नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: मैं दिन-रात माया में ही मगन रहा। वही कुछ करता रहा। जो मुझे अपने आप को अच्छा लगता था। 1। रहाउ। हे हरी ! मैंने कानों से गुरू की शिक्षा (कभी) नहीं सुनी। पराई स्त्री के लिए काम-वासना रखता रहा। दूसरों की निंदा करने के लिए बहुत दौड़-भाग करता रहा। समझाने पर भी मैं (कभी) नहीं समझा (कि ये काम बुरा है)। 1। हे हरी ! जिस तरह मैंने अपना जीवन व्यर्थ गवा लिया। वह मैं कहाँ तब अपनी करतूत बताऊँ। नानक कहता है- हे प्रभू ! मेरे अंदर सारे अवगुण ही हैं। मुझे अपनी शरण में रख। 2। 4। 3। 13। 139। 4। 159।
रागु सारग असटपदीआ महला 1 घरु 1 ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ हरि बिनु किउ जीवा मेरी माई ॥ जै जगदीस तेरा जसु जाचउ मै हरि बिनु रहनु न जाई ॥1॥ रहाउ ॥ हरि की पिआस पिआसी कामनि देखउ रैनि सबाई ॥ स्रीधर नाथ मेरा मनु लीना प्रभु जानै पीर पराई ॥1॥ गणत सरीरि पीर है हरि बिनु गुर सबदी हरि पांई ॥ होहु दइआल क्रिपा करि हरि जीउ हरि सिउ रहां समाई ॥2॥ ऐसी रवत रवहु मन मेरे हरि चरणी चितु लाई ॥ बिसम भए गुण गाइ मनोहर निरभउ सहजि समाई ॥3॥ हिरदै नामु सदा धुनि निहचल घटै न कीमति पाई ॥ बिनु नावै सभु कोई निरधनु सतिगुरि बूझ बुझाई ॥4॥ प्रीतम प्रान भए सुनि सजनी दूत मुए बिखु खाई ॥ जब की उपजी तब की तैसी रंगुल भई मनि भाई ॥5॥ सहज समाधि सदा लिव हरि सिउ जीवां हरि गुन गाई ॥ गुर कै सबदि रता बैरागी निज घरि ताड़ी लाई ॥6॥ सुध रस नामु महा रसु मीठा निज घरि ततु गुसांईं ॥ तह ही मनु जह ही तै राखिआ ऐसी गुरमति पाई ॥7॥ सनक सनादि ब्रहमादि इंद्रादिक भगति रते बनि आई ॥ नानक हरि बिनु घरी न जीवां हरि का नामु वडाई ॥8॥1॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: रागु सारग असटपदीआ महला 1 घरु 1 सतिगुर प्रसादि ॥ हे मेरी माँ ! परमात्मा के नाम के बिना मेरी जिंद व्याकुल होती है। हे जगत के मालिक ! आपकी ही सदा जै (जीत) है। मैं (आपसे) आपकी सिफत-सालाह (की दाति) माँगता हूँ। परमात्मा के नाम सिमरन के बिना मेरा मन घबराता है। 1। रहाउ। जैसे स्त्री को अपने पति से मिलने की चाहत होती है वह सारी रात उसका इन्तजार करती है। वैसे ही मुझे हरी के दीदार की है। मैं सारी उम्र ही उसका इन्तजार करती चली आ रही हूँ। हे लक्ष्मी-पति ! हे (जगत के) नाथ ! मेरा मन आपकी याद में मस्त है। (हे माँ !) परमात्मा ही पराई पीड़ समझ सकता है। 1 (हे माँ !) परमात्मा की याद के बिना मेरे हृदय में (और ही) चिंता-फिक्रें-तकलीफें टिकी रहती हैं। वह परमात्मा गुरू के शबद से ही मिल सकता है। हे प्यारे हरी ! मेरे पर दयावान हो। मेरे ऊपर कृपा कर। मैं आपकी याद में लीन रहूँ। 2। हे मेरे मन ! ऐसा रास्ता पकड़ कि (आप) परमात्मा के चरणों में जुड़ा रहे। मन को मोहने वाले परमात्मा के गुण गा के (भाग्यशाली व्यक्ति आनंद में) मस्त रहते हैं। दुनिया वाले डर-सहम से निडर हो के वे आत्मिक अडोलता में टिके रहते हैं। 3। (हे मेरे मन !) अगर हृदय में प्रभू का नाम बस जाए। अगर (प्रभू-प्यार की) सदीवी अटल रौंअ चल जाए। तब वह कभी कम नहीं होती। दुनिया का कोई सुख। दुनिया का कोई पदार्थ उसकी बराबरी नहीं कर सकता। सतिगुरू ने मुझे बख्श दी है कि परमात्मा के नाम के बिना हरेक जीव कंगाल (ही) है (चाहे उसके पास कितना ही धन-पदार्थ हो)। 4। हे सहेलिऐ ! (हे सत्संगी सज्जन !) सुन ! (गुरू की कृपा से) मेरे मन को प्रीतम। प्यारा लग रहा है। कामादिक वैरी (मेरी बाबत तो) मर गए हैं। उन्होंने (जैसे) जहर खा लिया है। जब से (प्रभू-चरणों में प्रीति) पैदा हुई है। तब से वैसी ही कायम है (कम नहीं हुई)। मैं उसके प्रेम में रंगी गई हूँ। मेरी जिंद प्रीतम-प्रभू के साथ एक-मेक हो गई है। 5। मैं सदा प्रभू में लिव लगाए रखता हूँ। और आत्मिक अडोलता में टिका रहता हूँ। ज्यों-ज्यों मैं हरी के गुण गाता हूँ मेरे अंदर आत्मिक जीवन विकसित होता है। गुरू के शबद में रंगे जा के मैं (प्रभू-चरणों का) प्रेमी बन गया हूँ। अब मैं अपने अंदर ही प्रभू की याद में जुड़ा रहता हूँ। 6। हे धरती के मालिक प्रभू ! मुझे सतिगुरू की ऐसी मति प्राप्त हो गई है कि जहाँ (अपने चरणों में) तूने मेरा मन जोड़ा है वहीं पर जुड़ा हुआ है। हे प्रभू ! पवित्रता का रस देने वाला आपका नाम मुझे बहुत ही स्वादिष्ट रस वाला प्रतीत हैं रहा है मुझे मीठा लग रहा है। आप जगत-का-मूल मुझे मेरे हृदय में ही मिल गया है। 7। इन्द्र जैसे देवता। ब्रहमा और उसके पुत्र सनक जैसे महापूरुष जब परमात्मा की भगती (के रंग) में रंगे गए। तब उनकी प्रीति प्रभू-चरणों के साथ बन गई। हे नानक ! (कह-) परमात्मा के नाम से एक घड़ी-मात्र विछुड़ने पर भी मेरे प्राण व्याकुल हो जाते हैं। परमात्मा का नाम ही मेरे वास्ते (सबसे श्रेष्ठ) आदर-मान है। 8। 1।
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: सारग महला 1 ॥ परमात्मा के नाम से विछुड़ के मेरा मन (अब) किसी भी तरह से धैर्य नहीं धरता (टिकता नहीं) क्योंकि इसको अनेकों दुख-रोग आ व्याप्ते हैं। पर अगर करोड़ों युगों के दुख नाश करने वाले और सदा ही स्थिर रहने वाले परमात्मा को (मन में) टिका लें तो सारे दुखों-रोगों का नाश हो जाता है (मन ठिकाने पर आ जाता है)। 1। रहाउ। उसके क्रोध को (अपने अंदर से) निकाल दिया है। उसका अहंकार और ममता जल जाती है। नित्य नया रहने वाला प्रेम (उसके हृदय में जाग उठता है)। जिस मनुष्य ने प्रभू (के दर से नाम का दान) माँगा है। पवित्र-स्वरूप प्रभू उसका (सदा के लिए) साथी बन गया है। 1। जिस मनुष्य ने एक परमात्मा की सिफतसालाह के शबद में सुरति जोड़ी है उसने (मायावी पदार्थों के पीछे) भटकने वाली मति (की अगवाई) त्याग के डर नाश करने वाला परमात्मा पा लिया है। परमात्मा के नाम का स्वाद चख के उसने (अपने अंदर से माया की) प्यास दूर कर ली है। उस अति भाग्यशाली मनुष्य को प्रभू ने अपने चरणों में मिला लिया है। 2। जिस मनुष्य ने गुरू की मति ले के सदा-स्थिर रहने वाले परमात्मा का दर्शन कर लिया। प्रभू का नाम-जल सींच के उसकी वह ज्ञानेन्द्रियां नाको-नाक भर गई जिनकी तृष्णा पहले कभी खत्म नहीं होती थी।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।
गुरु नानक की वाणी का अपना मिज़ाज है, सीधा-सादा, बिना अलंकार के, मगर हर पंक्ति में एक ठहराव। 1469 में तलवण्डी में जन्म, सुलतानपुर के बहीखाते में कुछ साल काम, फिर तीस की उम्र के क़रीब वो लम्बी पैदल यात्रा जो काबुल, बग़दाद, मक्का, जगन्नाथ-पुरी, तिब्बत की सरहद तक उन्हें ले गयी। उनके शबद इन्हीं यात्राओं की वाणी हैं।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “मैं दिन-रात माया में ही मगन रहा।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।