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अंग 1222

अंग
1222
राग सारंग
राग: सारंग · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सारग महला 5 ॥
हरि हरि संत जना की जीवनि ॥
बिखै रस भोग अंम्रित सुख सागर राम नाम रसु पीवनि ॥1॥ रहाउ ॥
संचनि राम नाम धनु रतना मन तन भीतरि सीवनि ॥
हरि रंग रांग भए मन लाला राम नाम रस खीवनि ॥1॥
जिउ मीना जल सिउ उरझानो राम नाम संगि लीवनि ॥
नानक संत चात्रिक की निआई हरि बूंद पान सुख थीवनि ॥2॥68॥91॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ यह ही जिंदगी संत जनों की। हे भाई ! परमात्मा के भगत आत्मिक जीवन देने वाले सुखों के समुंद्र हरी-नाम का रस (सदा) पीते रहते हैं। यही उनके लिए दुनिया वाले विषौ भोगों का स्वाद है- 1। रहाउ। हे भाई ! संत जन परमात्मा का नाम-धन एकत्र करते हैं। नाम-रत्न इकट्ठा करते हैं। और अपने मन में हृदय में (उनको) परो (सिल के) रखते हैं। परमात्मा के नाम-रंग के साथ रंग के उनका मन गाढ़े रंग वाला हुआ रहता है। वे हरी-नाम के रस से मस्त रहते हैं। 1। हे भाई ! जैसे मछली पानी से लिपटी रहती है (पानी के बिना जी नहीं सकती) वैसे ही संत जन हरी-नाम में लीन रहते हैं। हे नानक ! संत जन पपीहे की तरह हैं (जैसे पपीहा स्वाति नक्षत्र की बरखा की बूँद पी के तृप्त होता है। वैसे संत जन) परमात्मा के नाम की बूँद पी के सुखी होते हैं। 2। 68। 91।
सारग महला 5 ॥
हरि के नामहीन बेताल ॥
जेता करन करावन तेता सभि बंधन जंजाल ॥1॥ रहाउ ॥
बिनु प्रभ सेव करत अन सेवा बिरथा काटै काल ॥
जब जमु आइ संघारै प्रानी तब तुमरो कउनु हवाल ॥1॥
राखि लेहु दास अपुने कउ सदा सदा किरपाल ॥
सुख निधान नानक प्रभु मेरा साधसंगि धन माल ॥2॥69॥92॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे भाई ! परमात्मा के नाम से जो मनुष्य वंचित रहते हैं (आत्मिक-जीवन की कसवटी के अनुसार) वे भूत-प्रेत ही हैं। (ऐसे मनुष्य) जितना कुछ करते हैं और करवाते हैं। उनके सारे काम माया के फंदे माया के जंजाल (बढ़ाते हैं)। 1। रहाउ। हे भाई ! परमात्मा की भगती के बिना और-और की सेवा करते हुए (मनुष्य अपनी जिंदगी का) समय व्यर्थ बिताता है। हे प्राणी ! (अगर आप हरी-नाम के बिना ही रहा। तो) जब जमराज आ के मारता है। तब (सोच) आपका क्या हाल होंगे। 1। हे सदा ही दया के श्रोत ! अपने दास (नानक) की स्वयं रक्षा कर (और। अपना नाम बख्श)। हे नानक ! (कह- हे भाई !) मेरा प्रभू सारे सुखों का खजाना है। उसका नाम-धन साध-संगति में ही मिलता है। 2। 69। 92।
सारग महला 5 ॥
मनि तनि राम को बिउहारु ॥
प्रेम भगति गुन गावन गीधे पोहत नह संसारु ॥1॥ रहाउ ॥
स्रवणी कीरतनु सिमरनु सुआमी इहु साध को आचारु ॥
चरन कमल असथिति रिद अंतरि पूजा प्रान को आधारु ॥1॥
प्रभ दीन दइआल सुनहु बेनंती किरपा अपनी धारु ॥
नामु निधानु उचरउ नित रसना नानक सद बलिहारु ॥2॥70॥93॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे भाई ! जिन मनुष्यों के मन में हृदय में (सदा) परमात्मा का (नाम सिमरन का ही) आहर है। जो मनुष्य प्रभू-प्रेम और हरी-भगती (के मतवाले हैं) जो प्रभू के गुण गाने में गिझे (प्रेम से मस्त) हुए हैं। उनको जगत (का मोह) पोह नहीं सकता। 1। रहाउ। हे भाई ! कानों से मालिक-प्रभू की सिफतसालाह सुननी। (जीभ से मालिक का नाम) सिमरना- संत-जनों की यह नित्य की करणी हुआ करती है। उनके हृदय में परमात्मा के सुंदर चरणों का टिकाव हमेशा बना रहता है। प्रभू की पूजा-भगती उनके प्राणों का आसरा होता है। 1। हे नानक ! (कह-) हे दीनों पर दया करने वाले प्रभू ! (मेरी) बिनती सुन। (मेरे पर) अपनील मेहर कर। आपका नाम ही (मेरे वास्ते सब पदार्थों का) खजाना है (मेहर कर। मैं यह नाम) जीभ से सदा उचारता रहूँ। और आपसे सदा सदके होता रहूँ। 2। 70। 93।
सारग महला 5 ॥
हरि के नामहीन मति थोरी ॥
सिमरत नाहि सिरीधर ठाकुर मिलत अंध दुख घोरी ॥1॥ रहाउ ॥
हरि के नाम सिउ प्रीति न लागी अनिक भेख बहु जोरी ॥
तूटत बार न लागै ता कउ जिउ गागरि जल फोरी ॥1॥
करि किरपा भगति रसु दीजै मनु खचित प्रेम रस खोरी ॥
नानक दास तेरी सरणाई प्रभ बिनु आन न होरी ॥2॥71॥94॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे भाई ! जो मनुष्य परमात्मा के नाम से वंचित रहते हैं। उनकी मति होछी सी ही बन जाती है। वे लक्ष्मी-पति मालिक-प्रभू का नाम नहीं सिमरते। माया के मोह में अंधे हो चुके उन मनुष्यों को भयानक (आत्मिक) दुख-कलेश होते रहते हैं। 1। रहाउ। हे भाई ! जो मनुष्य परमात्मा के नाम से प्यार नहीं डालते। पर अनेकों धार्मिक भेषों से प्रीत जोड़ी रखते हैं। उनकी इस प्रीत के टूटते देर नहीं लगती। जैसे टूटी हुई गागर में पानी नहीं ठहर सकता। 1। हे नानक ! (कह- हे प्रभू !) मेहर कर। मुझे अपनी भगती का स्वाद बख्श। मेरा मन आपके प्रेम-रस की ख़ुमारी में मस्त रहे। हे प्रभू ! (आपका) दास नानक आपकी शरण आया है। हे प्रभू ! आपके बिना मेरा और कोई दूसरा सहारा नहीं। 2। 71। 94।
सारग महला 5 ॥
चितवउ वा अउसर मन माहि ॥
होइ इकत्र मिलहु संत साजन गुण गोबिंद नित गाहि ॥1॥ रहाउ ॥
बिनु हरि भजन जेते काम करीअहि तेते बिरथे जांहि ॥
पूरन परमानंद मनि मीठो तिसु बिनु दूसर नाहि ॥1॥
जप तप संजम करम सुख साधन तुलि न कछूऐ लाहि ॥
चरन कमल नानक मनु बेधिओ चरनह संगि समाहि ॥2॥72॥95॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे भाई ! मैं तो अपने मन उस मौके का इन्तजार करता रहता हूँ। जब में संतों-सज्जनों को मिलूँ जो नित्य इकट्ठे हो के परमात्मा के गुण गाते रहते हैं। 1। रहाउ। हे भाई ! परमात्मा के भजन के बिना और जितने भी काम किए जाते हैं। वे सारे (जिंद के हिसाब से) व्यर्थ चले जाते हैं। सर्व-व्यापक और सब से ऊँचे आनंद के मालिक का नाम मन में मीठा लगना- यही है असल लाभदायक काम। (क्योंकि) उस परमात्मा के बिना और कोई (साथी) नहीं। 1। हे नानक ! (कह-) जप-तप-संजम आदि हठ-कर्म और सुख की तलाश के और साधन – परमात्मा के नाम की बराबरी नहीं कर सकते और संत-जन इनको कुछ भी नहीं समझते (तुच्छ समझते हैं)। संत जनों का मन परमात्मा के सुंदर चरणों में भेदा रहता है। संत जन परमात्मा के चरणों में ही लीन रहते हैं। 2। 72। 95।
सारग महला 5 ॥
मेरा प्रभु संगे अंतरजामी ॥
आगै कुसल पाछै खेम सूखा सिमरत नामु सुआमी ॥1॥ रहाउ ॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे भाई ! सबके दिल की जानने वाला मेरा प्रभू (हर वक्त मेरे) साथ है- (जिस मनुष्य को यही निश्चय बन जाता है। उसको) मालिक-प्रभू का नाम सिमरते हुए परलोक और इस लोक में सदा सुख-आनंद बना रहता है। 1। रहाउ।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।

अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।

इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “सारग महला 5 ॥ यह ही जिंदगी संत जनों की।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।