Lulla Family

अंग 1235

अंग
1235
राग सारंग
राग: सारंग · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
मनमुख दूजै भरमि भुलाए ना बूझहि वीचारा ॥7॥
आपे गुरमुखि आपे देवै आपे करि करि वेखै ॥
नानक से जन थाइ पए है जिन की पति पावै लेखै ॥8॥3॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: पर अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य माया की भटकना के कारण गलत राह पर पड़े रहते हैं। उनको (आत्मिक जीवन वाली सही) विचार नहीं सूझती। 7। हे भाई ! प्रभू स्वयं ही (जीव को) गुरू की शरण में डाल के स्वयं ही (अपने नाम की दाति) देता है। स्वयं ही (ये सारा तमाशा) कर-कर के देखता है। हे नानक ! वही व्यक्ति कबूल होते हैं। जिनकी इजजत प्रभू स्वयं ही रखता है। 8। 3।
सारग महला 5 असटपदीआ घरु 1
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
गुसाइंी परतापु तुहारो डीठा ॥
करन करावन उपाइ समावन सगल छत्रपति बीठा ॥1॥ रहाउ ॥
राणा राउ राज भए रंका उनि झूठे कहणु कहाइओ ॥
हमरा राजनु सदा सलामति ता को सगल घटा जसु गाइओ ॥1॥
उपमा सुनहु राजन की संतहु कहत जेत पाहूचा ॥
बेसुमार वड साह दातारा ऊचे ही ते ऊचा ॥2॥
पवनि परोइओ सगल अकारा पावक कासट संगे ॥
नीरु धरणि करि राखे एकत कोइ न किस ही संगे ॥3॥
घटि घटि कथा राजन की चालै घरि घरि तुझहि उमाहा ॥
जीअ जंत सभि पाछै करिआ प्रथमे रिजकु समाहा ॥4॥
जो किछु करणा सु आपे करणा मसलति काहू दीन॑ी ॥
अनिक जतन करि करह दिखाए साची साखी चीन॑ी ॥5॥
हरि भगता करि राखे अपने दीनी नामु वडाई ॥
जिनि जिनि करी अवगिआ जन की ते तैं दीए रुड़॑ाई ॥6॥
मुकति भए साधसंगति करि तिन के अवगन सभि परहरिआ ॥
तिन कउ देखि भए किरपाला तिन भव सागरु तरिआ ॥7॥
हम नान॑े नीच तुमे॑ बड साहिब कुदरति कउण बीचारा ॥
मनु तनु सीतलु गुर दरस देखे नानक नामु अधारा ॥8॥1॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 असटपदीआ घरु 1 सतिगुर प्रसादि ॥ हे जगत के पति ! (मैंने) आपकी (अजब) ताकत समर्था देखी है। आप सब कुछ कर सकने योग्य है। (जीवों से) करवा सकने में समर्थ है। आप (जगत) पैदा करके फिर इसको अपने आप में लीन कर लेने वाला है। आप सब जीवों पर बादशाह (बन के) बैठा हुआ है। 1। रहाउ। हे भाई ! (प्रभू की रजा अनुसार) राजे बादशाह कंगाल हो जाते हैं। उन राजाओं ने तो अपने आप को झूठा ही राजा कहलिवाया। हे भाई ! हमारा प्रभू-पातशाह सदा कायम रहने वाला है। सारे ही जीवों ने उसका (सदा) यश गाया है। 1। हे संत जनो ! उस प्रभू-पातशाह की महिमा सुनो। जितने भी जीव उसकी वडिआई कहते हैं वे उसके चरणों में पहुँचते हैं। उसकी ताकत का अंदाजा नहीं लग सकता। सब जीवों को दातें देने वाला वह बड़ा शाहु है। वह ऊँचों से ऊँचा है। 2। हे भाई ! सारे शरीरों को श्वासों की हवा के साथ परो के रखा हुआ है। उसने आग को लकड़ी के साथ बाँध रखा है। उसने पानी और धरती एक साथ रखे हुए हैं। (इनमें से) कोई किसी के साथ (वैर नहीं कर सकता। पानी धरती को डूबाता नहीं। आग काठ को जलाती नहीं)। 3। हे भाई ! उस प्रभू-पातशाह की सिफतसालाह की कहानी हरेक के शरीर में चल रही है। हे प्रभू ! हरेक हृदय में आपके मिलाप के लिए उत्साह है। आप सारे जीवों को बाद में पैदा करता है। पहले उनके लिए रिज़क पहुँचाता है। 4। हे भाई ! मैंने यह अटल सबक सीख लिया है (कि परमात्मा का प्रताप बेअंत है) जो कुछ वह करता है वह स्वयं ही करता है। किसी ने कभी उसको कोई सलाह नहीं दी। हम जीव चाहे (अपनी बुद्धि के प्रगटावे के लिए) दिखावे के अनेकों यत्न करते हैं। 5। हे भाई ! (ये परमात्मा का प्रताप है कि) परमातमा अपने भक्तों की अपना बना के रक्षा करता है। भक्तों को अपना नाम बख्शता है। वडिआई देता है। हे प्रभू ! जिस-जिस ने कभी आपके भगतों की निरादरी की। तूने उनको (विकारों के समुंदर में) बहा दिया। 6। हे भाई ! साध-संगति कर के (विकारी भी) विकारों से बच निकले। प्रभू ने उनके सारे अवगुण नाश कर दिए। गुरू की संगति में आने वालों को देख के प्रभू जी सदा मेहरवान होते हैं। और। वे लोग संसार-समुंदर से पार लांघ जाते हैं। 7। हे मालिक-प्रभू ! आप बहुत बड़ा है। हम जीव (आपके सामने) बहुत ही छोटे और तुच्छ से (कीट समान) हैं। मेरी क्या ताकत है कि आपके प्रताप का अंदाजा लगा सकूँ। हे नानक ! कह- गुरू के दर्शन करके मनुष्य का मन-तन ठंडा-ठार हो जाता है। और। मनुष्य को प्रभू का नाम-आसरा मिल जाता है। 8। 1।
सारग महला 5 असटपदी घरु 6
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
अगम अगाधि सुनहु जन कथा ॥
पारब्रहम की अचरज सभा ॥1॥ रहाउ ॥
सदा सदा सतिगुर नमसकार ॥
गुर किरपा ते गुन गाइ अपार ॥
मन भीतरि होवै परगासु ॥
गिआन अंजनु अगिआन बिनासु ॥1॥
मिति नाही जा का बिसथारु ॥
सोभा ता की अपर अपार ॥
अनिक रंग जा के गने न जाहि ॥
सोग हरख दुहहू महि नाहि ॥2॥
अनिक ब्रहमे जा के बेद धुनि करहि ॥
अनिक महेस बैसि धिआनु धरहि ॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 असटपदी घरु 6 सतिगुर प्रसादि ॥ हे संत जनो ! अपहुँच और अथाह परमात्मा की सिफतसालाह सुना करो। उस परमात्मा का दरबार हैरान करने वाला है। 1। रहाउ। हे संत जनो ! सदा ही गुरू के दर पर सिर झुकाया करो। गुरू की मेहर से बेअंत प्रभू के गुण गा के मन में आत्मिक जीवन का प्रकाश पैदा हो जाता है। (गुरू से मिला हुआ) आत्मिक जीवन की सूझ का सुर्मा आत्मिक जीवन के प्रति अज्ञानता का नाश कर देता है। 1। हे संत जनो ! जिस परमात्मा का (यह सारा) जगत-पसारा (बनाया हुआ) है उस (की समर्था) की सीमा को नहीं आँका जा सकता उस प्रभू की वडिआई बेअंत है बेअंत है। हे संत जनो ! जिस परमात्मा के अनेकों ही करिश्मे-तमाशे हैं। जो गिने नहीं जा सकते। वह परमात्मा खुशी और ग़मी दोनों से परे रहता है। 2। हे संत जनो ! (उस प्रभू का दरबार हैरान कर देने वाला है) जिसके पैदा किए हुए अनेकों ही ब्रहमा गण। (उसके दर पर) वेदों का उच्चारण कर रहे हैं। अनेकों ही शिव बैठ के उसका ध्यान धर रहे हैं।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।

गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।

इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “पर अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य माया की भटकना के कारण गलत राह पर पड़े रहते हैं।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।