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अंग 1230

अंग
1230
राग सारंग
राग: सारंग · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
संतन कै चरन लागे काम क्रोध लोभ तिआगे गुर गोपाल भए क्रिपाल लबधि अपनी पाई ॥1॥
बिनसे भ्रम मोह अंध टूटे माइआ के बंध पूरन सरबत्र ठाकुर नह कोऊ बैराई ॥
सुआमी सुप्रसंन भए जनम मरन दोख गए संतन कै चरन लागि नानक गुन गाई ॥2॥3॥132॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: हे भाई ! जो मनुष्य संत-जनों के चरण लगते हैं। काम। क्रोध लोभ (आदि विकार) छोड़ देते हैं। उन पर गुर-गोपाल मेहरवान होता है। उनको अपनी वह नाम-वस्तु मिल जाती है जिसकी (अनेकों जन्मों से) तलाश करते आ रहे थे। 1। उनके अंदर से भ्रम और मोह के अंधेरे नाश हो जाते हैं। माया के मोह के फंदे टूट जाते हैं। प्रभू-मालिक उनको हर जगह व्यापक दिखाई देता है। कोई भी उन्हें वेरी नहीं लगता। हे नानक ! जो मनुष्य संत जनों के चरणों से लग के परमात्मा के गुण गाते रहते हैं। उन पर मालिक-प्रभू प्रसन्न हो जाते हैं। उनके जनम-मरण के चक्कर और पाप सभ समाप्त हो जाते हैं। 2। 3। 132।
सारग महला 5 ॥
हरि हरे हरि मुखहु बोलि हरि हरे मनि धारे ॥1॥ रहाउ ॥
स्रवन सुनन भगति करन अनिक पातिक पुनहचरन ॥
सरन परन साधू आन बानि बिसारे ॥1॥
हरि चरन प्रीति नीत नीति पावना महि महा पुनीत ॥
सेवक भै दूरि करन कलिमल दोख जारे ॥
कहत मुकत सुनत मुकत रहत जनम रहते ॥
राम राम सार भूत नानक ततु बीचारे ॥2॥4॥133॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे भाई ! सदा सदा ही परमात्मा का नाम अपने मुँह से उचारा कर और अपने मन में बसाए रख। 1। रहाउ। हे भाई ! परमात्मा का नाम कानों से सुनना प्रभू की भक्ति करनी – यही है अनेकों पापों को दूर करने के लिए किए हुए पछतावे-मात्र धार्मिक कर्म। हे भाई ! गुरू की शरण पड़े रहना- ये उद्यम अन्य (बुरी) आदतों को (मन में से) दूर कर देता है। 1। हे भाई ! सदा सदा प्रभू के चरणों से प्यार बनाए रखना- ये जीवन को बहुत ही पवित्र बना देता है। प्रभू-चरणों से प्रीति सेवक के सारे डर दूर करने वाली है। सेवक के सारे पाप विकार जला देती है। हे भाई ! प्रभू का नाम सिमरने वाले और सुनने वाले विकारों से बचे रहते हैं। सदाचार (सुचॅजी रहणी) रखने वाले जूनियों से बच जाते हैं। हे भाई ! नानक (सारी विचारों का यह) सारांश बताता है कि परमात्मा का नाम सबसे श्रेष्ठ है। 2। 4। 133।
सारग महला 5 ॥
नाम भगति मागु संत तिआगि सगल कामी ॥1॥ रहाउ ॥
प्रीति लाइ हरि धिआइ गुन गोुबिंद सदा गाइ ॥
हरि जन की रेन बांछु दैनहार सुआमी ॥1॥
सरब कुसल सुख बिस्राम आनदा आनंद नाम जम की कछु नाहि त्रास सिमरि अंतरजामी ॥
एक सरन गोबिंद चरन संसार सगल ताप हरन ॥
नाव रूप साधसंग नानक पारगरामी ॥2॥5॥134॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे भाई ! और सारे काम छोड़ के (भी) संत जनों से परमात्मा के नाम की भक्ति माँगता रहा कर। 1। रहाउ। हे भाई ! प्यार से परमात्मा के नाम का ध्यान धरा कर। सदा गोबिंद के गुण गाता रहा कर। उस सब कुछ दे सकने वाले मालिक-प्रभू से संतजनों के चरणों की धूल माँगता रहा कर। 1। हे भाई ! परमात्मा का नाम सारे सुखों का सारी खुशियों का। सारे आनंदों का श्रोत है। हरेक के दिल की जानने वाले प्रभू का नाम सिमरा कर। जमों का (भी) कोई डर नहीं रह जाता। हे नानक ! एक परमात्मा के चरणों की शरण जगत के सारे दुख-कलेश दूर करने योग्य है। (यह शरण साध-संगति में ही मिलती है। और) साध-संगति बेड़ी की तरह (संसार-समुंद्र से) पार लंघाने वाली है। 2। 5। 134।
सारग महला 5 ॥
गुन लाल गावउ गुर देखे ॥
पंचा ते एकु छूटा जउ साधसंगि पग रउ ॥1॥ रहाउ ॥
द्रिसटउ कछु संगि न जाइ मानु तिआगि मोहा ॥
एकै हरि प्रीति लाइ मिलि साधसंगि सोहा ॥1॥
पाइओ है गुण निधानु सगल आस पूरी ॥
नानक मनि अनंद भए गुरि बिखम गार्ह तोरी ॥2॥6॥135॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे भाई ! जब गुरू का दर्शन करके मैं सुंदर हरी के गुण गाता हूँ। जब गुरू की संगति में टिक के मैं (प्रभू के चरन) पकड़ता हूँ। तब (मेरा यह) मन (कामादिक) पाँचों (के पँजे) से निकल जाता है। 1। रहाउ। हे भाई ! (यह जो) दिखाई देता जगत (है। इस में से) कुछ भी (किसी के) साथ नहीं जाता (इसलिए इसका) मान और मोह छोड़ दे। साध-संगति में मिल के एक परमात्मा के चरणों के साथ प्रीत जोड़ (इस तरह जीवन) सुंदर बन जाता है। 1। हे नानक ! (कह- हे भाई !) मैंने गुणों का खजाना प्रभू पा लिया है। मेरी सारी आशा पूरी हो गई है। गुरू ने (मेरे अंदर से माया के मोह की) कठिन गाँठ खोल दी है। अब मेरे मन में आनंद ही आनंद बन गए हैं। 2। 6। 135।
सारग महला 5 ॥
मनि बिरागैगी ॥ खोजती दरसार ॥1॥ रहाउ ॥
साधू संतन सेवि कै प्रिउ हीअरै धिआइओ ॥
आनंद रूपी पेखि कै हउ महलु पावउगी ॥1॥
काम करी सभ तिआगि कै हउ सरणि परउगी ॥
नानक सुआमी गरि मिले हउ गुर मनावउगी ॥2॥7॥136॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ मेरी जिंद मन में वैराग वाली होती जा रही है हे सखी ! (प्रभू के) दर्शनों के यतन करती-करती । 1। रहाउ। हे सखी ! संत जनों की सेवा करके (साध-संगति की बरकति से) मैंने प्यारे प्रभू को अपने हृदय में बसा लिया है। और। उस आनंद-स्वरूप के दर्शन करके मैंने उसके चरणों में ठिकाना प्राप्त कर लिया है। 1। हे सखी ! (जगत के) काम-धंधों का सारा मोह छोड़ के मैं प्रभू की शरण पड़ी रहती हूँ। हे नानक ! (कह- हे सखी ! जिस गुरू की कृपा से) मालिक-प्रभू जी (मेरे) गले से आ लगे हैं। मैं (उस) गुरू की प्रसन्नता प्राप्त करती रहती हूँ। 2। 7। 136।
सारग महला 5 ॥
ऐसी होइ परी ॥
जानते दइआर ॥1॥ रहाउ ॥
मातर पितर तिआगि कै मनु संतन पाहि बेचाइओ ॥
जाति जनम कुल खोईऐ हउ गावउ हरि हरी ॥1॥
लोक कुटंब ते टूटीऐ प्रभ किरति किरति करी ॥
गुरि मो कउ उपदेसिआ नानक सेवि एक हरी ॥2॥8॥137॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे भाई ! (मेरे मन की हालत) ऐसी हो गई है (और। इस हालत को) दयालु प्रभू (स्वयं) जानता है। 1। रहाउ। हे भाई ! (गुरू के उपदेश की बरकति से) माता-पिता (आदि संबन्धियों का मोह) छोड़ के मैंने अपना मन संत जनों के हवाले कर दिया है। मैंने (ऊँची) जाति कुल जनम (का गुमान) छोड़ दिया है। और मैं (हर वक्त) परमात्मा की सिफत-सालाह ही करता हूँ (अपने कुल आदि को सराहने की जगह)। 1। हे नानक ! (कह- हे भाई ! गुरू के उपदेश की बरकति से मेरी प्रीति) लोगों से कुटुंब से टूट गई है। प्रभू ने मुझे निहाल-निहाल कर दिया है। गुरू ने मुझे शिक्षा दी है कि सदा एक परमात्मा की शरण पड़ा रह। 2। 8। 137।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।

अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।

इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! जो मनुष्य संत-जनों के चरण लगते हैं।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।