अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।
हिन्दी अर्थ: मैं उन मनुष्यों से सदा कुर्बान जाता हूँ, जो परमात्मा का नाम सुन के उसे अपने मन में बसाए रखते हैं। वह परमात्मा सदा कायम रहने वाला है। (वह जीवों वाली ‘मैं मेरी’ से) बहुत ऊँचा है। भाग्यशाली जीव अहंकार को मार के (ही) उसमें लीन होते हैं। 1। रहाउ। परमात्मा सदा कायम रहने वाला है। उसका बड़प्पन सदा कायम रहने वाला है। गुरू की कृपा से किसी (विरले भाग्यशाली) को (प्रभू अपने चरणों में) मिलाता है। जो मनुष्य गुरू के शबद के द्वारा (परमात्मा में) मिलते हैं, वह (उससे) बिछुड़ते नहीं। वे आत्मिक अडोलता में व सदा स्थिर प्रभू में लीन रहते हैं। 2। (हे भाई !) आपसे (अर्थात, आपके हुकम से) बाहर कुछ नहीं हैं सकता। आप (जगत) पैदा करके (उसकी) संभाल (भी) करता है। आप (हरेक के दिल की) जानता भी है। (हे भाई !) करतार स्वयं ही (सब जीवों में व्यापक हो के सब कुछ) करता है (और जीवों से) करवाता है। गुरू की मति के द्वारा स्वयं ही जीवों को अपने में मिलाता है। 3। जो जीव स्त्री परमात्मा के गुण अपने अंदर बसाती है वह परमात्मा को मिल पड़ती है। परमात्मा के डर अदब में रह के, परमात्मा के प्रेम में जुड़ के वह (परमात्मा के गुणों को अपने जीवन का) श्रृंगार बनाती है। वह गुरू का आसरा परना बन के सदा के लिए पति प्रभू वाली बन जाती है। वह प्रभू मिलाप वाले गुर-उपदेश में लीन रहती है। 4। जो मनुष्य गुरू के शबदको भुला देते हैं उन्हें (परमात्मा की हजूरी में) कोई जगह ठिकाना नहीं मिलता। वह (माया मोह की) भटकन में पड़ कर कुमार्ग पर पड़े रहते हैं। जैसे कोई कौए को किसी उजड़े घर में (खाने के लिए कुछ भी नहीं मिल सकता, वैसे ही गुरू शबद को भुलाने वाले लोग आत्मिक जीवन के पक्ष से खाली हाथ ही रहते हैं)। ऐसे मनुष्य इस लोक व परलोक दोनों को बर्बाद कर लेते हैं, उनकी उम्र सदा दुख में ही व्यतीत होती है। 5। (माया के आँगन में माया के लेखे) लिखते लिखते (अनेकों) कागज व (बेअंत) स्याही खत्म कर लेते हैं। पर माया के मोह में फंसे रह के किसी को कभी आत्मिक आनंद नहीं मिला। वे माया का ही लेखा लिखते रहते हैं, और माया ही एकत्र करते रहते हैं। वे सदा खिझते ही रहते हैं क्योंकि वे नाशवंत माया में ही अपना मन जोड़े रखते हैं। 6। गुरू की शरण में रहने वाले मनुष्य सदा स्थिर प्रभू का नाम लिखते है। परमात्मा के गुणों के विचार लिखते हैं। वे मनुष्य सदा स्थिर प्रभू का रूप हो जाते हैं, वे माया के मोह से विरक्त रहने का राह ढूँढ लेते हैं। उन मनुष्यों के कागज सफल हैं, उनकी कलम सफल हैं, दवात भी सफल है, जो सदा स्थिर प्रभू का नाम लिख लिख के सदा स्थिर प्रभू में ही लीन रहते हैं। 7। (हे भाई !) मेरा परमात्मा (सब जीवों के) अंदर बैठा (हरेक की) संभाल करता है। जो मनुष्य गुरू की कृपा से उस परमात्मा के चरणों में जुड़ता है, वही मनुष्य परमात्मा की नजरों में परवान होता है। हे नानक ! परमात्मा का नाम पूरे गुरू के पास से ही मिलता है। जिसे ये नाम मिल जाता है, वह (परमात्मा की हजूरी में) आदर प्राप्त करता है। 8। 22। 23।
माझ महला 3 ॥ आतम राम परगासु गुर ते होवै ॥ हउमै मैलु लागी गुर सबदी खोवै ॥ मनु निरमलु अनदिनु भगती राता भगति करे हरि पावणिआ ॥1॥ हउ वारी जीउ वारी आपि भगति करनि अवरा भगति करावणिआ ॥ तिना भगत जना कउ सद नमसकारु कीजै जो अनदिनु हरि गुण गावणिआ ॥1॥ रहाउ ॥ आपे करता कारणु कराए ॥ जितु भावै तितु कारै लाए ॥ पूरै भागि गुर सेवा होवै गुर सेवा ते सुखु पावणिआ ॥2॥ मरि मरि जीवै ता किछु पाए ॥ गुर परसादी हरि मंनि वसाए ॥ सदा मुकतु हरि मंनि वसाए सहजे सहजि समावणिआ ॥3॥ बहु करम कमावै मुकति न पाए ॥ देसंतरु भवै दूजै भाइ खुआए ॥ बिरथा जनमु गवाइआ कपटी बिनु सबदै दुखु पावणिआ ॥4॥ धावतु राखै ठाकि रहाए ॥ गुर परसादी परम पदु पाए ॥ सतिगुरु आपे मेलि मिलाए मिलि प्रीतम सुखु पावणिआ ॥5॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।
हिन्दी अर्थ: माझ महला 3 ॥ गुरू से ही मनुष्य को ये प्रकाश हो सकता है कि परमात्मा की ज्योति सब में व्यापक है। गुरू के शबद द्वारा ही मनुष्य (मन को) लगी हुई मैल धो सकता है। जिस मनुष्य का मन मल-रहित हो जाता है वह प्रभू की भक्ति में रंगा जाता है। भगती कर करके वह परमात्मा (का मिलाप) प्राप्त कर लेता है। 1। मैं उन मनुष्यों से सदके कुर्बान जाता हूँ, जों स्वयं परमात्मा की भगती करते हैं तथा औरों से भी भक्ति करवाते हैं। ऐसे भगतो के आगे सदा सिर झुकाना चाहिए जो हर रोज परमात्मा के गुण गाते हैं। 1। रहाउ। करतार स्वयं ही (जीवों से भक्ति करवाने का) सबब पैदा करता है (क्योंकि) वह जीवों को उस काम में लगाता है जिस में लगाना उसे अच्छा लगता है। खुश किस्मती से ही जीव से गुरू का आसरा लिया जा सकता है। गुरू का आसरा ले कर (भाग्यशाली) मनुष्य आत्मिक आनंद प्राप्त करता है। 2। जब मनुष्य बारंबार प्रयत्न करके अहंकार को मारता है, तो आत्मिक जीवन हासिल करता है। तब वह परमात्मा की भक्ति का कुछ आनंद लेता है। (तब) गुरू की कृपा से वह परमात्मा को अपने मन में बसाता है। जो मनुष्य परमात्मा को अपने मन में बसाए रखता है, वह सदैव (अहम् आदि विकारों से) आजाद रहता है। वह सदा आत्किम अडोलता में लीन रहता है। 3। (भक्ति के बिना) अगर मनुष्य अनेकों और (निहित धार्मिक) कर्म करता है (तो भी विकारों से) मुक्ति प्राप्त नहीं कर सकता। अगर देश-देशांतरों का रटन करता फिरे तो भी माया के मोह में रह के कुमार्ग पर पड़ा रहता है। (असल में वह मनुष्य छल ही करता है और) छली मनुष्य अपना मानस जीवन व्यर्थ गवाता है। गुरू के शबद (का आसरा लिए) बिना वह दुख ही पाता रहता है। 4। जो मनुष्य (विकारों की तरफ) दौड़ते मन की रक्षा करता है (इसे विकारों से) रोक के रखता है। वह गुरू की कृपा से सबसे ऊँचा दर्जा हासिल कर लेता है। गुरू स्वयं ही उसे परमात्मा के चरणों में मिला देता है। प्रीतम प्रभू को मिल के वह आत्मिक आनंद भोगता है। 5।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर वर्ष की आयु में गुरु-गद्दी सँभाली, 1552 में, और 1574 तक रहे। उनकी वाणी में बुढ़ापे, समाज की संरचना, और संगति की चिन्ताएँ बार-बार लौटती हैं। उन्होंने ही लंगर (साझा-भोजन) की व्यवस्था मज़बूत की, और देश-भर में बाईस मंजी (केन्द्र) स्थापित किए।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “मैं उन मनुष्यों से सदा कुर्बान जाता हूँ, जो परमात्मा का नाम सुन के उसे अपने मन में बसाए रखते हैं।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।