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अंग
1234
सारंग
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जनम जनम के किलविख भउ भंजन गुरमुखि एको डीठा ॥1॥ रहाउ ॥
जनम जनम के किलविख भउ भंजन गुरमुखि एको डीठा ॥1॥ रहाउ ॥
कोटि कोटंतर के पाप बिनासन हरि साचा मनि भाइआ ॥
हरि बिनु अवरु न सूझै दूजा सतिगुरि एकु बुझाइआ ॥1॥
प्रेम पदारथु जिन घटि वसिआ सहजे रहे समाई ॥
सबदि रते से रंगि चलूले राते सहजि सुभाई ॥2॥
रसना सबदु वीचारि रसि राती लाल भई रंगु लाई ॥
राम नामु निहकेवलु जाणिआ मनु त्रिपतिआ सांति आई ॥3॥
पंडित पड़ि॑ पड़ि॑ मोनी सभि थाके भ्रमि भेख थके भेखधारी ॥
गुर परसादि निरंजनु पाइआ साचै सबदि वीचारी ॥4॥
आवा गउणु निवारि सचि राते साच सबदु मनि भाइआ ॥
सतिगुरु सेवि सदा सुखु पाईऐ जिनि विचहु आपु गवाइआ ॥5॥
साचै सबदि सहज धुनि उपजै मनि साचै लिव लाई ॥
अगम अगोचरु नामु निरंजनु गुरमुखि मंनि वसाई ॥6॥
एकस महि सभु जगतो वरतै विरला एकु पछाणै ॥
सबदि मरै ता सभु किछु सूझै अनदिनु एको जाणै ॥7॥
जिस नो नदरि करे सोई जनु बूझै होरु कहणा कथनु न जाई ॥
नानक नामि रते सदा बैरागी एक सबदि लिव लाई ॥8॥2॥
कोटि कोटंतर के पाप बिनासन हरि साचा मनि भाइआ ॥
हरि बिनु अवरु न सूझै दूजा सतिगुरि एकु बुझाइआ ॥1॥
प्रेम पदारथु जिन घटि वसिआ सहजे रहे समाई ॥
सबदि रते से रंगि चलूले राते सहजि सुभाई ॥2॥
रसना सबदु वीचारि रसि राती लाल भई रंगु लाई ॥
राम नामु निहकेवलु जाणिआ मनु त्रिपतिआ सांति आई ॥3॥
पंडित पड़ि॑ पड़ि॑ मोनी सभि थाके भ्रमि भेख थके भेखधारी ॥
गुर परसादि निरंजनु पाइआ साचै सबदि वीचारी ॥4॥
आवा गउणु निवारि सचि राते साच सबदु मनि भाइआ ॥
सतिगुरु सेवि सदा सुखु पाईऐ जिनि विचहु आपु गवाइआ ॥5॥
साचै सबदि सहज धुनि उपजै मनि साचै लिव लाई ॥
अगम अगोचरु नामु निरंजनु गुरमुखि मंनि वसाई ॥6॥
एकस महि सभु जगतो वरतै विरला एकु पछाणै ॥
सबदि मरै ता सभु किछु सूझै अनदिनु एको जाणै ॥7॥
जिस नो नदरि करे सोई जनु बूझै होरु कहणा कथनु न जाई ॥
नानक नामि रते सदा बैरागी एक सबदि लिव लाई ॥8॥2॥
हिन्दी अर्थ: वह मनुष्य अनेकापें जन्मों के पाप और दुख नाश करने वाले प्रभू को ही (हर जगह) देखता है। 1। रहाउ। करोड़ों जन्मों के पाप नाश करने वाला सदा-स्थिर प्रभू ही उसको (अपने) मन में प्यारा लगता है। हे भाई ! (जिस मनुष्य को) सतिगुरू ने एक परमात्मा की समझ बख्श दी। उसको परमात्मा के बिना और कोई दूसरा (कहीं बसता) नहीं सूझता। 1। हे भाई ! जिन मनुष्यों के हृदय में (प्रभू का) अमूल्य प्रेम आ बसता है। वे सदा आत्मिक अडोलता में टिके रहते हैं। गुरू के शबद-रंग में गाढ़े रंगे हुए वे मनुष्य आत्मिक अडोलता और प्रेम-रंग में रंगे रहते हैं। 2। हे भाई ! गुरू का शबद मन में बसा के जिस मनुष्य की जीभ नाम के स्वाद में गिझ जाती है। नाम-रंग लगा के गाढ़ी रंगी जाती है। वह मनुष्य शुद्ध-स्वरूप हरी के नाम के साथ गहरी सांझ डाल लेता है। उसका मन (माया के प्रति) तृप्त हो जाता है। उसके अंदर शांति पैदा हो जाती है। 3। पर। हे भाई ! पण्डित लोग (वेद आदि धर्म-पुस्तकें) पढ़-पढ़ के थक जाते हैं। समाधियाँ लगाने वाले (समाधियां लगा-लगा के) थक जाते हैं। भेखधारी मनुष्य धार्मिक भेखों में भटक-भटक के थक जाते हैं (उनको हरी-नाम की दाति प्राप्त नहीं होती)। जो मनुष्य गुरू की कृपा से सदा-स्थिर प्रभू के शबद में सुरति जोड़ता है वह मनुष्य निर्लिप प्रभू का मिलाप हासिल कर लेता है। 4। हे भाई ! जिस (गुरू) ने (अपने अंदर से) स्वै भाव दूर किया हुआ है। उस गुरू की शरण पड़ कर (ही) सदा आत्मिक आनंद मिलता है। जिन मनुष्यों को सदा-स्थिर प्रभू की सिफत-सालाह वाला गुरू-शबद मन में प्यारा लगता है। वह (गुरू-शबद की बरकति से) जनम-मरण के चक्कर मिटा के सदा-स्थिर प्रभू (के नाम-रंग) में रंगे रहते हैं। 5। हे भाई ! जो मनुष्य सदा-स्थिर प्रभू की सिफतसालाह के शबद में जुड़ के अपने मन में सदा-स्थिर प्रभू में सुरति जोड़े रखता है। (उसके अंदर) आत्मिक अडोलता की रौंअ पैदा हो जाती है। हे भाई ! गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य ही अपहुँच अगोचर और निर्लिप प्रभू का नाम अपने मन में बसाता है। 6। हे भाई ! (गुरू के सन्मुख रहने वाला ही) कोई विरला मनुष्य एक परमात्मा के साथ सांझ डालता है (और समझ लेता है कि) सारा संसार एक परमात्मा (के हुकम) में ही काम कर रहा है। जब कोई मनुष्य गुरू के शबद के माध्यम से (अपने अंदर से) आपा-भाव दूर करता है। तब उसको (ये) सारी सूझ आ जाती है। तबवह हर वक्त सिर्फ परमात्मा के साथ ही गहरी सांझ डाले रखता है। 7। हे भाई ! जिस मनुष्य पर परमात्मा मेहर की निगाह करता है। वही (जीवन का सही रास्ता) समझता है (प्रभू की मेहर के बिना कोई) और (रास्ता) बताया नहीं जा सकता। हे नानक ! (हरी की कृपा से ही) प्रभू की सिफत-सालाह वाले गुरू-शबद में सुरति जोड़ के हरी-नाम में मगन रहने वाले मनुष्य (दुनिया के मोह से) सदा निर्लिप रहते हैं। 8। 2।
मन मेरे हरि की अकथ कहाणी ॥
सारग महला 3 ॥
मन मेरे हरि की अकथ कहाणी ॥
हरि नदरि करे सोई जनु पाए गुरमुखि विरलै जाणी ॥1॥ रहाउ ॥
हरि गहिर गंभीरु गुणी गहीरु गुर कै सबदि पछानिआ ॥
बहु बिधि करम करहि भाइ दूजै बिनु सबदै बउरानिआ ॥1॥
हरि नामि नावै सोई जनु निरमलु फिरि मैला मूलि न होई ॥
नाम बिना सभु जगु है मैला दूजै भरमि पति खोई ॥2॥
किआ द्रिड़ां किआ संग्रहि तिआगी मै ता बूझ न पाई ॥
होहि दइआलु क्रिपा करि हरि जीउ नामो होइ सखाई ॥3॥
सचा सचु दाता करम बिधाता जिसु भावै तिसु नाइ लाए ॥
गुरू दुआरै सोई बूझै जिस नो आपि बुझाए ॥4॥
देखि बिसमादु इहु मनु नही चेते आवा गउणु संसारा ॥
सतिगुरु सेवे सोई बूझै पाए मोख दुआरा ॥5॥
जिन॑ दरु सूझै से कदे न विगाड़हि सतिगुरि बूझ बुझाई ॥
सचु संजमु करणी किरति कमावहि आवण जाणु रहाई ॥6॥
से दरि साचै साचु कमावहि जिन गुरमुखि साचु अधारा ॥
मन मेरे हरि की अकथ कहाणी ॥
हरि नदरि करे सोई जनु पाए गुरमुखि विरलै जाणी ॥1॥ रहाउ ॥
हरि गहिर गंभीरु गुणी गहीरु गुर कै सबदि पछानिआ ॥
बहु बिधि करम करहि भाइ दूजै बिनु सबदै बउरानिआ ॥1॥
हरि नामि नावै सोई जनु निरमलु फिरि मैला मूलि न होई ॥
नाम बिना सभु जगु है मैला दूजै भरमि पति खोई ॥2॥
किआ द्रिड़ां किआ संग्रहि तिआगी मै ता बूझ न पाई ॥
होहि दइआलु क्रिपा करि हरि जीउ नामो होइ सखाई ॥3॥
सचा सचु दाता करम बिधाता जिसु भावै तिसु नाइ लाए ॥
गुरू दुआरै सोई बूझै जिस नो आपि बुझाए ॥4॥
देखि बिसमादु इहु मनु नही चेते आवा गउणु संसारा ॥
सतिगुरु सेवे सोई बूझै पाए मोख दुआरा ॥5॥
जिन॑ दरु सूझै से कदे न विगाड़हि सतिगुरि बूझ बुझाई ॥
सचु संजमु करणी किरति कमावहि आवण जाणु रहाई ॥6॥
से दरि साचै साचु कमावहि जिन गुरमुखि साचु अधारा ॥
हिन्दी अर्थ: सारग महला 3 ॥ हे मेरे मन ! हरि की कथा अकथनीय है। हे मेरे मन ! जिस मनुष्य पर परमात्मा कृपा करता है, वही मनुष्य प्रभू की कभी ना समाप्त होने वाली सिफतसालाह (की दाति) हासिल करता है। गुरू के सन्मुख रहने वाले किसी विरले मनुष्य ने (इसकी) महानता समझी है। 1। रहाउ। हे भाई ! गुरू के शबद से ये बात समझ में आती है कि परमात्मा बड़े ही गहरे जिगरे वाला है और सारे गुणों का खजाना है। जो मनुष्य (प्रभू के बिना) और-और के प्यार में (टिके रह के) कई तरीकों से (मिथे हुए धार्मिक) कर्म (भी) करते हैं, वे मनुष्य गुरू के शबद के बिना झल्ले (पागल) ही रहते हैं। 1। हे भाई ! जो मनुष्य परमात्मा के नाम (-जल) में (आत्मिक) स्नान करता रहता है, वही मनुष्य पवित्र (जीवन वाला) होता है। वह दोबारा कभी भी (विकारों की मैल से) मैला नहीं होता। हे भाई ! परमात्मा के नाम के बिना सारा जगत (पापों की मैल से) लिबड़ा रहता है। अन्य भटकनों में पड़ कर अपनी इज्जत गवा लेता है। 2। हे प्रभू ! मैं कौन सी बात अपने मन में दृढ़ कर लूँ; कौन से गुण (हृदय में) एकत्र कर के कौन से अवगुण त्याग दूँ? मुझे अपने आप तो समझ नहीं आ सकती। हे प्रभू जी ! मेहर कर के अगर आप (स्वयं मेरे ऊपर) दयावान हो जाएँ (तब ही मुझे समझ आती है कि आपका) नाम ही असल साथी बनता है। 3। हे भाई ! जो परमात्मा सदा ही कायम रहने वाला है, जो सब दातें देने वाला है, जो जीवों को उनके किए कर्मों के अनुसार जन्म देने वाला है, उसको जो जीव प्यारा लगता है, उसको वह अपने नाम से जोड़ता है। गुरू के दर पर आ के वही मनुष्य (जीवन का सही रास्ता) समझता है जिसको प्रभू स्वयं समझ बख्शता है। 4। हे भाई ! जिस मनुष्य का मन यह हैरान कर देने वाला जगत-तमाशा देख के परमात्मा को याद नहीं करता, उसके लिए जनम-मरण का चक्कर संसार-चक्र बना रहता है। जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है, वही (जीवन का सही रास्ता) समझता है। वही विकारों से मुक्ति का रास्ता पाता है। 5। हे भाई ! जिन मनुष्यों को गुरू ने (आत्मिक जीवन की) सूझ बख्श दी और जिनको परमात्मा का दरवाजा दिखाई दे गया, वे कभी भी (विकारों में अपना जीवन) खराब नहीं करते। वे मनुष्य हरी-नाम सिमरन और विकारों से बचे रहने का यतन आदि कर्तव्य करते रहते हैं। (इस तरह उनका) जनम-मरण का चक्कर समाप्त हो जाता है। 6। हे भाई ! जिन मनुष्यों को गुरू के द्वारा सदा-स्थिर हरी-नाम का आसरा मिल जाता है, वे मनुष्य सदा-स्थिर प्रभू के दर पे (चरणों में) टिक के सदा-स्थिर हरी-नाम सिमरन की कमाई करते हैं।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 3: गुरु अमर दास जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1234 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।