Lulla Family

अंग 1245

अंग
1245
राग सारंग
राग: सारंग · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
गुर परसादी घटि चानणा आन॑ेरु गवाइआ ॥
लोहा पारसि भेटीऐ कंचनु होइ आइआ ॥
नानक सतिगुरि मिलिऐ नाउ पाईऐ मिलि नामु धिआइआ ॥
जिन॑ कै पोतै पुंनु है तिन॑ी दरसनु पाइआ ॥19॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: (सत्संग में रहने से) सतिगुरू की कृपा से हृदय में (प्रभू के नाम का) प्रकाश हो जाता है और (माया के मोह का) अंधेरा दूर हो जाता है। (जैसे) पारस से छूने पर लोहा सोना बन जाता है। (इसी तरह) हे नानक ! अगर सतिगुरू मिल जाए (तो गुरू की छोह से) नाम मिल जाता है। (गुरू को) मिल के नाम सिमरा जाता है। पर (प्रभू का) दीदार उनको प्राप्त होता है जिनके भाग्यों में (पिछली की हुई) अच्छाई मौजूद है। 19।
सलोक मः 1 ॥
ध्रिगु तिना का जीविआ जि लिखि लिखि वेचहि नाउ ॥
खेती जिन की उजड़ै खलवाड़े किआ थाउ ॥
सचै सरमै बाहरे अगै लहहि न दादि ॥
अकलि एह न आखीऐ अकलि गवाईऐ बादि ॥
अकली साहिबु सेवीऐ अकली पाईऐ मानु ॥
अकली पड़ि॑ कै बुझीऐ अकली कीचै दानु ॥
नानकु आखै राहु एहु होरि गलां सैतानु ॥1॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1॥ जो मनुष्य परमात्मा का नाम (तावीत व अन्य जंत्र-मंत्र की शकल में) बेचते हैं उनके जीवन को लाहनत है (धिक्कार है। अगर वे बँदगी भी करते हैं तो भी उनकी ‘नाम’ वाली फसल इस तरह साथ-साथ उजड़ती जाती है। और) जिनकी फसल (साथ-साथ) उजड़ती जाए उनका खलिहान कहाँ बनना हुआ। (भाव। उस बँदगी का अच्छा नतीजा नहीं निकल सकता। क्योंकि वे बँदगी के सही रास्ते से भटके हुए हैं)। सही मेहनत के बिना प्रभू की हजूरी में भी उनकी कद्र नहीं होती। (परमात्मा का नाम-सिमरन करना बड़ी सुंदर अकल की बात है। पर तावीत-धागे बना के देने में लग जाने पर यह) अकल व्यर्थ गवा लेना है- इसको अक्ल नहीं कहते। अकल यह है कि परमात्मा का सिमरन करें और इज्जत कमाएं। अकल यह है कि (प्रभू की सिफत-सालाह वाली बाणी) पढ़ें (इसके गहरे भेद) समझें और औरों को समझाएं। नानक कहता है- जिंदगी का सही रास्ता सिर्फ यही है। (सिमरन से) लाभ की बातें (बताने वाला) शैतान है।
मः 2 ॥
जैसा करै कहावै तैसा ऐसी बनी जरूरति ॥
होवहि लिंङ झिंङ नह होवहि ऐसी कहीऐ सूरति ॥
जो ओसु इछे सो फलु पाए तां नानक कहीऐ मूरति ॥2॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: महला 2 ॥ ऐसी ही मर्यादा बनी हुई है कि मनुष्य जिस प्रकार के कर्म करता है वैसा ही उसका नाम पड़ जाता है। (इस मर्यादा के अनुसार असल में) वही शरीर मनुष्य-शरीर कहलवाने के योग्य होता है जिसके नरोए अंग होते हैं। जिसके अंग शिथिल नहीं होते। (इस तरह) हे नानक ! वही अस्तित्व मनुष्य-अस्तित्व कहा जाना चाहिए जिसके अंदर प्रभू के मिलने की चाहत हो (तड़प हो)। और (इस तमन्ना अनुसार प्रभू-मिलाप-रूप) फल प्राप्त हो जाए। 2।
पउड़ी ॥
सतिगुरु अंम्रित बिरखु है अंम्रित रसि फलिआ ॥
जिसु परापति सो लहै गुर सबदी मिलिआ ॥
सतिगुर कै भाणै जो चलै हरि सेती रलिआ ॥
जमकालु जोहि न सकई घटि चानणु बलिआ ॥
नानक बखसि मिलाइअनु फिरि गरभि न गलिआ ॥20॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ गुरू (जैसे) अमृत का वृक्ष है जो अमृत के रस से फला हुआ है (भाव। जिसको अमृत-रस-रूप फल लगा हुआ है। जिससे नाम-अमृत का रस मिलता है)। (यह नाम-रस रूप अमृत-फल) गुरू के शबद से ही मिलता है। पर वही मनुष्य प्राप्त करता है जिसके भाग्यों में प्राप्त करना धुर से लिखा हुआ है। जो मनुष्य गुरू के हुकम में चलता है। वह परमात्मा के साथ एक-रूप हुआ रहता है। उस मनुष्य को जमकाल घूर नहीं सकता (भाव। मौत का डर उसको छू नहीं सकता) क्योंकि उसके हृदय में ईश्वरीय-ज्योति जाग उठती है। हे नानक ! जिन लोगों को उस प्रभू ने बख्शिश करके अपने साथ मिलाया है वे बार-बार जूनियों में नहीं गलते। 20।
सलोक मः 1 ॥
सचु वरतु संतोखु तीरथु गिआनु धिआनु इसनानु ॥
दइआ देवता खिमा जपमाली ते माणस परधान ॥
जुगति धोती सुरति चउका तिलकु करणी होइ ॥
भाउ भोजनु नानका विरला त कोई कोइ ॥1॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1॥ जिन मनुष्यों ने सच को व्रत बनाया (भाव। सच धारण करने का प्रण लिया है)। संतोख जिनका तीर्थ है। जीवन-उद्देश्य की समझ और प्रभू-चरणों में चित्त जोड़ने को जिन्होंने तीर्थों का स्नान समझा है। दया जिनका ईष्ट-देव है। (दूसरों की ज्यादती) सहने की आदत (क्षमा) जिनकी माला है; (सदाचारी जीवन) जीने की जुगति जिनके लिए (देव-पूजा के वक्त पहनने वाली) धोती है। सुरति (को पवित्र रखना) जिनका (स्वच्छ) चौका है। ऊँचे आचरण का जिन्होंने माथे पर तिलक लगाया हुआ है। और प्रेम जिन (की आत्मा) की ख़ुराक है। हे नानक ! वे मनुष्य सबसे अच्छे हैं; पर। ऐसा मनुष्य है कोई विरला-विरला। 1।
महला 3 ॥
नउमी नेमु सचु जे करै ॥
काम क्रोधु त्रिसना उचरै ॥
दसमी दसे दुआर जे ठाकै एकादसी एकु करि जाणै ॥
दुआदसी पंच वसगति करि राखै तउ नानक मनु मानै ॥
ऐसा वरतु रहीजै पाडे होर बहुतु सिख किआ दीजै ॥2॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: महला 3॥ जो मनुष्य सच धारण करने के नियम को नउमी (का व्रत) बनाए। काम-क्रोध और लालच को अच्छी तरह दूर कर ले; अगर दसों ही इन्द्रियों को (विकारों से) रोक के रखे (इस उद्यम को) दसमी (तिथि का व्रत) बनाए। एक परमात्मा को हर जगह व्यापक समझे- यह उसकी ऐकादशी का व्रत हो। पाँच-कामादिकों को काबू में रखे- और यह उसका द्वादशी का व्रत हो। तो। हे नानक ! मन पतीज जाता है। हे पण्डित ! अगर इस तरह का व्रत निभा सकें तो किसी और शिक्षा की आवश्यक्ता नहीं पड़ती। 2।
पउड़ी ॥
भूपति राजे रंग राइ संचहि बिखु माइआ ॥
करि करि हेतु वधाइदे पर दरबु चुराइआ ॥
पुत्र कलत्र न विसहहि बहु प्रीति लगाइआ ॥
वेखदिआ ही माइआ धुहि गई पछुतहि पछुताइआ ॥
जम दरि बधे मारीअहि नानक हरि भाइआ ॥21॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ पातशाह। राजे। कंगाल और अमीर – सब माया-रूप जहर इकट्ठा करते हैं। संचित कर करके (इससे) हित बढ़ाते हैं (और अगर दाँव लगे तो) दूसरों का धन (भी) चुरा लेते हैं। माया से (इतना) ज्यादा हित जोड़ते हैं कि पुत्र और पत्नी का ऐतबार भी नहीं करते; (पर जब) आँखों के सामने ही माया ही माया छल के (भाव। अपने मोह में फसा के) चली जाती है तो (इसको जोड़ने वाले) आहें भरते हैं; (भाव। ऐसा प्रतीत होता है। जैसे वे) जम के दरवाजे पर बँधे हुए मार खा रहे हैं। हे नानक ! (किसी के वश की बात नहीं) प्रभू का ऐसे ही अच्छा लगता है। 21।
सलोक मः 1 ॥
गिआन विहूणा गावै गीत ॥
भुखे मुलां घरे मसीति ॥
मखटू होइ कै कंन पड़ाए ॥
फकरु करे होरु जाति गवाए ॥
गुरु पीरु सदाए मंगण जाइ ॥
ता कै मूलि न लगीऐ पाइ ॥
घालि खाइ किछु हथहु देइ ॥
नानक राहु पछाणहि सेइ ॥1॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महूला 1 ॥ (पण्डित का ये हाल है कि) परमात्मा के भजन तो गाता है पर खुद समझ से वंचित है (भाव। भजन गाने को वह रोजी का वसीला बनाए रखता है। समझ ऊँची नहीं हो सकी)। भूख के मारे हुए मुल्ला की मस्जिद भी रोजी की ही खातिर है (भाव। मुलला ने बाँग नमाज़ आदि मस्जिद की क्रिया को रोटी का वसीला ही बनाया हुआ है) (तीसरा एक) और है जो हॅड-हराम होने के कारण कान फड़वा लेता है। फकीर बन जाता है। कुल की अणख गवा बैठता है। (वैसे तो अपने आप को) गुरू-पीर कहलवाता है (पर रोटी दर-दर) माँगता-फिरता है; ऐसे लोगों के पैरों में भी कभी नहीं लगना चाहिए। जो-जो मनुष्य मेहनत से कमा के (स्वयं) खाते हैं और उस कमाई में से कुछ (औरों को भी) देते हैं। हे नानक ! ऐसे बंदे ही जिंदगी का सही रास्ता पहचानते हैं। 1।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।

नानक का स्वर साफ़ है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पन्द्रहवीं सदी के अंतिम दशकों में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पहली बड़ी यात्रा पर थे। वो जो शब्द लाए, वो आज भी इसी ग्रंथ में पढ़े जाते हैं।

इस अंग पर 8 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(सत्संग में रहने से) सतिगुरू की कृपा से हृदय में (प्रभू के नाम का) प्रकाश हो जाता है और (माया के मोह का) अंधेरा दूर हो जाता है।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।