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अंग 1225

अंग
1225
राग सारंग
राग: सारंग · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
पूरन होत न कतहु बातहि अंति परती हारि ॥1॥ रहाउ ॥
सांति सूख न सहजु उपजै इहै इसु बिउहारि ॥
आप पर का कछु न जानै काम क्रोधहि जारि ॥1॥
संसार सागरु दुखि बिआपिओ दास लेवहु तारि ॥
चरन कमल सरणाइ नानक सद सदा बलिहारि ॥2॥84॥107॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: किसी भी बात से (यह तृष्णा) तृप्त नहीं होती। (जिंदगी के आखिर तक) यह सफल नहीं होती (और-और बढ़ती ही रहती है)। 1। रहाउ। हे भाई ! (तृष्धा के कारण मनुष्य के मन में कभी) शांति पैदा नहीं होती। आनंद नहीं बनता। आत्मिक अडोलता नहीं उपजती। बस ! इस तृष्णा का (सदा) यही व्यवहार है। काम और क्रोध से (यह तृष्णा मनुष्य का अंदरला) जला देती है। किसी का लिहज़ नहीं करतीै। 1। हे भाई ! तृष्णा के कारण जीव पर संसार-समुंद्र अपना जोर डाले रखता है। (जीव) दुख में फसा रहता है। (पर। हे प्रभू !) आप अपने सेवकों को (इस संसार-समुंद्र से) पार लंघा लेता है। हे नानक ! कह- (हे प्रभू !) मैं (भी) आपके सुंदर चरणों की शरण आया हूँ। मैं आपसे सदा-सदा सदके जाता हूँ। 2। 84। 107।
सारग महला 5 ॥
रे पापी तै कवन की मति लीन ॥
निमख घरी न सिमरि सुआमी जीउ पिंडु जिनि दीन ॥1॥ रहाउ ॥
खात पीवत सवंत सुखीआ नामु सिमरत खीन ॥
गरभ उदर बिललाट करता तहां होवत दीन ॥1॥
महा माद बिकार बाधा अनिक जोनि भ्रमीन ॥
गोबिंद बिसरे कवन दुख गनीअहि सुखु नानक हरि पद चीन॑ ॥2॥85॥108॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे पापी ! तूने किस की (बुरी) मति ले ली है। जिस मालिक-प्रभू ने आपको यह जिंद दी। यह शरीर दिया। उसको आप बघड़ी भर के लिए भी आँख झपकने जितने समय के लिए भी याद नहीं करता। 1। रहाउ। हे पापी ! खाता। पीता। सोता तो आप खुश रहता है पर प्रभू का नाम सिमरते हुए आप आलसी हैं जाता है। जब आप माँ के पेट में था। तब बिलकता था। तब आप गरीबड़ा सा बना रहता था। 1। हे पापी ! बड़े-बड़े विकारों की मस्ती में बंधा हुआ आप अनेकों जूनियों में भटकता । हे नानक ! (कह- हे भाई !) परमात्मा का नाम भूलने से इतने दुख आते हैं कि गिने नहीं जा सकते। परमात्मा के चरणों से सांझ डालने से ही सुख मिलता है। 2। 85। 108।
सारग महला 5 ॥
माई री चरनह ओट गही ॥
दरसनु पेखि मेरा मनु मोहिओ दुरमति जात बही ॥1॥ रहाउ ॥
अगह अगाधि ऊच अबिनासी कीमति जात न कही ॥
जलि थलि पेखि पेखि मनु बिगसिओ पूरि रहिओ स्रब मही ॥1॥
दीन दइआल प्रीतम मनमोहन मिलि साधह कीनो सही ॥
सिमरि सिमरि जीवत हरि नानक जम की भीर न फही ॥2॥86॥109॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे माँ ! (जब का) परमात्मा के चरणों का आसरा लिया है। (उसके) दर्शन करके मेरा मन मोहा गया है। (मेरे अंदर से) बुरी मति बह गई है। 1। रहाउ। हे माँ ! वह परमात्मा अथाह है बेअंत गहरा है। बहुत ऊँचा है। कभी नहीं मरता। उसका मूल्य नहीं पाया जा सकता। जल में धरती में (हर जगह उसको) देख के मेरा मन खिला रहता है। हे माँ ! वह सारी सृष्टि में व्यापक है। 1। हे माँ ! साध-संगति में मिल के गरीबों पर दया करने वाले और मन को मोह लेने वाले प्रीतम का मैंने दर्शन किया है। हे नानक ! (कह- हे माँ !) परमात्मा का नाम सिमर-सिमर के आत्मिक जीवन मिलता है। और जमों के चुंगल में नहीं फसता। 2। 86। 109।
सारग महला 5 ॥
माई री मनु मेरो मतवारो ॥
पेखि दइआल अनद सुख पूरन हरि रसि रपिओ खुमारो ॥1॥ रहाउ ॥
निरमल भए ऊजल जसु गावत बहुरि न होवत कारो ॥
चरन कमल सिउ डोरी राची भेटिओ पुरखु अपारो ॥1॥
करु गहि लीने सरबसु दीने दीपक भइओ उजारो ॥
नानक नामि रसिक बैरागी कुलह समूहां तारो ॥2॥87॥110॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे माँ ! मेरा मन (प्रभू के दीदार में) मस्त हो रहा है। उस दया के सोमे प्रभू का दर्शन करके मेरे अंदर पूरी तरह से आत्मिक आनंद सुख बना हुआ है। मेरा मन प्रेम-रस से रंगा गया है और मस्त है। 1। रहाउ। हे माँ ! परमात्मा का यश गाते हुए जिस मनुष्य का मन निर्मल-उज्जवल हो जाता है। वह दोबारा (विकारों से) काला नहीं होता। (सिफतसालाह की बरकति से) जिस मनुष्य के मन की डोर प्रभू के सुंदर चरणों के साथ जुड़ती है। उसको बेअंत प्रभू मिल जाता है। 1। हे माँ ! जिस मनुष्य का हाथ पकड़ के प्रभू उसको अपना बना लेता है। उसको सब कुछ बख्शता है। उसके अंदर (नाम के) दीए का प्रकाश हो जाता है। हे नानक ! परमात्मा के नाम में प्रीत प्रेम जोड़ने वाला मनुष्य अपनी सारी कुलों को (संसार-समुंद्र से) पार लंघा लेता है। 2। 87। 110।
सारग महला 5 ॥
माई री आन सिमरि मरि जांहि ॥
तिआगि गोबिदु जीअन को दाता माइआ संगि लपटाहि ॥1॥ रहाउ ॥
नामु बिसारि चलहि अन मारगि नरक घोर महि पाहि ॥
अनिक सजांई गणत न आवै गरभै गरभि भ्रमाहि ॥1॥
से धनवंते से पतिवंते हरि की सरणि समाहि ॥
गुर प्रसादि नानक जगु जीतिओ बहुरि न आवहि जांहि ॥2॥88॥111॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे माँ ! वह (प्रभू के बिना) और को मन में बसाए रख के आत्मिक मौत सहेड़ लेते हैं। सारे जीवों को दातें देने वाले परमात्मा को छोड़ के जो मनुष्य (सदा) माया के साथ चिपके रहते हैं। 1। रहाउ। हे माँ ! जो मनुष्य परमात्मा का नाम भुला के और (जीवन-) राह पर चलते हैं। वे भयानक नर्क में पड़े रहते हैं। उनको इतनी सजाएं मिलती रहती हैं कि उनकी गिनती नहीं हो सकती। वे हरेक जून में भटकते फिरते हैं। 1। हे माँ ! जो मनुष्य परमात्मा की शरण में टिके रहते हैं। वे धन वाले हैं। वे इज्जत वाले हैं। हे नानक ! (कह- हे माँ !) गुरू की मेहर से उन्होंने जगत (के मोह) को जीत लिया है। वे बार-बार ना पैदा होते हैं ना मरते हैं। 2। 88। 111।
सारग महला 5 ॥
हरि काटी कुटिलता कुठारि ॥
भ्रम बन दहन भए खिन भीतरि राम नाम परहारि ॥1॥ रहाउ ॥
काम क्रोध निंदा परहरीआ काढे साधू कै संगि मारि ॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे भाई ! परमात्मा ने (जिस मनुष्य के) मन का खोट (मानो) कुहाड़े से काट दिया। उसके अंदर से प्रभू के नाम की चोट से एक छिन में ही भटकना के जंगलों के जंगल ही जल (के राख हो) गए। 1। रहाउ। हे भाई ! गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य गुरू की संगति में रह के काम क्रोध निंदा आदि विकारों को (अपने अंदर से) दूर कर देता है मार-मार के निकाल देता है

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।

अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।

इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “किसी भी बात से (यह तृष्णा) तृप्त नहीं होती।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।