माइआ मोहु इसु मनहि नचाए अंतरि कपटु दुखु पावणिआ ॥4॥ गुरमुखि भगति जा आपि कराए ॥ तनु मनु राता सहजि सुभाए ॥ बाणी वजै सबदि वजाए गुरमुखि भगति थाइ पावणिआ ॥5॥ बहु ताल पूरे वाजे वजाए ॥ ना को सुणे न मंनि वसाए ॥ माइआ कारणि पिड़ बंधि नाचै दूजै भाइ दुखु पावणिआ ॥6॥ जिसु अंतरि प्रीति लगै सो मुकता ॥ इंद्री वसि सच संजमि जुगता ॥ गुर कै सबदि सदा हरि धिआए एहा भगति हरि भावणिआ ॥7॥ गुरमुखि भगति जुग चारे होई ॥ होरतु भगति न पाए कोई ॥ नानक नामु गुर भगती पाईऐ गुर चरणी चितु लावणिआ ॥8॥20॥21॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।
हिन्दी अर्थ: उसके मन को माया का मोह ही नचा रहा है, उसके अंदर छल है। (सिर्फ बाहर ही रास आदि के वक्त प्रेम बताता है) और वह दुख पाता है। 4। जब परमात्मा खुद किसी मनुष्य को गुरू की शरण में डाल के उससे अपनी भगती करवाता है, तो उसका मन उसका तन (अर्थात, हरेक ज्ञानेंद्रिय) आत्मिक अडोलता में प्रभू चरणों के प्रेम में रंगा जाता है। उसके अंदर सिफत सलाह की बाणी अपना प्रभाव डाले रखती है। वह गुरू के शबद में जुड़ के (अपने अंदर से सिफत सालाह का, मानो) बाजा बजाता है। गुरू का आसरा ले के की हुई भक्ति परमात्मा परवान करता है। 5। पर जो भी मनुष्य निरे साज बजाता है और साजों के साथ मिल के नाच करता है। वह (इस तरह) परमात्मा का नाम ना ही सुनता है और ना ही अपने मन में बसाता है। वह तो माया कामनी की खातिर मैदान बांध के नाचता है। माया के मोह में टिका रह के वह दुख ही सहता है (इस नाच से वह आत्मिक आनंद नहीं पा सकता)। 6। जिस मनुष्य के हृदय में प्रभू चरणों की प्रीति पैदा होती है, वह माया के मोह से स्वतंत्र हो जाता है। वह अपनी इन्द्रियों को अपने वश में कर लेता है। वह मनुष्य सदा स्थिर प्रभू का नाम सिमरन के संजम में टिका रहता है। गुरू के शबद में जुड़ के वह सदा परमात्मा का नाम सिमरता है, और यही है भगती, जो परमात्मा को पसंद आती है। 7। परमात्मा की भक्ति गुरू के सन्मुख रहके ही हो सकती है,ये नियम सदा के लिए अटॅल है। (इसके बगैर) किसी भी और तरीके से कोई मनुष्य प्रभू की भक्ति प्राप्त नहीं कर सकता। हे नानक ! परमात्मा के नाम सिमरन की दाति गुरू में श्रद्धा रखने से ही मिल सकती है। वही मनुष्य नाम सिमर सकता है, जो गुरू के चरणों में अपना चित्त जोड़ता है। 8। 20। 21।
माझ महला 3 ॥ सचा सेवी सचु सालाही ॥ सचै नाइ दुखु कब ही नाही ॥ सुखदाता सेवनि सुखु पाइनि गुरमति मंनि वसावणिआ ॥1॥ हउ वारी जीउ वारी सुख सहजि समाधि लगावणिआ ॥ जो हरि सेवहि से सदा सोहहि सोभा सुरति सुहावणिआ ॥1॥ रहाउ ॥ सभु को तेरा भगतु कहाए ॥ सेई भगत तेरै मनि भाए ॥ सचु बाणी तुधै सालाहनि रंगि राते भगति करावणिआ ॥2॥ सभु को सचे हरि जीउ तेरा ॥ गुरमुखि मिलै ता चूकै फेरा ॥ जा तुधु भावै ता नाइ रचावहि तूं आपे नाउ जपावणिआ ॥3॥ गुरमती हरि मंनि वसाइआ ॥ हरखु सोगु सभु मोहु गवाइआ ॥ इकसु सिउ लिव लागी सद ही हरि नामु मंनि वसावणिआ ॥4॥ भगत रंगि राते सदा तेरै चाए ॥ नउ निधि नामु वसिआ मनि आए ॥ पूरै भागि सतिगुरु पाइआ सबदे मेलि मिलावणिआ ॥5॥ तूं दइआलु सदा सुखदाता ॥ तूं आपे मेलिहि गुरमुखि जाता ॥ तूं आपे देवहि नामु वडाई नामि रते सुखु पावणिआ ॥6॥ सदा सदा साचे तुधु सालाही ॥ गुरमुखि जाता दूजा को नाही ॥ एकसु सिउ मनु रहिआ समाए मनि मंनिऐ मनहि मिलावणिआ ॥7॥ गुरमुखि होवै सो सालाहे ॥ साचे ठाकुर वेपरवाहे ॥ नानक नामु वसै मन अंतरि गुर सबदी हरि मेलावणिआ ॥8॥21॥22॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।
हिन्दी अर्थ: माझ महला 3 ॥ (हे भाई !) मैं सदा स्थिर प्रभू का सिमरन करता हूँ। मैं सदा स्थिर प्रभू की ही सिफत सालाह करता हूँ। सदा स्थिर प्रभू के नाम में जुड़ने से कभी कोई दुख छू नहीं सकता। जो मनुष्य सब सुख देने वाले परमात्मा को सिमरते हैं, और गुरू की मति ले के उस प्रभू को अपने मन में बसाऐ रखते हैं, वे आत्मिक आनंद प्राप्त करते हैं। 1। (हे भाई !) मैं उन लोगों से सदके कुर्बान जाता हूं, जो आत्मिक अडोलता में टिक के आत्मिक आनंद की समाधि लगाए रखते हैं। जो मनुष्य परमात्मा को सिमरते हैं, वे सदैव सुंदर जीवन वाले बने रहते हैं। उन्हें (लोक परलोक में) शोभा मिलती है, उनकी सुरति सदा सुहावनी टिकी रहती है। 1। रहाउ। (हे प्रभू ! वैसे तो) हरेक मनुष्य आपका भक्त कहलाता है, पर (असल) भगत वही हैं जो आपके मन को अच्छे लगते हैं। (हे प्रभू !) वह गुरू की बाणी के द्वारा आपको सदा स्थिर रहने वाले को सलाहते हैं। वह आपके प्रेम रंग में रंगे हुए आपकी भक्ति करते रहते हैं। 2। हे सदा स्थिर रहने वाले प्रभू जी ! हरेक जीव आपका (ही पैदा किया हुआ) है। (पर जब किसी को) गुरू की शरण पड़ के आपका नाम मिलता है, तब (उसके जनम मरण का) चक्कर समाप्त होता है। जब आपको अच्छा लगता है (जब आपकी रजा होती है), तब आप (जीवों को अपने) नाम में जोड़ता है। आप स्वयं ही (जीवों से अपना) नाम जपाता है। 3। जिस मनुष्य ने गुरू की मति ले के परमात्मा (का नाम अपने) मन में बसा लिया, उसने खुशी (की लालसा) ग़मी (से घबराहट) खत्म कर ली। उसने (माया का) सारा मोह दूर कर लिया। उस मनुष्य की लगन सदा ही सिर्फ परमात्मा (के चरणों) से लगी रहती है। वह सदा हरी के नाम को अपने मन में बसाए रखता है। 4। हे प्रभू ! आपके भक्त (बड़े) चाव से आपके नाम रंग में रंगे रहते हैं। उनके मन में आपका नाम आ बसता है (जो, मानो) नौ खजाने (हैं)। जिस मनुष्य ने पूरी किस्मत से गुरू को ढूँढ लिया, गुरू उसे (अपने) शबद के द्वारा परमात्मा के चरणों में मिला देता है। 5। हे प्रभू आप दया का (सोमा है) श्रोत है। आप सदा (सब जीवों को) सुख देने वाला है। आप स्वयं ही (जीवों को गुरू के साथ) मिलाता है। गुरू की शरण पड़ कर जीव आपके साथ गहरी सांझ डाल लेते हैं। हे प्रभू ! आप स्वयं ही जीवों को अपना नाम बख्शता है, (नाम जपने की) इज्जत देता है। जो मनुष्य आपके नाम (-रंग) में रंगे जाते हैं, वे आत्मिक आनंद लेते हैं। 6। हे सदा स्थिर रहने वाले प्रभू ! (मेहर कर) मैं सदा ही सदा ही आपकी सिफत सालाह करता रहूँ। जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है, वह आपके साथ सांझ डालता है। अन्य कोई (आपके साथ सांझ) नहीं (डाल सकता)। (जो मनुष्य गुरू का आसरा लेता है उसका) मन सदा एक परमात्मा के साथ ही जुड़ा रहता है। अगर (मनुष्य का) मन (परमात्मा की याद में) मगन हो जाए, तो मनुष्य मन में मिला रहता है (भाव, बाहर नहीं भटकता)। 7। जो मनुष्य गुरू का आसरा परना लेता है, वह सदा कायम रहने वाले बेपरवाह ठाकुर की सिफत सालाह करता है। हे नानक ! उस मनुष्य के मन में परमात्मा का नाम आ बसता है। गुरू के शबद की बरकति से वह मनुष्य परमात्मा (के चरणों) में लीन रहता है। 8। 21। 22।
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।
हिन्दी अर्थ: माझ महला 3 ॥ (हे प्रभू !) आपकी भक्ति करने वाले बंदेआपके सदा स्थिर रहने वाले दरबार में शोभा पाते हैं। (हे भाई !) भगत जन गुरू के शबद द्वारा परमात्मा के नाम में जुड़ के सुंदर जीवन वाले बन जाते हैं। वे सदा आत्मिक आनंद में टिके रहते हैं। वे दिन रात प्रभू के गुण उचार के गुणों के मालिक प्रभू में समाए रहते हैं।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।
अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “उसके मन को माया का मोह ही नचा रहा है, उसके अंदर छल है।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।