इकि कूड़ि लागे कूड़े फल पाए ॥ दूजै भाइ बिरथा जनमु गवाए ॥ आपि डुबे सगले कुल डोबे कूड़ु बोलि बिखु खावणिआ ॥6॥ इसु तन महि मनु को गुरमुखि देखै ॥ भाइ भगति जा हउमै सोखै ॥ सिध साधिक मोनिधारी रहे लिव लाइ तिन भी तन महि मनु न दिखावणिआ ॥7॥ आपि कराए करता सोई ॥ होरु कि करे कीतै किआ होई ॥ नानक जिसु नामु देवै सो लेवै नामो मंनि वसावणिआ ॥8॥23॥24॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।
हिन्दी अर्थ: कई जीव ऐसे हैं जो नाशवंत जगत के मोह में ही फंसे रहते हैं वे फल भी वही प्राप्त करते हैं जिनसे साथ टूट जाता है (और इस तरह सदा) माया के मोह में ही रह के वे अपना मानस जनम व्यर्थ गवा लेते हैं। वे स्वयं माया के मोह में गलतान रहते हैं, अपनी सारी कुलों को उस मोह में ही डुबोए रखते हैं, वह सदा माया के मोह की ही बातें करके उस जहर को अपनी आत्मिक खुराक बनाए रखते हैं (जो उनकी आत्मिक मौत का कारण बनता है)। 6। (आम तौर पे हरेक मनुष्य माया के पदार्थों के पीछे ही भटकता फिरता है) गुरू के सन्मुख रहने वाला कोई विरला मनुष्य अपने मन को अपने इस शरीर के अंदर ही टिका हुआ देखता है। (पर ये तब ही होता है) जब वह प्रभू के प्रेम में प्रभू की भक्ति में टिक के (अपने अंदर से) अहंकार को खत्म कर देता है। पहुँचे हुए योगी, योग साधना करने वाले योगी, मौनधारी साधू सुरति जोड़ने का यत्न करते हैं, पर वे भी अपने मन को शरीर के अंदर टिका हुआ नहीं देख सकते। 7। (पर, जीवों के भी क्या वश?मन को काबू करने का और भक्ति में जुड़ने का उद्यम) वह करतार स्वयं ही (जीवों से) करवाता है। (अपने आप) कोई जीव क्या कर सकता है? करतार के पैदा किए हुए इस जीव द्वारा किए गए अपने उद्यम से कुछ नहीं हो सकता। हे नानक ! जिस मनुष्य को परमात्मा अपने नाम की दात देता है, वही नाम सिमर सकता है। उस सदा प्रभू के नाम को ही अपने मन में बसाए रखता है। 8। 23। 24।
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।
हिन्दी अर्थ: माझ महला 3 ॥ (योगी पहाड़ों की गुफाओं में बैठ के आत्मिक शक्तियां प्राप्त करने के यत्न करते हैं, पर) इस शरीर गुफा में (आत्मिक गुणों के इतने) खजाने (भरे हुए हैं जो) खत्म होने वाले नहीं। (क्योंकि सारे गुणों का मालिक) अदृष्ट व बेअंत हरी इस शरीर में ही बसता है। जिन मनुष्यों ने गुरू के शबद में लीन हो के (अपने अंदर से) स्वै भाव दूर कर लिया उन्हें दिखाई देने लग पड़ता है कि परमात्मा स्वयं ही हर जगह मौजूद है। किसी को प्रत्यक्ष नजर आ जाता है और किसी को छुपा हुआ ही प्रतीत होता है। 1। (हे भाई !) मैं उनसे सदके जाता हूँ जो आत्मिक जीवन देने वालेहरी के नाम को अपने मन में बसाते हैं। आत्मिक जीवन दाता हरी नाम अत्यंत रसीला व मधुर है, मीठा है। गुरू की मति पर चल कर ही ये नाम अंमृत पिया जा सकता है। 1। रहाउ। जिस मनुष्य ने (अपने अंदर से) अहंकार को मार के (अहम् के) कठोर कपाट खोल लिए हैं, उसने गुरू की कृपा से वह नाम अंमृत (अंदर ही) ढूँढ लिया है जो किसी (दुनियावी पदार्थ के बदले) मोल में नहीं मिलता। गुरू के शबद (में जुड़े) बगैर कोई मनुष्य नाम अंमृत प्राप्त नहीं कर सकता। गुरू की कृपा से ही (हरी नाम) मन में बसाया जा सकता है। 2। जिस मनुष्य ने गुरू से ज्ञान का अंजन (सुर्मा) (अपनी आत्मिक) आँखों में डाला है, उस के अंदर (आत्मिक) प्रकाश हो गया है। उसने (अपने अंदर से) अज्ञान अंधेरा दूर कर लिया है। उसकी सुरति प्रभू की ज्योति में लीन रहती है। उसका मन (प्रभू की याद में) मगन हो जाता है। वह मनुष्य परमात्मा के दर पे शोभा हासिल करता है। 3। (पर यदि कोई मनुष्य अपने) शरीर के बाहर (अर्थात जंगलों में, पहाड़ों की गुफाओं में इस आत्मिक रोशनी को) तलाशने जाता है, उसे (ये आत्मिक प्रकाश देने वाला) हरी नाम तो नहीं मिलता, (उल्टा) वह (बेगार में फंसे किसी) बेगारी की तरह दुख ही पाता है। अपने मन के पीछे चलने वाले माया के मोह में अंधे हुए मनुष्य को समझ नहीं पड़ती। (जंगलों पहाड़ों में खुआर हो हो के, भटक के) आखिर वह आ के गुरू की शरण पड़ के ही नाम अंमृत प्राप्त करता है। 4। जब मनुष्य गुरू की कृपा से सदा स्थिर हरी का मिलाप प्राप्त करता है, तो वह अपने मन में (ही) अपने तन में (ही) उसका दर्शन कर लेता है, और उसके अंदर से अहंकार की मैल दूर हो जाती है। अपने शुद्ध हुए हृदय में ही बैठ के (भटकना रहित हो के) वह सदा परमात्मा के गुण गाता है, गुरू के शबद द्वारा सदा स्थिर प्रभू में समाया रहता है। 5। जिस मनुष्य ने अपने नौ दरवाजे (नौ गोलकें) (विकारों के प्रभाव की ओर से) बंद कर लिए हैं, जिस ने (विकारों की ओर) दौड़ता अपना मन काबू कर लिया है। उसने अपने चित्त आकाश के द्वारा (अपनी ऊँची हुई सुरति के द्वारा) अपने असल घर में (प्रभू चरणों में) निवास प्राप्त कर लिया है। उस अवस्था में पहुँचे मनुष्य के अंदर (हृदय में) सदा एक रस परमात्माकी सिफत सालाह के बोल अपना प्रभाव डाले रखते हैं। वह दिन रात अपने गुरू की मति पर चल के सिफत सालाह की बाणी को ही अपनी सुरति में टिकाए रखता है। 6। गुरू के शबद के बिना मनुष्य के हृदय में माया के मोह का अंधकार बना रहता है। जिसके कारण उसे अपने अंदरनाम पदार्थ नहीं मिलता और उसके जनम मरन का चक्कर बना रहता है। (मोह के बज्र किवाड़ खोलने की) कुँजी गुरू के हाथ में ही है। किसी और तरीके से वह दरवाजा नहीं खुलता। और, गुरू भी बहुत किस्मत से ही मिलता है। 7। हे प्रभू ! आप सब जगह मौजूद है। (किसी को) प्रत्यक्ष (दिखाई देता है और किसी के लिए) छुपा हुआ है। (आपके सर्व-व्यापक होने की) समझ गुरू की कृपा से (आपको) मिल के होती है। हे नानक ! आप (गुरू की शरण पड़ कर) सदा परमात्मा के नाम की सिफत सालाह करता रह। गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य प्रभू के नाम को अपने मन में बसा लेता है। 8। 24। 25।
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।
हिन्दी अर्थ: माझ महला 3 ॥ जो मनुष्य गुरू का आसरा परना लेता है, उसे परमात्मा मिल जाता है। परमात्मा स्वयं ही उसे गुरू मिलाता है। (ऐसे मनुष्य को) आत्मिक मौत अपनी नजर में नहीं रखती, उसे कोई दुख कलेश सता नहीं सकता। गुरू के आसरे रहने वाला मनुष्य (अपने अंदर से) अहंकार को दूर करके (माया के मोह के) सारे बंधन तोड़ लेता है। गुरू के शबद द्वारा उसका जीवन खूबसूरत बन जाता है। 1। मैं उस मनुष्य से सदा सदके जाता हूँ, जो परमात्मा के नाम में जुड़ के अपना जीवन सुंदर बना लेता है। गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य प्रभू के गुण गाता रहता है। उसका मन (नाम सिमरन के) हिलोरों में आया रहता है। गुरू का आसरा रखने वाला मनुष्य परमात्मा (के चरणों) के साथ अपना मन जोड़े रखता है। 1। रहाउ।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।
अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “कई जीव ऐसे हैं जो नाशवंत जगत के मोह में ही फंसे रहते हैं वे फल भी वही प्राप्त करते हैं जिनसे साथ टूट जाता है (और इस तरह सदा) माया के मोह में ही रह के वे अपना मानस जनम व्यर्थ गवा ले।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।