मन रति नामि रते निहकेवल आदि जुगादि दइआला ॥3॥ मोहनि मोहि लीआ मनु मोरा बडै भाग लिव लागी ॥ साचु बीचारि किलविख दुख काटे मनु निरमलु अनरागी ॥4॥ गहिर गंभीर सागर रतनागर अवर नही अन पूजा ॥ सबदु बीचारि भरम भउ भंजनु अवरु न जानिआ दूजा ॥5॥ मनूआ मारि निरमल पदु चीनिआ हरि रस रते अधिकाई ॥ एकस बिनु मै अवरु न जानां सतिगुरि बूझ बुझाई ॥6॥ अगम अगोचरु अनाथु अजोनी गुरमति एको जानिआ ॥ सुभर भरे नाही चितु डोलै मन ही ते मनु मानिआ ॥7॥ गुर परसादी अकथउ कथीऐ कहउ कहावै सोई ॥ नानक दीन दइआल हमारे अवरु न जानिआ कोई ॥8॥2॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।
हिन्दी अर्थ: जिनके मन की प्रीति प्रभू के नाम में बन जाती है वे उस परमात्मा के प्यार में (सदा के लिए) रंगे जाते हैं जो शुद्ध-स्वरूप है और सदा से ही दया का श्रोत है। 3। मेरे अच्छे भाग्यों के कारण (गुरू की कृपा से) मेरी लिव (प्रभू चरणों में) लग गई है। मन को मोह लेने वाले प्रभू ने मेरा मन (अपने प्रेम में) मोह लिया है। सदा-स्थिर प्रभू (के गुणों) को सोच-मण्डल में लाने के कारण मेरे सारे पाप-दुख कट गए हैं। मेरा मन पवित्र हो गया है। (प्रभू-चरणों का) प्रेमी हो गया है। 4। मैं किसी और की पूजा नहीं करता। सिर्फ उसको ही पूजता हूँ जो बड़े गहरे और बड़े जिगरे वाला है। जो बेअंत रत्नों की खान-समुंद्र है। गुरू के शबद को विचार के मैंने समझ लिया है कि सिर्फ परमात्मा ही डर-सहम का नाश करने वाला है। कोई और (देवी-देवता आदि) दूसरा नहीं।5। मन (में से विकारों की अंश) मार के मैंने पवित्र आत्मिक दर्जे से गहरी सांझ डाल ली है। अब मैं प्रभू के नाम-रंग में बहुत रंगा गया हूँ। गुरू ने मुझे बख्श दी है। (अब) एक परमात्मा के बिना मैं किसी और को (उस जैसा) नहीं जानता। 6। गुरू की मति ले के सिर्फ उस प्रभू के साथ ही गहरी सांझ डाली है जो अपहुँच है। जिस तक ज्ञानेन्द्रियों की पहुँच नहीं। जो स्वयं ही अपना खसम-मालिक है। और जो जूनियों में नहीं आता। (इस सांझ की बरकति से) मेरी ज्ञानेन्द्रियां (नाम-रस से) नाको-नाक भर गई हैं। अब मेरा मन (माया की तरफ) डोलता नहीं। अपने अंदर ही टिक गया है। 7। परमात्मा का स्वरूप बयान से परे है। गुरू की कृपा से ही उसका सिमरन किया जा सकता है। मैं तब ही उसकी सिफत-सालाह कर सकता हूँ जब वह स्वयं ही सिफत-सालाह करवाता है। हे नानक ! (कह-) हे मेरे दीन दयालु प्रभू ! मुझे आपके जैसा और कोई नहीं दिखता। मैंने आपके साथ ही सांझ डाली है। 8। 2।
सारग महला 3 असटपदीआ घरु 1 ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ मन मेरे हरि कै नामि वडाई ॥ हरि बिनु अवरु न जाणा कोई हरि कै नामि मुकति गति पाई ॥1॥ रहाउ ॥ सबदि भउ भंजनु जमकाल निखंजनु हरि सेती लिव लाई ॥ हरि सुखदाता गुरमुखि जाता सहजे रहिआ समाई ॥1॥ भगतां का भोजनु हरि नाम निरंजनु पैन॑णु भगति बडाई ॥ निज घरि वासा सदा हरि सेवनि हरि दरि सोभा पाई ॥2॥ मनमुख बुधि काची मनूआ डोलै अकथु न कथै कहानी ॥ गुरमति निहचलु हरि मनि वसिआ अंम्रित साची बानी ॥3॥ मन के तरंग सबदि निवारे रसना सहजि सुभाई ॥ सतिगुर मिलि रहीऐ सद अपुने जिनि हरि सेती लिव लाई ॥4॥ मनु सबदि मरै ता मुकतो होवै हरि चरणी चितु लाई ॥ हरि सरु सागरु सदा जलु निरमलु नावै सहजि सुभाई ॥5॥ सबदु वीचारि सदा रंगि राते हउमै त्रिसना मारी ॥ अंतरि निहकेवलु हरि रविआ सभु आतम रामु मुरारी ॥6॥ सेवक सेवि रहे सचि राते जो तेरै मनि भाणे ॥ दुबिधा महलु न पावै जगि झूठी गुण अवगण न पछाणे ॥7॥ आपे मेलि लए अकथु कथीऐ सचु सबदु सचु बाणी ॥ नानक साचे सचि समाणे हरि का नामु वखाणी ॥8॥1॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।
हिन्दी अर्थ: सारग महला 3 असटपदीआ घरु 1 सतिगुर प्रसादि ॥ हे मेरे मन परमात्मा के नाम में (जुड़ने से लोक-परलोक का) सम्मान मिलता है। हे भाई ! परमात्मा के नाम के बिना मैं किसी और के साथ गहरी सांझ नहीं डालता। प्रभू के नाम से ही विकारों से मुक्ति और ऊँची आत्मिक अवस्था प्राप्त होती है। 1। रहाउ। हे भाई ! गुरू के शबद से डर दूर करने वाला और आत्मिक मौत नाश करने वाला हरी मिल जाता है। परमात्मा के साथ लगन लग जाती है। हे भाई ! गुरू की शरण पड़ने से सारे सुख देने वाले हरी के साथ सांझ बन जाती है। (गुरू की शरण पड़ के मनुष्य) आत्मिक अडोलता में टिका रहता है। 1। हे भाई ! निर्लिप हरी-नाम (ही) भगत जनों (की आत्मा) की खुराक है। प्रभू की भक्ति उनके वास्ते पोशाक है और इज्जत है। जो मनुष्य सदा प्रभू का सिमरन करते हैं। वे प्रभू-चरणों में टिके रहते हैं। परमात्मा के दर पर उनको इज्जत मिलती है। 2। हे भाई ! अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य की बुद्धि होछी होती है। उसका मन (माया में) डोलता रहता है। वह कभी अकथ प्रभू की सिफतसालाह नहीं करता। हे भाई ! गुरू की मति पर चलने से मनुष्य अडोल-चित्त हो जाता है। उसके मन में परमात्मा आ बसता है। उसके मन में आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल बसता है। सदा-स्थिर प्रभू की सिफतसालाह बसती है। 3। हे भाई ! गुरू के शबद की बरकति से मन की तरंगों (की बेवजह की उड़ान। दौड़ भाग) दूर कर ली जाती हैं (मन रसों-कसों के पीछे नहीं दौड़ता)। हे भाई ! अपने गुरू (के चरणों) में जुड़े रहना चाहिए। क्योंकि (उस) गुरू ने अपनी सुरति सदा परमात्मा में जोड़ रखी है। 4। हे भाई ! (जब किसी मनुष्य का) मन गुरू के शबद के द्वारा स्वै भाव दूर करता है तब (वह मनुष्य) प्रभू के चरणों में चित्त जोड़ के विकारों के पँजे में से निकल जाता है। हे भाई ! परमात्मा (मानो। ऐसा) सरोवर है समुंदर है (जिसका) जल पवित्र रहता है। (जो मनुष्य इसमें) स्नान करता है। वह आत्मिक अडोलता में प्रेम में लीन रहता है। 5। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू के शबद को अपने मन में बसा के (और। शबद की बरकति से अपने अंदर से) अहंकार और तृष्णा को खत्म करके सदा (प्रभू के) प्रेम-रंग में रंगे रहते हैं। उनके अंदर शुद्ध-स्वरूप हरी आ बसता है। (उनको) हर जगह परमात्मा ही दिखता है। 6। पर। हे प्रभू ! वही सेवक आपकी सेवा-भगती करते हैं और आपके सदा-स्थिर नाम में रंगे रहते हैं। जो आपको प्यारे लगते हैं। हे भाई ! मेर-तेर (द्वैत भाव) में फसी हुई जीव-स्त्री परमात्मा के चरणों में जगह नहीं ले सकती। वह दुनियां में भी अपना ऐतबार गवाए रखती है। वह ये नहीं पहचान सकती कि जो कुछ मैं कर रही हूँ वह अच्छा है या बुरा। 7। हे भाई ! जब प्रभू स्वयं ही अपने चरणों में जोड़े। तब ही उस अकथ प्रभू की सिफत-सालाह की जा सकती है। तब ही उसका सदा-स्थिर शबद उसकी सदा-स्थिर बाणी का उच्चारण किया जा सकता है। हे नानक ! (जिनको प्रभू स्वयं अपने चरणों से जोड़ता है; वे मनुष्य) परमात्मा का नाम सिमर-सिमर के सदा ही उस सदा-स्थिर प्रभू में लीन रहते हैं। 8। 1।
सारग महला 3 ॥ मन मेरे हरि का नामु अति मीठा ॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।
हिन्दी अर्थ: सारग महला 3 ॥ हे मेरे मन ! (जिस मनुष्य को) गुरू की शरण पड़ कर प्रभू का नाम बहुत प्यारा लगने लग जाता है।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर वर्ष की आयु में गुरु-गद्दी सँभाली, 1552 में, और 1574 तक रहे। उनकी वाणी में बुढ़ापे, समाज की संरचना, और संगति की चिन्ताएँ बार-बार लौटती हैं। उन्होंने ही लंगर (साझा-भोजन) की व्यवस्था मज़बूत की, और देश-भर में बाईस मंजी (केन्द्र) स्थापित किए।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “जिनके मन की प्रीति प्रभू के नाम में बन जाती है वे उस परमात्मा के प्यार में (सदा के लिए) रंगे जाते हैं जो शुद्ध-स्वरूप है और सदा से ही दया का श्रोत है।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।