गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: और देवताओं को जा के पूछूँ। उन लोगों को जा के पूछूँ जो बड़े-बड़े योद्धा बनते हैं; अगर समाधि लगाने वाले सिद्ध-हस्त योगियों की सारी मतें जा के सुनूँ कि प्रभू का दरबार मैं कैसे जा के देखूँ – (इन सभी उद्यमों के) समक्ष (एक ही सुमति है कि) सदा कायम रहने वाला प्रभू। जो निर्भय है जिसको किसी का डर नहीं और जो सारे जगत का मूल है। सिमरन के द्वारा ही मिलता है; (सिमरन के बिना) और सारी मतें कच्ची हैं। अन्य सारे उद्यम कच्चे-पिल्ले हैं (सिमरन से टूटे हुए) अंधों की अंधी-टटोलबाजी ही है। हे नानक ! ये सिमरन प्रभू की मेहर से मिलता है। प्रभू अपनी मेहर की नजर से ही पार लंघाता है। 2।
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ अगर मन नाम सिमरन में पतीज जाए तो दुमर्ति दूर हो जाती है और (अच्छी) मति चमक उठती है। अहंकार दूर हो जाता है। सारे ही (मन के) रोग नाश हो जाते हैं। अगर नाम में मन पतीज जाए तो (मन में) नाम (जपने का चाव) पैदा हो जाता है और अडोल अवस्था में पहुँच के सुख प्राप्त होता है। मन में ठंड बरत जाती है। प्रभू मन में आ बसता है। हे नानक ! (प्रभू का) नाम (जैसे) एक कीमती मोती है। पर हरी-नाम सिमरता वह मनुष्य है जो गुरू के सन्मुख होता है। 11।
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1॥ हे प्रभू ! अगर कोई और आपके बराबर का हैं तो ही मैं उसके सामने आपका जिकर करूँ (पर आपके जैसा और कोई है ही नही। सो) आपकी सिफत-सालाह मैं आपके आगे ही कर सकता हूँ (आपके जैसा मैं आपको ही कह सकता हूँ। और ज्यों-ज्यों मैं आपकी सिफत करता हूँ) आपका नाम मुझ (आत्मिक जीवन से) अंधे की आँखों के लिए रौशनी देता है। लिख के अथवा बोल के जो कुछ मैंने आपकी सिफत में कहा है। वह सब आपके प्यार के आकर्षण में ही कहा है। वरना सबसे बड़ी बात कहनी नानक को यही फबती है कि (जो कुछ है) सब आपकी ही वडिआई है। 1।
मः 1 ॥ जां न सिआ किआ चाकरी जां जंमे किआ कार ॥ सभि कारण करता करे देखै वारो वार ॥ जे चुपै जे मंगिऐ दाति करे दातारु ॥ इकु दाता सभि मंगते फिरि देखहि आकारु ॥ नानक एवै जाणीऐ जीवै देवणहारु ॥2॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: महला 1॥ जब जीव अस्तित्व में नहीं आया था तब ये कौन सी कमाई कर सकता था। और जब पैदा हुआ तब भी कौन सी किरत की। (भाव। जीव के कुछ वश नहीं)। जिसने पैदा किया है वह स्वयं ही सारे सबब बनाता है और सदा जीवों की संभाल करता है। चाहे चुप कर रहें चाहे माँगें। दाता देने वाला करतार खुद ही दातें देता है। जब जीव सारा जगत फिर के (ये बात) देख लेते हैं (तो कहते हैं कि) एक परमात्मा दाता है और सारे जीव उसके मँगते हैं। हे नानक ! इस तरह समझ आ जाती है कि दातें देने वाला प्रभू (सदा ही) जीवित रहता है। 2।
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: पाउड़ी ॥ अगर मन नाम में पतीज जाए तो (अंदर नाम की) लिव पैदा हुई रहती है और नाम में ही मति (पवित्र होती) है। मनुष्य प्रभू के गुण कहने लग जाता है और नाम में सुख-आनंद से टिकता है। भटकना काटी जाती है। और फिर कोई दुख नहीं व्यापता; प्रभू की सिफतसालाह करने लग जाता है और पापों वाली मति धुल जाती है। हे नानक ! पूरे सतिगुरू से यह निश्चय आता है कि नाम (-सिमरन जीवन का सही रास्ता) है (ये दाति उनको मिलती है) जिनको वह प्रभू खुद देता है। 12।
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1 ॥ (जब तक मनुष्य) शास्त्रों वेद पुराण (आदि धर्म-पुस्तकों को निरा) पढ़ता रहता है (तब तक) ऊँचा-ऊँचा बोलता है (औरों को सुनाता है) पर खुद समझता कुछ नहीं। (पर) जब (धर्म-पुस्तकों के उपदेश का) भेद पा लेता है तब (इसे हर जगह) प्रभू ही दिखाई देता है। और। नानक कहता है इसकी (प्रर्दशन वाली ऊँचा-ऊँचा बोल के सुनाने वाली ढोंगी) आवाज बंद हो जाती हैं।
मः 1 ॥ जां हउ तेरा तां सभु किछु मेरा हउ नाही तू होवहि ॥ आपे सकता आपे सुरता सकती जगतु परोवहि ॥ आपे भेजे आपे सदे रचना रचि रचि वेखै ॥ नानक सचा सची नांई सचु पवै धुरि लेखै ॥2॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: महला 1 ॥ जब मैं आपका बन जाता हूँ तब जगत में सब कुछ मुझे अपना प्रतीत होता है (क्योंकि उस वक्त) मेरा अपनत्व नहीं होता। मुझे आप ही दिखाई देता है। आप खुद ही जोर का मालिक। आप खुद ही सुरति का मालिक मुझे लगता है। आप खुद ही जगत को अपनी सक्ता (के धागे) में परोने वाला प्रतीत होता है। हे नानक ! प्रभू स्वयं ही (जीवों को यहाँ) भेजता है। स्वयं ही (यहाँ से वापस) बुला लेता है। सृष्टि पैदा करके आप ही संभाल कर रहा है। वह सदा-स्थिर रहने वाला है। उसकी वडिआई सदा कायम रहने वाली है। उसके नाम का सिमरन ही उसकी हजूरी में कबूल होता है। 2।
पउड़ी ॥ नामु निरंजन अलखु है किउ लखिआ जाई ॥ नामु निरंजन नालि है किउ पाईऐ भाई ॥ नामु निरंजन वरतदा रविआ सभ ठांई ॥ गुर पूरे ते पाईऐ हिरदै देइ दिखाई ॥ नानक नदरी करमु होइ गुर मिलीऐ भाई ॥13॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ माया-रहित प्रभू का नाम (ऐसा है जिस) का कोई खास चिन्ह नहीं दिखता। (तो फिर) उसको बयान कैसे किया जाए। हे भाई ! निरंजन का नाम सब जगह व्यापक है और मौजूद है। (हमारे) साथ (भी) है। पर वह मिले कैसे। निरंजन नाम समूची सृष्टि में कार्यशील है। (यह नाम) पूरे सतिगुरू से मिलता है। (पूरा गुरू प्रभू का नाम हमारे) हृदय में दिखा देता है। हे नानक ! (कह-) हे भाई ! जब (प्रभू की मेहर भरी) निगाह से मेहर हो तो गुरू मिलता है। 13।
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1 ॥ ईश्वर से विछुड़ी हुई दुनिया को कुत्ते की तरह खाने का हलक लगा रहता है और रिश्वत आदि हराम चीज़ इसका मन-पसंद खाना हो जाता है (जेसे कुत्ते का मन-पसंद खाना मुरदार है)। (ये दुनिया) सदा झूठ बोलती है। (जैसे। मुरदार खाने वाले कुत्ते की तरह) भौंक रही है। (इस तरह इसके अंदर से) धर्म (की अंश) और (ईश्वरीय गुणों की) विचार समाप्त हो जाती है। जब तक ऐसे लोग (जगत में) जीते हैं इनकी (कोई व्यक्ति) इज्जत नहीं (करता)। जब मर जाते हैं। (लोग इनको) बुरों के रूप में ही याद करते हैं।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।
नानक का स्वर साफ़ है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पन्द्रहवीं सदी के अंतिम दशकों में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पहली बड़ी यात्रा पर थे। वो जो शब्द लाए, वो आज भी इसी ग्रंथ में पढ़े जाते हैं।
इस अंग पर 9 शबद हैं, क्रम-से बँधे।
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।