मः 1 ॥ मनहु जि अंधे कूप कहिआ बिरदु न जाणन॑ी ॥ मनि अंधै ऊंधै कवलि दिसनि॑ खरे करूप ॥ इकि कहि जाणहि कहिआ बुझहि ते नर सुघड़ सरूप ॥ इकना नाद न बेद न गीअ रसु रस कस न जाणंति ॥ इकना सुधि न बुधि न अकलि सर अखर का भेउ न लहंति ॥ नानक से नर असलि खर जि बिनु गुण गरबु करंति ॥2॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।
हिन्दी अर्थ: महला 1॥ जो मनुष्य मन से अंधे कूँए हैं (भाव। महा मूर्ख हैं)। वे बताने पर भी मानवीय फर्ज को नहीं जानते; मन अंधा होने के कारण और हृदय-कमल (धर्म से) उल्टा होने के कारण वह लोग बहुत कोझे लगते हैं। कई मनुष्य ऐसे हैं जो बात करनी भी जानते हैं और किसी का कहा समझते भी हैं वे मनुष्य सुचॅजे और सुंदर लगते हैं। कई लोगों को (तो) ना जोगियों के नाद का रस। ना वेद का शौक। ना राग के प्रति आकर्षण – किसी तरह के कोमल कला की तरफ रुचि ही नहीं। ना सूझ। ना बुद्धि। ना अकल की सार। और एक अक्षर भी पढ़ना नहीं जानते। हे नानक ! जिनमें कोई भी गुण ना हो और अहंकार किए जाएं। वे मनुष्य सिर्फ गधे हैं। 2।
पउड़ी ॥ गुरमुखि सभ पवितु है धनु संपै माइआ ॥ हरि अरथि जो खरचदे देंदे सुखु पाइआ ॥ जो हरि नामु धिआइदे तिन तोटि न आइआ ॥ गुरमुखां नदरी आवदा माइआ सुटि पाइआ ॥ नानक भगतां होरु चिति न आवई हरि नामि समाइआ ॥22॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ जो मनुष्य गुरू के बताए हुए राह पर चलते हैं उनके लिए धन-पदार्थ माया आदि सब कुछ पवित्र है क्योंकि वे रॅब लेखे भी खर्चते हैं और (जरूरतमंदों को) देते हैं (ज्यों-ज्यों बाँटते हैं त्यो-त्यों) सुख पाते हैं। जो मनुष्य परमात्मा का नाम सिमरते हैं (और माया जरूरतमंदों को देते हैं) उनको (माया की) कमी नहीं आती; गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्यों को (ये बात) साफ दिखती है। (इस वास्ते) वे माया (औरों को भी) हाथों से देते हैं। हे नानक ! भक्ति करने वाले बंदों को (प्रभू के नाम के बिना कुछ) और चित्त नहीं आता (भाव। धन आदि का मोह उनके मन में घर नहीं कर सकता) वे प्रभू के नाम में लीन रहते हैं। 22।
सलोक मः 4 ॥ सतिगुरु सेवनि से वडभागी ॥ सचै सबदि जिन॑ा एक लिव लागी ॥ गिरह कुटंब महि सहजि समाधी ॥ नानक नामि रते से सचे बैरागी ॥1॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 4 ॥ वे मनुष्य बहुत भाग्यशाली हैं जो अपने गुरू के बताए हुए राह पर चलते हैं। गुरू के सच्चे शबद के द्वारा जिनकी सुरति एक परमात्मा में लगी रहती है। जो गृहस्त-परिवार में रहते हुए भी अडोल अवस्था में टिके रहते हैं। हे नानक ! वे मनुष्य असल विरक्त हैं जो प्रभू के नाम में रंगे हुए हैं। 1।
मः 4 ॥ गणतै सेव न होवई कीता थाइ न पाइ ॥ सबदै सादु न आइओ सचि न लगो भाउ ॥ सतिगुरु पिआरा न लगई मनहठि आवै जाइ ॥ जे इक विख अगाहा भरे तां दस विखां पिछाहा जाइ ॥ सतिगुर की सेवा चाकरी जे चलहि सतिगुर भाइ ॥ आपु गवाइ सतिगुरू नो मिलै सहजे रहै समाइ ॥ नानक तिन॑ा नामु न वीसरै सचे मेलि मिलाइ ॥2॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।
हिन्दी अर्थ: महला 4 ॥ अगर ये कहते रहे कि हमने फलाना काम किया। फलानी सेवा की तो इस तरह सेवा नहीं हो सकती। इस तरह किया हुआ कोई भी काम सफल नहीं होता। जिस मनुष्य को सतिगुरू के शबद का आनंद नहीं आता। प्रभू के नाम में उसका प्यार नहीं बन सकता। जिसको गुरू प्यारा नहीं लगता वह मन के हठ से ही (गुरू के दर पर) आता है (भाव। गुरू-दर पे जाने का उसको कोई लाभ नहीं होता। क्योंकि) अगर वह एक कदम आगे को उठाता है तो दस कदम पीछे जा पड़ता है। अगर मनुष्य सतिगुरू के भाणे में चले। तब ही गुरू की सेवा-चाकरी प्रवान होती है। जो मनुष्य स्वै-भाव मिटा के गुरू के दर पर जाए तो वह अडोल अवस्था में टिका रहता है। हे नानक ! ऐसे लोगों को प्रभू का नाम नहीं भूलता। वे सदा कायम रहने वाले प्रभू में जुड़े रहते हैं। 2।
पउड़ी ॥ खान मलूक कहाइदे को रहणु न पाई ॥ गड़॑ मंदर गच गीरीआ किछु साथि न जाई ॥ सोइन साखति पउण वेग ध्रिगु ध्रिगु चतुराई ॥ छतीह अंम्रित परकार करहि बहु मैलु वधाई ॥ नानक जो देवै तिसहि न जाणन॑ी मनमुखि दुखु पाई ॥23॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ (जो लोग अपने आप को) ख़ान और बादशाह कहलवाते हैं (तो भी क्या हुआ।) कोई (यहाँ सदा) नहीं रह सकता; अगर किले। सुंदर घर और चूने-गॅच इमारतें हों (तो भी क्या है।) कोई चीज़ (मनुष्य के मरने पर) साथ नहीं जाती। अगर सोने की दुमचियां वाले और हवा जैसी तेज़ रफतार वाले घोड़े हों (तो भी इन पर गुमान और) अकड़ दिखानी धिक्कार-योग्य है। अगर कई किस्मों के सुंदर-स्वादिष्ट खाने खाए हों (तो भी) बहुत विष्टा ही बढ़ाते हैं ! हे नानक ! जो दातार प्रभू ये सारी चीज़ें देता है अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य उसके साथ गहरी सांझ नहीं डालते (इसलिए) दुख ही पाते हैं। 23।
सलोक मः 3 ॥ पड़ि॑ पड़ि॑ पंडित मोुनी थके देसंतर भवि थके भेखधारी ॥ दूजै भाइ नाउ कदे न पाइनि दुखु लागा अति भारी ॥ मूरख अंधे त्रै गुण सेवहि माइआ कै बिउहारी ॥ अंदरि कपटु उदरु भरण कै ताई पाठ पड़हि गावारी ॥ सतिगुरु सेवे सो सुखु पाए जिन हउमै विचहु मारी ॥ नानक पड़णा गुनणा इकु नाउ है बूझै को बीचारी ॥1॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3 ॥ मुनि और पण्डित (वेद आदि धर्म-पुस्तकें) पढ़-पढ़ के थक गए। भेखधारी साधू धरती का रटन कर के थक गए; इतना (व्यर्थ) तकलीफ़ें ही सहते रहे। (जब तक) प्रभू के बग़ैर किसी और के प्यार में मन फसा हुआ है (पंडित क्या और साधू क्या। कोई भी चाहे हो) प्रभू का नाम प्राप्त नहीं कर सकता। क्योंकि माया के व्यापारी बने रहने के कारण मूर्ख अंधे मनुष्य तीन गुणों को ही सीते हैं (भाव। तीनों गुणों में ही रहते हैं)। वह मूर्ख (बाहर तो) रोजी कमाने की खातिर (धर्म-पुस्तकों का) पाठ करते हैं। पर (उनके) मन में खोट ही टिका रहता है। जो मनुष्य गुरू के बताए हुए राह पर चलता है वह सुख पाता है (क्योंकि गुरू के राह पर चलने वाले मनुष्य) मन में से अहंकार दूर कर लेते हैं। हे नानक ! सिर्फ परमात्मा का नाम ही पढ़ने और विचारने-योग्य है। पर कोई विचारवान ही इस बात को समझता है। 1।
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।
हिन्दी अर्थ: महला 3॥ जगत में हरेक जीव खाली हाथ आता है और खाली हाथ ही यहाँ से चला जाता है- प्रभू ने यही हुकम रखा है। इसमें कोई ना-नुकर नहीं की जा सकती; (यह जिंद) जिस प्रभू की दी हुई चीज़ है वही वापस ले जाता है। (इस बारे में) किसी से कोई गिला (-शिकवा) नहीं किया जा सकता। गुरू के बताए हुए राह पर चलने वाला मनुष्य प्रभू की रज़ा को मानता है। और (किसी प्यारे के मरने पर भी) अडोल रहके नाम-अमृत पीता है। हे नानक ! सदा सुख देने वाले प्रभू को सिमरो। और जीभ से प्रभू का नाम जपो। 2।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।
रामदास जी का जीवन-व्यवहार और रचना दोनों एक तरह की संगति में रहीं। अमृतसर का चयन, हरमंदिर साहिब का स्थल, और सूही राग की भावुक रचनाएँ, सब एक ही मनोदशा के अलग-अलग पहलू हैं।
इस अंग पर 7 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “महला 1॥ जो मनुष्य मन से अंधे कूँए हैं (भाव।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।