नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: पाप और पुन्य के फल बता के) वेद तो व्यापार की बातें करता है; (पर। मनुष्य के लिए असल) राशि-पूँजी (प्रभू के गुणों का) ज्ञान है और यह ज्ञान प्रभू की मेहर से (गुरू से) मिलता है; हे नानक ! (इस ज्ञान-रूप) पूँजी के बिना कोई मनुष्य (जगत से) लाभ कमा के नहीं जाता। 2।
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ (अगर) नीम (के) वृक्ष को अमृत-रस डाल के (भी) बहुत सींचें (तो भी नीम का कड़वापन नहीं जाता); अगर बहुत सारा दूध पिला के मंत्र वश करके साँप को ऐतबारी बनाएं (भाव। साँप पर विश्वास करें।) (फिर भी वह डंक मारने का स्वभाव नहीं छोड़ता); (जैसे) पत्थर को स्नान कराएं (तो भी वह कोरे का कोरा। इसी तरह) मन के पीछे चलने वाला मनुष्य कोरा ही रहता है (उसका हृदय कभी) भीगता नहीं; अगर जहर को अमृत से सींचें (तो भी वह अमृत नहीं बन जाता) जहर का ही असर रहता है। (पर) हे नानक ! अगर प्रभू (गुरमुखों की) संगति मिलाए तो (मन में से माया के मोह वाली) सारी जहर उतर जाती है। 16।
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1॥ मौत ने (कभी) महूरत नहीं पूछा। कभी ये बात नहीं पूछी कि आज कौन सी तारीख है कौन सा वार है। कई जीवों ने (यहाँ से चलने के लिए। जैसे। अपना सामान) लाद लिया है। कई लाद के चल पड़े हैं और कई जीवों ने (सामान के) भार बाँध लिए हैं। कई जीवों की तैयारी हो गई है। और कई जीवों को चलने के बुलावे आ गए हैं; फौजें। दमामे और बाँके घर यहीं रह जाते हैं। हे नानक ! यह शरीर जो मिट्टी की मुट्ठी थी (जो मिट्टी से बना था) दोबारा मिट्टी में जा मिला। 1।
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: महला 1॥ हे नानक ! यह शरीर मिट्टी का किला था। सो आखिर मिट्टी का ये निर्माण गिर ही गया। हे जिंदे ! आप (इस शरीर की खातिर) नित्य खोट ही कमाता रहा और अपने अंदर तूने चोर-मन को बैठाए रखा। 2।
पउड़ी ॥ जिन अंदरि निंदा दुसटु है नक वढे नक वढाइआ ॥ महा करूप दुखीए सदा काले मुह माइआ ॥ भलके उठि नित पर दरबु हिरहि हरि नामु चुराइआ ॥ हरि जीउ तिन की संगति मत करहु रखि लेहु हरि राइआ ॥ नानक पइऐ किरति कमावदे मनमुखि दुखु पाइआ ॥17॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ जिन (मन के मुरीद) मनुष्यों के मन में दूसरों की निंदा करने का बुरा स्वभाव होता है उनकी कहीं इज्जत नहीं होती (वे हर जगह) हल्के पड़ते हें; माया (के इस विकार में ग्रसे होने) के कारण वे बहुत कुरूप और भ्रष्ट मुँह वाले प्रतीत होते हैं और सदा दुखी रहते हैं। जो मनुष्य सदा नित्य उठ के (भाव। स्वभावत।) दूसरों का धन चुराते हैं (भाव। जो निंदा करके दूसरों की इज्जत रूप धन छीनने का यतन करते हैं) उन (के अपने अंदर) का हरी-नाम (-रूप धन) चोरी हो जाता है। हे हरी जीउ ! हे हरी राय ! हमारी सहायता करो। हमें उनकी संगति ना दो। हे नानक ! मन के मुरीद मनुष्य पिछले किए कर्मों के संस्कारों के अनुसार (अब भी निंदा की किरत) कमाते हैं और दुख पाते हैं। 17।
सलोक मः 4 ॥ सभु कोई है खसम का खसमहु सभु को होइ ॥ हुकमु पछाणै खसम का ता सचु पावै कोइ ॥ गुरमुखि आपु पछाणीऐ बुरा न दीसै कोइ ॥ नानक गुरमुखि नामु धिआईऐ सहिला आइआ सोइ ॥1॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 4 ॥ हरेक जीव पति-प्रभू का है पति-प्रभू से हरेक जीव पैदा होता है; जब जीव पति का हुकम पहचानता है तो सदा कायम रहने वाले प्रभू को प्राप्त कर लेता है। अगर गुरू के हुकम में चल के स्वै की सूझ हो जाए तो (जगत में) कोई जीव बुरा नहीं लगता। हे नानक ! (जगत में) पैदा हुआ जीव सुखी जीवन वाला होता है जो गुरू के सन्मुख हो के नाम सिमरता है। 1।
मः 4 ॥ सभना दाता आपि है आपे मेलणहारु ॥ नानक सबदि मिले न विछुड़हि जिना सेविआ हरि दातारु ॥2॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: महला 4 ॥ सब जीवों को (रोज़ी-रोटी आदि) देने वाला और (अपने साथ) मिलाने वाला प्रभू स्वयं ही है। हे नानक ! जिन्होंने (सारे पदार्थ) देने वाले प्रभू को सिमरा है। जो गुरू के शबद में जुड़े रहते हैं वे कभी प्रभू से विछुड़ते नहीं हैं। 2।
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ जो मनुष्य गुरू के सन्मुख होते हैं उनके हृदय में शांति होती है। (उनके मन में) नाम (जपने का चाव) पैदा हुआ रहता है। (गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य) मेरे प्रभू को प्यारे लगते हैं। उन्होंने (जैसे) जप कर लिए हैं। तप साध लिए हैं। तीर्थों पर नहा लिया है और मन को वश में करने के साधन साध लिए हैं गुरमुखों का हृदय पवित्र होता है। वे प्रभू का सिमरन करते हैं और प्रभू की सिफत सालाह करके सुंदर लगते हैं। प्यारे प्रभू को भी यही बात भाती है। वह गुरमुखों को (संसार-समुंद्र से) पार लंघा लेता है। हे नानक ! गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्यों को प्रभू ने स्वयं अपने साथ मिला लिया होता है। वे प्रभू के दर पर सुंदर लगते हैं (शोभते हैं)। 18।
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1 ॥ धनवान मनुष्य (सदा) यूँ ही कहता है कि मैं और धन कमाने के लिए जाऊँ। पर। नानक तो उस दिन कंगाल (होगा) जिस दिन इसको परमात्मा का नाम बिसरेगा। 1।
मः 1 ॥ सूरजु चड़ै विजोगि सभसै घटै आरजा ॥ तनु मनु रता भोगि कोई हारै को जिणै ॥ सभु को भरिआ फूकि आखणि कहणि न थंम॑ीऐ ॥ नानक वेखै आपि फूक कढाए ढहि पवै ॥2॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: महला 1 ॥ सूरज चढ़ता है (और डूबता है। इस तरह दिनों के) गुजरने से हरेक जीव की उम्र घट रही है। जिसका मन तन माया के भोगों में व्यस्त है वह तो मानस-जनम की बाजी हार जाता है। और। कोई (विरला। विरला। कोई एक) जीत के जाता है। (माया के कारण) हरेक जीव अहंकार से अफरा हुआ है। समझाने से अकड़ने से रुकता नहीं। हे नानक ! परमात्मा स्वयं (जीव की अकड़ को) देख रहा है। जब वह इसकी सांसें समाप्त कर देता है तो यह (अहंकारी) धरती पर गिर जाता है (भाव। मिट्टी में मिल जाता है)। 2।
पउड़ी ॥ सतसंगति नामु निधानु है जिथहु हरि पाइआ ॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ सत्संग में परमात्मा का नाम-रूप खजाना है। सत्संग में ही परमात्मा मिलता है।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।
गुरु नानक की वाणी का अपना मिज़ाज है, सीधा-सादा, बिना अलंकार के, मगर हर पंक्ति में एक ठहराव। 1469 में तलवण्डी में जन्म, सुलतानपुर के बहीखाते में कुछ साल काम, फिर तीस की उम्र के क़रीब वो लम्बी पैदल यात्रा जो काबुल, बग़दाद, मक्का, जगन्नाथ-पुरी, तिब्बत की सरहद तक उन्हें ले गयी। उनके शबद इन्हीं यात्राओं की वाणी हैं।
इस अंग पर 11 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “पाप और पुन्य के फल बता के) वेद तो व्यापार की बातें करता है; (पर।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।