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अंग 1229

अंग
1229
राग सारंग
राग: सारंग · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सारंग महला 5 चउपदे घरु 5
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
हरि भजि आन करम बिकार ॥
मान मोहु न बुझत त्रिसना काल ग्रस संसार ॥1॥ रहाउ ॥
खात पीवत हसत सोवत अउध बिती असार ॥
नरक उदरि भ्रमंत जलतो जमहि कीनी सार ॥1॥
पर द्रोह करत बिकार निंदा पाप रत कर झार ॥
बिना सतिगुर बूझ नाही तम मोह महां अंधार ॥2॥
बिखु ठगउरी खाइ मूठो चिति न सिरजनहार ॥
गोबिंद गुपत होइ रहिओ निआरो मातंग मति अहंकार ॥3॥
करि क्रिपा प्रभ संत राखे चरन कमल अधार ॥
कर जोरि नानकु सरनि आइओ गोुपाल पुरख अपार ॥4॥1॥129॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: सारंग महला 5 चउपदे घरु 5 सतिगुर प्रसादि ॥ हे भाई ! परमात्मा के नाम का भजन किया कर। (भजन के बिना) अन्य काम (जिंद के लिए) व्यर्थ हैं। (अन्य कर्मों से) अहंकार और मोह (पैदा होता है)। तृष्णा नहीं मिटती। दुनिया आत्मिक मौत में फसी रहती है। 1। रहाउ। हे भाई ! खाते पीते हसते हुए सोए हुए (इस तरह मनुष्य की) उम्र बेसमझी में बीतती जाती है। नर्क समान हरेक जून में (जीव) भटकता है दुखी होता है। जमों के वश पड़ा रहता है। 1। हे भाई ! (भजन से टूट के) मनुष्य दूसरों से ठॅगी करता है। निंदा आदि कुकर्म करता है। बेपरवाह हो के पापों में मस्त रहता है। गुरू की शरण के बिना (मनुष्य को) आत्मिक जीवन की समझ नहीं पड़ती। मोह के घोर अंधकार में पड़ा रहता है। 2। हे भाई ! आत्मक मौत लाने वाली माया-ठॅग-बूटी खा के मनुष्य (का आत्मिक सरमाया) लूटा जाता है। इसके मन में परमात्मा की याद नहीं होती। अहंकार की मति के कारण हाथी की तरह (फूला रहता है। इसके अंदर ही) परमात्मा छुपा बैठा है। पर उससे अलग ही रहता है। 3। हे भाई ! प्रभू जी ने मेहर करके अपने संतों को अपने सुंदर चरणों के आसरे (इस ‘बिखु ठगउरी’ से) बचाए रखा है। हे गोपाल ! हे अकाल पुरख ! हे बेअंत ! छोनों हाथ जोड़ कर नानक (आपकी) शरण आया है (इसकी भी रक्षा कर)। 4। 1। 129।
सारग महला 5 घरु 6 पड़ताल
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सुभ बचन बोलि गुन अमोल ॥
किंकरी बिकार ॥
देखु री बीचार ॥
गुर सबदु धिआइ महलु पाइ ॥
हरि संगि रंग करती महा केल ॥1॥ रहाउ ॥
सुपन री संसारु ॥
मिथनी बिसथारु ॥
सखी काइ मोहि मोहिली प्रिअ प्रीति रिदै मेल ॥1॥
सरब री प्रीति पिआरु ॥
प्रभु सदा री दइआरु ॥
कांएं आन आन रुचीऐ ॥
हरि संगि संगि खचीऐ ॥
जउ साधसंग पाए ॥
कहु नानक हरि धिआए ॥
अब रहे जमहि मेल ॥2॥1॥130॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 घरु 6 पड़ताल सतिगुर प्रसादि ॥ परमात्मा के अमूल्य गुण (सभी वचनों से) शुभ वचन हैं- इनका उच्चारण किया कर। हे विकारों की दासी (हो चुकी जीव-स्त्री) ! होश कर (बिचार के देख)। (हे जीव-स्त्री !) गुरू का शबद अपने मन में टिकाए रख (और। शबद की बरकति से) प्रभू-चरणों में ठिकाना प्राप्त कर। (जो जीव-स्त्री प्रभू-चरणों में टिकती है। वह) परमात्मा में जुड़ के बड़े आत्मिक आनंद भोगती है। 1। रहाउ। हे सखी ! यह जगत सपने जैसा है। (इसका सारा) पसारा नाशवंत है। आप इस के मोह में क्यों फसी हुई है। प्रीतम प्रभू की प्रीति अपने हृदय में बसाए रख। 1। वह सब जीवों से प्रीत करता है प्यार करता है। हे सखी ! प्रभू सदा ही दया का घर है। हे सखी ! (उसको भुला के) और-और पदार्थों में प्यार नहीं डालना चाहिए। सदा परमात्मा के प्यार में ही मस्त रहना चाहिए। हे नानक ! कह- जब (कोई भाग्यशाली मनुष्य) साध-संगति का मिलाप करता है और परमात्मा का ध्यान धरता है। तब जमों से उसका सामना नहीं पड़ता। 2। 1। 130।
सारग महला 5 ॥
कंचना बहु दत करा ॥
भूमि दानु अरपि धरा ॥
मन अनिक सोच पवित्र करत ॥
नाही रे नाम तुलि मन चरन कमल लागे ॥1॥ रहाउ ॥
चारि बेद जिहव भने ॥
दस असट खसट स्रवन सुने ॥
नही तुलि गोबिद नाम धुने ॥
मन चरन कमल लागे ॥1॥
बरत संधि सोच चार ॥
क्रिआ कुंटि निराहार ॥
अपरस करत पाकसार ॥
निवली करम बहु बिसथार ॥
धूप दीप करते हरि नाम तुलि न लागे ॥
राम दइआर सुनि दीन बेनती ॥
देहु दरसु नैन पेखउ जन नानक नाम मिसट लागे ॥2॥2॥131॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे मन ! अगर कोई मनुष्य बहुत सोना दान करता है। जमीन अरप के दान करता है। कई तरह के स्वच्छता भरी क्रियाओं से (शरीर को) पवित्र करता है। (यह उद्यम) परमात्मा के नाम के बराबर नहीं हैं। हे मन ! परमात्मा के सुंदर चरणों में जुडा रह। 1। रहाउ। हे मन ! अगर कोई मनुष्य चारों वेद अपनी जीभ से उचारता रहता है। अठारह पुराण और छह शास्त्र कानों से सुनता रहता है (यह काम) परमात्मा की लगन के बराबर नहीं हैं। हे मन ! प्रभू के सुंदर चरणों में प्रीत बनाए रख। 1। हे मन ! व्रत। संध्या। शारीरिक पवित्रता। (तीर्थ-यात्रा आदि के लिए) चार कुंटों में भूखे रहके भटकते फिरना। बिना किसी से छूए अपनी रसोई तैयार करनी। (आँतों को घुमाने का अभ्यास)। निवली कर्म करना। और ऐसे पसारे पसारने। (देव-पूजा के लिए) धूपें-धुखानीं दीए जगाने- ये सारे ही उद्यम परमात्मा के नाम की बराबरी नहीं करते। हे दास नानक ! (कह-) हे दया के श्रोत प्रभू ! मेरी गरीब की विनती सुन। अपने दर्शन दे। मैं आपको अपनी आँखों से (सदा) देखता रहूँ। आपका नाम मुझे मीठा लगता रहे। 2। 2। 131।
सारग महला 5 ॥
राम राम राम जापि रमत राम सहाई ॥1॥ रहाउ ॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे भाई ! सदा सदा परमात्मा (के नाम का जाप) जपा कर। (नाम) जपते हुए (वह) परमात्मा (हर जगह) सहायता करने वाला है। 1।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।

गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “सारंग महला 5 चउपदे घरु 5 सतिगुर प्रसादि ॥ हे भाई ! परमात्मा के नाम का भजन किया कर।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।