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अंग १२४ · माझ

अंग
124
माझ
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  1. इकि कूड़ि लागे कूड़े फल पाए ॥
  2. इसु गुफा महि अखुट भंडारा ॥
  3. गुरमुखि मिलै मिलाए आपे ॥

इकि कूड़ि लागे कूड़े फल पाए ॥

अंग १२३ से चला आ रहा अंश

इकि कूड़ि लागे कूड़े फल पाए ॥
दूजै भाइ बिरथा जनमु गवाए ॥
आपि डुबे सगले कुल डोबे कूड़ु बोलि बिखु खावणिआ ॥6॥
इसु तन महि मनु को गुरमुखि देखै ॥
भाइ भगति जा हउमै सोखै ॥
सिध साधिक मोनिधारी रहे लिव लाइ तिन भी तन महि मनु न दिखावणिआ ॥7॥
आपि कराए करता सोई ॥
होरु कि करे कीतै किआ होई ॥
नानक जिसु नामु देवै सो लेवै नामो मंनि वसावणिआ ॥8॥23॥24॥

हिन्दी अर्थ: कई जीव ऐसे हैं जो नाशवंत जगत के मोह में ही फंसे रहते हैं वे फल भी वही प्राप्त करते हैं जिनसे साथ टूट जाता है (और इस तरह सदा) माया के मोह में ही रह के वे अपना मानस जनम व्यर्थ गवा लेते हैं। वे स्वयं माया के मोह में गलतान रहते हैं, अपनी सारी कुलों को उस मोह में ही डुबोए रखते हैं, वह सदा माया के मोह की ही बातें करके उस जहर को अपनी आत्मिक खुराक बनाए रखते हैं (जो उनकी आत्मिक मौत का कारण बनता है)। 6। (आम तौर पे हरेक मनुष्य माया के पदार्थों के पीछे ही भटकता फिरता है) गुरू के सन्मुख रहने वाला कोई विरला मनुष्य अपने मन को अपने इस शरीर के अंदर ही टिका हुआ देखता है। (पर ये तब ही होता है) जब वह प्रभू के प्रेम में प्रभू की भक्ति में टिक के (अपने अंदर से) अहंकार को खत्म कर देता है। पहुँचे हुए योगी, योग साधना करने वाले योगी, मौनधारी साधू सुरति जोड़ने का यत्न करते हैं, पर वे भी अपने मन को शरीर के अंदर टिका हुआ नहीं देख सकते। 7। (पर, जीवों के भी क्या वश?मन को काबू करने का और भक्ति में जुड़ने का उद्यम) वह करतार स्वयं ही (जीवों से) करवाता है। (अपने आप) कोई जीव क्या कर सकता है? करतार के पैदा किए हुए इस जीव द्वारा किए गए अपने उद्यम से कुछ नहीं हो सकता। हे नानक ! जिस मनुष्य को परमात्मा अपने नाम की दात देता है, वही नाम सिमर सकता है। उस सदा प्रभू के नाम को ही अपने मन में बसाए रखता है। 8। 23। 24।

इसु गुफा महि अखुट भंडारा ॥

माझ महला 3 ॥
इसु गुफा महि अखुट भंडारा ॥
तिसु विचि वसै हरि अलख अपारा ॥
आपे गुपतु परगटु है आपे गुर सबदी आपु वंञावणिआ ॥1॥
हउ वारी जीउ वारी अंम्रित नामु मंनि वसावणिआ ॥
अंम्रित नामु महा रसु मीठा गुरमती अंम्रितु पीआवणिआ ॥1॥ रहाउ ॥
हउमै मारि बजर कपाट खुलाइआ ॥
नामु अमोलकु गुर परसादी पाइआ ॥
बिनु सबदै नामु न पाए कोई गुर किरपा मंनि वसावणिआ ॥2॥
गुर गिआन अंजनु सचु नेत्री पाइआ ॥
अंतरि चानणु अगिआनु अंधेरु गवाइआ ॥
जोती जोति मिली मनु मानिआ हरि दरि सोभा पावणिआ ॥3॥
सरीरहु भालणि को बाहरि जाए ॥ नामु न लहै बहुतु वेगारि दुखु पाए ॥
मनमुख अंधे सूझै नाही फिरि घिरि आइ गुरमुखि वथु पावणिआ ॥4॥
गुर परसादी सचा हरि पाए ॥
मनि तनि वेखै हउमै मैलु जाए ॥
बैसि सुथानि सद हरि गुण गावै सचै सबदि समावणिआ ॥5॥
नउ दर ठाके धावतु रहाए ॥
दसवै निज घरि वासा पाए ॥
ओथै अनहद सबद वजहि दिनु राती गुरमती सबदु सुणावणिआ ॥6॥
बिनु सबदै अंतरि आनेरा ॥
न वसतु लहै न चूकै फेरा ॥
सतिगुर हथि कुंजी होरतु दरु खुलै नाही गुरु पूरै भागि मिलावणिआ ॥7॥
गुपतु परगटु तूं सभनी थाई ॥
गुर परसादी मिलि सोझी पाई ॥
नानक नामु सलाहि सदा तूं गुरमुखि मंनि वसावणिआ ॥8॥24॥25॥

हिन्दी अर्थ: माझ महला 3 ॥ (योगी पहाड़ों की गुफाओं में बैठ के आत्मिक शक्तियां प्राप्त करने के यत्न करते हैं, पर) इस शरीर गुफा में (आत्मिक गुणों के इतने) खजाने (भरे हुए हैं जो) खत्म होने वाले नहीं। (क्योंकि सारे गुणों का मालिक) अदृष्ट व बेअंत हरी इस शरीर में ही बसता है। जिन मनुष्यों ने गुरू के शबद में लीन हो के (अपने अंदर से) स्वै भाव दूर कर लिया उन्हें दिखाई देने लग पड़ता है कि परमात्मा स्वयं ही हर जगह मौजूद है। किसी को प्रत्यक्ष नजर आ जाता है और किसी को छुपा हुआ ही प्रतीत होता है। 1। (हे भाई !) मैं उनसे सदके जाता हूँ जो आत्मिक जीवन देने वालेहरी के नाम को अपने मन में बसाते हैं। आत्मिक जीवन दाता हरी नाम अत्यंत रसीला व मधुर है, मीठा है। गुरू की मति पर चल कर ही ये नाम अंमृत पिया जा सकता है। 1। रहाउ। जिस मनुष्य ने (अपने अंदर से) अहंकार को मार के (अहम् के) कठोर कपाट खोल लिए हैं, उसने गुरू की कृपा से वह नाम अंमृत (अंदर ही) ढूँढ लिया है जो किसी (दुनियावी पदार्थ के बदले) मोल में नहीं मिलता। गुरू के शबद (में जुड़े) बगैर कोई मनुष्य नाम अंमृत प्राप्त नहीं कर सकता। गुरू की कृपा से ही (हरी नाम) मन में बसाया जा सकता है। 2। जिस मनुष्य ने गुरू से ज्ञान का अंजन (सुर्मा) (अपनी आत्मिक) आँखों में डाला है, उस के अंदर (आत्मिक) प्रकाश हो गया है। उसने (अपने अंदर से) अज्ञान अंधेरा दूर कर लिया है। उसकी सुरति प्रभू की ज्योति में लीन रहती है। उसका मन (प्रभू की याद में) मगन हो जाता है। वह मनुष्य परमात्मा के दर पे शोभा हासिल करता है। 3। (पर यदि कोई मनुष्य अपने) शरीर के बाहर (अर्थात जंगलों में, पहाड़ों की गुफाओं में इस आत्मिक रोशनी को) तलाशने जाता है, उसे (ये आत्मिक प्रकाश देने वाला) हरी नाम तो नहीं मिलता, (उल्टा) वह (बेगार में फंसे किसी) बेगारी की तरह दुख ही पाता है। अपने मन के पीछे चलने वाले माया के मोह में अंधे हुए मनुष्य को समझ नहीं पड़ती। (जंगलों पहाड़ों में खुआर हो हो के, भटक के) आखिर वह आ के गुरू की शरण पड़ के ही नाम अंमृत प्राप्त करता है। 4। जब मनुष्य गुरू की कृपा से सदा स्थिर हरी का मिलाप प्राप्त करता है, तो वह अपने मन में (ही) अपने तन में (ही) उसका दर्शन कर लेता है, और उसके अंदर से अहंकार की मैल दूर हो जाती है। अपने शुद्ध हुए हृदय में ही बैठ के (भटकना रहित हो के) वह सदा परमात्मा के गुण गाता है, गुरू के शबद द्वारा सदा स्थिर प्रभू में समाया रहता है। 5। जिस मनुष्य ने अपने नौ दरवाजे (नौ गोलकें) (विकारों के प्रभाव की ओर से) बंद कर लिए हैं, जिस ने (विकारों की ओर) दौड़ता अपना मन काबू कर लिया है। उसने अपने चित्त आकाश के द्वारा (अपनी ऊँची हुई सुरति के द्वारा) अपने असल घर में (प्रभू चरणों में) निवास प्राप्त कर लिया है। उस अवस्था में पहुँचे मनुष्य के अंदर (हृदय में) सदा एक रस परमात्माकी सिफत सालाह के बोल अपना प्रभाव डाले रखते हैं। वह दिन रात अपने गुरू की मति पर चल के सिफत सालाह की बाणी को ही अपनी सुरति में टिकाए रखता है। 6। गुरू के शबद के बिना मनुष्य के हृदय में माया के मोह का अंधकार बना रहता है। जिसके कारण उसे अपने अंदरनाम पदार्थ नहीं मिलता और उसके जनम मरन का चक्कर बना रहता है। (मोह के बज्र किवाड़ खोलने की) कुँजी गुरू के हाथ में ही है। किसी और तरीके से वह दरवाजा नहीं खुलता। और, गुरू भी बहुत किस्मत से ही मिलता है। 7। हे प्रभू ! आप सब जगह मौजूद हैं। (किसी को) प्रत्यक्ष (दिखाई देते हैं और किसी के लिए) छुपे हुए हैं। (आपके सर्व-व्यापक होने की) समझ गुरू की कृपा से (आपको) मिल के होती है। हे नानक ! आप (गुरू की शरण पड़ कर) सदा परमात्मा के नाम की सिफत सालाह करते रहें। गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य प्रभू के नाम को अपने मन में बसा लेता है। 8। 24। 25।

गुरमुखि मिलै मिलाए आपे ॥

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माझ महला 3 ॥
गुरमुखि मिलै मिलाए आपे ॥
कालु न जोहै दुखु न संतापे ॥
हउमै मारि बंधन सभ तोड़ै गुरमुखि सबदि सुहावणिआ ॥1॥
हउ वारी जीउ वारी हरि हरि नामि सुहावणिआ ॥
गुरमुखि गावै गुरमुखि नाचै हरि सेती चितु लावणिआ ॥1॥ रहाउ ॥

हिन्दी अर्थ: माझ महला 3 ॥ जो मनुष्य गुरू का आसरा परना लेता है, उसे परमात्मा मिल जाता है। परमात्मा स्वयं ही उसे गुरू मिलाता है। (ऐसे मनुष्य को) आत्मिक मौत अपनी नजर में नहीं रखती, उसे कोई दुख कलेश सता नहीं सकता। गुरू के आसरे रहने वाला मनुष्य (अपने अंदर से) अहंकार को दूर करके (माया के मोह के) सारे बंधन तोड़ लेता है। गुरू के शबद द्वारा उसका जीवन खूबसूरत बन जाता है। 1। मैं उस मनुष्य से सदा सदके जाता हूँ, जो परमात्मा के नाम में जुड़ के अपना जीवन सुंदर बना लेता है। गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य प्रभू के गुण गाता रहता है। उसका मन (नाम सिमरन के) हिलोरों में आया रहता है। गुरू का आसरा रखने वाला मनुष्य परमात्मा (के चरणों) के साथ अपना मन जोड़े रखता है। 1। रहाउ।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ३: गुरु अमर दास जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग १२४ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

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