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अंग 1241

अंग
1241
राग सारंग
राग: सारंग · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
पूज करे रखै नावालि ॥
कुंगू चंनणु फुल चड़ाए ॥
पैरी पै पै बहुतु मनाए ॥
माणूआ मंगि मंगि पैन॑ै खाइ ॥
अंधी कंमी अंध सजाइ ॥
भुखिआ देइ न मरदिआ रखै ॥
अंधा झगड़ा अंधी सथै ॥1॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: उसकी पूजा करता है। उसको स्नान करवाता है; केसर चंदन और फूल (उस मूर्ति के आगे) भेट करता है। उसके पैरों पर सिर रख-रख के उसको प्रसन्न करने का यतन करता है; (पर। रोटी कपड़ा और) मनुष्यों से माँग-माँग के खाता और पहनता है। अज्ञानता वाले काम करने से (यही) सज़ा मिलती है कि और भी अज्ञानता बढ़ती जाती है। (मूर्ख यह नहीं जानता कि कि ये मूर्ति) ना भूखे को कुछ दे सकती है ना (भूख से मरते हुए को) मरने से बचा सकती है। (फिर भी मूर्ति-पूजक) अज्ञानियों की सभा में अज्ञानता वाला ये लंबा सिलसिला चलता ही जाता है (भाव। फिर भी लोक आँखें बंद करके प्रभू को छोड़ के मूर्ति-पूजा करते ही जा रहे हैं)। 1।
महला 1 ॥
सभे सुरती जोग सभि सभे बेद पुराण ॥
सभे करणे तप सभि सभे गीत गिआन ॥
सभे बुधी सुधि सभि सभि तीरथ सभि थान ॥
सभि पातिसाहीआ अमर सभि सभि खुसीआ सभि खान ॥
सभे माणस देव सभि सभे जोग धिआन ॥
सभे पुरीआ खंड सभि सभे जीअ जहान ॥
हुकमि चलाए आपणै करमी वहै कलाम ॥
नानक सचा सचि नाइ सचु सभा दीबानु ॥2॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: महला 1 ॥ योग-मत के अनुसार बिरती जोड़नी। वेद पुराण (आदि के पाठ)। तप साधन करने। (भजनों के) गीत और (उनकी विचारें)। ऊँची मति और सद्-बुद्धि। तीर्थ-स्थान (आदि के स्नान)। बादशाहियां और हकूमतें। खुशियां और अच्छे खाने। मनुष्य और देवते। योग की समाधियां। धरतियों के मण्डल और हिस्से। सारे जगत के जीव-जंतु – इन सब को परमात्मा अपनी आज्ञा में चलाता है। पर उसके हुकम की कलम जीवों के किए कर्मों के अनुसार बहती है। हे नानक ! वह प्रभू सदा कायम रहने वाला है। उसका दरबार सदा स्थिर रहने वाला है। उसके नाम में जुड़ने से उसकी प्राप्ति होती है।
पउड़ी ॥
नाइ मंनिऐ सुखु ऊपजै नामे गति होई ॥
नाइ मंनिऐ पति पाईऐ हिरदै हरि सोई ॥
नाइ मंनिऐ भवजलु लंघीऐ फिरि बिघनु न होई ॥
नाइ मंनिऐ पंथु परगटा नामे सभ लोई ॥
नानक सतिगुरि मिलिऐ नाउ मंनीऐ जिन देवै सोई ॥9॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ यदि मन नाम-सिमरन में पतीज जाए तो (मन में) सुख पैदा होता है। नाम में (पतीजने से) ही उच्च आत्मिक अवस्था बनती है। इज्जत मिलती है और हृदय में वह प्रभू (आ बसता है)। संसार-समुंद्र से पार लांघ जाया जाता है। और (जिंदगी के राह में) कोई रोक नहीं पड़ती। जीवन का रास्ता प्रत्यक्ष साफ दिखने लग जाता है क्योंकि नाम में सारी रौशनी है (आत्मिक जीवन की सूझ है)। (पर) हे नानक ! अगर सतिगुरू मिले तो ही नाम-सिमरन जिंदगी का ‘प्रकट पंथ’ माना जा सकता है (और ये दाति उनको ही मिलती है) जिनको वह प्रभू स्वयं देता है। 9।
सलोक मः 1 ॥
पुरीआ खंडा सिरि करे इक पैरि धिआए ॥
पउणु मारि मनि जपु करे सिरु मुंडी तलै देइ ॥
किसु उपरि ओहु टिक टिकै किस नो जोरु करेइ ॥
किस नो कहीऐ नानका किस नो करता देइ ॥
हुकमि रहाए आपणै मूरखु आपु गणेइ ॥1॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1॥ अगर कोई मनुष्य सिर के बल हो के सारी धरतियों और धरती के सारे हिस्सों में फिरे। अगर एक पैर के भार खड़ा हो के ध्यान धरे। अगर प्राण रोक के मन में जप करे। अगर अपना सिर गर्दन के नीचे रखे (भाव। अगर शीर्षासन करके सिर के भार खड़ा रहे) – (तो भी इनमें से) किस साधन पर वह टेक रखता है। (भरोसा कर सकता है।) किस उद्यम को अपनी शक्ति बनाता है। (भाव। ये सारे भरोसे तुच्छ हैं। इनका आसरा कमजोर है)। हे नानक ! यह बात नहीं कही जा सकती कि करतार किसको मान-सम्मान बख्शता है। (प्रभू सब जीवों को) अपने हुकम में चलाता है। पर मूर्ख अपने आप को (बड़ा) समझने लग जाता है। 1।
मः 1 ॥
है है आखां कोटि कोटि कोटी हू कोटि कोटि ॥
आखूं आखां सदा सदा कहणि न आवै तोटि ॥
ना हउ थकां न ठाकीआ एवड रखहि जोति ॥
नानक चसिअहु चुख बिंद उपरि आखणु दोसु ॥2॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: महला 1 ॥ अगर मैं करोड़ों-करोड़ों बार कहॅूँ कि परमात्मा सचमुच है। और करोड़ों बार से ज्यादा करोड़ों बार (यही बात) कहूँ। और मैं यही बात सदा ही अपने मुँह से कहता रहूँ। मेरे कहने में कोई कमी ना आए; (हे प्रभू !) अगर आप मेरे में इतनी सक्ता (ताकत) डाल दे कि मैं कहता-कहता ना तो थकूँ और ना ही किसी के रोके रुकूँ। तो भी। हे नानक ! (कह-) यह सारा यतन आपकी रक्ती भर सिफत के बराबर होता है। यदि मैं कहूँ कि इससे ज्यादा सिफत मैंने की है तो (यह मेरी) भूल है। 2।
पउड़ी ॥
नाइ मंनिऐ कुलु उधरै सभु कुटंबु सबाइआ ॥
नाइ मंनिऐ संगति उधरै जिन रिदै वसाइआ ॥
नाइ मंनिऐ सुणि उधरे जिन रसन रसाइआ ॥
नाइ मंनिऐ दुख भुख गई जिन नामि चितु लाइआ ॥
नानक नामु तिनी सालाहिआ जिन गुरू मिलाइआ ॥10॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ अगर मन नाम सिमरन में पतीज जाए तो (ऐसे मनुष्य की) सारी कुल सारा परिवार (भवजल में से) बच जाता है। नाम में मन पतीजने से जिन लोगों ने नाम को हृदय में बसा लिया है उनकी सारी संगति (संसार-समुंद्र से) पार उतर जाती है। नाम में पतीज के जिन्होंने जीभ को नाम के साथ एक-रस कर लिया वे नाम सुन के (माया के प्रभाव से) बच जाते हैं। नाम में पतीज के जिन्होंने नाम में मन जोड़ लिया उनके दुख दूर हो जाते हैं उनकी (माया वाली) भूख मिट जाती है। पर। हे नानक ! वही लोग नाम सिमरते हैं जिनको प्रभू सतिगुरू मिलाता है। 10।
सलोक मः 1 ॥
सभे राती सभि दिह सभि थिती सभि वार ॥
सभे रुती माह सभि सभि धरतंी सभि भार ॥
सभे पाणी पउण सभि सभि अगनी पाताल ॥
सभे पुरीआ खंड सभि सभि लोअ लोअ आकार ॥
हुकमु न जापी केतड़ा कहि न सकीजै कार ॥
आखहि थकहि आखि आखि करि सिफतंी वीचार ॥
त्रिणु न पाइओ बपुड़ी नानकु कहै गवार ॥1॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1 ॥ रातें। दिन। तिथियां। वार। ऋतुएं। महीने; धरतियां और धरतियों पर पैदा हुए सारे पदार्थ। हवा। पानी। आग। धरती की निचली तरफ (के पदार्थ)। धरतियों के मण्डल। ब्रहमण्ड के बेअंत हिस्से। हरेक लोक के (बेअंत किस्मों के) जीव-जन्तु – यह सारी रचना (कितनी है) बयान नहीं की जा सकती। (इस रचना को बनाने वाले प्रभू का) हुकम कितना बड़ा है – यह भी पता नहीं लग सकता। परमात्मा की सिफतों की विचार कर के लोग बार-बार बेअंत बार (उसकी वडिआईयाँ) बयान करते हैं और (बयान कर-कर के) थक जाते हैं। पर। नानक कहता है। बेचारे गँवारों ने प्रभू का रक्ती भर भी अंत नहीं पाया। 1।
मः 1 ॥
अखंी परणै जे फिरां देखां सभु आकारु ॥
पुछा गिआनी पंडितां पुछा बेद बीचार ॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: महला 1 ॥ अगर मैं आँखों के भार हो के फिरूँ और सारा जगत (घूम के) देख लूँ। और मैं ज्ञानवान पंडितों से वेदों के गहरे भेद पूछ लूँ;

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।

गुरु नानक की वाणी का अपना मिज़ाज है, सीधा-सादा, बिना अलंकार के, मगर हर पंक्ति में एक ठहराव। 1469 में तलवण्डी में जन्म, सुलतानपुर के बहीखाते में कुछ साल काम, फिर तीस की उम्र के क़रीब वो लम्बी पैदल यात्रा जो काबुल, बग़दाद, मक्का, जगन्नाथ-पुरी, तिब्बत की सरहद तक उन्हें ले गयी। उनके शबद इन्हीं यात्राओं की वाणी हैं।

इस अंग पर 8 शबद हैं, क्रम-से बँधे।

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।