सारग महला 5 ॥ माई री माती चरण समूह ॥ एकसु बिनु हउ आन न जानउ दुतीआ भाउ सभ लूह ॥1॥ रहाउ ॥ तिआगि गोुपाल अवर जो करणा ते बिखिआ के खूह ॥ दरस पिआस मेरा मनु मोहिओ काढी नरक ते धूह ॥1॥ संत प्रसादि मिलिओ सुखदाता बिनसी हउमै हूह ॥ राम रंगि राते दास नानक मउलिओ मनु तनु जूह ॥2॥95॥118॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे (मेरी) माँ ! मैं तो प्रभू के चरणों में पूरी तरह से मस्त रहती हूँ। उस एक के बिना मैं किसी और को जानती-पहचानती ही नहीं। (अपने अंदर से) औरों का प्यार मैं सरा जला चुकी हूँ। 1। रहाउ। हे माँ ! प्रभू को भुला के और जो जो भी काम किए जाते हैं। वे सारे माया (के मोह) के कूएं में फेंके जाते हैं। हे माँ ! मेरा मन तो गोपाल के दर्शनों की चाहत में मगन रहता है। मुझे उसने नर्कों में से खींच के निकाल लिया है। 1। हे दास नानक ! जिस मनुष्य को गुरू की कृपा से सारे सुखों को देने वाला प्रभू मिल जाता है। (उसके अंदर से) अहंकार का शोर समाप्त हो जाता है। जो मनुष्य परमात्मा के प्रेम-रंग में रंगे रहते हैं। उनका मन उनका तन (इस प्रकार से) हरा-भरा हो जाता है (जैसे बरसात होने से) जूह (घास से हरी हो जाती है)। 2। 95। 118।
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे भाई ! काँच (-समान माया की खातिर) सारी दौड़-भाग व्यर्थ जाती हैं। साध-संगति में मिल के परमात्मा का भजन किया कर। जगत में यही काम श्रेष्ठ है। 1। रहाउ। हे भाई ! परमात्मा का नाम (अपने) हृदय में बसाए रख (इसकी बरकति से) ना इस लोक में ना परलोक में कहीं भी डोलेगा। जिस मनुष्य को किस्मत से गुरू के चरणों का जहाज मिल जाता है। वह संसार (समुंद्र) से पार लांघ जाता है। 1। हे नानक ! जो प्रभू जल में थल में आकाश में भरपूर है। जो सब जीवों का खसम है। जो बेअंत है। उसका आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल पीते रहा कर। (हरी-नाम-जल के मुकाबले पर) और सारे रस कड़वे हैं। 2। 96। 119।
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे भाई ! (मनुष्य) इसलिए (सदा) करुणा-प्रलाप करता रहता है- मनुष्य मोह अहंकार (आदि) बड़े-बड़े विकारों में मगन रहता है। परमात्मा का नाम नहीं सिमरता। 1। रहाउ। हे भाई ! जो मनुष्य साध-संगति में (टिक के) परमात्मा का नाम जपते रहते हैं। उनके (अंदर से सारे) पाप जल जाते हैं। जो मनुष्य प्रभू के साथ (के चरणों में) जुड़े रहते हैं। वे भाग्यशाली हैं। उनका जनम उसका शरीर सफल हो जाता है। 1। हे भाई ! (धर्म। काम। मोक्ष- यह) चार पदार्थ और अठारह सिद्धियाँ (लोग इनती खातिर तरले-मिन्नतें करते फिरते हैं। पर इन) सबसे संत जन श्रेष्ठ हैं। दास नानक तो संत जनों के चरणों की धूड़ (नित्य) माँगता है। (संत जनों के) लड़ लग के (अनेकों जीव संसार-समुंद्र से) पार लांघ जाते हैं। 2। 97। 120।
सारग महला 5 ॥ हरि के नाम के जन कांखी ॥ मनि तनि बचनि एही सुखु चाहत प्रभ दरसु देखहि कब आखी ॥1॥ रहाउ ॥ तू बेअंतु पारब्रहम सुआमी गति तेरी जाइ न लाखी ॥ चरन कमल प्रीति मनु बेधिआ करि सरबसु अंतरि राखी ॥1॥ बेद पुरान सिम्रिति साधू जन इह बाणी रसना भाखी ॥ जपि राम नामु नानक निसतरीऐ होरु दुतीआ बिरथी साखी ॥2॥98॥121॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे भाई ! परमात्मा के सेवक परमात्मा के नाम के चाहवान रहते हैं। अपने मन से। तन से वचन से वे सदा यही सुख माँगते हैं कि कब अपनी आँखों से परमात्मा के दर्शन करेंगे। 1। रहाउ। हे पारब्रहम ! हे मालिक प्रभू ! आपका अंत नहीं पाया जा सकता। आप किस तरह का है- ये बात बयान नहीं की जा सकती। (पर आपके संत जनों का) मन आपके सुंदर चरणों की प्रीति में परोया रहता है। इस प्रीत को ही वह (जगत का) सारा धन-पदार्थ समझ के अपने अंदर थ्अकाए रखते हैं। 1। हे नानक ! वेद-पुराण स्मृतियां (आदि धम्र-पुस्तकों का पाठ) संत-जन। अपनी जीभ से यही सिफतसालाह की बाणी ही उचारते हैं। यही उनके लिए परमात्मा का नाम सिमर के (ही) संसार-समुंद्र से पार लांघ जाते हैं। इसके बिना और कोई दूसरील बात व्यर्थ है। 2। 98। 121।
सारग महला 5 ॥ माखी राम की तू माखी ॥ जह दुरगंध तहा तू बैसहि महा बिखिआ मद चाखी ॥1॥ रहाउ ॥ कितहि असथानि तू टिकनु न पावहि इह बिधि देखी आखी ॥ संता बिनु तै कोइ न छाडिआ संत परे गोबिद की पाखी ॥1॥ जीअ जंत सगले तै मोहे बिनु संता किनै न लाखी ॥ नानक दासु हरि कीरतनि राता सबदु सुरति सचु साखी ॥2॥99॥122॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे माया ! आप मक्खी है। परमात्मा की पैदा की हुई मक्खी (के स्वभाव वाली)। (जैसे मक्खी सदा गंदगी पर बैठती है। वैसे) जहाँ विकारों की बदबू होती है आप वहाँ बैटती है। आप सदा विकारों का नशा ही रखती रहती है। 1। रहाउ। हे माया ! हमने अपनी आँखों से आपका यह हाल देखा है कि आप किसी भी एक जगह पर नहीं टिकती। संतों के बिना तूने किसी को भी (दुखी करने से) नहीं छोड़ा (वह भी इस वास्ते बचते हें कि) संत परमात्मा की शरण पड़े रहते हैं। 1। हे माया ! (जगत के सारे ही) जीव तूने अपने वश में किए हुए हैं। संतों के बिना किसी भी और ने ये बात नहीं समझी। हे नानक ! परमात्मा का संत परमात्मा की सिफतसालाह (के रंग) में रंगा रहता है। संत (गुरू के) शबद को अपनी सुरति में टिका के सदा-स्थिर प्रभू के दर्शन करता रहता है। 2। 99। 122।
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे माँ ! (जिन भाग्यशालियों की) आत्मिक मौत लाने वाली माया के मोह की फाही काटी गई। परमात्मा का नाम जपते हुए उन्होंने सारे सुख पा लिए। वे गृहस्त में रहते हुए ही (माया के मोह से) उपराम रहते हैं। 1। रहाउ।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।
अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।
इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “सारग महला 5 ॥ हे (मेरी) माँ ! मैं तो प्रभू के चरणों में पूरी तरह से मस्त रहती हूँ।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।