लुल्ला परिवारLULLA FAMILY, शुरुआतEnglish
सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 1229 · सारंग

इस पृष्ठ पर
अंग
1229
सारंग
अंग बदलें या अंश चुनें · 4 अंश

1 से 1430 तक कोई अंक लिखिए।

  1. हरि भजि आन करम बिकार ॥
  2. सुभ बचन बोलि गुन अमोल ॥
  3. कंचना बहु दत करा ॥
  4. राम राम राम जापि रमत राम सहाई ॥1॥ रहाउ ॥

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग सारंग

हरि भजि आन करम बिकार ॥

सारंग महला 5 चउपदे घरु 5
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
हरि भजि आन करम बिकार ॥
मान मोहु न बुझत त्रिसना काल ग्रस संसार ॥1॥ रहाउ ॥
खात पीवत हसत सोवत अउध बिती असार ॥
नरक उदरि भ्रमंत जलतो जमहि कीनी सार ॥1॥
पर द्रोह करत बिकार निंदा पाप रत कर झार ॥
बिना सतिगुर बूझ नाही तम मोह महां अंधार ॥2॥
बिखु ठगउरी खाइ मूठो चिति न सिरजनहार ॥
गोबिंद गुपत होइ रहिओ निआरो मातंग मति अहंकार ॥3॥
करि क्रिपा प्रभ संत राखे चरन कमल अधार ॥
कर जोरि नानकु सरनि आइओ गोुपाल पुरख अपार ॥4॥1॥129॥

हिन्दी अर्थ: सारंग महला 5 चउपदे घरु 5 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे भाई! परमात्मा के नाम का भजन किया करें। (भजन के बिना) अन्य काम (जिंद के लिए) व्यर्थ हैं। (अन्य कर्मों से) अहंकार और मोह (पैदा होता है)। तृष्णा नहीं मिटती। दुनिया आत्मिक मौत में फसी रहती है। 1। रहाउ। हे भाई! खाते पीते हसते हुए सोए हुए (इस तरह मनुष्य की) उम्र बेसमझी में बीतती जाती है। नर्क समान हरेक जून में (जीव) भटकता है दुखी होता है। जमों के वश पड़ा रहता है। 1। हे भाई! (भजन से टूट के) मनुष्य दूसरों से ठॅगी करता है। निंदा आदि कुकर्म करता है। बेपरवाह हो के पापों में मस्त रहता है। गुरू की शरण के बिना (मनुष्य को) आत्मिक जीवन की समझ नहीं पड़ती। मोह के घोर अंधकार में पड़ा रहता है। 2। हे भाई! आत्मक मौत लाने वाली माया-ठॅग-बूटी खा के मनुष्य (का आत्मिक सरमाया) लूटा जाता है। इसके मन में परमात्मा की याद नहीं होती। अहंकार की मति के कारण हाथी की तरह (फूला रहता है। इसके अंदर ही) परमात्मा छुपा बैठा है। पर उससे अलग ही रहता है। 3। हे भाई! प्रभू जी ने मेहर करके अपने संतों को अपने सुंदर चरणों के आसरे (इस 'बिखु ठगउरी' से) बचाए रखा है। हे गोपाल! हे अकाल पुरख! हे बेअंत! छोनों हाथ जोड़ कर नानक (आपकी) शरण आया है (इसकी भी रक्षा करें)। 4। 1। 129।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग सारंग

सुभ बचन बोलि गुन अमोल ॥

सारग महला 5 घरु 6 पड़ताल
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सुभ बचन बोलि गुन अमोल ॥
किंकरी बिकार ॥
देखु री बीचार ॥
गुर सबदु धिआइ महलु पाइ ॥
हरि संगि रंग करती महा केल ॥1॥ रहाउ ॥
सुपन री संसारु ॥
मिथनी बिसथारु ॥
सखी काइ मोहि मोहिली प्रिअ प्रीति रिदै मेल ॥1॥
सरब री प्रीति पिआरु ॥
प्रभु सदा री दइआरु ॥
कांएं आन आन रुचीऐ ॥
हरि संगि संगि खचीऐ ॥
जउ साधसंग पाए ॥
कहु नानक हरि धिआए ॥
अब रहे जमहि मेल ॥2॥1॥130॥

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 घरु 6 पड़ताल ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। परमात्मा के अमूल्य गुण (सभी वचनों से) शुभ वचन हैं, इनका उच्चारण किया करें। हे विकारों की दासी (हो चुकी जीव-स्त्री)! होश करें (बिचार के देखें)। (हे जीव-स्त्री!) गुरू का शबद अपने मन में टिकाए रखें (और, शबद की बरकति से) प्रभू-चरणों में ठिकाना प्राप्त करें। (जो जीव-स्त्री प्रभू-चरणों में टिकती है। वह) परमात्मा में जुड़ के बड़े आत्मिक आनंद भोगती है। 1। रहाउ। हे सखी! यह जगत सपने जैसा है। (इसका सारा) पसारा नाशवंत है। आप इस के मोह में क्यों फसी हुई हैं। प्रीतम प्रभू की प्रीति अपने हृदय में बसाए रखें। 1। वह सब जीवों से प्रीत करता है प्यार करता है। हे सखी! प्रभू सदा ही दया का घर है। हे सखी! (उसको भुला के) और-और पदार्थों में प्यार नहीं डालना चाहिए। सदा परमात्मा के प्यार में ही मस्त रहना चाहिए। हे नानक! कहें: जब (कोई भाग्यशाली मनुष्य) साध-संगति का मिलाप करता है और परमात्मा का ध्यान धरता है, तब जमों से उसका सामना नहीं पड़ता। 2। 1। 130।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग सारंग

कंचना बहु दत करा ॥

सारग महला 5 ॥
कंचना बहु दत करा ॥
भूमि दानु अरपि धरा ॥
मन अनिक सोच पवित्र करत ॥
नाही रे नाम तुलि मन चरन कमल लागे ॥1॥ रहाउ ॥
चारि बेद जिहव भने ॥
दस असट खसट स्रवन सुने ॥
नही तुलि गोबिद नाम धुने ॥
मन चरन कमल लागे ॥1॥
बरत संधि सोच चार ॥
क्रिआ कुंटि निराहार ॥
अपरस करत पाकसार ॥
निवली करम बहु बिसथार ॥
धूप दीप करते हरि नाम तुलि न लागे ॥
राम दइआर सुनि दीन बेनती ॥
देहु दरसु नैन पेखउ जन नानक नाम मिसट लागे ॥2॥2॥131॥

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे मन! अगर कोई मनुष्य बहुत सोना दान करता है। जमीन अरप के दान करता है। कई तरह के स्वच्छता भरी क्रियाओं से (शरीर को) पवित्र करता है। (यह उद्यम) परमात्मा के नाम के बराबर नहीं हैं। हे मन! परमात्मा के सुंदर चरणों में जुडे रहें। 1। रहाउ। हे मन! अगर कोई मनुष्य चारों वेद अपनी जीभ से उचारता रहता है। अठारह पुराण और छह शास्त्र कानों से सुनता रहता है (यह काम) परमात्मा की लगन के बराबर नहीं हैं। हे मन! प्रभू के सुंदर चरणों में प्रीत बनाए रखें। 1। हे मन! व्रत, संध्या, शारीरिक पवित्रता। (तीर्थ-यात्रा आदि के लिए) चार कुंटों में भूखे रहके भटकते फिरना। बिना किसी से छूए अपनी रसोई तैयार करनी। (आँतों को घुमाने का अभ्यास)। निवली कर्म करना। और ऐसे पसारे पसारने। (देव-पूजा के लिए) धूपें-धुखानीं दीए जगाने, ये सारे ही उद्यम परमात्मा के नाम की बराबरी नहीं करते। हे दास नानक! (कहें:) हे दया के श्रोत प्रभू! मेरी गरीब की विनती सुनें। अपने दर्शन दें। मैं आपको अपनी आँखों से (सदा) देखता रहूँ। आपका नाम मुझे मीठा लगता रहे। 2। 2। 131।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग सारंग

राम राम राम जापि रमत राम सहाई ॥1॥ रहाउ ॥

अगले अंग पर आगे पढ़िए →

सारग महला 5 ॥
राम राम राम जापि रमत राम सहाई ॥1॥ रहाउ ॥

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे भाई! सदा सदा परमात्मा (के नाम का जाप) जपा करें। (नाम) जपते हुए (वह) परमात्मा (हर जगह) सहायता करने वाला है। 1।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1229 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।