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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 1230 · सारंग

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अंग
1230
सारंग
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  1. संतन कै चरन लागे काम क्रोध लोभ तिआगे गुर गोपाल भए क्रिपाल लबधि अपनी पाई ॥1॥
  2. हरि हरे हरि मुखहु बोलि हरि हरे मनि धारे ॥1॥ रहाउ ॥
  3. नाम भगति मागु संत तिआगि सगल कामी ॥1॥ रहाउ ॥
  4. गुन लाल गावउ गुर देखे ॥
  5. मनि बिरागैगी ॥ खोजती दरसार ॥1॥ रहाउ ॥
  6. ऐसी होइ परी ॥

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग सारंग

संतन कै चरन लागे काम क्रोध लोभ तिआगे गुर गोपाल भए क्रिपाल लबधि अपनी पाई ॥1॥

अंग 1229 से चला आ रहा अंश

संतन कै चरन लागे काम क्रोध लोभ तिआगे गुर गोपाल भए क्रिपाल लबधि अपनी पाई ॥1॥
बिनसे भ्रम मोह अंध टूटे माइआ के बंध पूरन सरबत्र ठाकुर नह कोऊ बैराई ॥
सुआमी सुप्रसंन भए जनम मरन दोख गए संतन कै चरन लागि नानक गुन गाई ॥2॥3॥132॥

हिन्दी अर्थ: हे भाई! जो मनुष्य संत-जनों के चरण लगते हैं। काम, क्रोध लोभ (आदि विकार) छोड़ देते हैं। उन पर गुर-गोपाल मेहरवान होता है। उनको अपनी वह नाम-वस्तु मिल जाती है जिसकी (अनेकों जन्मों से) तलाश करते आ रहे थे। 1। उनके अंदर से भ्रम और मोह के अंधेरे नाश हो जाते हैं। माया के मोह के फंदे टूट जाते हैं। प्रभू-मालिक उनको हर जगह व्यापक दिखाई देता है। कोई भी उन्हें वेरी नहीं लगता। हे नानक! जो मनुष्य संत जनों के चरणों से लग के परमात्मा के गुण गाते रहते हैं। उन पर मालिक-प्रभू प्रसन्न हो जाते हैं। उनके जनम-मरण के चक्कर और पाप सभ समाप्त हो जाते हैं। 2। 3। 132।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग सारंग

हरि हरे हरि मुखहु बोलि हरि हरे मनि धारे ॥1॥ रहाउ ॥

सारग महला 5 ॥
हरि हरे हरि मुखहु बोलि हरि हरे मनि धारे ॥1॥ रहाउ ॥
स्रवन सुनन भगति करन अनिक पातिक पुनहचरन ॥
सरन परन साधू आन बानि बिसारे ॥1॥
हरि चरन प्रीति नीत नीति पावना महि महा पुनीत ॥
सेवक भै दूरि करन कलिमल दोख जारे ॥
कहत मुकत सुनत मुकत रहत जनम रहते ॥
राम राम सार भूत नानक ततु बीचारे ॥2॥4॥133॥

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे भाई! सदा सदा ही परमात्मा का नाम अपने मुँह से उचारा करें और अपने मन में बसाए रखें। 1। रहाउ। हे भाई! परमात्मा का नाम कानों से सुनना प्रभू की भक्ति करनी, यही है अनेकों पापों को दूर करने के लिए किए हुए पछतावे-मात्र धार्मिक कर्म। हे भाई! गुरू की शरण पड़े रहना, ये उद्यम अन्य (बुरी) आदतों को (मन में से) दूर कर देता है। 1। हे भाई! सदा सदा प्रभू के चरणों से प्यार बनाए रखना, ये जीवन को बहुत ही पवित्र बना देता है। प्रभू-चरणों से प्रीति सेवक के सारे डर दूर करने वाली है। सेवक के सारे पाप विकार जला देती है। हे भाई! प्रभू का नाम सिमरने वाले और सुनने वाले विकारों से बचे रहते हैं। सदाचार (सुचॅजी रहणी) रखने वाले जूनियों से बच जाते हैं। हे भाई! नानक (सारी विचारों का यह) सारांश बताता है कि परमात्मा का नाम सबसे श्रेष्ठ है। 2। 4। 133।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग सारंग

नाम भगति मागु संत तिआगि सगल कामी ॥1॥ रहाउ ॥

सारग महला 5 ॥
नाम भगति मागु संत तिआगि सगल कामी ॥1॥ रहाउ ॥
प्रीति लाइ हरि धिआइ गुन गोुबिंद सदा गाइ ॥
हरि जन की रेन बांछु दैनहार सुआमी ॥1॥
सरब कुसल सुख बिस्राम आनदा आनंद नाम जम की कछु नाहि त्रास सिमरि अंतरजामी ॥
एक सरन गोबिंद चरन संसार सगल ताप हरन ॥
नाव रूप साधसंग नानक पारगरामी ॥2॥5॥134॥

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे भाई! और सारे काम छोड़ के (भी) संत जनों से परमात्मा के नाम की भक्ति माँगते रहा करें। 1। रहाउ। हे भाई! प्यार से परमात्मा के नाम का ध्यान धरा करें। सदा गोबिंद के गुण गाते रहा करें। उस सब कुछ दे सकने वाले मालिक-प्रभू से संतजनों के चरणों की धूल माँगते रहा करें। 1। हे भाई! परमात्मा का नाम सारे सुखों का सारी खुशियों का। सारे आनंदों का श्रोत है। हरेक के दिल की जानने वाले प्रभू का नाम सिमरा करें। जमों का (भी) कोई डर नहीं रह जाता। हे नानक! एक परमात्मा के चरणों की शरण जगत के सारे दुख-कलेश दूर करने योग्य है। (यह शरण साध-संगति में ही मिलती है। और) साध-संगति बेड़ी की तरह (संसार-समुंद्र से) पार लंघाने वाली है। 2। 5। 134।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग सारंग

गुन लाल गावउ गुर देखे ॥

सारग महला 5 ॥
गुन लाल गावउ गुर देखे ॥
पंचा ते एकु छूटा जउ साधसंगि पग रउ ॥1॥ रहाउ ॥
द्रिसटउ कछु संगि न जाइ मानु तिआगि मोहा ॥
एकै हरि प्रीति लाइ मिलि साधसंगि सोहा ॥1॥
पाइओ है गुण निधानु सगल आस पूरी ॥
नानक मनि अनंद भए गुरि बिखम गार्ह तोरी ॥2॥6॥135॥

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे भाई! जब गुरू का दर्शन करके मैं सुंदर हरी के गुण गाता हूँ। जब गुरू की संगति में टिक के मैं (प्रभू के चरन) पकड़ता हूँ, तब (मेरा यह) मन (कामादिक) पाँचों (के पँजे) से निकल जाता है। 1। रहाउ। हे भाई! (यह जो) दिखाई देता जगत (है। इस में से) कुछ भी (किसी के) साथ नहीं जाता (इसलिए इसका) मान और मोह छोड़ दें। साध-संगति में मिल के एक परमात्मा के चरणों के साथ प्रीत जोड़ें (इस तरह जीवन) सुंदर बन जाता है। 1। हे नानक! (कहें: हे भाई!) मैंने गुणों का खजाना प्रभू पा लिया है। मेरी सारी आशा पूरी हो गई है। गुरू ने (मेरे अंदर से माया के मोह की) कठिन गाँठ खोल दी है। अब मेरे मन में आनंद ही आनंद बन गए हैं। 2। 6। 135।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग सारंग

मनि बिरागैगी ॥ खोजती दरसार ॥1॥ रहाउ ॥

सारग महला 5 ॥
मनि बिरागैगी ॥ खोजती दरसार ॥1॥ रहाउ ॥
साधू संतन सेवि कै प्रिउ हीअरै धिआइओ ॥
आनंद रूपी पेखि कै हउ महलु पावउगी ॥1॥
काम करी सभ तिआगि कै हउ सरणि परउगी ॥
नानक सुआमी गरि मिले हउ गुर मनावउगी ॥2॥7॥136॥

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ मेरी जिंद मन में वैराग वाली होती जा रही है हे सखी! (प्रभू के) दर्शनों के यतन करती-करती। 1। रहाउ। हे सखी! संत जनों की सेवा करके (साध-संगति की बरकति से) मैंने प्यारे प्रभू को अपने हृदय में बसा लिया है। और, उस आनंद-स्वरूप के दर्शन करके मैंने उसके चरणों में ठिकाना प्राप्त कर लिया है। 1। हे सखी! (जगत के) काम-धंधों का सारा मोह छोड़ के मैं प्रभू की शरण पड़ी रहती हूँ। हे नानक! (कहें: हे सखी! जिस गुरू की कृपा से) मालिक-प्रभू जी (मेरे) गले से आ लगे हैं। मैं (उस) गुरू की प्रसन्नता प्राप्त करती रहती हूँ। 2। 7। 136।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग सारंग

ऐसी होइ परी ॥

सारग महला 5 ॥
ऐसी होइ परी ॥
जानते दइआर ॥1॥ रहाउ ॥
मातर पितर तिआगि कै मनु संतन पाहि बेचाइओ ॥
जाति जनम कुल खोईऐ हउ गावउ हरि हरी ॥1॥
लोक कुटंब ते टूटीऐ प्रभ किरति किरति करी ॥
गुरि मो कउ उपदेसिआ नानक सेवि एक हरी ॥2॥8॥137॥

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे भाई! (मेरे मन की हालत) ऐसी हो गई है (और, इस हालत को) दयालु प्रभू (स्वयं) जानता है। 1। रहाउ। हे भाई! (गुरू के उपदेश की बरकति से) माता-पिता (आदि संबन्धियों का मोह) छोड़ के मैंने अपना मन संत जनों के हवाले कर दिया है। मैंने (ऊँची) जाति कुल जनम (का गुमान) छोड़ दिया है। और मैं (हर वक्त) परमात्मा की सिफत-सालाह ही करता हूँ (अपने कुल आदि को सराहने की जगह)। 1। हे नानक! (कहें: हे भाई! गुरू के उपदेश की बरकति से मेरी प्रीति) लोगों से कुटुंब से टूट गई है। प्रभू ने मुझे निहाल-निहाल कर दिया है। गुरू ने मुझे शिक्षा दी है कि सदा एक परमात्मा की शरण पड़े रहें। 2। 8। 137।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1230 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।