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अंग 1231

अंग
1231
राग सारंग
राग: सारंग · रचयिता: Guru Tegh Bahaadur Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सारग महला 5 ॥
लाल लाल मोहन गोपाल तू ॥
कीट हसति पाखाण जंत सरब मै प्रतिपाल तू ॥1॥ रहाउ ॥
नह दूरि पूरि हजूरि संगे ॥
सुंदर रसाल तू ॥1॥
नह बरन बरन नह कुलह कुल ॥
नानक प्रभ किरपाल तू ॥2॥9॥138॥
तेग बहादुर जी ने जीवन का बड़ा हिस्सा एकांत में बिताया, असम और बिहार की यात्राओं में। दुनिया की क्षणभंगुरता उनकी वाणी का केन्द्रीय धागा है, और इस शबद में भी वही स्वर सुनाई देता है।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे जगत-रक्षक प्रभू ! आप सुंदर है। आप सुंदर है। आप मन को मोह लेने वाला है। हे सबके पालनहार ! कीड़े। हाथी। पत्थरों के (में बसते) जंतु- इन सबमें ही आप मौजूद है। 1। रहाउ। हे प्रभू ! आप (किसी जीव से) दूर नहीं। आप सबमें व्यापक है। आप प्रत्यक्ष दिखता है। आप (सब जीवों के) साथ है। आप सुंदर है। आप सब रसों का श्रोत है। 1। हे नानक ! (कह- हे प्रभू ! लोगों द्वारा मिथे हुए) वर्णों में से आपका कोई वर्ण नहीं है (लोगों द्वारा मिथी हुई) कुलों में से आपकी कोई कुल नहीं है (आप किसी विशेष कुल व वर्ण का पक्ष नहीं करता) आप (सब पर) दयावान रहता है। 2। 9। 138।
सारग मः 5 ॥
करत केल बिखै मेल चंद्र सूर मोहे ॥
उपजता बिकार दुंदर नउपरी झुनंतकार सुंदर अनिग भाउ करत फिरत बिनु गोपाल धोहे ॥ रहाउ ॥
तीनि भउने लपटाइ रही काच करमि न जात सही उनमत अंध धंध रचित जैसे महा सागर होहे ॥1॥
उधरे हरि संत दास काटि दीनी जम की फास पतित पावन नामु जा को सिमरि नानक ओहे ॥2॥10॥139॥3॥13॥155॥
गुरु तेग बहादुर जी (1621-1675) की वाणी में वैराग्य और nश्वरता का स्वर लगातार है। उनकी शहादत 1675 में दिल्ली के चाँदनी चौक के पास हुई, औरंगज़ेब के हुक्म पर। उनकी रचनाएँ ग्रंथ के अन्तिम पन्नों पर हैं, गुरु गोबिंद सिंह द्वारा 1706 में जोड़ी गयीं।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे भाई ! (माया अनेकों तरह के) रंग-तमाशे करती है। (जीवों को) विषौ-विकारों संग जोड़ती है। चंद्रमा-सूर्य आदि सब देवते इसने अपने जाल में फसा रखे हैं। हे भाई ! (माया के प्रभाव के कारण जीवों के अंदर) झगड़ालू विकार पैदा हो जाते हैं। झांझरों की छनकार की तरह माया जीवों को प्यारी लगती है। यह माया अनेकों हाव-भाव करती फिरती है। जगत-रक्षक प्रभू के बिना माया ने सभी जीवों को ठॅग लिया है। 1। रहाउ। हे भाई ! माया तीनों भवनों (के जीवों) को चिपकी रहती है। (पुन्य। दान। तीर्थ आदि) कच्चे कर्मों की (इस माया की चोट को) सहा नहीं जा सकता। जीव माया के मोह में मस्त और अंधे हुए रहते हैं। जगत के धंधों में व्यस्त रहते हैं (इस तरह धक्के खाते हैं) जैसे बड़े समुंद्र में धक्के पड़ते हैं। 1। हे भाई ! (माया के असर से) परमात्मा के संत प्रभू के दास (ही) बचते हैं। प्रभू ने उनकी जमों वाली (आत्मिक मौत के) फंदे काट दिए होते हैं। हे नानक ! जिस प्रभू का नाम ‘पतित पावन’ (पापियों को पवित्र करने वाला) है। उसी का नाम सिमरा कर। 2। 10। 139। 155।
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
रागु सारंग महला 9 ॥
हरि बिनु तेरो को न सहाई ॥
कां की मात पिता सुत बनिता को काहू को भाई ॥1॥ रहाउ ॥
धनु धरनी अरु संपति सगरी जो मानिओ अपनाई ॥
तन छूटै कछु संगि न चालै कहा ताहि लपटाई ॥1॥
दीन दइआल सदा दुख भंजन ता सिउ रुचि न बढाई ॥
नानक कहत जगत सभ मिथिआ जिउ सुपना रैनाई ॥2॥1॥
तेग बहादुर जी ने जीवन का बड़ा हिस्सा एकांत में बिताया, असम और बिहार की यात्राओं में। दुनिया की क्षणभंगुरता उनकी वाणी का केन्द्रीय धागा है, और इस शबद में भी वही स्वर सुनाई देता है।

हिन्दी अर्थ: ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ रागु सारंग महला 9 ॥ हे भाई ! परमात्मा के बिना आपका (और) कोई भी सहायता करने वाला नहीं। हे भाई ! कौन किसी की माँ। कौन किसी का पिता। कौन किसी का पुत्र। कौन किसी की पत्नी। (जब शरीर से साथ समाप्त हो जाता है तब) कौन किसी का भाई बनता है। (कोई नहीं)। 1। रहाउ। हे भाई ! यह धन धरती सारी मायश जिन्हें (आप) अपनी समझे बैठा है। जब शरीर से साथ छूटता है। कोई भी चीज़ (जीव के) साथ नहीं जाती। फिर जीव क्यों इनके साथ चिपका रहता है। 1। हे भाई ! जो प्रभू गरीबों पर दया करने वाला है। जो सदा (जीवों के) दुखों का नाश करने वाला है। आप उससे प्यार नहीं बढ़ाता। नानक कहता है- हे भाई ! जैसे रात का सपना होता है वैसे ही सयारा जगत नाशवंत है। 2। 1।
सारंग महला 9 ॥
कहा मन बिखिआ सिउ लपटाही ॥
या जग महि कोऊ रहनु न पावै इकि आवहि इकि जाही ॥1॥ रहाउ ॥
कां को तनु धनु संपति कां की का सिउ नेहु लगाही ॥
जो दीसै सो सगल बिनासै जिउ बादर की छाही ॥1॥
तजि अभिमानु सरणि संतन गहु मुकति होहि छिन माही ॥
जन नानक भगवंत भजन बिनु सुखु सुपनै भी नाही ॥2॥2॥
गुरु तेग बहादुर जी (1621-1675) की वाणी में वैराग्य और nश्वरता का स्वर लगातार है। उनकी शहादत 1675 में दिल्ली के चाँदनी चौक के पास हुई, औरंगज़ेब के हुक्म पर। उनकी रचनाएँ ग्रंथ के अन्तिम पन्नों पर हैं, गुरु गोबिंद सिंह द्वारा 1706 में जोड़ी गयीं।

हिन्दी अर्थ: रागु सारंग महला 9 ॥ हे मन ! आप क्यों माया से (ही) चिपका रहता है। (देख) इस दुनिया में (सदा के लिए) कोई भी टिका नहीं रह सकता। अनेकों पैदा होते रहते हैं। अनेकों ही मरते रहते हैं। 1। रहाउ। हे मन (देख) सदा के लिए ना किसी का शरीर रहता है। ना धन रहता है। ना माया रहती है। आप किससे प्यार बनाए बैठा है। जैसे बादलों की छाया है। वैसे ही जो कुछ दिख रहा है सभ नाशवंत है। 1। हे मन ! अहंकार छोड़। और। संत जनों की शरण पड़। (इस तरह) एक छिन में आप (माया के बँधनों से) स्वतंत्र हैं जाएगा। हे दास नानक ! (कह- हे मन !) परमात्मा के भजन के बिना कभी सपने में भी सुख नहीं मिलता। 2। 2।
सारंग महला 9 ॥
कहा नर अपनो जनमु गवावै ॥
माइआ मदि बिखिआ रसि रचिओ राम सरनि नही आवै ॥1॥ रहाउ ॥
इहु संसारु सगल है सुपनो देखि कहा लोभावै ॥
जो उपजै सो सगल बिनासै रहनु न कोऊ पावै ॥1॥
मिथिआ तनु साचो करि मानिओ इह बिधि आपु बंधावै ॥
जन नानक सोऊ जनु मुकता राम भजन चितु लावै ॥2॥3॥
तेग बहादुर जी ने जीवन का बड़ा हिस्सा एकांत में बिताया, असम और बिहार की यात्राओं में। दुनिया की क्षणभंगुरता उनकी वाणी का केन्द्रीय धागा है, और इस शबद में भी वही स्वर सुनाई देता है।

हिन्दी अर्थ: रागु सारंग महला 9 ॥ हे भाई ! पता नहीं मनुष्य क्यों अपना जीवचन व्यर्थ में बरबाद करता है। माया की मस्ती में माया के स्वाद में व्यस्त रहता है। और। परमात्मा की शरण नहीं पड़ता। 1। रहाउ। हे भाई ! यह सारा जगत सपने जैसा है। इसको देख के। पता नहीं। मनुष्य क्यों लोभ में फसता है। यहाँ तो जो कोई पैदा होता है वह हरेक ही नाश हो जाता है। यहाँ सदा के लिए कोई नहीं टिक सकता। 1। हे भाई ! यह शरीर नाशवंत है। पर जीव इसको सदा कायम रहने वाला समझे रहता है। इस तरह अपने आप को (मोह की फंदों में) फसाए रखता है। हे दास नानक ! वही मनुष्य मोह के बँधनों से स्वतंत्र रहता है। जो परमात्मा के भजन में अपना चित्त जोड़ के रखता है। 2। 3।
सारंग महला 9 ॥
मन करि कबहू न हरि गुन गाइओ ॥
गुरु तेग बहादुर जी (1621-1675) की वाणी में वैराग्य और nश्वरता का स्वर लगातार है। उनकी शहादत 1675 में दिल्ली के चाँदनी चौक के पास हुई, औरंगज़ेब के हुक्म पर। उनकी रचनाएँ ग्रंथ के अन्तिम पन्नों पर हैं, गुरु गोबिंद सिंह द्वारा 1706 में जोड़ी गयीं।

हिन्दी अर्थ: रागु सारंग महला 9 ॥ हे प्रभू ! मैं मन लगा के कभी भी आपके गुण नहीं गाता रहा।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।

गुरु तेग बहादुर जी (1621-1675) की वाणी में वैराग्य और nश्वरता का स्वर लगातार है। उन्होंने जीवन का बड़ा हिस्सा एकांत में बिताया, असम और बिहार की यात्राओं में। 1675 में औरंगज़ेब के हुक्म पर उन्हें दिल्ली के चाँदनी चौक के पास शहीद किया गया, क्योंकि उन्होंने कश्मीरी पंडितों के धर्मांतरण से इनकार किया था। उनकी शहादत के स्थल पर आज सीस-गंज गुरुद्वारा है।

इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “सारग महला 5 ॥ हे जगत-रक्षक प्रभू ! आप सुंदर है।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।