इस पृष्ठ पर
अंग
1235
सारंग
अंग बदलें या अंश चुनें · 3 अंश
मनमुख दूजै भरमि भुलाए ना बूझहि वीचारा ॥7॥
मनमुख दूजै भरमि भुलाए ना बूझहि वीचारा ॥7॥
आपे गुरमुखि आपे देवै आपे करि करि वेखै ॥
नानक से जन थाइ पए है जिन की पति पावै लेखै ॥8॥3॥
आपे गुरमुखि आपे देवै आपे करि करि वेखै ॥
नानक से जन थाइ पए है जिन की पति पावै लेखै ॥8॥3॥
हिन्दी अर्थ: पर अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य माया की भटकना के कारण गलत राह पर पड़े रहते हैं। उनको (आत्मिक जीवन वाली सही) विचार नहीं सूझती। 7। हे भाई ! प्रभू स्वयं ही (जीव को) गुरू की शरण में डाल के स्वयं ही (अपने नाम की दाति) देता है। स्वयं ही (ये सारा तमाशा) कर-कर के देखता है। हे नानक ! वही व्यक्ति कबूल होते हैं। जिनकी इजजत प्रभू स्वयं ही रखता है। 8। 3।
गुसाइंी परतापु तुहारो डीठा ॥
सारग महला 5 असटपदीआ घरु 1
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
गुसाइंी परतापु तुहारो डीठा ॥
करन करावन उपाइ समावन सगल छत्रपति बीठा ॥1॥ रहाउ ॥
राणा राउ राज भए रंका उनि झूठे कहणु कहाइओ ॥
हमरा राजनु सदा सलामति ता को सगल घटा जसु गाइओ ॥1॥
उपमा सुनहु राजन की संतहु कहत जेत पाहूचा ॥
बेसुमार वड साह दातारा ऊचे ही ते ऊचा ॥2॥
पवनि परोइओ सगल अकारा पावक कासट संगे ॥
नीरु धरणि करि राखे एकत कोइ न किस ही संगे ॥3॥
घटि घटि कथा राजन की चालै घरि घरि तुझहि उमाहा ॥
जीअ जंत सभि पाछै करिआ प्रथमे रिजकु समाहा ॥4॥
जो किछु करणा सु आपे करणा मसलति काहू दीन॑ी ॥
अनिक जतन करि करह दिखाए साची साखी चीन॑ी ॥5॥
हरि भगता करि राखे अपने दीनी नामु वडाई ॥
जिनि जिनि करी अवगिआ जन की ते तैं दीए रुड़॑ाई ॥6॥
मुकति भए साधसंगति करि तिन के अवगन सभि परहरिआ ॥
तिन कउ देखि भए किरपाला तिन भव सागरु तरिआ ॥7॥
हम नान॑े नीच तुमे॑ बड साहिब कुदरति कउण बीचारा ॥
मनु तनु सीतलु गुर दरस देखे नानक नामु अधारा ॥8॥1॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
गुसाइंी परतापु तुहारो डीठा ॥
करन करावन उपाइ समावन सगल छत्रपति बीठा ॥1॥ रहाउ ॥
राणा राउ राज भए रंका उनि झूठे कहणु कहाइओ ॥
हमरा राजनु सदा सलामति ता को सगल घटा जसु गाइओ ॥1॥
उपमा सुनहु राजन की संतहु कहत जेत पाहूचा ॥
बेसुमार वड साह दातारा ऊचे ही ते ऊचा ॥2॥
पवनि परोइओ सगल अकारा पावक कासट संगे ॥
नीरु धरणि करि राखे एकत कोइ न किस ही संगे ॥3॥
घटि घटि कथा राजन की चालै घरि घरि तुझहि उमाहा ॥
जीअ जंत सभि पाछै करिआ प्रथमे रिजकु समाहा ॥4॥
जो किछु करणा सु आपे करणा मसलति काहू दीन॑ी ॥
अनिक जतन करि करह दिखाए साची साखी चीन॑ी ॥5॥
हरि भगता करि राखे अपने दीनी नामु वडाई ॥
जिनि जिनि करी अवगिआ जन की ते तैं दीए रुड़॑ाई ॥6॥
मुकति भए साधसंगति करि तिन के अवगन सभि परहरिआ ॥
तिन कउ देखि भए किरपाला तिन भव सागरु तरिआ ॥7॥
हम नान॑े नीच तुमे॑ बड साहिब कुदरति कउण बीचारा ॥
मनु तनु सीतलु गुर दरस देखे नानक नामु अधारा ॥8॥1॥
हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 असटपदीआ घरु 1 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे जगत के पति ! (मैंने) आपकी (अजब) ताकत-सामर्थ्य देखी है। आप सब कुछ कर सकने योग्य हैं। (जीवों से) करवा सकने में समर्थ हैं। आप (जगत) पैदा करके फिर इसको अपने आप में लीन कर लेने वाले हैं। आप सब जीवों पर बादशाह (बन के) बैठे हुए हैं। 1। रहाउ। हे भाई ! (प्रभू की रजा अनुसार) राजे बादशाह कंगाल हो जाते हैं। उन राजाओं ने तो अपने आप को झूठा ही राजा कहलवाया। हे भाई ! हमारा प्रभू-पातशाह सदा कायम रहने वाला है। सारे ही जीवों ने उसका (सदा) यश गाया है। 1। हे संत जनो ! उस प्रभू-पातशाह की महिमा सुनें। जितने भी जीव उसकी वडिआई कहते हैं वे उसके चरणों में पहुँचते हैं। उसकी ताकत का अंदाजा नहीं लग सकता। सब जीवों को दातें देने वाला वह बड़ा शाहु है। वह ऊँचों से ऊँचा है। 2। हे भाई ! सारे शरीरों को श्वासों की हवा के साथ पिरोकर रखा हुआ है। उसने आग को लकड़ी के साथ बाँध रखा है। उसने पानी और धरती एक साथ रखे हुए हैं। (इनमें से) कोई किसी के साथ (वैर नहीं कर सकता। पानी धरती को डूबाता नहीं। आग काठ को जलाती नहीं)। 3। हे भाई ! उस प्रभू-पातशाह की सिफतसालाह की कहानी हरेक के शरीर में चल रही है। हे प्रभू ! हरेक हृदय में आपके मिलाप के लिए उत्साह है। आप सारे जीवों को बाद में पैदा करते हैं। पहले उनके लिए रिज़क पहुँचाते हैं। 4। हे भाई ! हम जीव चाहे (अपनी बुद्धि के प्रगटावे के लिए) दिखावे के अनेकों यत्न करते हैं, पर मैंने यह अटल सबक सीख लिया है (कि परमात्मा का प्रताप बेअंत है): जो कुछ वह करता है, वह स्वयं ही करता है। किसी ने कभी उसको कोई सलाह नहीं दी। 5। हे भाई ! (ये परमात्मा का प्रताप है कि) परमात्मा अपने भक्तों को अपना बना के उनकी रक्षा करता है। भक्तों को अपना नाम बख्शता है। वडिआई देता है। हे प्रभू ! जिस-जिस ने कभी आपके भगतों की निरादरी की, आपने उनको (विकारों के समुंदर में) बहा दिया। 6। हे भाई ! साध-संगति कर के (विकारी भी) विकारों से बच निकले। प्रभू ने उनके सारे अवगुण नाश कर दिए। गुरू की संगति में आने वालों को देख के प्रभू जी सदा मेहरवान होते हैं और वे लोग संसार-समुंदर से पार लांघ जाते हैं। 7। हे मालिक-प्रभू ! आप बहुत बड़े हैं। हम जीव (आपके सामने) बहुत ही छोटे और तुच्छ से (कीट समान) हैं। मेरी क्या ताकत है कि आपके प्रताप का अंदाजा लगा सकूँ? हे नानक ! कहें- गुरू के दर्शन करके मनुष्य का मन-तन ठंडा-ठार हो जाता है और मनुष्य को प्रभू का नाम-आसरा मिल जाता है। 8। 1।
अगम अगाधि सुनहु जन कथा ॥
सारग महला 5 असटपदी घरु 6
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
अगम अगाधि सुनहु जन कथा ॥
पारब्रहम की अचरज सभा ॥1॥ रहाउ ॥
सदा सदा सतिगुर नमसकार ॥
गुर किरपा ते गुन गाइ अपार ॥
मन भीतरि होवै परगासु ॥
गिआन अंजनु अगिआन बिनासु ॥1॥
मिति नाही जा का बिसथारु ॥
सोभा ता की अपर अपार ॥
अनिक रंग जा के गने न जाहि ॥
सोग हरख दुहहू महि नाहि ॥2॥
अनिक ब्रहमे जा के बेद धुनि करहि ॥
अनिक महेस बैसि धिआनु धरहि ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
अगम अगाधि सुनहु जन कथा ॥
पारब्रहम की अचरज सभा ॥1॥ रहाउ ॥
सदा सदा सतिगुर नमसकार ॥
गुर किरपा ते गुन गाइ अपार ॥
मन भीतरि होवै परगासु ॥
गिआन अंजनु अगिआन बिनासु ॥1॥
मिति नाही जा का बिसथारु ॥
सोभा ता की अपर अपार ॥
अनिक रंग जा के गने न जाहि ॥
सोग हरख दुहहू महि नाहि ॥2॥
अनिक ब्रहमे जा के बेद धुनि करहि ॥
अनिक महेस बैसि धिआनु धरहि ॥
हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 असटपदी घरु 6 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे संत जनो ! अपहुँच और अथाह परमात्मा की सिफतसालाह सुना करें। उस परमात्मा का दरबार हैरान करने वाला है। 1। रहाउ। हे संत जनो ! सदा ही गुरू के दर पर सिर झुकाया करें। गुरू की मेहर से बेअंत प्रभू के गुण गा के मन में आत्मिक जीवन का प्रकाश पैदा हो जाता है। (गुरू से मिला हुआ) आत्मिक जीवन की सूझ का सुर्मा आत्मिक जीवन के प्रति अज्ञानता का नाश कर देता है। 1। हे संत जनो ! जिस परमात्मा का (यह सारा) जगत-पसारा (बनाया हुआ) है उसकी सामर्थ्य की सीमा को नहीं आँका जा सकता। उस प्रभू की वडिआई बेअंत है बेअंत है। हे संत जनो ! जिस परमात्मा के अनेकों ही करिश्मे-तमाशे हैं जो गिने नहीं जा सकते, वह परमात्मा खुशी और ग़मी दोनों से परे रहता है। 2। हे संत जनो ! (उस प्रभू का दरबार हैरान कर देने वाला है) जिसके पैदा किए हुए अनेकों ही ब्रह्मा (उसके दर पर) वेदों का उच्चारण कर रहे हैं। अनेकों ही शिव बैठ के उसका ध्यान धर रहे हैं।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 3: गुरु अमर दास जी; महला 5: गुरु अर्जन देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1235 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।