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अंग 1239

अंग
1239
राग सारंग
राग: सारंग · रचयिता: गुरु अंगद देव जी (महला 2)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
महला 2 ॥
कीता किआ सालाहीऐ करे सोइ सालाहि ॥
नानक एकी बाहरा दूजा दाता नाहि ॥
करता सो सालाहीऐ जिनि कीता आकारु ॥
दाता सो सालाहीऐ जि सभसै दे आधारु ॥
नानक आपि सदीव है पूरा जिसु भंडारु ॥
वडा करि सालाहीऐ अंतु न पारावारु ॥2॥
अंगद जी की वाणी कम है, मगर हर एक रचना में एक संयम झलकता है। 1552 तक उनके गुरु-काल में लिपि-व्यवस्था और संगठन का काम सबसे अधिक हुआ।

हिन्दी अर्थ: महला 2॥ पैदा किए हुए जीव की वडिआई करने का क्या लाभ। उस (प्रभू) की सिफत-सालाह करो जो (सबको पैदा) करता है; (क्योंकि) हे नानक ! उस एक प्रभू के बिना कोई और दाता नहीं। जिस करतार ने यह सारा जगत बनाया है उसकी उपमा करो। उस एक दातार के गुण गाओ जो हरेक जीव को आसरा देता है। हे नानक ! वह प्रभू स्वयं सदा ही कायम रहने वाला है। उसका खजाना भी सदा भरा रहता है। उसको बड़ा कहो। उसकी उपमा करो। उस (की महिमा वडिआई) का अंत नहीं पाया जा सकता। इस पार और उस पार का किनारा नहीं मिल सकता। 2।
पउड़ी ॥
हरि का नामु निधानु है सेविऐ सुखु पाई ॥
नामु निरंजनु उचरां पति सिउ घरि जांई ॥
गुरमुखि बाणी नामु है नामु रिदै वसाई ॥
मति पंखेरू वसि होइ सतिगुरू धिआइंी ॥
नानक आपि दइआलु होइ नामे लिव लाई ॥4॥
गुरु अंगद देव जी की शिक्षक-वाली शान्त-दृष्टि यहाँ काम कर रही है। 1539 में गुरु-गद्दी पर बैठने के बाद, उन्होंने गुरमुखी लिपि को व्यवस्थित किया, जिससे आगे की वाणी संग्रहित हो सकी।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ परमात्मा का नाम (सारे सुखों का) खजाना है। जो नाम सिमरें तो सुख मिलता है। मैं माया-रहित प्रभू का नाम सिमरूँ और इज्जत से (अपने) घर में जाऊँ – (गुरमुख की सदा यही तमन्ना होती है) गुरमुख सदा नाम ही उचारता है और नाम को हृदय में बसाता है। (ज्यों ज्यों) गुरू के द्वारा (गुरमुखि) नाम सिमरता है। पंछी (की तरह उड़ने वाली ये) मति (उसके) वश में आ जाती है। हे नानक ! (गुरमुख पर) प्रभू स्वयं दयाल होता है और वह नाम में ही लिव लगाए रखता है। 4।
सलोक महला 2 ॥
तिसु सिउ कैसा बोलणा जि आपे जाणै जाणु ॥
चीरी जा की ना फिरै साहिबु सो परवाणु ॥
चीरी जिस की चलणा मीर मलक सलार ॥
जो तिसु भावै नानका साई भली कार ॥
जिन॑ा चीरी चलणा हथि तिन॑ा किछु नाहि ॥
साहिब का फुरमाणु होइ उठी करलै पाहि ॥
जेहा चीरी लिखिआ तेहा हुकमु कमाहि ॥
घले आवहि नानका सदे उठी जाहि ॥1॥
अंगद जी की वाणी कम है, मगर हर एक रचना में एक संयम झलकता है। 1552 तक उनके गुरु-काल में लिपि-व्यवस्था और संगठन का काम सबसे अधिक हुआ।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 2 ॥ जो अंतरजामी प्रभू स्वयं ही (हरेक के दिल की) जानता है उसके आगे बोलना फबता नहीं (भाव। उसके आगे बोला नहीं जा सकता)। वह जाना-माना मालिक है क्योंकि उसका हुकम कोई मोड़ नहीं सकता। पातशाह मालिक और फौजों के सरदार सबको उसके हुकम में चलना पड़ता है। (इस वास्ते) हे नानक ! वही काम अच्छा (मानना चाहिए) जो उस प्रभू को अच्छा लगता है। इन जीवों के वश में कुछ नहीं क्योंकि इन्होंने तो उसके हुकम में ही चलना है। (जिस वक्त) मालिक का हुकम होता है (ये जीव) उठ के रास्ते पर पड़ जाते हैं। जिस तरह का हुकम लिखा हुआ आता है। (जीव) उसी तरह हुकम की पालना करते हैं। हे नानक ! (उस मालिक के) भेजे हुए (यहाँ जगत में) आ जाते हैं उसके बुलाए हुए (यहाँ से) उठ के चल पड़ते हैं। 1।
महला 2 ॥
सिफति जिना कउ बखसीऐ सेई पोतेदार ॥
कुंजी जिन कउ दितीआ तिन॑ा मिले भंडार ॥
जह भंडारी हू गुण निकलहि ते कीअहि परवाणु ॥
नदरि तिन॑ा कउ नानका नामु जिन॑ा नीसाणु ॥2॥
गुरु अंगद देव जी की शिक्षक-वाली शान्त-दृष्टि यहाँ काम कर रही है। 1539 में गुरु-गद्दी पर बैठने के बाद, उन्होंने गुरमुखी लिपि को व्यवस्थित किया, जिससे आगे की वाणी संग्रहित हो सकी।

हिन्दी अर्थ: महला 2॥ वही मनुष्य असल खजानों के मालिक हैं। जिनको प्रभू की सिफतसालाह (प्रभू के दर से) बख्शिश के तौर पर मिली है; जिनको प्रभू (नाम के खजाने की) कूँजी खुद देता है उनको (सिफतसालाह के) खजानों के खजाने मिल जाते हैं। (फिर इस सिफतसालाह की बरकति से) जिन (हृदय-रूप) खजानों में से (प्रभू के) गुण निकलते हैं वे (प्रभू के दर पर) कबूल किए जाते हैं। हे नानक ! जिनके पास प्रभू का नाम (-रूप) झण्डा है। उन पर मेहर की निगाह होती है। 2।
पउड़ी ॥
नामु निरंजनु निरमला सुणिऐ सुखु होई ॥
सुणि सुणि मंनि वसाईऐ बूझै जनु कोई ॥
बहदिआ उठदिआ न विसरै साचा सचु सोई ॥
भगता कउ नाम अधारु है नामे सुखु होई ॥
नानक मनि तनि रवि रहिआ गुरमुखि हरि सोई ॥5॥
अंगद जी की वाणी कम है, मगर हर एक रचना में एक संयम झलकता है। 1552 तक उनके गुरु-काल में लिपि-व्यवस्था और संगठन का काम सबसे अधिक हुआ।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ (प्रभू का) नाम माया (के प्रभाव से) रहत है और पवित्र है। अगर ये नाम सुनें (भाव। अगर इस नाम में सुरति जोड़ें) और जोड़-जोड़ के मन में बसा लें तो सुख (प्राप्त) होता है; (पर) कोई विरला मनुष्य (इस बात को) समझता है; (जो गुरमुख ये बात समझ लेता है उसको) वह सदा कायम रहने वाला सच्चा प्रभू उठते-बैठते कभी भी भूलता नहीं है; (गुरमुख) भगतों को (आत्मिक जीवन के लिए) नाम का आसरा हो जाता है। नाम में जुड़ने से ही उनको सुख (प्रतीत) होता है। हे नानक ! गुरमुख के मन में और तन में वह प्रभू सदा बसा रहता है। 5।
सलोक महला 1 ॥
नानक तुलीअहि तोल जे जीउ पिछै पाईऐ ॥
इकसु न पुजहि बोल जे पूरे पूरा करि मिलै ॥
वडा आखणु भारा तोलु ॥
होर हउली मती हउले बोल ॥
धरती पाणी परबत भारु ॥
किउ कंडै तोलै सुनिआरु ॥
तोला मासा रतक पाइ ॥
नानक पुछिआ देइ पुजाइ ॥
मूरख अंधिआ अंधी धातु ॥
कहि कहि कहणु कहाइनि आपु ॥1॥
गुरु अंगद देव जी की शिक्षक-वाली शान्त-दृष्टि यहाँ काम कर रही है। 1539 में गुरु-गद्दी पर बैठने के बाद, उन्होंने गुरमुखी लिपि को व्यवस्थित किया, जिससे आगे की वाणी संग्रहित हो सकी।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1॥ हे नानक ! अगर तराजू के दूसरे छाबे में जिंद रख दें तो तोल पूरा हो जाता है (भाव। मनुष्य के जीवन की प्रवानगी का एक ही माप-दण्ड है कि स्वै-भाव प्रभू पर से वार दिया जाय); अगर मनुष्य (प्रभू की सिफतसालाह के द्वारा मनुष्य-जीवन की प्रवानगी वाले तोल से अपने आप को) बराबर करके (प्रभू को) मिल जाए तो सिफतसालाह के शबद के (और कोई उद्यम) बराबर (तुल्य और कुछ) नहीं हो सकता। प्रभू की सिफतसालाह वज़नदार चीज़ है (जिससे जिंद वाला छाबा प्रवानगी के तोल से बराबर का हो जाता है)। (वरना। सिफतसालाह के बिना) और हर तरह की बुद्धि तुच्छ व अन्य (सभी प्रकार के) वचन हल्के हैं (बुद्धि व वचनों की मदद से जिंद वाला छाबा पूरा नहीं उतर सकता) धरती-पानी और पर्वतों के भार को (छोटे से) तराजू में (भला कोई) सोनियारा तोले-मासे-रक्तियाँ डाल के कैसे तोल सकता है। (यही हाल अन्य सभी मतों और बातों का समझें। जो। मानो। तोले मासे और रक्ती ही हैं); (पर) हे नानक ! अगर (सोनियारे को) पूछें तो (वह बातों से) घर पूरा कर देता है। (अंधे मूर्ख लोग प्रभू की सिफतसालाह छोड़ के) अपने आप को बड़ा कहलवाते हैं। और बार-बार (अपने आप को अच्छा) कहना मूर्ख अंधों की अंधों वाली दौड़-भाग है (भाव। ठोकरें खा के चोटें ही लगवाते रहते हैं)। 1।
महला 1 ॥
आखणि अउखा सुनणि अउखा आखि न जापी आखि ॥
इकि आखि आखहि सबदु भाखहि अरध उरध दिनु राति ॥
जे किहु होइ त किहु दिसै जापै रूपु न जाति ॥
सभि कारण करता करे घट अउघट घट थापि ॥
अंगद जी की वाणी कम है, मगर हर एक रचना में एक संयम झलकता है। 1552 तक उनके गुरु-काल में लिपि-व्यवस्था और संगठन का काम सबसे अधिक हुआ।

हिन्दी अर्थ: महला 1 ॥ (परमात्मा का स्वरूप) किसी भी तरह से बयान करना मुश्किल है। बार-बार बयान करने से भी समझ में नहीं आता। कई लोग बड़ी मेहनत से दिन-रात (लग के) (प्रभू का स्वरूप) बार-बार बयान करते हैं (और स्वरूप बयान करने वाले) शब्द बोलते हैं; पर। अगर कोई (पाँच-तत्वी) स्वरूप ही हो। और दिखाई भी दे। उसका ना तो कोई रूप प्रतीत होता है ना ही कोई जाति दिखती है। हे नानक ! मुश्किल-आसान जगहें (हरेक किस्म के बर्तन) स्वयं रच के प्रभू खुद ही (जगत के) सारे सबब बनाता है;

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।

गुरु अंगद देव जी ने गुरमुखी लिपि को व्यवस्थित किया। 1539 में गुरु-गद्दी पर बैठे, 1552 तक रहे। उनकी अपनी वाणी की मात्रा कम है, मगर हर एक रचना में एक शिक्षक का ठहराव है, और उसी ठहराव से आगे की गुरु-परम्परा को व्यवस्था मिली।

इस अंग पर 7 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “महला 2॥ पैदा किए हुए जीव की वडिआई करने का क्या लाभ।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।