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अंग 1224

अंग
1224
राग सारंग
राग: सारंग · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
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नानक दासु दरसु प्रभ जाचै मन तन को आधार ॥2॥78॥101॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: (आपका) दास नानक आपके दर्शन माँगता है। यही (इसके) मन का तन का आसरा है। 2। 78। 101।
सारग महला 5 ॥
मैला हरि के नाम बिनु जीउ ॥
तिनि प्रभि साचै आपि भुलाइआ बिखै ठगउरी पीउ ॥1॥ रहाउ ॥
कोटि जनम भ्रमतौ बहु भांती थिति नही कतहू पाई ॥
पूरा सतिगुरु सहजि न भेटिआ साकतु आवै जाई ॥1॥
राखि लेहु प्रभ संम्रिथ दाते तुम प्रभ अगम अपार ॥
नानक दास तेरी सरणाई भवजलु उतरिओ पार ॥2॥79॥102॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे भाई ! परमात्मा के नाम के बिना जीव विकारों में भरा रहता है। (पर। जीव के भी क्या वश।) उस सदा-स्थिर प्रभू ने आप ही इसको गलत राह पर डाला हुआ है कि विषियों की ठॅग-बूटी (घोट-घोट के) पीता रह। 1। रहाउ। हे भाई ! परमात्मा से टूटा हुआ मनुष्य कई तरीकों से करोड़ों जन्मों में भटकता रहता है। कहीं भी (इस चक्कर में से इसको) मुक्ति नहीं मिलती। आत्मिक अडोलता में (पहुँचाने वाला) पूरा गुरू इसको नहीं मिलता (इस वास्ते सदा) पैदा होता मरता रहता है। 1। हे सब ताकतों के मालिक प्रभू ! हे सब दातें देने वाले ! हम जीवों के लिए आप अपहुँच है बेअंत है। आप स्वयं ही रक्षा कर। हे नानक ! (कह- हे प्रभू ! जो आपका) दास आपकी शरण आता है। वह संसार-समुंद्र से पार लांघ जाता है। 2। 79। 102।
सारग महला 5 ॥
रमण कउ राम के गुण बाद ॥
साधसंगि धिआईऐ परमेसरु अंम्रित जा के सुआद ॥1॥ रहाउ ॥
सिमरत एकु अचुत अबिनासी बिनसे माइआ माद ॥
सहज अनद अनहद धुनि बाणी बहुरि न भए बिखाद ॥1॥
सनकादिक ब्रहमादिक गावत गावत सुक प्रहिलाद ॥
पीवत अमिउ मनोहर हरि रसु जपि नानक हरि बिसमाद ॥2॥80॥103॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे भाई ! परमात्मा के गुणों का उच्चारण- यह ही सिमरन के लिए (श्रेष्ठ दाति है)। हे भाई ! जिस परमेश्वर के (नाम जपने के) रस आत्मिक-जीवन देने वाले हैं। उसका ध्यान साध-संगति में टिक के धरना चाहिए। 1। रहाउ। हे भाई ! अविनाशी नाश-रहित प्रभू का नाम सिमरते हुए माया के सारे नशे नाश हो जाते हैं। (सिमरन वाले के अंदर) आत्मिक अडोलता के आनंद बने रहते हैं। सिफतसालाह की बाणी की ण्क-रस रौंअ निरंतर चलने लगती है। उसके मन में दुख-कलेश नहीं रह जाते। 1। हे भाई ! सनक आदि ब्रहमा के चारों पुत्र। ब्रहमा आदि देवतागण (उस प्रभू की सिफतसालाह के गीत) गाते रहते हैं। शुकदेव ऋषि प्रहलाद भगत आदि उसके गुण गाते हैं। हे नानक ! मन को मोहने वाले हरी का आत्मिक-जीवन देने वाला नाम-रस पीते हुए। हरी का नाम जप-जप के मनुष्य के अंद रवह अवस्था पैदा हो जाती है कि जहाँ यह सदा वाह-वाह की मस्ती में टिका रहता है। 2। 80। 103।
सारग महला 5 ॥
कीन॑े पाप के बहु कोट ॥
दिनसु रैनी थकत नाही कतहि नाही छोट ॥1॥ रहाउ ॥
महा बजर बिख बिआधी सिरि उठाई पोट ॥
उघरि गईआं खिनहि भीतरि जमहि ग्रासे झोट ॥1॥
पसु परेत उसट गरधभ अनिक जोनी लेट ॥
भजु साधसंगि गोबिंद नानक कछु न लागै फेट ॥2॥81॥104॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे भाई ! (हरी-नाम से विछुड़ के) मनुष्य पापों की अनेकों किले (चार दिवारियां) (अपनी जिंद के चारों तरफ) खड़ी करता जाता है। दिन-रात (पाप करते हुए) थकता नहीं (साध-संगति के बिना और) कहीं भी (पापों से) इसकी मुक्ति नहीं मिल सकती। 1। रहाउ। हे भाई ! (हरी-नाम से विछुड़ के) मनुष्य बड़े कठोर और आत्मिक मौत लाने वाले रोगों की पोटली (अपने) सिर पर उठाए रखता है। जब जमों ने (आ के) केसों से पकड़ लिया। तब एक-छिन में ही (इसकी) आँखें खुल जाती हैं (पर। तब क्या फायदा।)। 1। हे भाई ! (पापों की पोटली के कारण) जीव पशू। प्रेत। ऊँठ। गधा आदि अनेकों जूनियों में भटकता फिरता है। हे नानक ! (कह- हे भाई !) साध-संगति में टिक के परमात्मा का भजन किया कर। फिर (जमों की) रक्ती भर भी चोट नहीं लगेगी। 2। 81। 104।
सारग महला 5 ॥
अंधे खावहि बिसू के गटाक ॥
नैन स्रवन सरीरु सभु हुटिओ सासु गइओ तत घाट ॥1॥ रहाउ ॥
अनाथ रञाणि उदरु ले पोखहि माइआ गईआ हाटि ॥
किलबिख करत करत पछुतावहि कबहु न साकहि छांटि ॥1॥
निंदकु जमदूती आइ संघारिओ देवहि मूंड उपरि मटाक ॥
नानक आपन कटारी आपस कउ लाई मनु अपना कीनो फाट ॥2॥82॥105॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे भाई ! (माया के मोह में) अंधे हो चुके मनुष्य आत्मिक मौत लाने वाले पदार्थ ही खुश हो-हो के खाते रहते हैं (आखिर मौत सिर पर आ जाती है)। आँखें। कान। शरीर- हरेक अंग काम करने से रह जाता है। और। सांसें भी खत्म हो जाती हैं। 1। रहाउ। हे भाई ! (माया के मोह में अंधे हो चुके मनुष्य) कमजोरों को दुख दे-दे के अपना पेट पालते रहते हैं (पर मौत आने पर) वह माया भी साथ छोड़ देती है। ऐसे मनुष्य पाप करते-करते पछताते भी हैं। (पर। इन पापों को) छोड़ नहीं सकते। 1। हे भाई ! (यही हाल होता है निंदक मनुष्य का। निंदक सारी उम्र संत-जनों पर दूषणबाजी करता रहता है। आखिर में जब) जमदूत निंदक को आ पकड़ते हैं। उसके सिर के ऊपर (मौत की) चोट आ चलाते हैं। हे नानक ! (सारी उम्र) निंदक अपनी छुरी अपने ऊपर ही चलाता रहता है। अपने ही मन को निंदा के जख़्म लगाता रहता है। 2। 82। 105।
सारग महला 5 ॥
टूटी निंदक की अध बीच ॥
जन का राखा आपि सुआमी बेमुख कउ आइ पहूची मीच ॥1॥ रहाउ ॥
उस का कहिआ कोइ न सुणई कही न बैसणु पावै ॥
ईहां दुखु आगै नरकु भुंचै बहु जोनी भरमावै ॥1॥
प्रगटु भइआ खंडी ब्रहमंडी कीता अपणा पाइआ ॥
नानक सरणि निरभउ करते की अनद मंगल गुण गाइआ ॥2॥83॥106॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे भाई ! संतजनों की निंदा करने वाले मनुष्य की जिंदगी निष्फल जाती है। मालिक-प्रभू स्वयं अपने सेवक की रक्षा करने वाला है। पर जो मनुष्य संत-जनों से मुँह मोड़े रखता है। वह आत्मिक मौत सहेड़ लेता है। 1। रहाउ। हे भाई ! संतजनों की निंदा करने वाले मनुष्य की बात पर कोई ऐतबार नहीं करता। उसको कहीं भी इज्जत वाली जगह नहीं मिलती। निंदक इस लोक में दुख पाता है। (क्योंकि कोई उसकी इज्जत नहीं करता)। परलोक में वह नर्क भोगता है। अनेकों जूनियों में भटकता है। 1। हे भाई ! संतजनों की निंदा करने वाले मनुष्य अपने (इस) किए का (यह) फल पाता है कि सारे जगत में बदनाम हो जाता है। हे नानक ! (प्रभू का सेवक) निर्भय करतार की शरण पड़ा रहता है। प्रभू के गुण गाता है। उसके अंदर आहित्मक आनंद बना रहता है। आत्मिक खुशियां बनी रहती हैं। 2। 83। 106।
सारग महला 5 ॥
त्रिसना चलत बहु परकारि ॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे भाई ! (मनुष्य के अंदर) तृष्णा कई तरीकों से दौड़-भाग करती रहती है।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।

अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।

इस अंग पर 7 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(आपका) दास नानक आपके दर्शन माँगता है।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।