पर) मेहर की निगाह करता है, तब उसका यह मन गुरू की शरण की बरकति से बड़ी जल्दी वश में आ जाता है। 3। हे भाई ! जब मनुष्य गुरू के शबद द्वारा (परमात्मा के गुणों को) अपने मन में बसा के (सही जीवन-राह को) समझता है, तो वह अपने अंदर से ही इस मन को वश में रखने की रीति सीख लेता है। हे नानक ! (कहें- हे भाई !) आप सदा परमात्मा का नाम सिमरा करें, जिस नाम के द्वारा आप संसार-समुंद्र से पार लांघ जाएँगे। 4। 6।

जीउ पिंडु प्राण सभि तिस के घटि घटि रहिआ समाई ॥

मलार महला 3 ॥
जीउ पिंडु प्राण सभि तिस के घटि घटि रहिआ समाई ॥
एकसु बिनु मै अवरु न जाणा सतिगुरि दीआ बुझाई ॥1॥
मन मेरे नामि रहउ लिव लाई ॥
अदिसटु अगोचरु अपरंपरु करता गुर कै सबदि हरि धिआई ॥1॥ रहाउ ॥
मनु तनु भीजै एक लिव लागै सहजे रहे समाई ॥
गुर परसादी भ्रमु भउ भागै एक नामि लिव लाई ॥2॥
गुर बचनी सचु कार कमावै गति मति तब ही पाई ॥
कोटि मधे किसहि बुझाए तिनि राम नामि लिव लाई ॥3॥
जह जह देखा तह एको सोई इह गुरमति बुधि पाई ॥
मनु तनु प्रान धरंी तिसु आगै नानक आपु गवाई ॥4॥7॥

हिन्दी अर्थ: मलार महला 3 ॥ हे भाई ! गुरू ने (मुझे) समझ बख्शी है कि जो परमात्मा हरेक शरीर में समा रहा है, उसके ही दिए हुए ये जिंद, ये शरीर, ये प्राण और ये सारे अंग हैं। हे भाई ! उस एक के बिना मैं किसी और के साथ गहरी सांझ नहीं डालता। 1। हे मेरे मन ! मैं (तो सदा) परमात्मा के नाम में ही लगन लगाए रखता हूँ। जो करतार (इन आँखों से) नहीं दिखता, जिस तक ज्ञानेन्द्रियों की पहुँच हो नहीं सकती, जो बेअंत ही बेअंत है, मैं उसको गुरू के शबद द्वारा ध्याता हूँ। 1। रहाउ। हे भाई ! (जिन मनुष्यों की) लगन एक परमात्मा के साथ लगी रहती है, उनका मन, उनका तन (नाम-रस से) भीगा रहता है। वे मनुष्य आत्मिक अडोलता में लीन रहते हैं। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू की कृपा से सिर्फ हरी-नाम में सुरति जोड़े रखता है, उसकी भटकना उसका हरेक डर दूर हो जाता है। 2। हे भाई ! (जब मनुष्य) गुरू के बचनों पर चल के सदा-स्थिर हरी-नाम सिमरन की कार करता है, तब ही वह ऊँची आत्मिक अवस्था हासिल कर सकने वाली समझ सीखता है। हे भाई ! करोड़ों में से जिस किसी विरले मनुष्य को (गुरू आत्मिक जीवन की) सूझ देता है, उस मनुष्य ने (सदा के लिए) परमात्मा के नाम में सुरति जोड़ ली। 3। हे नानक ! (कहें- हे भाई !) मैं जिधर-जिधर देखता हूँ, उधर-उधर एक परमात्मा ही बसता (दिखाई देता) है - यह बुद्धि मुझे गुरू की मति से आई है। उस (गुरू) के आगे मैं अहंभाव गँवा के अपना मन, अपना शरीर, अपने प्राण भेंट धरता हूँ। 4। 7।

मेरा प्रभु साचा दूख निवारणु सबदे पाइआ जाई ॥

मलार महला 3 ॥
मेरा प्रभु साचा दूख निवारणु सबदे पाइआ जाई ॥
भगती राते सद बैरागी दरि साचै पति पाई ॥1॥
मन रे मन सिउ रहउ समाई ॥
गुरमुखि राम नामि मनु भीजै हरि सेती लिव लाई ॥1॥ रहाउ ॥
मेरा प्रभु अति अगम अगोचरु गुरमति देइ बुझाई ॥
सचु संजमु करणी हरि कीरति हरि सेती लिव लाई ॥2॥
आपे सबदु सचु साखी आपे जिन॑ जोती जोति मिलाई ॥
देही काची पउणु वजाए गुरमुखि अंम्रितु पाई ॥3॥
आपे साजे सभ कारै लाए सो सचु रहिआ समाई ॥
नानक नाम बिना कोई किछु नाही नामे देइ वडाई ॥4॥8॥

हिन्दी अर्थ: मलार महला 3 ॥ हे भाई ! मेरा प्रभू सदा कायम रहने वाला है। (जीवों के) दुखों को दूर करने वाला है। (वह प्रभू गुरू के) शबद द्वारा मिल सकता है। (जो मनुष्य गुरू के शबद द्वारा परमात्मा की) भगती में रंगे रहते हैं, वे सदा निर्लिप रहते हैं। उनको सदा-स्थिर प्रभू के दर पर आदर मिलता है। 1। हे (मेरे) मन ! मैं (तो गुरू के सन्मुख हो के प्रभू के चरणों में) टिका रह सकता हूँ। गुरू की शरण पड़ कर ही (मनुष्य का) मन परमात्मा के नाम में भीगता है। (गुरू के सन्मुख रह के ही मनुष्य) प्रभू के साथ सुरति जोड़े रखता है। 1। रहाउ। हे भाई ! प्यारा प्रभू (तो) बहुत अपहुँच है उस तक ज्ञान-इन्द्रियों की (भी) पहुँच नहीं हो सकती। (पर जिस मनुष्य को वह प्रभू) गुरू की मति के द्वारा (आत्मिक जीवन की) समझ बख्शता है, वह मनुष्य परमात्मा में सुरति जोड़ के रखता है। सदा-स्थिर हरी-नाम का सिमरन उस मनुष्य का संजम बनता है। प्रभू की सिफत-सालाह उसकी कार हो जाती है। 2। हे भाई ! जिन मनुष्यों की सुरति (गुरू के द्वारा) प्रभू की ज्योति में जुड़ती है (उनको यह निश्चय बन जाता है कि) सदा-स्थिर प्रभू स्वयं ही (गुरू का) शबद है प्रभू स्वयं ही (गुरू की) शिक्षा है। हे भाई ! इस नाशवंत शरीर को हर श्वास चला रहा है। इसी शरीर में गुरू के द्वारा ही आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल पड़ता है। 3। हे नानक ! (गुरू के द्वारा ही यह समझ पड़ती है कि) जो प्रभू स्वयं ही सारी सृष्टि को पैदा करता है और काम-काज में लगाए रखता है, वह सदा-स्थिर प्रभू सब जगह व्यापक है। प्रभू के नाम के बिना किसी भी जीव का कोई महत्त्व नहीं। प्रभू अपने नाम से ही जीव को आदर बख्शता है। 4। 8।

हउमै बिखु मनु मोहिआ लदिआ अजगर भारी ॥

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मलार महला 3 ॥
हउमै बिखु मनु मोहिआ लदिआ अजगर भारी ॥
गरुड़ु सबदु मुखि पाइआ हउमै बिखु हरि मारी ॥1॥
मन रे हउमै मोहु दुखु भारी ॥
इहु भवजलु जगतु न जाई तरणा गुरमुखि तरु हरि तारी ॥1॥ रहाउ ॥
त्रै गुण माइआ मोहु पसारा सभ वरतै आकारी ॥
तुरीआ गुणु सतसंगति पाईऐ नदरी पारि उतारी ॥2॥
चंदन गंध सुगंध है बहु बासना बहकारि ॥

हिन्दी अर्थ: मलार महला 3 ॥ हे भाई ! अहंकार (आत्मिक मौत लाने वाला) जहर है। (मनुष्य का) मन (इस जहर के) मोह में फँसा रहता है, (इस अहंकार के) बहुत बड़े भार से लदा रहता है। गुरू का शबद (इस जहर को मारने के लिए) गारुड़ी मंत्र है। (जिस मनुष्य ने यह शबद मंत्र अपने) मुँह में रख लिया, परमात्मा ने उसके अंदर से यह अहंकार का जहर खत्म कर दिया। 1। हे (मेरे) मन ! अहंकार एक बड़ा दुख है। (माया का) मोह भारी दुख है। (अहंकार और मोह के कारण) इस संसार-समुंद्र से पार नहीं लांघा जा सकता। आप गुरू की शरण पड़ के हरी-नाम की बेड़ी में (इस संसार-समुंद्र से) पार लांघें। 1। रहाउ। हे भाई ! त्रै-गुणी माया का मोह (अपना) पसारा (पसार के) सारे जीवों पर अपना प्रभाव डाल रहा है। इन तीन गुणों से ऊपर तुरीय अवस्था है। यह अवस्था साध-संगति में हासिल होती है। जो मनुष्य इस अवस्था को प्राप्त कर लेता है, परमात्मा मेहर की निगाह करके उसको संसार-समुंद्र से पार लंघा लेता है। 2। हे भाई ! जैसे चंदन की सुगंधि है जैसे चंदन में से महक निकलती है।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 3: गुरु अमर दास जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1260 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।