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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 1231 · सारंग

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अंग
1231
सारंग
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  1. लाल लाल मोहन गोपाल तू ॥
  2. करत केल बिखै मेल चंद्र सूर मोहे ॥
  3. हरि बिनु तेरो को न सहाई ॥
  4. कहा मन बिखिआ सिउ लपटाही ॥
  5. कहा नर अपनो जनमु गवावै ॥
  6. मन करि कबहू न हरि गुन गाइओ ॥

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग सारंग

लाल लाल मोहन गोपाल तू ॥

सारग महला 5 ॥
लाल लाल मोहन गोपाल तू ॥
कीट हसति पाखाण जंत सरब मै प्रतिपाल तू ॥1॥ रहाउ ॥
नह दूरि पूरि हजूरि संगे ॥
सुंदर रसाल तू ॥1॥
नह बरन बरन नह कुलह कुल ॥
नानक प्रभ किरपाल तू ॥2॥9॥138॥

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे जगत-रक्षक प्रभू! आप सुंदर हैं। आप सुंदर हैं। आप मन को मोह लेने वाले हैं। हे सबके पालनहार! कीड़े, हाथी, पत्थरों में (बसते) जंतु: इन सबमें ही आप मौजूद हैं। 1। रहाउ। हे प्रभू! आप (किसी जीव से) दूर नहीं। आप सबमें व्यापक हैं। आप प्रत्यक्ष दिखते हैं। आप (सब जीवों के) साथ हैं। आप सुंदर हैं। आप सब रसों का स्रोत हैं। 1। हे नानक! (कहें: हे प्रभू! लोगों द्वारा मिथे हुए) वर्णों में से आपका कोई वर्ण नहीं है (लोगों द्वारा मिथी हुई) कुलों में से आपकी कोई कुल नहीं है (आप किसी विशेष कुल व वर्ण का पक्ष नहीं करते) आप (सब पर) दयावान रहते हैं। 2। 9। 138।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग सारंग

करत केल बिखै मेल चंद्र सूर मोहे ॥

सारग मः 5 ॥
करत केल बिखै मेल चंद्र सूर मोहे ॥
उपजता बिकार दुंदर नउपरी झुनंतकार सुंदर अनिग भाउ करत फिरत बिनु गोपाल धोहे ॥ रहाउ ॥
तीनि भउने लपटाइ रही काच करमि न जात सही उनमत अंध धंध रचित जैसे महा सागर होहे ॥1॥
उधरे हरि संत दास काटि दीनी जम की फास पतित पावन नामु जा को सिमरि नानक ओहे ॥2॥10॥139॥3॥13॥155॥

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे भाई! (माया अनेकों तरह के) रंग-तमाशे करती है। (जीवों को) विषय-विकारों संग जोड़ती है। चंद्रमा-सूर्य आदि सब देवते इसने अपने जाल में फसा रखे हैं। हे भाई! (माया के प्रभाव के कारण जीवों के अंदर) झगड़ालू विकार पैदा हो जाते हैं। झांझरों की छनकार की तरह माया जीवों को प्यारी लगती है। यह माया अनेकों हाव-भाव करती फिरती है। जगत-रक्षक प्रभू के बिना माया ने सभी जीवों को ठग लिया है। 1। रहाउ। हे भाई! माया तीनों भवनों (के जीवों) को चिपकी रहती है। (पुण्य, दान, तीर्थ आदि) कच्चे कर्मों के सहारे (इस माया की चोट को) सहा नहीं जा सकता। जीव माया के मोह में मस्त और अंधे हुए रहते हैं। जगत के धंधों में व्यस्त रहते हैं (इस तरह धक्के खाते हैं) जैसे बड़े समुंद्र में धक्के पड़ते हैं। 1। हे भाई! (माया के असर से) परमात्मा के संत प्रभू के दास (ही) बचते हैं। प्रभू ने उनके जमों वाले (आत्मिक मौत के) फंदे काट दिए होते हैं। हे नानक! जिस प्रभू का नाम 'पतित पावन' (पापियों को पवित्र करने वाला) है, उसी का नाम सिमरा करें। 2। 10। 139। 3। 13। 155।

गुरु तेग बहादुर जी · शबद · राग सारंग

हरि बिनु तेरो को न सहाई ॥

ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
रागु सारंग महला 9 ॥
हरि बिनु तेरो को न सहाई ॥
कां की मात पिता सुत बनिता को काहू को भाई ॥1॥ रहाउ ॥
धनु धरनी अरु संपति सगरी जो मानिओ अपनाई ॥
तन छूटै कछु संगि न चालै कहा ताहि लपटाई ॥1॥
दीन दइआल सदा दुख भंजन ता सिउ रुचि न बढाई ॥
नानक कहत जगत सभ मिथिआ जिउ सुपना रैनाई ॥2॥1॥

हिन्दी अर्थ: ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। रागु सारंग महला 9 ॥ हे भाई! परमात्मा के बिना आपका (और) कोई भी सहायता करने वाला नहीं। हे भाई! कौन किसी की माँ? कौन किसी का पिता? कौन किसी का पुत्र? कौन किसी की पत्नी? (जब शरीर से साथ समाप्त हो जाता है तब) कौन किसी का भाई बनता है? (कोई नहीं)। 1। रहाउ। हे भाई! यह धन, धरती, सारी माया जिन्हें (आप) अपना समझे बैठे हैं, जब शरीर से साथ छूटता है, तो कोई भी चीज़ (जीव के) साथ नहीं जाती। फिर जीव क्यों इनके साथ चिपका रहता है? 1। हे भाई! जो प्रभू गरीबों पर दया करने वाला है, जो सदा (जीवों के) दुखों का नाश करने वाला है, आप उससे प्यार नहीं बढ़ाते। नानक कहता है: हे भाई! जैसे रात का सपना होता है, वैसे ही सारा जगत नाशवंत है। 2। 1।

गुरु तेग बहादुर जी · शबद · राग सारंग

कहा मन बिखिआ सिउ लपटाही ॥

सारंग महला 9 ॥
कहा मन बिखिआ सिउ लपटाही ॥
या जग महि कोऊ रहनु न पावै इकि आवहि इकि जाही ॥1॥ रहाउ ॥
कां को तनु धनु संपति कां की का सिउ नेहु लगाही ॥
जो दीसै सो सगल बिनासै जिउ बादर की छाही ॥1॥
तजि अभिमानु सरणि संतन गहु मुकति होहि छिन माही ॥
जन नानक भगवंत भजन बिनु सुखु सुपनै भी नाही ॥2॥2॥

हिन्दी अर्थ: रागु सारंग महला 9 ॥ हे मन! आप क्यों माया से (ही) चिपके रहते हैं? (देखें) इस दुनिया में (सदा के लिए) कोई भी टिका नहीं रह सकता। अनेकों पैदा होते रहते हैं। अनेकों ही मरते रहते हैं। 1। रहाउ। हे मन (देखें) सदा के लिए ना किसी का शरीर रहता है। ना धन रहता है। ना माया रहती है। आप किससे प्यार बनाए बैठे हैं? जैसे बादलों की छाया है, वैसे ही जो कुछ दिख रहा है सब नाशवंत है। 1। हे मन! अहंकार छोड़ें और संत जनों की शरण पड़ें। (इस तरह) एक छिन में आप (माया के बँधनों से) स्वतंत्र हो जाएँगे। हे दास नानक! (कहें: हे मन!) परमात्मा के भजन के बिना कभी सपने में भी सुख नहीं मिलता। 2। 2।

गुरु तेग बहादुर जी · शबद · राग सारंग

कहा नर अपनो जनमु गवावै ॥

सारंग महला 9 ॥
कहा नर अपनो जनमु गवावै ॥
माइआ मदि बिखिआ रसि रचिओ राम सरनि नही आवै ॥1॥ रहाउ ॥
इहु संसारु सगल है सुपनो देखि कहा लोभावै ॥
जो उपजै सो सगल बिनासै रहनु न कोऊ पावै ॥1॥
मिथिआ तनु साचो करि मानिओ इह बिधि आपु बंधावै ॥
जन नानक सोऊ जनु मुकता राम भजन चितु लावै ॥2॥3॥

हिन्दी अर्थ: रागु सारंग महला 9 ॥ हे भाई! पता नहीं मनुष्य क्यों अपना जीवन व्यर्थ में बरबाद करता है। माया की मस्ती में माया के स्वाद में व्यस्त रहता है और परमात्मा की शरण नहीं पड़ता। 1। रहाउ। हे भाई! यह सारा जगत सपने जैसा है। इसको देख के, पता नहीं, मनुष्य क्यों लोभ में फँसता है। यहाँ तो जो कोई पैदा होता है वह हरेक ही नाश हो जाता है। यहाँ सदा के लिए कोई नहीं टिक सकता। 1। हे भाई! यह शरीर नाशवंत है। पर जीव इसको सदा कायम रहने वाला समझे रहता है। इस तरह अपने आप को (मोह के फंदों में) फसाए रखता है। हे दास नानक! वही मनुष्य मोह के बँधनों से स्वतंत्र रहता है, जो परमात्मा के भजन में अपना चित्त जोड़ के रखता है। 2। 3।

गुरु तेग बहादुर जी · शबद · राग सारंग

मन करि कबहू न हरि गुन गाइओ ॥

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सारंग महला 9 ॥
मन करि कबहू न हरि गुन गाइओ ॥

हिन्दी अर्थ: रागु सारंग महला 9 ॥ हे प्रभू! मैं मन लगा के कभी भी आपके गुण नहीं गाता रहा।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी; महला 9: गुरु तेग बहादुर जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1231 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।