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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 1225 · सारंग

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अंग
1225
सारंग
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  1. पूरन होत न कतहु बातहि अंति परती हारि ॥1॥ रहाउ ॥
  2. रे पापी तै कवन की मति लीन ॥
  3. माई री चरनह ओट गही ॥
  4. माई री मनु मेरो मतवारो ॥
  5. माई री आन सिमरि मरि जांहि ॥
  6. हरि काटी कुटिलता कुठारि ॥

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग सारंग

पूरन होत न कतहु बातहि अंति परती हारि ॥1॥ रहाउ ॥

अंग 1224 से चला आ रहा अंश

पूरन होत न कतहु बातहि अंति परती हारि ॥1॥ रहाउ ॥
सांति सूख न सहजु उपजै इहै इसु बिउहारि ॥
आप पर का कछु न जानै काम क्रोधहि जारि ॥1॥
संसार सागरु दुखि बिआपिओ दास लेवहु तारि ॥
चरन कमल सरणाइ नानक सद सदा बलिहारि ॥2॥84॥107॥

हिन्दी अर्थ: किसी भी बात से (यह तृष्णा) तृप्त नहीं होती। (जिंदगी के आखिर तक) यह सफल नहीं होती (और-और बढ़ती ही रहती है)। 1। रहाउ। हे भाई! (तृष्धा के कारण मनुष्य के मन में कभी) शांति पैदा नहीं होती। आनंद नहीं बनता। आत्मिक अडोलता नहीं उपजती। बस! इस तृष्णा का (सदा) यही व्यवहार है। काम और क्रोध से (यह तृष्णा मनुष्य का अंदरला) जला देती है। किसी का लिहज़ नहीं करतीै। 1। हे भाई! तृष्णा के कारण जीव पर संसार-समुंद्र अपना जोर डाले रखता है। (जीव) दुख में फसा रहता है। (पर, हे प्रभू!) आप अपने सेवकों को (इस संसार-समुंद्र से) पार लंघा लेते हैं। हे नानक! कहें: (हे प्रभू!) मैं (भी) आपके सुंदर चरणों की शरण आया हूँ। मैं आपसे सदा-सदा सदके जाता हूँ। 2। 84। 107।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग सारंग

रे पापी तै कवन की मति लीन ॥

सारग महला 5 ॥
रे पापी तै कवन की मति लीन ॥
निमख घरी न सिमरि सुआमी जीउ पिंडु जिनि दीन ॥1॥ रहाउ ॥
खात पीवत सवंत सुखीआ नामु सिमरत खीन ॥
गरभ उदर बिललाट करता तहां होवत दीन ॥1॥
महा माद बिकार बाधा अनिक जोनि भ्रमीन ॥
गोबिंद बिसरे कवन दुख गनीअहि सुखु नानक हरि पद चीन॑ ॥2॥85॥108॥

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे पापी! आपने किस की (बुरी) मति ले ली है। जिस मालिक-प्रभू ने आपको यह जिंद दी। यह शरीर दिया। उसको आप बघड़ी भर के लिए भी आँख झपकने जितने समय के लिए भी याद नहीं करते। 1। रहाउ। हे पापी! खाते, पीते और सोते समय तो आप खुश रहते हैं पर प्रभू का नाम सिमरते हुए आप आलसी हो जाते हैं। जब आप माँ के पेट में थे, तब बिलकते थे। तब आप गरीबड़े से बने रहते थे। 1। हे पापी! बड़े-बड़े विकारों की मस्ती में बंधे हुए आप अनेकों जूनियों में भटकते आ रहे हैं। हे नानक! (कहें: हे भाई!) परमात्मा का नाम भूलने से इतने दुख आते हैं कि गिने नहीं जा सकते। परमात्मा के चरणों से सांझ डालने से ही सुख मिलता है। 2। 85। 108।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग सारंग

माई री चरनह ओट गही ॥

सारग महला 5 ॥
माई री चरनह ओट गही ॥
दरसनु पेखि मेरा मनु मोहिओ दुरमति जात बही ॥1॥ रहाउ ॥
अगह अगाधि ऊच अबिनासी कीमति जात न कही ॥
जलि थलि पेखि पेखि मनु बिगसिओ पूरि रहिओ स्रब मही ॥1॥
दीन दइआल प्रीतम मनमोहन मिलि साधह कीनो सही ॥
सिमरि सिमरि जीवत हरि नानक जम की भीर न फही ॥2॥86॥109॥

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे माँ! (जब का) परमात्मा के चरणों का आसरा लिया है। (उसके) दर्शन करके मेरा मन मोहा गया है। (मेरे अंदर से) बुरी मति बह गई है। 1। रहाउ। हे माँ! वह परमात्मा अथाह है बेअंत गहरा है। बहुत ऊँचा है। कभी नहीं मरता। उसका मूल्य नहीं पाया जा सकता। जल में धरती में (हर जगह उसको) देख के मेरा मन खिला रहता है। हे माँ! वह सारी सृष्टि में व्यापक है। 1। हे माँ! साध-संगति में मिल के गरीबों पर दया करने वाले और मन को मोह लेने वाले प्रीतम का मैंने दर्शन किया है। हे नानक! (कहें: हे माँ!) परमात्मा का नाम सिमर-सिमर के आत्मिक जीवन मिलता है। और जमों के चुंगल में नहीं फसता। 2। 86। 109।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग सारंग

माई री मनु मेरो मतवारो ॥

सारग महला 5 ॥
माई री मनु मेरो मतवारो ॥
पेखि दइआल अनद सुख पूरन हरि रसि रपिओ खुमारो ॥1॥ रहाउ ॥
निरमल भए ऊजल जसु गावत बहुरि न होवत कारो ॥
चरन कमल सिउ डोरी राची भेटिओ पुरखु अपारो ॥1॥
करु गहि लीने सरबसु दीने दीपक भइओ उजारो ॥
नानक नामि रसिक बैरागी कुलह समूहां तारो ॥2॥87॥110॥

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे माँ! मेरा मन (प्रभू के दीदार में) मस्त हो रहा है। उस दया के सोमे प्रभू का दर्शन करके मेरे अंदर पूरी तरह से आत्मिक आनंद सुख बना हुआ है। मेरा मन प्रेम-रस से रंगा गया है और मस्त है। 1। रहाउ। हे माँ! परमात्मा का यश गाते हुए जिस मनुष्य का मन निर्मल-उज्जवल हो जाता है। वह दोबारा (विकारों से) काला नहीं होता। (सिफतसालाह की बरकति से) जिस मनुष्य के मन की डोर प्रभू के सुंदर चरणों के साथ जुड़ती है। उसको बेअंत प्रभू मिल जाता है। 1। हे माँ! जिस मनुष्य का हाथ पकड़ के प्रभू उसको अपना बना लेता है। उसको सब कुछ बख्शता है। उसके अंदर (नाम के) दीए का प्रकाश हो जाता है। हे नानक! परमात्मा के नाम में प्रीत प्रेम जोड़ने वाला मनुष्य अपनी सारी कुलों को (संसार-समुंद्र से) पार लंघा लेता है। 2। 87। 110।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग सारंग

माई री आन सिमरि मरि जांहि ॥

सारग महला 5 ॥
माई री आन सिमरि मरि जांहि ॥
तिआगि गोबिदु जीअन को दाता माइआ संगि लपटाहि ॥1॥ रहाउ ॥
नामु बिसारि चलहि अन मारगि नरक घोर महि पाहि ॥
अनिक सजांई गणत न आवै गरभै गरभि भ्रमाहि ॥1॥
से धनवंते से पतिवंते हरि की सरणि समाहि ॥
गुर प्रसादि नानक जगु जीतिओ बहुरि न आवहि जांहि ॥2॥88॥111॥

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे माँ! वह (प्रभू के बिना) और को मन में बसाए रख के आत्मिक मौत सहेड़ लेते हैं। सारे जीवों को दातें देने वाले परमात्मा को छोड़ के जो मनुष्य (सदा) माया के साथ चिपके रहते हैं। 1। रहाउ। हे माँ! जो मनुष्य परमात्मा का नाम भुला के और (जीवन-) राह पर चलते हैं। वे भयानक नर्क में पड़े रहते हैं। उनको इतनी सजाएं मिलती रहती हैं कि उनकी गिनती नहीं हो सकती। वे हरेक जून में भटकते फिरते हैं। 1। हे माँ! जो मनुष्य परमात्मा की शरण में टिके रहते हैं। वे धन वाले हैं। वे इज्जत वाले हैं। हे नानक! (कहें: हे माँ!) गुरू की मेहर से उन्होंने जगत (के मोह) को जीत लिया है। वे बार-बार ना पैदा होते हैं ना मरते हैं। 2। 88। 111।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग सारंग

हरि काटी कुटिलता कुठारि ॥

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सारग महला 5 ॥
हरि काटी कुटिलता कुठारि ॥
भ्रम बन दहन भए खिन भीतरि राम नाम परहारि ॥1॥ रहाउ ॥
काम क्रोध निंदा परहरीआ काढे साधू कै संगि मारि ॥

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे भाई! परमात्मा ने (जिस मनुष्य के) मन का खोट (मानो) कुहाड़े से काट दिया। उसके अंदर से प्रभू के नाम की चोट से एक छिन में ही भटकना के जंगलों के जंगल ही जल (के राख हो) गए। 1। रहाउ। हे भाई! गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य गुरू की संगति में रह के काम क्रोध निंदा आदि विकारों को (अपने अंदर से) दूर कर देता है मार-मार के निकाल देता है

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1225 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।