आपे गुरमुखि आपे देवै आपे करि करि वेखै ॥
नानक से जन थाइ पए है जिन की पति पावै लेखै ॥8॥3॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
गुसाइंी परतापु तुहारो डीठा ॥
करन करावन उपाइ समावन सगल छत्रपति बीठा ॥1॥ रहाउ ॥
राणा राउ राज भए रंका उनि झूठे कहणु कहाइओ ॥
हमरा राजनु सदा सलामति ता को सगल घटा जसु गाइओ ॥1॥
उपमा सुनहु राजन की संतहु कहत जेत पाहूचा ॥
बेसुमार वड साह दातारा ऊचे ही ते ऊचा ॥2॥
पवनि परोइओ सगल अकारा पावक कासट संगे ॥
नीरु धरणि करि राखे एकत कोइ न किस ही संगे ॥3॥
घटि घटि कथा राजन की चालै घरि घरि तुझहि उमाहा ॥
जीअ जंत सभि पाछै करिआ प्रथमे रिजकु समाहा ॥4॥
जो किछु करणा सु आपे करणा मसलति काहू दीन॑ी ॥
अनिक जतन करि करह दिखाए साची साखी चीन॑ी ॥5॥
हरि भगता करि राखे अपने दीनी नामु वडाई ॥
जिनि जिनि करी अवगिआ जन की ते तैं दीए रुड़॑ाई ॥6॥
मुकति भए साधसंगति करि तिन के अवगन सभि परहरिआ ॥
तिन कउ देखि भए किरपाला तिन भव सागरु तरिआ ॥7॥
हम नान॑े नीच तुमे॑ बड साहिब कुदरति कउण बीचारा ॥
मनु तनु सीतलु गुर दरस देखे नानक नामु अधारा ॥8॥1॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
अगम अगाधि सुनहु जन कथा ॥
पारब्रहम की अचरज सभा ॥1॥ रहाउ ॥
सदा सदा सतिगुर नमसकार ॥
गुर किरपा ते गुन गाइ अपार ॥
मन भीतरि होवै परगासु ॥
गिआन अंजनु अगिआन बिनासु ॥1॥
मिति नाही जा का बिसथारु ॥
सोभा ता की अपर अपार ॥
अनिक रंग जा के गने न जाहि ॥
सोग हरख दुहहू महि नाहि ॥2॥
अनिक ब्रहमे जा के बेद धुनि करहि ॥
अनिक महेस बैसि धिआनु धरहि ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।
गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “पर अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य माया की भटकना के कारण गलत राह पर पड़े रहते हैं।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।