Lulla Family

अंग 1240

अंग
1240
राग सारंग
राग: सारंग · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
आखणि अउखा नानका आखि न जापै आखि ॥2॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: उसका स्वरूप बयान करना मुश्किल है। बार-बार बयान करने से भी समझ में नहीं आता। 2।
पउड़ी ॥
नाइ सुणिऐ मनु रहसीऐ नामे सांति आई ॥
नाइ सुणिऐ मनु त्रिपतीऐ सभ दुख गवाई ॥
नाइ सुणिऐ नाउ ऊपजै नामे वडिआई ॥
नामे ही सभ जाति पति नामे गति पाई ॥
गुरमुखि नामु धिआईऐ नानक लिव लाई ॥6॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ यदि (प्रभू के) नाम में सुरति जोड़े रखें तो मन खिल उठता है। नाम में (जुड़ने से अंदर) शांति पैदा होती है। अगर नाम में ध्यान लग जाए तो मन (माया से) तृप्त हो जाता है और सारे दुख दूर हो जाते हैं; अगर प्रभू का नाम सुनते रहें तो (मन में) नाम (जपने का चाव) पैदा हो जाता है। नाम (सिमरन) में ही वडिआई (प्रतीत होती) है। गुरमुख मनुष्य नाम (सिमरन) में ही उच्च कुल वाली इज्जत समझता है। नाम सिमर के ही ऊँची आत्मिक अवस्था हासिल करता है; हे नानक ! गुरमुख (सदा) नाम सिमरता है और (नाम में ही) लिव लगाए रखता है। 6।
सलोक महला 1 ॥
जूठि न रागंी जूठि न वेदंी ॥
जूठि न चंद सूरज की भेदी ॥
जूठि न अंनी जूठि न नाई ॥
जूठि न मीहु वर्हिऐ सभ थाई ॥
जूठि न धरती जूठि न पाणी ॥
जूठि न पउणै माहि समाणी ॥
नानक निगुरिआ गुणु नाही कोइ ॥
मुहि फेरिऐ मुहु जूठा होइ ॥1॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1॥ (हे भाई ! रागों का गायन मनुष्य के अंदर कई तरह के हिल्लोरे पैदा करता है। पर मनुष्य के अंदर टिकी हुई निंदा की वादी की) यह मैल रागों (के गायन) से भी दूर नहीं होती। वेद (आदि धर्म-पुस्तकों के पाठ) से भी नहीं (धुलती)। (अमावस। संग्रांद। पूर्णमासी आदि) चँद्रमा और सूर्य के माने हुए अलग-अलग पवित्र दिन-त्यौहारों (के वक्त अलग-अलग किस्म की पूजा) से (मनुष्य के अंदर टिकी हुई निंदा आदि की) यह मैल साफ नहीं होती। हे भाई ! अन्न (का त्याग करने) से (तीर्थों के) स्नान करने से भी यह मैल नहीं जाती। (इन्द्र देवते की पूजा से भी) यह अंदरूनी मैल दूर नहीं होती चाहे (ये माना जा रहा है कि उस देवते के द्वारा ही) सब जगह वर्षा होती है (और धरती व वनस्पति आदि की बाहरी मैल धुल जाती है)। (हे भाई ! रमते साधू बन के) धरती रटन करने से। धरती में गॅुफा बना के बैठने से अथवा पानी (में खड़े हो के तप) करके भी ये मैल नहीं धुलती। और। हे भाई ! प्राणायाम करने से (समाधियां लगाने से) भी (मनुष्य के अंदर टिकी हुई निंदा आदि करने की) यह मैल दूर नहीं होती। हे नानक ! जो मनुष्य गुरू के बताए हुए राह पर नहीं चलते। (उनके अंदर आत्मिक जीवन ऊँचा करने वाला) कोई गुण नहीं (बढ़ता-फूलता)। अगर गुरू की ओर से मँुह मोड़ के रखें। तो मुँह (निंदा आदि करने की गंदी मैल से) अपवित्र हुआ रहता है। 1।
महला 1 ॥
नानक चुलीआ सुचीआ जे भरि जाणै कोइ ॥
सुरते चुली गिआन की जोगी का जतु होइ ॥
ब्रहमण चुली संतोख की गिरही का सतु दानु ॥
राजे चुली निआव की पड़िआ सचु धिआनु ॥
पाणी चितु न धोपई मुखि पीतै तिख जाइ ॥
पाणी पिता जगत का फिरि पाणी सभु खाइ ॥2॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: महला 1 ॥ हे नानक ! (सिर्फ पानी से चुल्लियां करने से आत्मिक जीवन की सुच्चता नहीं आ सकती। पर) यदि कोई मनुष्य (सच्ची चुल्ली) भरनी जान ले तो (दरअसल सुच्ची) पवित्र चुल्लियां ये हैं- विद्वान के लिए चुल्ली विचार की है (भाव। विद्वान की विद्वता पवित्र है अगर उसके अंदर विचार भी है)। जोगी का काम-वासना से बचे रहना जोगी के लिए पवित्र चुल्ली है। ब्राहमण के लिए चुल्ली संतोख है और गृहस्ती के लिए चुली है उच्च आचरण और सेवा। राजा के न्याय चुल्ली है। पानी से (चुल्ली करने से) मन नहीं धुल सकता। (हाँ) मुँह से पानी पीने से प्यास मिट जाती है; (पर पानी की चुल्ली से पवित्रता आने की जगह तो बल्कि सूतक का भ्रम पैदा होना चाहिए क्योंकि) पानी से सारा संसार पैदा होता है और पानी ही सारे जगत को नाश करता है। 2।
पउड़ी ॥
नाइ सुणिऐ सभ सिधि है रिधि पिछै आवै ॥
नाइ सुणिऐ नउ निधि मिलै मन चिंदिआ पावै ॥
नाइ सुणिऐ संतोखु होइ कवला चरन धिआवै ॥
नाइ सुणिऐ सहजु ऊपजै सहजे सुखु पावै ॥
गुरमती नाउ पाईऐ नानक गुण गावै ॥7॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ प्रभू के नाम में सुरति जोड़े रखें तो सारी करामाती ताकतें पीछे लगी फिरती हैं (सहज ही प्राप्त हो जाती हैं); जगत के सारे पदार्थ हासिल हो जाते हैं। जो कुछ मन चितवता है मिल जाता है; (मन में) संतोख पैदा हो जाता है। माया भी सेवा करने लग जाती है। वह अवस्था पैदा हो जाती है जहाँ मन डोलता नहीं। और इस अडोल अवस्था में (पहुँच के) सुख प्राप्त हो जाता है। पर। हे नानक ! गुरू की मति लेने पर ही नाम मिलता है। (और गुरू के राह पर चल के मनुष्य सदा प्रभू के) गुण गाता है। 7।
सलोक महला 1 ॥
दुख विचि जंमणु दुखि मरणु दुखि वरतणु संसारि ॥
दुखु दुखु अगै आखीऐ पड़ि॑ पड़ि॑ करहि पुकार ॥
दुख कीआ पंडा खुल॑ीआ सुखु न निकलिओ कोइ ॥
दुख विचि जीउ जलाइआ दुखीआ चलिआ रोइ ॥
नानक सिफती रतिआ मनु तनु हरिआ होइ ॥
दुख कीआ अगी मारीअहि भी दुखु दारू होइ ॥1॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1॥ जीव का जनम दुख में और मौत भी दुख में होती है (भाव। जनम से मरने तक सारी उम्र जीव दुख में ही फसा रहता है) दुख में (ग्रसा हुआ ही) जगत में सारे काम-काज करता है। (विद्या) पढ़-पढ़ के भी (जीव) विलकते ही हैं। (जो कुछ) सामने (प्राप्त होता है उसको) दुख ही दुख कहा जा सकता है। (जीव के भाग्यों में) दुखों की (जैसे) गठड़ियाँ खुली हुई हैं। (इसके किसी भी उद्यम में से) कोई सुख नहीं निकलता; (सारी उम्र) दुखों में जिंद जलाता रहता है (आखिर।) दुखों का मारा हुआ रोता हुआ ही (यहां से) चल पड़ता है। हे नानक ! अगर प्रभू की सिफत-सालाह में रंगे जाएं तो मन-तन हरे हो जाते हैं। जीव दुखों की तपश से (आत्मिक मौत) मरते हैं। पर फिर इसका इलाज भी दुख ही है। (सवेरे चारपाई पर सुख से सोया रहे तो यह दुख बन जाता है; पर अगर सवेरे उठ के बाहर जा के कसरत आदि करके कष्ट उठाए तो वह सुखदायी बनता है)।
महला 1 ॥
नानक दुनीआ भसु रंगु भसू हू भसु खेह ॥
भसो भसु कमावणी भी भसु भरीऐ देह ॥
जा जीउ विचहु कढीऐ भसू भरिआ जाइ ॥
अगै लेखै मंगिऐ होर दसूणी पाइ ॥2॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: महला 1॥ हे नानक ! दुनिया का रंग-तमाशा राख (के समान) है। सिर्फ राख ही राख है। निरी स्वाह स्वाह है। (इन रंग-तमाशों में लग के जीव। जैसे) राख ही राख कमाता है। (जैसे-जैसे इस राख को इकट्ठा करता है त्यों-त्यों) इसका शरीर (विकारों की) राख से और ज्यादा लिबड़ता जाता है। (मरने पर) जब जिंद (शरीर) में से अलग की जाती है। तो यह जिंद (विकारों की) राख के साथ लिबड़ी हुई ही (यहाँ से) जाती है। और परलोक में जब किए कर्मों का लेखा होता है (तब) और दस गुना ज्यादा राख (भाव। शर्मिंदगी) इसको मिलती है। 2।
पउड़ी ॥
नाइ सुणिऐ सुचि संजमो जमु नेड़ि न आवै ॥
नाइ सुणिऐ घटि चानणा आन॑ेरु गवावै ॥
नाइ सुणिऐ आपु बुझीऐ लाहा नाउ पावै ॥
नाइ सुणिऐ पाप कटीअहि निरमल सचु पावै ॥
नानक नाइ सुणिऐ मुख उजले नाउ गुरमुखि धिआवै ॥8॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ अगर नाम में सुरति जोड़ के रखें तो पवित्रता प्राप्त होती है। मन को वश में करने की समर्थता आ जाती है। जम (भी। भाव। मौत का डर) नजदीक नहीं फटकता। हृदय में (प्रभू की जोति का) प्रकाश हो जाता है (और आत्मिक जीवन की अज्ञानता का) अंधकार दूर हो जाता है। अपनी असलियत की समझ आ जाती है और प्रभू का नाम (जो मनुष्य जीवन का असल) लाभ (है) कमा लेते हैं। सारे पाप नाश हो जाते हैं। पवित्र सच्चा प्रभू मिल जाता है। हे नानक ! अगर नाम में ध्यान जोड़ें तो माथे खिले रहते हैं। पर। ये नाम वही मनुष्य सिमर सकता है जो गुरू के बताए हुए राह पर चलता है। 8।
सलोक महला 1 ॥
घरि नाराइणु सभा नालि ॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1 ॥ (ब्राहमण अपने) घर में बहुत सारी मूर्तियों समेत ठाकुरों की मूर्ति की स्थापना करता है।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।

नानक की रचनाओं में एक खास तरह की आबजर्वेशनल आँख है। एक पटवारी का पेशा छोड़ कर तीस के बाद के दशकों में वो काबुल, मक्का, अरब, असम, श्रीलंका, और तिब्बत की सरहद तक गए। हर जगह संत-फ़क़ीरों, बादशाहों, और साधारण किसानों से बातचीत की, और उसी बातचीत की पर्तें इन शबदों में बैठी हैं।

इस अंग पर 9 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “उसका स्वरूप बयान करना मुश्किल है।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।