Lulla Family

अंग 1259

अंग
1259
राग मलार
राग: मलार · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
जीअ दानु देइ त्रिपतासे सचै नामि समाही ॥
अनदिनु हरि रविआ रिद अंतरि सहजि समाधि लगाही ॥2॥
सतिगुर सबदी इहु मनु भेदिआ हिरदै साची बाणी ॥
मेरा प्रभु अलखु न जाई लखिआ गुरमुखि अकथ कहाणी ॥
आपे दइआ करे सुखदाता जपीऐ सारिंगपाणी ॥3॥
आवण जाणा बहुड़ि न होवै गुरमुखि सहजि धिआइआ ॥
मन ही ते मनु मिलिआ सुआमी मन ही मंनु समाइआ ॥
साचे ही सचु साचि पतीजै विचहु आपु गवाइआ ॥4॥
एको एकु वसै मनि सुआमी दूजा अवरु न कोई ॥
एकोु नामु अंम्रितु है मीठा जगि निरमल सचु सोई ॥
नानक नामु प्रभू ते पाईऐ जिन कउ धुरि लिखिआ होई ॥5॥4॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: जिन मनुष्यों को गुरू आत्मिक जीवन की दाति देता है। वे (माया की तृष्णा से) तृप्त हो जाते हैं। वे मनुष्य सदा-स्थिर हरी-नाम में लीन रहते हैं। उनके हृदय में परमात्मा (का नाम) हर वक्त बसा रहता है। वे आत्मिक अडोलता में हमेशा टिके रहते हैं। 2। जिस मनुष्य का यह मन गुरू के शबद से भेद जाता है। उसके हृदय में सदा-स्थिर प्रभू की सिफत सालाह टिकी रहती है। हे भाई ! मेरा प्रभू अलख है उसका सही स्वरूप समझा नहीं जा सकता। गुरू की शरण पड़ कर उस अकथ की सिफत सालाह की जा सकती है। हे भाई ! सारे सुख देने वाला धर्नुधारी प्रभू स्वयं ही जब मेहर करता है। तो उसका नाम जपा जा सकता है। 3। हे भाई ! गुरू के सन्मुख हो के मनुष्य ने आत्मिक अडोलता में (टिक के) परमात्मा का नाम सिमरा। उसको दोबारा जनम-मरण का चक्कर नहीं रहता। उसको अपने अंदर से स्वयं की समझ हो जाती है। उसको मालिक-प्रभू मिल जाता है। उसका मन (फिर) अंदर ही लीन हो जाता है। सदा-स्थिर हरी को (हृदय में बसा के) वह हर वक्त सदा-स्थिर प्रभू में मगन रहता है। वह अपने अंदर से स्वै-भाव (अहम्) दूर कर लेता है। 4। उनके मन में सदा मालिक-प्रभू ही बसा रहता है। और कोई दूसरा नहीं बसता। उनको आत्मिक जीवन देने वाला सिर्फ हरी-नाम ही मीठा लगता है। जगत में (हर जगह उनको) वही दिखाई देता है जो पवित्र है और सदा कायम रहने वाला है। हे नानक ! (कह- हे भाई !) परमात्मा का नाम परमात्मा से ही मिलता है। (मिलता उनको है) जिनके भाग्यों में धुर-दरगाह से ही (नाम की प्राप्ति का लेख) लिखा होता है। 5। 4।
मलार महला 3 ॥
गण गंधरब नामे सभि उधरे गुर का सबदु वीचारि ॥
हउमै मारि सद मंनि वसाइआ हरि राखिआ उरि धारि ॥
जिसहि बुझाए सोई बूझै जिस नो आपे लए मिलाइ ॥
अनदिनु बाणी सबदे गांवै साचि रहै लिव लाइ ॥1॥
मन मेरे खिनु खिनु नामु सम॑ालि ॥
गुर की दाति सबद सुखु अंतरि सदा निबहै तेरै नालि ॥1॥ रहाउ ॥
मनमुख पाखंडु कदे न चूकै दूजै भाइ दुखु पाए ॥
नामु विसारि बिखिआ मनि राते बिरथा जनमु गवाए ॥
इह वेला फिरि हथि न आवै अनदिनु सदा पछुताए ॥
मरि मरि जनमै कदे न बूझै विसटा माहि समाए ॥2॥
गुरमुखि नामि रते से उधरे गुर का सबदु वीचारि ॥
जीवन मुकति हरि नामु धिआइआ हरि राखिआ उरि धारि ॥
मनु तनु निरमलु निरमल मति ऊतम ऊतम बाणी होई ॥
एको पुरखु एकु प्रभु जाता दूजा अवरु न कोई ॥3॥
आपे करे कराए प्रभु आपे आपे नदरि करेइ ॥
मनु तनु राता गुर की बाणी सेवा सुरति समेइ ॥
अंतरि वसिआ अलख अभेवा गुरमुखि होइ लखाइ ॥
नानक जिसु भावै तिसु आपे देवै भावै तिवै चलाइ ॥4॥5॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: मलार महला 3 ॥ हे भाई ! गण-गंधर्व (आदि देव-श्रेणियों के लोग) सारे परमात्मा के नाम के द्वारा ही। गुरू का शबद मन में बसा के ही संसार-समुंद्र से पार लांघे हैं। (जिन्होंने) परमात्मा को अपने हृदय में टिकाए रखा। उन्होंने (अपने अंदर से) अहंकार को समाप्त करके प्रभू के नाम को सदा अपने मन में बसा लिया। हे भाई ! वही मनुष्य (इस सही जीवन-राह को) समझता है। जिसको परमात्मा स्वयं ही समझ बख्शता है। जिसको स्वयं (अपने चरणों में) जोड़ता है। वह मनुष्य गुरू की बाणी से गुरू के शबद से (प्रभू के सिफतसालाह के गीत) गाता है। और सदा-स्थिर प्रभू में सुरति जोड़े रखता है। 1। हे मेरे मन ! परमात्मा का नाम हर पल याद करता रह। गुरू के बख्शे हुए शबद का आनंद आपके अंदर टिका रहेगा। हे मन ! (यह हरी-नाम) आपका साथ सदा बनाए रखेगा। 1। रहाउ। हे भाई ! अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य का पाखण्ड कभी समाप्त नहीं होता। वह माया के मोह में दुख सहता रहता है। प्रभू-नाम को भुला के अपने मन में माया के साथ रंगा होने के कारण वह अपनी जिंदगी व्यर्थ गवाता है। उसको यह (मनुष्य जनम का) समय दोबारा नहीं मिलता। (इस वास्ते) सदा हाथ मलता रहता है। वह सदा जनम-मरण के चक्करों में पड़ा रहता है (सही जीवन-राह को) समझ नहीं सकता। और (विकारों की) गंदगी में लीन रहता है। 2। हे भाई ! गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य हरी-नाम-रंग में रंगे रहते हैं। वे गुरू के शबद को मन में बसा के (संसार-समुंद्र से) पार लांघ जाते हैं। जो मनुष्य परमात्मा का नाम सिमरते हैं। परमात्मा को अपने हृदय में बसाए रखते हैं। वे जीवित ही (दुनिया की किरत-व्यवहार करते हुए ही) विकारों से खलासी पाए रखते हैं। उनका मन पवित्र हो जाता है। उनका शरीर पवित्र हो जाता है। उनकी मति भी ऊँची हो जाती है। उनके बोल-चाल उक्तम हो जाते हैं। वे मनुष्य एक सर्व-व्यापक प्रभू के साथ गहरी सांझ डाले रखते हैं (प्रभू के बिना) कोई और दूसरा (उनको कहीं) नहीं (दिखता)। 3। हे भाई ! प्रभू स्वयं ही सब कुछ करता है और (जीवों से) करवाता है। स्वयं ही मेहर की निगाह (जीवों पर) करता है। (जिस मनुष्य पर मेहर की निगाह करता है। उसका) मन (उसका) तन गुरू की बाणी (के रंग) में रंगा रहता है। उसकी सुरति (प्रभू की) भगती में लीन रहती है। उसके अंदर अलख और अभेव प्रकट हो जाता है। गुरू के सन्मुख हो के (वह अंदर बसते प्रभू को) देख लेता है। हे नानक ! जो मनुष्य प्रभू को भा जाता है उसको यह दाति बख्शता है। जै। से उसकी रज़ा होती है वह (जीवों को) जीवन-राह पर चलाता है। 4। 5।
मलार महला 3 दुतुके ॥
सतिगुर ते पावै घरु दरु महलु सु थानु ॥
गुर सबदी चूकै अभिमानु ॥1॥
जिन कउ लिलाटि लिखिआ धुरि नामु ॥
अनदिनु नामु सदा सदा धिआवहि साची दरगह पावहि मानु ॥1॥ रहाउ ॥
मन की बिधि सतिगुर ते जाणै अनदिनु लागै सद हरि सिउ धिआनु ॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: मलार महला 3 दुतुके ॥ हे भाई ! मनुष्य गुरू से ही परमात्मा का घर प्रभू का दर प्रभू का महल और जगह पा सकता है। गुरू के शबद से ही (मनुष्य के अंदर से) अहंकार समाप्त होता है। 1। हे भाई ! जिन मनुष्यों के लिए (उनके) माथे पर धुर-दरगाह से नाम (का सिमरन) लिखा होता है। वे मनुष्य हर वक्त सदा-सदा ही नाम सिमरते रहते हैं। और सदा कायम रहने वाली दरगाह में वे आदर प्राप्त करते हैं। 1। रहाउ। हे भाई ! (जो मनुष्य) गुरू से मन (को जीतने) का ढंग सीख लेता है। उसकी सुरति हर वक्त सदा ही परमात्मा (के चरणों) के साथ लगी रहती है।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।

गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर वर्ष की आयु में गुरु-गद्दी सँभाली, 1552 में, और 1574 तक रहे। उनकी वाणी में बुढ़ापे, समाज की संरचना, और संगति की चिन्ताएँ बार-बार लौटती हैं। उन्होंने ही लंगर (साझा-भोजन) की व्यवस्था मज़बूत की, और देश-भर में बाईस मंजी (केन्द्र) स्थापित किए।

इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “जिन मनुष्यों को गुरू आत्मिक जीवन की दाति देता है।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।