ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
हरि भजि आन करम बिकार ॥
मान मोहु न बुझत त्रिसना काल ग्रस संसार ॥1॥ रहाउ ॥
खात पीवत हसत सोवत अउध बिती असार ॥
नरक उदरि भ्रमंत जलतो जमहि कीनी सार ॥1॥
पर द्रोह करत बिकार निंदा पाप रत कर झार ॥
बिना सतिगुर बूझ नाही तम मोह महां अंधार ॥2॥
बिखु ठगउरी खाइ मूठो चिति न सिरजनहार ॥
गोबिंद गुपत होइ रहिओ निआरो मातंग मति अहंकार ॥3॥
करि क्रिपा प्रभ संत राखे चरन कमल अधार ॥
कर जोरि नानकु सरनि आइओ गोुपाल पुरख अपार ॥4॥1॥129॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सुभ बचन बोलि गुन अमोल ॥
किंकरी बिकार ॥
देखु री बीचार ॥
गुर सबदु धिआइ महलु पाइ ॥
हरि संगि रंग करती महा केल ॥1॥ रहाउ ॥
सुपन री संसारु ॥
मिथनी बिसथारु ॥
सखी काइ मोहि मोहिली प्रिअ प्रीति रिदै मेल ॥1॥
सरब री प्रीति पिआरु ॥
प्रभु सदा री दइआरु ॥
कांएं आन आन रुचीऐ ॥
हरि संगि संगि खचीऐ ॥
जउ साधसंग पाए ॥
कहु नानक हरि धिआए ॥
अब रहे जमहि मेल ॥2॥1॥130॥
कंचना बहु दत करा ॥
भूमि दानु अरपि धरा ॥
मन अनिक सोच पवित्र करत ॥
नाही रे नाम तुलि मन चरन कमल लागे ॥1॥ रहाउ ॥
चारि बेद जिहव भने ॥
दस असट खसट स्रवन सुने ॥
नही तुलि गोबिद नाम धुने ॥
मन चरन कमल लागे ॥1॥
बरत संधि सोच चार ॥
क्रिआ कुंटि निराहार ॥
अपरस करत पाकसार ॥
निवली करम बहु बिसथार ॥
धूप दीप करते हरि नाम तुलि न लागे ॥
राम दइआर सुनि दीन बेनती ॥
देहु दरसु नैन पेखउ जन नानक नाम मिसट लागे ॥2॥2॥131॥
राम राम राम जापि रमत राम सहाई ॥1॥ रहाउ ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।
गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “सारंग महला 5 चउपदे घरु 5 सतिगुर प्रसादि ॥ हे भाई ! परमात्मा के नाम का भजन किया कर।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।