हरि हरि संत जना की जीवनि ॥
बिखै रस भोग अंम्रित सुख सागर राम नाम रसु पीवनि ॥1॥ रहाउ ॥
संचनि राम नाम धनु रतना मन तन भीतरि सीवनि ॥
हरि रंग रांग भए मन लाला राम नाम रस खीवनि ॥1॥
जिउ मीना जल सिउ उरझानो राम नाम संगि लीवनि ॥
नानक संत चात्रिक की निआई हरि बूंद पान सुख थीवनि ॥2॥68॥91॥
हरि के नामहीन बेताल ॥
जेता करन करावन तेता सभि बंधन जंजाल ॥1॥ रहाउ ॥
बिनु प्रभ सेव करत अन सेवा बिरथा काटै काल ॥
जब जमु आइ संघारै प्रानी तब तुमरो कउनु हवाल ॥1॥
राखि लेहु दास अपुने कउ सदा सदा किरपाल ॥
सुख निधान नानक प्रभु मेरा साधसंगि धन माल ॥2॥69॥92॥
मनि तनि राम को बिउहारु ॥
प्रेम भगति गुन गावन गीधे पोहत नह संसारु ॥1॥ रहाउ ॥
स्रवणी कीरतनु सिमरनु सुआमी इहु साध को आचारु ॥
चरन कमल असथिति रिद अंतरि पूजा प्रान को आधारु ॥1॥
प्रभ दीन दइआल सुनहु बेनंती किरपा अपनी धारु ॥
नामु निधानु उचरउ नित रसना नानक सद बलिहारु ॥2॥70॥93॥
हरि के नामहीन मति थोरी ॥
सिमरत नाहि सिरीधर ठाकुर मिलत अंध दुख घोरी ॥1॥ रहाउ ॥
हरि के नाम सिउ प्रीति न लागी अनिक भेख बहु जोरी ॥
तूटत बार न लागै ता कउ जिउ गागरि जल फोरी ॥1॥
करि किरपा भगति रसु दीजै मनु खचित प्रेम रस खोरी ॥
नानक दास तेरी सरणाई प्रभ बिनु आन न होरी ॥2॥71॥94॥
चितवउ वा अउसर मन माहि ॥
होइ इकत्र मिलहु संत साजन गुण गोबिंद नित गाहि ॥1॥ रहाउ ॥
बिनु हरि भजन जेते काम करीअहि तेते बिरथे जांहि ॥
पूरन परमानंद मनि मीठो तिसु बिनु दूसर नाहि ॥1॥
जप तप संजम करम सुख साधन तुलि न कछूऐ लाहि ॥
चरन कमल नानक मनु बेधिओ चरनह संगि समाहि ॥2॥72॥95॥
मेरा प्रभु संगे अंतरजामी ॥
आगै कुसल पाछै खेम सूखा सिमरत नामु सुआमी ॥1॥ रहाउ ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।
अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।
इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “सारग महला 5 ॥ यह ही जिंदगी संत जनों की।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।