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1232
सारंग
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· शबद · राग सारंग
बिखिआसकत रहिओ निसि बासुर कीनो अपनो भाइओ ॥1॥ रहाउ ॥
बिखिआसकत रहिओ निसि बासुर कीनो अपनो भाइओ ॥1॥ रहाउ ॥
गुर उपदेसु सुनिओ नहि काननि पर दारा लपटाइओ ॥
पर निंदा कारनि बहु धावत समझिओ नह समझाइओ ॥1॥
कहा कहउ मै अपुनी करनी जिह बिधि जनमु गवाइओ ॥
कहि नानक सभ अउगन मो महि राखि लेहु सरनाइओ ॥2॥4॥3॥13॥139॥4॥159॥
गुर उपदेसु सुनिओ नहि काननि पर दारा लपटाइओ ॥
पर निंदा कारनि बहु धावत समझिओ नह समझाइओ ॥1॥
कहा कहउ मै अपुनी करनी जिह बिधि जनमु गवाइओ ॥
कहि नानक सभ अउगन मो महि राखि लेहु सरनाइओ ॥2॥4॥3॥13॥139॥4॥159॥
हिन्दी अर्थ: मैं दिन-रात माया में ही मगन रहा। वही कुछ करता रहा, जो मुझे अपने आप को अच्छा लगता था। 1। रहाउ। हे हरी ! मैंने कानों से गुरू की शिक्षा (कभी) नहीं सुनी। पराई स्त्री के लिए काम-वासना रखता रहा। दूसरों की निंदा करने के लिए बहुत दौड़-भाग करता रहा। समझाने पर भी मैं (कभी) नहीं समझा (कि ये काम बुरा है)। 1। हे हरी ! मैं अपनी करतूत कहाँ तक बताऊँ कि किस तरह मैंने अपना जीवन व्यर्थ गँवा लिया? नानक कहता है- हे प्रभू ! मेरे अंदर सारे अवगुण ही हैं। मुझे अपनी शरण में रखें। 2। 4। 3। 13। 139। 4। 159।
· अष्टपदी · राग सारंग
हरि बिनु किउ जीवा मेरी माई ॥
रागु सारग असटपदीआ महला 1 घरु 1
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
हरि बिनु किउ जीवा मेरी माई ॥
जै जगदीस तेरा जसु जाचउ मै हरि बिनु रहनु न जाई ॥1॥ रहाउ ॥
हरि की पिआस पिआसी कामनि देखउ रैनि सबाई ॥
स्रीधर नाथ मेरा मनु लीना प्रभु जानै पीर पराई ॥1॥
गणत सरीरि पीर है हरि बिनु गुर सबदी हरि पांई ॥
होहु दइआल क्रिपा करि हरि जीउ हरि सिउ रहां समाई ॥2॥
ऐसी रवत रवहु मन मेरे हरि चरणी चितु लाई ॥
बिसम भए गुण गाइ मनोहर निरभउ सहजि समाई ॥3॥
हिरदै नामु सदा धुनि निहचल घटै न कीमति पाई ॥
बिनु नावै सभु कोई निरधनु सतिगुरि बूझ बुझाई ॥4॥
प्रीतम प्रान भए सुनि सजनी दूत मुए बिखु खाई ॥
जब की उपजी तब की तैसी रंगुल भई मनि भाई ॥5॥
सहज समाधि सदा लिव हरि सिउ जीवां हरि गुन गाई ॥
गुर कै सबदि रता बैरागी निज घरि ताड़ी लाई ॥6॥
सुध रस नामु महा रसु मीठा निज घरि ततु गुसांईं ॥
तह ही मनु जह ही तै राखिआ ऐसी गुरमति पाई ॥7॥
सनक सनादि ब्रहमादि इंद्रादिक भगति रते बनि आई ॥
नानक हरि बिनु घरी न जीवां हरि का नामु वडाई ॥8॥1॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
हरि बिनु किउ जीवा मेरी माई ॥
जै जगदीस तेरा जसु जाचउ मै हरि बिनु रहनु न जाई ॥1॥ रहाउ ॥
हरि की पिआस पिआसी कामनि देखउ रैनि सबाई ॥
स्रीधर नाथ मेरा मनु लीना प्रभु जानै पीर पराई ॥1॥
गणत सरीरि पीर है हरि बिनु गुर सबदी हरि पांई ॥
होहु दइआल क्रिपा करि हरि जीउ हरि सिउ रहां समाई ॥2॥
ऐसी रवत रवहु मन मेरे हरि चरणी चितु लाई ॥
बिसम भए गुण गाइ मनोहर निरभउ सहजि समाई ॥3॥
हिरदै नामु सदा धुनि निहचल घटै न कीमति पाई ॥
बिनु नावै सभु कोई निरधनु सतिगुरि बूझ बुझाई ॥4॥
प्रीतम प्रान भए सुनि सजनी दूत मुए बिखु खाई ॥
जब की उपजी तब की तैसी रंगुल भई मनि भाई ॥5॥
सहज समाधि सदा लिव हरि सिउ जीवां हरि गुन गाई ॥
गुर कै सबदि रता बैरागी निज घरि ताड़ी लाई ॥6॥
सुध रस नामु महा रसु मीठा निज घरि ततु गुसांईं ॥
तह ही मनु जह ही तै राखिआ ऐसी गुरमति पाई ॥7॥
सनक सनादि ब्रहमादि इंद्रादिक भगति रते बनि आई ॥
नानक हरि बिनु घरी न जीवां हरि का नामु वडाई ॥8॥1॥
हिन्दी अर्थ: रागु सारग असटपदीआ महला 1 घरु 1 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे मेरी माँ ! परमात्मा के नाम के बिना मेरी जिंद व्याकुल होती है। हे जगत के मालिक ! आपकी ही सदा जै (जीत) है। मैं (आपसे) आपकी सिफत-सालाह (की दाति) माँगता हूँ। परमात्मा के नाम सिमरन के बिना मेरा मन घबराता है। 1। रहाउ। जैसे स्त्री को अपने पति से मिलने की चाहत होती है वह सारी रात उसका इन्तजार करती है। वैसे ही मुझे हरी के दीदार की प्यास है। मैं सारी उम्र ही उसका इन्तजार करती चली आ रही हूँ। हे लक्ष्मी-पति ! हे (जगत के) नाथ ! मेरा मन आपकी याद में मस्त है। (हे माँ !) परमात्मा ही पराई पीड़ समझ सकता है। 1। (हे माँ !) परमात्मा की याद के बिना मेरे हृदय में (और ही) चिंता-फिक्रें-तकलीफें टिकी रहती हैं। वह परमात्मा गुरू के शबद से ही मिल सकता है। हे प्यारे हरी ! मेरे पर दयावान हों। मेरे ऊपर कृपा करें, ताकि मैं आपकी याद में लीन रहूँ। 2। हे मेरे मन ! ऐसा रास्ता पकड़ें कि आप परमात्मा के चरणों में जुड़े रहें। मन को मोहने वाले परमात्मा के गुण गा के (भाग्यशाली व्यक्ति आनंद में) मस्त रहते हैं। दुनिया वाले डर-सहम से निडर हो के वे आत्मिक अडोलता में टिके रहते हैं। 3। (हे मेरे मन !) अगर हृदय में प्रभू का नाम बस जाए, अगर (प्रभू-प्यार की) स्थायी, अटल धारा चल जाए, तो वह कभी कम नहीं होती। दुनिया का कोई सुख, दुनिया का कोई पदार्थ उसकी बराबरी नहीं कर सकता। सतिगुरू ने मुझे यह समझ बख्श दी है कि परमात्मा के नाम के बिना हरेक जीव कंगाल (ही) है (चाहे उसके पास कितना ही धन-पदार्थ हो)। 4। हे सहेली ! (हे सत्संगी सज्जन !) सुनें ! (गुरू की कृपा से) मेरे मन को प्रीतम प्यारा लग रहा है। कामादिक वैरी (मेरी बाबत तो) मर गए हैं। उन्होंने (जैसे) जहर खा लिया है। जब से (प्रभू-चरणों में प्रीति) पैदा हुई है, तब से वैसी ही कायम है (कम नहीं हुई)। मैं उसके प्रेम में रंगी गई हूँ। मेरी जिंद प्रीतम-प्रभू के साथ एक-मेक हो गई है। 5। मैं सदा प्रभू में लिव लगाए रखता हूँ। और आत्मिक अडोलता में टिका रहता हूँ। ज्यों-ज्यों मैं हरी के गुण गाता हूँ, मेरे अंदर आत्मिक जीवन विकसित होता है। गुरू के शबद में रंगे जा के मैं (प्रभू-चरणों का) प्रेमी बन गया हूँ। अब मैं अपने अंदर ही प्रभू की याद में जुड़ा रहता हूँ। 6। हे धरती के मालिक प्रभू ! मुझे सतिगुरू की ऐसी मति प्राप्त हो गई है कि जहाँ (अपने चरणों में) आपने मेरा मन जोड़ा है, वहीं पर जुड़ा हुआ है। हे प्रभू ! पवित्रता का रस देने वाला आपका नाम मुझे बहुत ही स्वादिष्ट रस वाला प्रतीत हो रहा है, मुझे मीठा लग रहा है। आप जगत-का-मूल मुझे मेरे हृदय में ही मिल गए हैं। 7। इन्द्र जैसे देवता, ब्रह्मा और उसके पुत्र सनक जैसे महापुरुष जब परमात्मा की भगती (के रंग) में रंगे गए, तब उनकी प्रीति प्रभू-चरणों के साथ बन गई। हे नानक ! (कहें-) परमात्मा के नाम से एक घड़ी-मात्र विछुड़ने पर भी मेरे प्राण व्याकुल हो जाते हैं। परमात्मा का नाम ही मेरे वास्ते (सबसे श्रेष्ठ) आदर-मान है। 8। 1।
· अष्टपदी · राग सारंग
हरि बिनु किउ धीरै मनु मेरा ॥
सारग महला 1 ॥
हरि बिनु किउ धीरै मनु मेरा ॥
कोटि कलप के दूख बिनासन साचु द्रिड़ाइ निबेरा ॥1॥ रहाउ ॥
क्रोधु निवारि जले हउ ममता प्रेमु सदा नउ रंगी ॥
अनभउ बिसरि गए प्रभु जाचिआ हरि निरमाइलु संगी ॥1॥
चंचल मति तिआगि भउ भंजनु पाइआ एक सबदि लिव लागी ॥
हरि रसु चाखि त्रिखा निवारी हरि मेलि लए बडभागी ॥2॥
अभरत सिंचि भए सुभर सर गुरमति साचु निहाला ॥
हरि बिनु किउ धीरै मनु मेरा ॥
कोटि कलप के दूख बिनासन साचु द्रिड़ाइ निबेरा ॥1॥ रहाउ ॥
क्रोधु निवारि जले हउ ममता प्रेमु सदा नउ रंगी ॥
अनभउ बिसरि गए प्रभु जाचिआ हरि निरमाइलु संगी ॥1॥
चंचल मति तिआगि भउ भंजनु पाइआ एक सबदि लिव लागी ॥
हरि रसु चाखि त्रिखा निवारी हरि मेलि लए बडभागी ॥2॥
अभरत सिंचि भए सुभर सर गुरमति साचु निहाला ॥
हिन्दी अर्थ: सारग महला 1 ॥ परमात्मा के नाम से विछुड़ के मेरा मन (अब) किसी भी तरह से धैर्य नहीं धरता (टिकता नहीं) क्योंकि इसको अनेकों दुख-रोग आ घेरते हैं। पर अगर करोड़ों युगों के दुख नाश करने वाले और सदा ही स्थिर रहने वाले परमात्मा को (मन में) टिका लें, तो सारे दुखों-रोगों का नाश हो जाता है (मन ठिकाने पर आ जाता है)। 1। रहाउ। जिस मनुष्य ने प्रभू (के दर से नाम का दान) माँगा है, पवित्र-स्वरूप प्रभू उसका (सदा के लिए) साथी बन गया है। उसने अपने अंदर से क्रोध निकाल दिया है। उसका अहंकार और ममता जल जाते हैं। नित्य नया रहने वाला प्रेम उसके हृदय में जाग उठता है। उसके मन से दूसरों का डर-सहम दूर हो गया है। 1। जिस मनुष्य ने एक परमात्मा की सिफतसालाह के शबद में सुरति जोड़ी है उसने (मायावी पदार्थों के पीछे) भटकने वाली मति (की अगवाई) त्याग के डर नाश करने वाला परमात्मा पा लिया है। परमात्मा के नाम का स्वाद चख के उसने (अपने अंदर से माया की) प्यास दूर कर ली है। उस अति भाग्यशाली मनुष्य को प्रभू ने अपने चरणों में मिला लिया है। 2। जिस मनुष्य ने गुरू की मति ले के सदा-स्थिर रहने वाले परमात्मा का दर्शन कर लिया, प्रभू का नाम-जल सींच के उसकी वे ज्ञानेन्द्रियां नाको-नाक भर गईं जिनकी तृष्णा पहले कभी खत्म नहीं होती थी।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 1: गुरु नानक देव जी; महला 9: गुरु तेग बहादुर जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1232 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।