नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: (पर) हे नानक ! (इनके भी क्या वश। पिछले किए कर्मों के अनुसार) माथे पर लिखा लेख ही उघड़ता है (और उस लेख के अनुसार) जो कुछ करतार करता है वही होता है। 1।
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: महला 1॥ (ईश्वर से विछुड़ के) मनुष्य जालिम हो रहे हैं और सि्त्रयाँ इस जुल्म की सलाहकार बन रही हैं। मीठा स्वभाव। जगत में रहना। दिल की सफाई – ये सब बातें दूर हो गई हैं और रिश्वत आदि हराम माल इन लोगों का मन-पसनंद खाना हो गया है। शर्म-हया अपने वतन से कहीं (दूर) चली गई है (भाव। इन मनुष्यों से कहीं दूर हो गई है) अणख भी शर्म-हया के साथ ही चली गई है। हे नानक ! (अगर ‘सील संजम सुच’ आदि गुण ढूँढने हैं। तो उनका श्रोत) सिर्फ सदा कायम रहने वाला परमात्मा ही है। (इन गुणों के लिए) कोई और जगह ना तलाशो (भाव। प्रभू के बिना किसी अन्य जगह ये गुण नहीं मिल सकते)। 2।
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ जो मनुष्य शरीर पर (तो) राख मल लेता है (पर उसके) मन में (माया के मोह का) अंधेरा है। (बाहर) गोदड़ी और झोली (आदि) के कई भेष करता है और दुर्मति के कारण (इस भेष का) अहंकार करता है। प्रभू की सिफत-सालाह की बाणी नहीं उचारता। (सिर्फ) माया के मोह का पसारा ही (बनाए बैठा) है। उसके मन में लालच है भटकना है। मूर्ख ठोकरें खाता फिरता है। प्रभू का नाम नहीं सिमरता। हे नानक ! (ऐसा मनुष्य। जैसे) जूए में (मनुष्य-जन्म की) बाज़ी हार जाता है। 14।
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1 ॥ लाखों लोगों से प्यार हो। लाखों सालों की जिंदगी हो। चाहे कितनी ही खुशियां और कितने ही चाव हों। पर मरने के वक्त बंदा एक घड़ी में ही उठ के चल पड़ता है और इनसे जुदाई बहुत दुखदाई होती है। अगर सैकड़ों वर्ष भी स्वादिष्ट भोग भोगते रहें तो भी इनसे विछुड़ने का कड़वा घूँट भरना ही पड़ता है। भोगे हुए भोग तो भूल जाते हैं। पर इनसे विछुड़ने की चोट गहरा असर कर जाती है। हे नानक ! इन भोगों का मिलना और छिन जाना दोनों बातें ही दुखदाई हैं क्योंकि भोगों के कारण आखिर लोग दुखी ही होते हैं। नित्य-नित्य विषौ भोगने से विषौ भोगने का एक लंबा चस्का बन जाता है। विषौ भोग-भोग के जीव यहाँ जगत से चले जाते हैं। (और। वासना बंधे हुए) उन विषियों के ईर्द-गिर्द ही चक्कर मारते रहते हैं। 1।
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: महला 1 ॥ (मनुष्य ने) कपड़े और लकड़ी का सामान रंग से रंग लिया। घरों को चूने-गॅच से सफेद ही सफेद बना लिया। (ऐसे) स्वादों और सुखों से मन को बहलाता रहा। (पर इन कामों के कारण) हे प्रभू ! आपके से उलाहमा लिया (कि मनुष्य जन्म का मनोरथ ना कमाया)। विषौ-विकार जो आखिर दुखदाई होते हैं स्वादिष्ट जान के भोगता रहा। उसी विषौ-भोग ने शरीर में रोग पैदा कर दिए। हे माँ ! अगर प्रभू का नाम-रूपी स्वादिष्ट भोजन दोबारा मिल जाए। तो विषौ-भोगों से पैदा होया हुआ दुख दूर हो जाता है; पर। हे नानक ! यह ‘मीठा’ नाम उसी गुरमुखि को मिलता है जिसके भाग्यों में इसकी प्राप्ति लिखी हो। 2।
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी। जिन मनुष्यों के हृदय साफ नहीं। धोखा है। पर शरीर को बाहर से धो-धो के रखते हैं। वे (अपने हरेक कार्य-व्यवहार में) झूठ और धोखा ही बरतते हैं। पर झूठ उघड़ आता है। (क्योंकि) मन के अंदर जो कुछ होता है वह जाहिर हो जाता है। छुपाया छुप नहीं सकता। झूठ लालच में लगने से (नतीजा यह निकलता है कि मनुष्य) बार-बार जूनियों में जा पड़ता है। हे नानक ! जो कुछ (मनुष्य अपने कर्मों का) बीज बीजता है वही (फल) खाता है। करतार ने (यह रज़ा जीवों के माथे पर) लिख के रख दी है। 15।
सलोक मः 2 ॥ कथा कहाणी बेदंी आणी पापु पुंनु बीचारु ॥ दे दे लैणा लै लै देणा नरकि सुरगि अवतार ॥ उतम मधिम जातीं जिनसी भरमि भवै संसारु ॥ अंम्रित बाणी ततु वखाणी गिआन धिआन विचि आई ॥ गुरमुखि आखी गुरमुखि जाती सुरतंी करमि धिआई ॥ हुकमु साजि हुकमै विचि रखै हुकमै अंदरि वेखै ॥ नानक अगहु हउमै तुटै तां को लिखीऐ लेखै ॥1॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 2 ॥ (जो) शिक्षा वेद ले के आए (भाव। वेदों ने दी) (उस में यह) विचार है कि पाप क्या है और पुंन्य क्या है। (उसने यह बताया है कि हाथों से) दे के ही (दोबारा वापस) लिया जाता है और जो कुछ किसी से लेते हैं वह (अगले जनम में) मोड़ना पड़ता है। (अपने किए कर्मों के अनुसार) दुनिया ऊँची-नीच जातियों और किस्मों के वहिमों में दुखी होती है। (पर। जो) बाणी गुरू ने उचारी है। (जिसके गहरे भेद को) गुरू ने समझा है और (जिसको) सुरतियों ने जपा है वह बाणी नाम-अमृत से भरी हुई है। और प्रभू के गुण बयान करती है। यह बाणी प्रभू के गुणों की विचार करने और प्रभू में सुरति जोड़ने से प्रकट हुई है। (ये बाणी बताती है कि) परमात्मा ने अपना हुकम (-रूप सक्ता) रच के (सब जीवों को) अपने हुकम में ही रखा है और हुकम में ही संभाल करता है। हे नानक ! (इस बाणी की बरकति से) पहले (जीव का) अहंकार दूर होता है तब जीव प्रभू की हजूरी में प्रवान होता है। 1।
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: महला 1॥ वेदों की शिक्षा ये है कि (जीव का किया हुआ) पुन्य कर्म (उसके वास्ते) स्वर्ग (मिलने) का कारण (बनता) है और पाप (जीव के लिए) नर्क (में पड़ने) का कारण हो जाता है; (अपने किए हुए पुन्य और पाप का फल) खाने वाला (हरेक) जीव (खुद ही) जान लेता है कि जो कुछ कोई बीजता है वही उगता है। (इस तरह। इस कर्म-काण्ड की शिक्षा में प्रभू की सिफत-सालाह और प्रभू की मेहर को कोई जगह नहीं दी गई है)। (पर गुरू का बख्शा हुआ) ज्ञान परमात्मा को महान कह के (उसकी) सिफतसालाह करता है (और बताता है कि) प्रभू का नाम सदा कायम रहने वाला है। जो मनुष्य प्रभू का नाम (हृदय में) बीजता है उसके अंदर नाम ही प्रफुल्लित होता है और उसको प्रभू की हजूरी में आदर मिलता है। (सो।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।
नानक की रचनाओं में एक खास तरह की आबजर्वेशनल आँख है। एक पटवारी का पेशा छोड़ कर तीस के बाद के दशकों में वो काबुल, मक्का, अरब, असम, श्रीलंका, और तिब्बत की सरहद तक गए। हर जगह संत-फ़क़ीरों, बादशाहों, और साधारण किसानों से बातचीत की, और उसी बातचीत की पर्तें इन शबदों में बैठी हैं।
इस अंग पर 8 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(पर) हे नानक ! (इनके भी क्या वश।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।