अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: हे माँ ! मेहर कर के (जिनको परमात्मा ने) अपने बना लिया। उनके अंदर प्रभू के दर्शन की तमन्ना पैदा हो जाती है। वे मनुष्य साध-संगति में मिल के परमात्मा की परमात्मा की सिफतसालाह के गीत गाते हैं। (उनके अंदर से परमात्मा के बिना) कोई और दूसरी टेक खत्म हो जाती है। 1। हे नानक ! जिनको संत जनों ने (सही जीवन-) राह बता दिया। उनको उनके बड़े संघने जंगल (जैसे संसार-वन) से बाहर निकाल लिया। (परमात्मा का) दर्शन करके उन मनुष्यों के सारे पाप नाश हो गए। उन्होंने प्रभू का नाम-रत्न पा लिया। 2। 100। 123।
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे माँ ! (मेरा मन प्रीतम प्रभू के) प्यार के नशे में मस्त रहता है। मेरे मन में उसके दर्शन की लगन लगी रहती ह। उस सुंदर (के दर्शन) की चाहत बनी रहती है (यह लगन यह चाहत ऐसी है कि इसको) कोई तोड़ नहीं सकता। 1। रहाउ। हे माँ ! अब मेरे वास्ते प्रभू प्रीतम ही जिंद है। आसरा है। इज्जत है। पिता है। पुत्र है। सन्बंधी है। धन है। मेरा सब कुछ वही वही है। जो मनुष्य परमात्मा के बिना और-और सांझ बनाए रखता है। उसका शरीर धिक्कार-योग्य हो जाता है (क्योकि फिर यह मानस-शरीर सिर्फ) हड्डियां। गंदगी और कृमि ही है। 1। हे नानक ! (कह- हे माँ !) जिससे कोई आदि कदीमी का (परा-पूर्बला) जोड़ होता है। गरीबों के दुख दूर करने वाला प्रभू उस पर दयावान होता है। वह मनुष्य दया के खजाने मेहर के समुंद्र प्रभू की शरण पड़ता है। उसकी अन्य (सारी) मुथाजी समाप्त हो जाती है। 2। 101। 124।
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे भाई ! परमात्मा की लगन (हृदय में बना)। परमात्मा की सिफतसालाह करनी- यह एक सुंदर (काम) है। हे भाई ! सुंदर मालिक प्रभू के सुंदर चरन जपते हुए मनुष्य भला नेक बन जाता है। 1। रहाउ। हे भाई ! जगत के पालनहार प्रभू के दर्शनों की तमन्ना मन में बसाता हुआ (भाव। बसा के) (अपने अंदर से सारे) पाप धो के दूर कर ले। (अगर आप हरी-दर्शन की चाहत अपने अंदर पैदा करेगा तो) परमात्मा (आपके अंदर से) जनम मरण के (सारी उम्र के) विकारों के फूट रहे बीज काट के नाश कर देगा। 1। यह दाति कोई वह विरला मनुष्य हासिल करता है जिसके माथे पर पूर्बले समय से (ये लेख) लिखे होते हैं हे नानक ! जो परमात्मा सदा कायम रहने वाला है उस करतार गोपाल के गुन गाने- । 2। 102। 125।
सारग महला 5 ॥ हरि के नाम की मति सार ॥ हरि बिसारि जु आन राचहि मिथन सभ बिसथार ॥1॥ रहाउ ॥ साधसंगमि भजु सुआमी पाप होवत खार ॥ चरनारबिंद बसाइ हिरदै बहुरि जनम न मार ॥1॥ करि अनुग्रह राखि लीने एक नाम अधार ॥ दिन रैनि सिमरत सदा नानक मुख ऊजल दरबारि ॥2॥103॥126॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे भाई ! परमात्मा के नाम सिमरन (की ओर प्रेरित करने) वाली बुद्धि (अन्य कार्यों की तरफ प्रेरित करने वाली बुद्धियों से) श्रेष्ठ है। जो मनुष्य परमात्मा को भुला के और-और आहरों में सदा व्यस्त रहते हैं उनके सारे पसारे (आखिर) व्यर्थ जाते हैं। 1। हे भाई ! साध-संगति में (टिक के) मालिक-प्रभू का भजन किया कर (सिमरन की बरकति से) सारे पाप नाश हो जाते हैं। हे भाई ! परमात्मा के सुंदर चरण अपने हृदय में बसाए रख। दोबारा जनम-मरण का चक्कर नहीं होंगे। 1। हे नानक ! मेहर करके जिन मनुष्यों की प्रभू रक्षा करता है। उनको अपने नाम का सहारा देता है। दिन-रात सदा सिमरन करते हुए उनके मुँह प्रभू के दरबार में उज्जवल हो जाते हैं। 2। 103। 126।
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ (हे जिंदे ! अगर आप भी यह उद्यम करे। तो) आप परमात्मा के दर पर अवश्य सत्कार हासिल करेगी। (हे जिंदे ! जिस जीव-स्त्री ने) साध-संगति में मिल के परमात्मा के गुण गाने आरम्भ कर दिए। उसके अंदर से अहंकार वाली मति सारी समाप्त हो गई। 1। रहाउ। हे जिंदे ! प्रभू ने मेहर करके (जिस जीव-स्त्री को) अपनी बना लिया। वह गुरू के सन्मुख र हके आत्मिक जीवन की पूरी सूझ वाली हो गई। उसके हृदय में सारे सुख अनेकों आनंद पैदा हो गए। उसकी सुरति मालिक-प्रभू के दर्शनों में जुड़ने लग गई। 1। हे जिंदे ! जो जीव-स्त्री सदा प्रभू-चरणों में टिकने लग गई। वह सदा के लिए सोहाग-भाग वाली हो गई। वही सारे जगत में प्रकट हो गई। हे नानक ! (कह-) मैं उस जीव-स्त्री से सदके हूँ जो प्यारे प्रभू के करिश्मों के रंग में रंगी रहती है। 2। 104। 127।
सारग महला 5 ॥ तुअ चरन आसरो ईस ॥ तुमहि पछानू साकु तुमहि संगि राखनहार तुमै जगदीस ॥ रहाउ ॥ तू हमरो हम तुमरे कहीऐ इत उत तुम ही राखे ॥ तू बेअंतु अपरंपरु सुआमी गुर किरपा कोई लाखै ॥1॥ बिनु बकने बिनु कहन कहावन अंतरजामी जानै ॥ जा कउ मेलि लए प्रभु नानकु से जन दरगह माने ॥2॥105॥128॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे ईश्वर ! (हम जीवों को) आपके चरणों का (ही) आसरा है। आप ही (हमारा) जान-पहचान वाला है। आपके साथ ही हमारा मेल-मिलाप है। हे जगत के ईश्वर ! आप ही (हमारी) रक्षा कर सकने वाला है। 1। रहाउ। हे प्रभू ! हरेक जीव यही कहता है कि आप हमारा है हम आपके हैं। आप ही इस लोक और परलोक में रखवाला है। हे मालिक-प्रभू ! आप ही बेअंत है। परे से परे है। किसी विरले मनुष्य ने गुरू की मेहर से ये बात समझी है। 1। नानक (कहता है- हे भाई !) प्रभू हरेक के दिल की जानने वाला है। हमारे बोले बिना। हमारे कहे-कहाए बिना (हमारी जरूरतें) जान लेता है। वह प्रभू ! जिन को (अपने चरणों में) जोड़ लेता है। वह मनुष्य उसकी हजूरी में आदर-सम्मान प्राप्त करते हैं। 2। 105। 128।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।
अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।
इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे माँ ! मेहर कर के (जिनको परमात्मा ने) अपने बना लिया।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।