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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 1226 · सारंग

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अंग
1226
सारंग
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  1. जनमु पदारथु गुरमुखि जीतिआ बहुरि न जूऐ हारि ॥1॥
  2. पोथी परमेसर का थानु ॥
  3. वूठा सरब थाई मेहु ॥
  4. गोबिद जीउ तू मेरे प्रान अधार ॥
  5. निबही नाम की सचु खेप ॥
  6. माई री पेखि रही बिसमाद ॥

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग सारंग

जनमु पदारथु गुरमुखि जीतिआ बहुरि न जूऐ हारि ॥1॥

अंग 1225 से चला आ रहा अंश

जनमु पदारथु गुरमुखि जीतिआ बहुरि न जूऐ हारि ॥1॥
आठ पहर प्रभ के गुण गावह पूरन सबदि बीचारि ॥
नानक दासनि दासु जनु तेरा पुनह पुनह नमसकारि ॥2॥89॥112॥

हिन्दी अर्थ: गुरमुख इस कीमती मनुष्य जनम को (विकारों के मुकाबले में) कामयाब बना लेता है। फिर कभी इसको जूए में हार के नहीं जाता। 1। हे भाई! आएँ। मिल के सर्व-व्यापक प्रभू के गुणों को गुरू-शबद के द्वारा मन में बसा के आठों पहर उसके गुण गाते रहें। हे नानक! (कहें:) हे प्रभू! मैं आपके दासों का दास हूँ। (आपके दर पर ही) बार-बार नमस्कार करता हूँ। 2। 89। 112।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग सारंग

पोथी परमेसर का थानु ॥

सारग महला 5 ॥
पोथी परमेसर का थानु ॥
साधसंगि गावहि गुण गोबिंद पूरन ब्रहम गिआनु ॥1॥ रहाउ ॥
साधिक सिध सगल मुनि लोचहि बिरले लागै धिआनु ॥
जिसहि क्रिपालु होइ मेरा सुआमी पूरन ता को कामु ॥1॥
जा कै रिदै वसै भै भंजनु तिसु जानै सगल जहानु ॥
खिनु पलु बिसरु नही मेरे करते इहु नानकु मांगै दानु ॥2॥90॥113॥

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे भाई! गुरबाणी (ही) परमात्मा के मिलाप का स्थान है। जो मनुष्य गुरू की संगति में र हके परमात्मा के गुण गाते रहते हैं। वे मनुष्य सर्व-व्यापक परमात्मा के साथ गहरी सांझ डाल लेते हैं। 1। रहाउ। हे भाई! जोग-साधना करने वाले मनुष्य। जोग-साधना में सिद्ध-हस्त जोगी। सारे ऋषि-मुनि (परमात्मा के साथ मिलाप की) तमन्ना करते आ रहे हैं। पर किसी विरले की सुरति (उसमें) जुड़ती है। जिस मनुष्य पर मेरा मालिक-प्रभू स्वयं दयावान होता है। उसका (यह) काम सफल हो जाता है। 1। हे भाई! सारे डरों का नाश करने वाला परमात्मा जिस मनुष्य के हृदय में आ बसता है उसको सारा जगत जान लेता है (सारे जगत में उसकी शोभा पसर जाती है)। (उस परमात्मा के दर पर) नानक यह दान माँगता है (कि) हे मेरे करतार! (मेरे मन से कभी) एक छिन वास्ते एक पल के लिए भी ना बिसर। 2। 90। 113।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग सारंग

वूठा सरब थाई मेहु ॥

सारग महला 5 ॥
वूठा सरब थाई मेहु ॥
अनद मंगल गाउ हरि जसु पूरन प्रगटिओ नेहु ॥1॥ रहाउ ॥
चारि कुंट दह दिसि जल निधि ऊन थाउ न केहु ॥
क्रिपा निधि गोबिंद पूरन जीअ दानु सभ देहु ॥1॥
सति सति हरि सति सुआमी सति साधसंगेहु ॥
सति ते जन जिन परतीति उपजी नानक नह भरमेहु ॥2॥91॥114॥

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे भाई! परमात्मा का यश गाया करें। (जैसे) बरसात (टोए-टिब्बे) सब जगह होती है (वैसे ही यश गायन करने वालों के हृदयों में) आनंद और खुशियों की बरखा होती है। सर्व-व्यापक परमात्मा का प्यार (हृदय में) पैदा हो जाता है। 1। रहाउ। हे भाई! (जीवन-) जल का खजाना प्रभू चारों कुंटों में दसों दिशाओं में (हर जगह मौजूद है) कोई भी जगह (उसके अस्तित्व से) खाली नहीं। (उसका इस तरह यश गाया करें-) हे दया के खजाने! हे गोबिंद! हे सर्व-व्यापक! आप सब जीवों को ही जीवन-दाति देते हैं। 1। हे नानक! (कहें: हे भाई!) परमात्मा सदा ही अटल रहने वाला है (जहाँ वह मिलता है। वह) साध-संगति भी धुर से चली आ रही है। जिन मनुष्यों के हृदय में परमात्मा के प्रति श्रद्धा पैदा हो जाती है। वे भी अटल धार्मिक जीवन वाले हो जाते हैं। उनको कोई भटकना नहीं रह जाती। 2। 91। 114।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग सारंग

गोबिद जीउ तू मेरे प्रान अधार ॥

सारग महला 5 ॥
गोबिद जीउ तू मेरे प्रान अधार ॥
साजन मीत सहाई तुम ही तू मेरो परवार ॥1॥ रहाउ ॥
करु मसतकि धारिओ मेरै माथै साधसंगि गुण गाए ॥
तुमरी क्रिपा ते सभ फल पाए रसकि राम नाम धिआए ॥1॥
अबिचल नीव धराई सतिगुरि कबहू डोलत नाही ॥
गुर नानक जब भए दइआरा सरब सुखा निधि पांही ॥2॥92॥115॥

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे प्रभू जी! आप मेरे प्राणों का आसरा हैं। आप ही मेरे सज्जन हैं। आप ही मेरे मित्र हैं। आप ही मेरी मदद करने वाले हैं। आप ही मेरा परिवार हैं। 1। रहाउ। हे प्रभू! जब आपने मेरे माथे पर मेरे मस्तक पर (अपनी मेहर का) हाथ रखा, तब मैंने साध-संगति में (टिक के आपकी) सिफत-सालाह के गीत गाए हैं। हे प्रभू! आपकी मेहर से मैंने सारे फल हासिल किए हैं। और प्यार से आपका नाम सिमरा है। 1। हे भाई! सतिगुरू ने (जिन मनुष्यों के हृदय में हरी-नाम सिमरन की) अटल नींव रख दी। वे कभी (माया में) डोलते नहीं हैं। हे नानक! (कहें:) जब सतिगुरू जी दयावान होते हैं। वह सारे सुखों के खजाने परमात्मा का मिलाप हासिल कर लेते हैं। 2। 92। 115।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग सारंग

निबही नाम की सचु खेप ॥

सारग महला 5 ॥
निबही नाम की सचु खेप ॥
लाभु हरि गुण गाइ निधि धनु बिखै माहि अलेप ॥1॥ रहाउ ॥
जीअ जंत सगल संतोखे आपना प्रभु धिआइ ॥
रतन जनमु अपार जीतिओ बहुड़ि जोनि न पाइ ॥1॥
भए क्रिपाल दइआल गोबिद भइआ साधू संगु ॥
हरि चरन रासि नानक पाई लगा प्रभ सिउ रंगु ॥2॥93॥116॥

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे भाई! परमात्मा के नाम का सदा कायम रहने वाला व्यापार का लादा हुआ माल जिस जीव-बनजारे के साथ सदा का साथ बना लेता है। वह जीव-बंजारा (सदा) परमात्मा के गुण गाता रहता है। यही असल कमाई है। यही असल खजाना है यही असल धन है। (इसकी बरकति से) वह जीव-वणजारा (मायावी) पदार्थों में निर्लिप रहता है। 1। रहाउ। हे भाई! अपने प्रभू का ध्यान धर के सारे जीव संतोख वाला जीवन हासिल कर लेते हैं। जिस भी मनुष्य ने यह बेयंत कीमती मनुष्य-जनम विकारों के हमलों से बचा लिया। वह बार-बार जूनियों में नहीं पड़ता। 1। हे नानक! (कहें: हे भाई!) जिस मनुष्य पर प्रभू जी दयावान होते हैं। उसको गुरू का मिलाप हासिल होता है। वह मनुष्य प्रभू के चरणों की प्रीति का सरमाया हासिल कर लेता है। उसका प्रभू के साथ प्यार बन जाता है। 2। 93। 116।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग सारंग

माई री पेखि रही बिसमाद ॥

सारग महला 5 ॥
माई री पेखि रही बिसमाद ॥
अनहद धुनी मेरा मनु मोहिओ अचरज ता के स्वाद ॥1॥ रहाउ ॥
मात पिता बंधप है सोई मनि हरि को अहिलाद ॥
साधसंगि गाए गुन गोबिंद बिनसिओ सभु परमाद ॥1॥
डोरी लपटि रही चरनह संगि भ्रम भै सगले खाद ॥
एकु अधारु नानक जन कीआ बहुरि न जोनि भ्रमाद ॥2॥94॥117॥

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे (मेरी) माँ! (प्रभू के करिश्मे) देख के मैं हैरान हो रही हूँ। जिस प्रभू की जीवन-रौंअ एक-रस (सारे जगत में) रुमक रही है उसने मेरा मन मोह लिया है। उसके (मिलाप के) आनंद भी हैरान करने वाले हैं। 1। रहाउ। हे माँ! (सब जीवों का) माता-पिता संबंधी वह प्रभू ही है। (मेरे) मन में उस प्रभू (के मिलाप) का हुलारा आ रहा है। हे माँ! जिस मनुष्य ने साध-संगति में (टिक के) उसकी सिफत-सालाह के गीत गाए हैं। उसका सारा भरम-भुलेखा दूर हो गया। 1। हे दास नानक! जिस मनुष्य के चित्त की डोर प्रभू के चरणों के साथ जुड़ी रहती है। उसके सारे भ्रम सारे डर समाप्त हो जाते हैं। जिसने सिर्फ हरी-नाम को अपनी जिंदगी का आसरा बना लिया। वह बार-बार जूनियों में नहीं भटकता। 2। 94। 117।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1226 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।