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1228
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· शबद · राग सारंग
करि किरपा लीने करि अपुने उपजी दरस पिआस ॥
करि किरपा लीने करि अपुने उपजी दरस पिआस ॥
संतसंगि मिलि हरि गुण गाए बिनसी दुतीआ आस ॥1॥
महा उदिआन अटवी ते काढे मारगु संत कहिओ ॥
देखत दरसु पाप सभि नासे हरि नानक रतनु लहिओ ॥2॥100॥123॥
संतसंगि मिलि हरि गुण गाए बिनसी दुतीआ आस ॥1॥
महा उदिआन अटवी ते काढे मारगु संत कहिओ ॥
देखत दरसु पाप सभि नासे हरि नानक रतनु लहिओ ॥2॥100॥123॥
हिन्दी अर्थ: हे माँ! मेहर कर के (जिनको परमात्मा ने) अपने बना लिया, उनके अंदर प्रभू के दर्शन की तमन्ना पैदा हो जाती है। वे मनुष्य साध-संगति में मिल के परमात्मा की सिफतसालाह के गीत गाते हैं। (उनके अंदर से परमात्मा के बिना) कोई और दूसरी टेक खत्म हो जाती है। 1। हे नानक! जिनको संत जनों ने (सही जीवन का) रास्ता बता दिया, उनको उन्होंने बड़े घने जंगल (जैसे संसार-वन) से बाहर निकाल लिया। (परमात्मा का) दर्शन करके उन मनुष्यों के सारे पाप नाश हो गए। उन्होंने प्रभू का नाम-रत्न पा लिया। 2। 100। 123।
· शबद · राग सारंग
माई री अरिओ प्रेम की खोरि ॥
सारग महला 5 ॥
माई री अरिओ प्रेम की खोरि ॥
दरसन रुचित पिआस मनि सुंदर सकत न कोई तोरि ॥1॥ रहाउ ॥
प्रान मान पति पित सुत बंधप हरि सरबसु धन मोर ॥
ध्रिगु सरीरु असत बिसटा क्रिम बिनु हरि जानत होर ॥1॥
भइओ क्रिपाल दीन दुख भंजनु परा पूरबला जोर ॥
नानक सरणि क्रिपा निधि सागर बिनसिओ आन निहोर ॥2॥101॥124॥
माई री अरिओ प्रेम की खोरि ॥
दरसन रुचित पिआस मनि सुंदर सकत न कोई तोरि ॥1॥ रहाउ ॥
प्रान मान पति पित सुत बंधप हरि सरबसु धन मोर ॥
ध्रिगु सरीरु असत बिसटा क्रिम बिनु हरि जानत होर ॥1॥
भइओ क्रिपाल दीन दुख भंजनु परा पूरबला जोर ॥
नानक सरणि क्रिपा निधि सागर बिनसिओ आन निहोर ॥2॥101॥124॥
हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे माँ! (मेरा मन प्रीतम प्रभू के) प्यार के नशे में मस्त रहता है। मेरे मन में उसके दर्शन की लगन लगी रहती है। उस सुंदर (के दर्शन) की चाहत बनी रहती है (यह लगन यह चाहत ऐसी है कि इसको) कोई तोड़ नहीं सकता। 1। रहाउ। हे माँ! अब मेरे वास्ते प्रभू प्रीतम ही जिंद है। आसरा है, इज्जत है, पिता है, पुत्र है, संबंधी है, धन है। मेरा सब कुछ वही वही है। जो मनुष्य परमात्मा के बिना और-और सांझ बनाए रखता है, उसका शरीर धिक्कार-योग्य हो जाता है (क्योंकि फिर यह मानस-शरीर सिर्फ) हड्डियाँ, गंदगी और कृमि ही है। 1। हे नानक! (कहें: हे माँ!) जिससे कोई आदि कदीमी का (परा-पूर्बला) जोड़ होता है, गरीबों के दुख दूर करने वाला प्रभू उस पर दयावान होता है। वह मनुष्य दया के खजाने मेहर के समुंद्र प्रभू की शरण पड़ता है। दूसरों पर उसकी (सारी) निर्भरता समाप्त हो जाती है। 2। 101। 124।
· शबद · राग सारंग
नीकी राम की धुनि सोइ ॥
सारग महला 5 ॥
नीकी राम की धुनि सोइ ॥
चरन कमल अनूप सुआमी जपत साधू होइ ॥1॥ रहाउ ॥
चितवता गोपाल दरसन कलमला कढु धोइ ॥
जनम मरन बिकार अंकुर हरि काटि छाडे खोइ ॥1॥
परा पूरबि जिसहि लिखिआ बिरला पाए कोइ ॥
रवण गुण गोपाल करते नानका सचु जोइ ॥2॥102॥125॥
नीकी राम की धुनि सोइ ॥
चरन कमल अनूप सुआमी जपत साधू होइ ॥1॥ रहाउ ॥
चितवता गोपाल दरसन कलमला कढु धोइ ॥
जनम मरन बिकार अंकुर हरि काटि छाडे खोइ ॥1॥
परा पूरबि जिसहि लिखिआ बिरला पाए कोइ ॥
रवण गुण गोपाल करते नानका सचु जोइ ॥2॥102॥125॥
हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे भाई! परमात्मा की लगन (हृदय में बनाएँ)। परमात्मा की सिफतसालाह करनी, यह एक सुंदर (काम) है। हे भाई! सुंदर मालिक प्रभू के सुंदर चरन जपते हुए मनुष्य भला नेक बन जाता है। 1। रहाउ। हे भाई! जगत के पालनहार प्रभू के दर्शनों की तमन्ना मन में बसाते हुए (भाव, बसा के) (अपने अंदर से सारे) पाप धो के दूर कर लें। (अगर आप हरी-दर्शन की चाहत अपने अंदर पैदा करेंगे तो) परमात्मा (आपके अंदर से) जनम मरण के (सारी उम्र के) विकारों के फूट रहे बीज काट के नाश कर देगा। 1। हे नानक! जो परमात्मा सदा कायम रहने वाला है, उस करतार गोपाल के गुण गाने की यह दाति कोई वह विरला मनुष्य हासिल करता है जिसके माथे पर पूर्बले समय से (ये लेख) लिखे होते हैं। 2। 102। 125।
· शबद · राग सारंग
हरि के नाम की मति सार ॥
सारग महला 5 ॥
हरि के नाम की मति सार ॥
हरि बिसारि जु आन राचहि मिथन सभ बिसथार ॥1॥ रहाउ ॥
साधसंगमि भजु सुआमी पाप होवत खार ॥
चरनारबिंद बसाइ हिरदै बहुरि जनम न मार ॥1॥
करि अनुग्रह राखि लीने एक नाम अधार ॥
दिन रैनि सिमरत सदा नानक मुख ऊजल दरबारि ॥2॥103॥126॥
हरि के नाम की मति सार ॥
हरि बिसारि जु आन राचहि मिथन सभ बिसथार ॥1॥ रहाउ ॥
साधसंगमि भजु सुआमी पाप होवत खार ॥
चरनारबिंद बसाइ हिरदै बहुरि जनम न मार ॥1॥
करि अनुग्रह राखि लीने एक नाम अधार ॥
दिन रैनि सिमरत सदा नानक मुख ऊजल दरबारि ॥2॥103॥126॥
हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे भाई! परमात्मा के नाम सिमरन (की ओर प्रेरित करने) वाली बुद्धि (अन्य कार्यों की तरफ प्रेरित करने वाली बुद्धियों से) श्रेष्ठ है। जो मनुष्य परमात्मा को भुला के और-और कामों में सदा व्यस्त रहते हैं उनके सारे पसारे (आखिर) व्यर्थ जाते हैं। 1। रहाउ। हे भाई! साध-संगति में (टिक के) मालिक-प्रभू का भजन किया करें। (सिमरन की बरकति से) सारे पाप नाश हो जाते हैं। हे भाई! परमात्मा के सुंदर चरण अपने हृदय में बसाए रखें। दोबारा जनम-मरण का चक्कर नहीं होगा। 1। हे नानक! मेहर करके जिन मनुष्यों की प्रभू रक्षा करता है, उनको अपने नाम का सहारा देता है। दिन-रात सदा सिमरन करते हुए उनके मुँह प्रभू के दरबार में उज्जवल हो जाते हैं। 2। 103। 126।
· शबद · राग सारंग
मानी तूं राम कै दरि मानी ॥
सारग महला 5 ॥
मानी तूं राम कै दरि मानी ॥
साधसंगि मिलि हरि गुन गाए बिनसी सभ अभिमानी ॥1॥ रहाउ ॥
धारि अनुग्रहु अपनी करि लीनी गुरमुखि पूर गिआनी ॥
सरब सूख आनंद घनेरे ठाकुर दरस धिआनी ॥1॥
निकटि वरतनि सा सदा सुहागनि दह दिस साई जानी ॥
प्रिअ रंग रंगि रती नाराइन नानक तिसु कुरबानी ॥2॥104॥127॥
मानी तूं राम कै दरि मानी ॥
साधसंगि मिलि हरि गुन गाए बिनसी सभ अभिमानी ॥1॥ रहाउ ॥
धारि अनुग्रहु अपनी करि लीनी गुरमुखि पूर गिआनी ॥
सरब सूख आनंद घनेरे ठाकुर दरस धिआनी ॥1॥
निकटि वरतनि सा सदा सुहागनि दह दिस साई जानी ॥
प्रिअ रंग रंगि रती नाराइन नानक तिसु कुरबानी ॥2॥104॥127॥
हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ (हे जिंदे! जिस जीव-स्त्री ने) साध-संगति में मिल के परमात्मा के गुण गाने आरम्भ कर दिए, उसके अंदर से अहंकार वाली मति सारी समाप्त हो गई। (हे जिंदे! अगर आप भी यह उद्यम करें, तो) आप परमात्मा के दर पर अवश्य सत्कार हासिल करेंगी। 1। रहाउ। हे जिंदे! प्रभू ने मेहर करके (जिस जीव-स्त्री को) अपनी बना लिया, वह गुरू के सन्मुख रह के आत्मिक जीवन की पूरी सूझ वाली हो गई। उसके हृदय में सारे सुख अनेकों आनंद पैदा हो गए। उसकी सुरति मालिक-प्रभू के दर्शनों में जुड़ने लग गई। 1। हे जिंदे! जो जीव-स्त्री सदा प्रभू-चरणों में टिकने लग गई, वह सदा के लिए सोहाग-भाग वाली हो गई। वही सारे जगत में प्रकट हो गई। हे नानक! (कहें:) मैं उस जीव-स्त्री से सदके हूँ जो प्यारे प्रभू के करिश्मों के रंग में रंगी रहती है। 2। 104। 127।
· शबद · राग सारंग
तुअ चरन आसरो ईस ॥
सारग महला 5 ॥
तुअ चरन आसरो ईस ॥
तुमहि पछानू साकु तुमहि संगि राखनहार तुमै जगदीस ॥ रहाउ ॥
तू हमरो हम तुमरे कहीऐ इत उत तुम ही राखे ॥
तू बेअंतु अपरंपरु सुआमी गुर किरपा कोई लाखै ॥1॥
बिनु बकने बिनु कहन कहावन अंतरजामी जानै ॥
जा कउ मेलि लए प्रभु नानकु से जन दरगह माने ॥2॥105॥128॥
तुअ चरन आसरो ईस ॥
तुमहि पछानू साकु तुमहि संगि राखनहार तुमै जगदीस ॥ रहाउ ॥
तू हमरो हम तुमरे कहीऐ इत उत तुम ही राखे ॥
तू बेअंतु अपरंपरु सुआमी गुर किरपा कोई लाखै ॥1॥
बिनु बकने बिनु कहन कहावन अंतरजामी जानै ॥
जा कउ मेलि लए प्रभु नानकु से जन दरगह माने ॥2॥105॥128॥
हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे ईश्वर! (हम जीवों को) आपके चरणों का (ही) आसरा है। आप ही (हमारे) जान-पहचान वाले हैं। आपके साथ ही हमारा मेल-मिलाप है। हे जगत के ईश्वर! आप ही (हमारी) रक्षा कर सकने वाले हैं। 1। रहाउ। हे प्रभू! हरेक जीव यही कहता है कि आप हमारे हैं हम आपके हैं। आप ही इस लोक और परलोक में रखवाले हैं। हे मालिक-प्रभू! आप ही बेअंत हैं। परे से परे हैं। किसी विरले मनुष्य ने गुरू की मेहर से ये बात समझी है। 1। नानक (कहता है: हे भाई!) प्रभू हरेक के दिल की बात जानने वाला है। हमारे बोले बिना, हमारे कहे-कहाए बिना (हमारी जरूरतें) जान लेता है। वह प्रभू जिनको (अपने चरणों में) जोड़ लेता है, वे मनुष्य उसकी हजूरी में आदर-सम्मान प्राप्त करते हैं। 2। 105। 128।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1228 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।