लाल लाल मोहन गोपाल तू ॥
कीट हसति पाखाण जंत सरब मै प्रतिपाल तू ॥1॥ रहाउ ॥
नह दूरि पूरि हजूरि संगे ॥
सुंदर रसाल तू ॥1॥
नह बरन बरन नह कुलह कुल ॥
नानक प्रभ किरपाल तू ॥2॥9॥138॥
करत केल बिखै मेल चंद्र सूर मोहे ॥
उपजता बिकार दुंदर नउपरी झुनंतकार सुंदर अनिग भाउ करत फिरत बिनु गोपाल धोहे ॥ रहाउ ॥
तीनि भउने लपटाइ रही काच करमि न जात सही उनमत अंध धंध रचित जैसे महा सागर होहे ॥1॥
उधरे हरि संत दास काटि दीनी जम की फास पतित पावन नामु जा को सिमरि नानक ओहे ॥2॥10॥139॥3॥13॥155॥
रागु सारंग महला 9 ॥
हरि बिनु तेरो को न सहाई ॥
कां की मात पिता सुत बनिता को काहू को भाई ॥1॥ रहाउ ॥
धनु धरनी अरु संपति सगरी जो मानिओ अपनाई ॥
तन छूटै कछु संगि न चालै कहा ताहि लपटाई ॥1॥
दीन दइआल सदा दुख भंजन ता सिउ रुचि न बढाई ॥
नानक कहत जगत सभ मिथिआ जिउ सुपना रैनाई ॥2॥1॥
कहा मन बिखिआ सिउ लपटाही ॥
या जग महि कोऊ रहनु न पावै इकि आवहि इकि जाही ॥1॥ रहाउ ॥
कां को तनु धनु संपति कां की का सिउ नेहु लगाही ॥
जो दीसै सो सगल बिनासै जिउ बादर की छाही ॥1॥
तजि अभिमानु सरणि संतन गहु मुकति होहि छिन माही ॥
जन नानक भगवंत भजन बिनु सुखु सुपनै भी नाही ॥2॥2॥
कहा नर अपनो जनमु गवावै ॥
माइआ मदि बिखिआ रसि रचिओ राम सरनि नही आवै ॥1॥ रहाउ ॥
इहु संसारु सगल है सुपनो देखि कहा लोभावै ॥
जो उपजै सो सगल बिनासै रहनु न कोऊ पावै ॥1॥
मिथिआ तनु साचो करि मानिओ इह बिधि आपु बंधावै ॥
जन नानक सोऊ जनु मुकता राम भजन चितु लावै ॥2॥3॥
मन करि कबहू न हरि गुन गाइओ ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।
गुरु तेग बहादुर जी (1621-1675) की वाणी में वैराग्य और nश्वरता का स्वर लगातार है। उन्होंने जीवन का बड़ा हिस्सा एकांत में बिताया, असम और बिहार की यात्राओं में। 1675 में औरंगज़ेब के हुक्म पर उन्हें दिल्ली के चाँदनी चौक के पास शहीद किया गया, क्योंकि उन्होंने कश्मीरी पंडितों के धर्मांतरण से इनकार किया था। उनकी शहादत के स्थल पर आज सीस-गंज गुरुद्वारा है।
इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “सारग महला 5 ॥ हे जगत-रक्षक प्रभू ! आप सुंदर है।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।