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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 1222 · सारंग

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अंग
1222
सारंग
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  1. हरि हरि संत जना की जीवनि ॥
  2. हरि के नामहीन बेताल ॥
  3. मनि तनि राम को बिउहारु ॥
  4. हरि के नामहीन मति थोरी ॥
  5. चितवउ वा अउसर मन माहि ॥
  6. मेरा प्रभु संगे अंतरजामी ॥

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग सारंग

हरि हरि संत जना की जीवनि ॥

सारग महला 5 ॥
हरि हरि संत जना की जीवनि ॥
बिखै रस भोग अंम्रित सुख सागर राम नाम रसु पीवनि ॥1॥ रहाउ ॥
संचनि राम नाम धनु रतना मन तन भीतरि सीवनि ॥
हरि रंग रांग भए मन लाला राम नाम रस खीवनि ॥1॥
जिउ मीना जल सिउ उरझानो राम नाम संगि लीवनि ॥
नानक संत चात्रिक की निआई हरि बूंद पान सुख थीवनि ॥2॥68॥91॥

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ यह ही जिंदगी संत जनों की। हे भाई! परमात्मा के भगत आत्मिक जीवन देने वाले सुखों के समुंद्र हरी-नाम का रस (सदा) पीते रहते हैं। यही उनके लिए दुनिया वाले विषौ भोगों का स्वाद है, 1। रहाउ। हे भाई! संत जन परमात्मा का नाम-धन एकत्र करते हैं। नाम-रत्न इकट्ठा करते हैं। और अपने मन में हृदय में (उनको) परो (सिल के) रखते हैं। परमात्मा के नाम-रंग के साथ रंग के उनका मन गाढ़े रंग वाला हुआ रहता है। वे हरी-नाम के रस से मस्त रहते हैं। 1। हे भाई! जैसे मछली पानी से लिपटी रहती है (पानी के बिना जी नहीं सकती) वैसे ही संत जन हरी-नाम में लीन रहते हैं। हे नानक! संत जन पपीहे की तरह हैं (जैसे पपीहा स्वाति नक्षत्र की बरखा की बूँद पी के तृप्त होता है, वैसे संत जन) परमात्मा के नाम की बूँद पी के सुखी होते हैं। 2। 68। 91।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग सारंग

हरि के नामहीन बेताल ॥

सारग महला 5 ॥
हरि के नामहीन बेताल ॥
जेता करन करावन तेता सभि बंधन जंजाल ॥1॥ रहाउ ॥
बिनु प्रभ सेव करत अन सेवा बिरथा काटै काल ॥
जब जमु आइ संघारै प्रानी तब तुमरो कउनु हवाल ॥1॥
राखि लेहु दास अपुने कउ सदा सदा किरपाल ॥
सुख निधान नानक प्रभु मेरा साधसंगि धन माल ॥2॥69॥92॥

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे भाई! परमात्मा के नाम से जो मनुष्य वंचित रहते हैं (आत्मिक-जीवन की कसवटी के अनुसार) वे भूत-प्रेत ही हैं। (ऐसे मनुष्य) जितना कुछ करते हैं और करवाते हैं। उनके सारे काम माया के फंदे माया के जंजाल (बढ़ाते हैं)। 1। रहाउ। हे भाई! परमात्मा की भगती के बिना और-और की सेवा करते हुए (मनुष्य अपनी जिंदगी का) समय व्यर्थ बिताता है। हे प्राणी! (अगर आप हरी-नाम के बिना ही रहे, तो) जब जमराज आ के मारता है, तब (सोचें) आपका क्या हाल होंगे। 1। हे सदा ही दया के श्रोत! अपने दास (नानक) की स्वयं रक्षा करें (और, अपना नाम बख्शें)। हे नानक! (कहें: हे भाई!) मेरा प्रभू सारे सुखों का खजाना है। उसका नाम-धन साध-संगति में ही मिलता है। 2। 69। 92।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग सारंग

मनि तनि राम को बिउहारु ॥

सारग महला 5 ॥
मनि तनि राम को बिउहारु ॥
प्रेम भगति गुन गावन गीधे पोहत नह संसारु ॥1॥ रहाउ ॥
स्रवणी कीरतनु सिमरनु सुआमी इहु साध को आचारु ॥
चरन कमल असथिति रिद अंतरि पूजा प्रान को आधारु ॥1॥
प्रभ दीन दइआल सुनहु बेनंती किरपा अपनी धारु ॥
नामु निधानु उचरउ नित रसना नानक सद बलिहारु ॥2॥70॥93॥

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे भाई! जिन मनुष्यों के मन में हृदय में (सदा) परमात्मा का (नाम सिमरन का ही) आहर है। जो मनुष्य प्रभू-प्रेम और हरी-भगती (के मतवाले हैं) जो प्रभू के गुण गाने में गिझे (प्रेम से मस्त) हुए हैं। उनको जगत (का मोह) पोह नहीं सकता। 1। रहाउ। हे भाई! कानों से मालिक-प्रभू की सिफतसालाह सुननी। (जीभ से मालिक का नाम) सिमरना, संत-जनों की यह नित्य की करणी हुआ करती है। उनके हृदय में परमात्मा के सुंदर चरणों का टिकाव हमेशा बना रहता है। प्रभू की पूजा-भगती उनके प्राणों का आसरा होता है। 1। हे नानक! (कहें:) हे दीनों पर दया करने वाले प्रभू! (मेरी) बिनती सुनें। (मेरे पर) अपनील मेहर करें। आपका नाम ही (मेरे वास्ते सब पदार्थों का) खजाना है (मेहर करें। मैं यह नाम) जीभ से सदा उचारता रहूँ। और आपसे सदा सदके होता रहूँ। 2। 70। 93।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग सारंग

हरि के नामहीन मति थोरी ॥

सारग महला 5 ॥
हरि के नामहीन मति थोरी ॥
सिमरत नाहि सिरीधर ठाकुर मिलत अंध दुख घोरी ॥1॥ रहाउ ॥
हरि के नाम सिउ प्रीति न लागी अनिक भेख बहु जोरी ॥
तूटत बार न लागै ता कउ जिउ गागरि जल फोरी ॥1॥
करि किरपा भगति रसु दीजै मनु खचित प्रेम रस खोरी ॥
नानक दास तेरी सरणाई प्रभ बिनु आन न होरी ॥2॥71॥94॥

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे भाई! जो मनुष्य परमात्मा के नाम से वंचित रहते हैं। उनकी मति होछी सी ही बन जाती है। वे लक्ष्मी-पति मालिक-प्रभू का नाम नहीं सिमरते। माया के मोह में अंधे हो चुके उन मनुष्यों को भयानक (आत्मिक) दुख-कलेश होते रहते हैं। 1। रहाउ। हे भाई! जो मनुष्य परमात्मा के नाम से प्यार नहीं डालते। पर अनेकों धार्मिक भेषों से प्रीत जोड़ी रखते हैं। उनकी इस प्रीत के टूटते देर नहीं लगती। जैसे टूटी हुई गागर में पानी नहीं ठहर सकता। 1। हे नानक! (कहें: हे प्रभू!) मेहर करें। मुझे अपनी भगती का स्वाद बख्शें। मेरा मन आपके प्रेम-रस की ख़ुमारी में मस्त रहे। हे प्रभू! (आपका) दास नानक आपकी शरण आया है। हे प्रभू! आपके बिना मेरा और कोई दूसरा सहारा नहीं। 2। 71। 94।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग सारंग

चितवउ वा अउसर मन माहि ॥

सारग महला 5 ॥
चितवउ वा अउसर मन माहि ॥
होइ इकत्र मिलहु संत साजन गुण गोबिंद नित गाहि ॥1॥ रहाउ ॥
बिनु हरि भजन जेते काम करीअहि तेते बिरथे जांहि ॥
पूरन परमानंद मनि मीठो तिसु बिनु दूसर नाहि ॥1॥
जप तप संजम करम सुख साधन तुलि न कछूऐ लाहि ॥
चरन कमल नानक मनु बेधिओ चरनह संगि समाहि ॥2॥72॥95॥

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे भाई! मैं तो अपने मन उस मौके का इन्तजार करता रहता हूँ। जब में संतों-सज्जनों को मिलूँ जो नित्य इकट्ठे हो के परमात्मा के गुण गाते रहते हैं। 1। रहाउ। हे भाई! परमात्मा के भजन के बिना और जितने भी काम किए जाते हैं। वे सारे (जिंद के हिसाब से) व्यर्थ चले जाते हैं। सर्व-व्यापक और सब से ऊँचे आनंद के मालिक का नाम मन में मीठा लगना, यही है असल लाभदायक काम। (क्योंकि) उस परमात्मा के बिना और कोई (साथी) नहीं। 1। हे नानक! (कहें:) जप-तप-संजम आदि हठ-कर्म और सुख की तलाश के और साधन, परमात्मा के नाम की बराबरी नहीं कर सकते और संत-जन इनको कुछ भी नहीं समझते (तुच्छ समझते हैं)। संत जनों का मन परमात्मा के सुंदर चरणों में भेदा रहता है। संत जन परमात्मा के चरणों में ही लीन रहते हैं। 2। 72। 95।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग सारंग

मेरा प्रभु संगे अंतरजामी ॥

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सारग महला 5 ॥
मेरा प्रभु संगे अंतरजामी ॥
आगै कुसल पाछै खेम सूखा सिमरत नामु सुआमी ॥1॥ रहाउ ॥

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे भाई! सबके दिल की जानने वाला मेरा प्रभू (हर वक्त मेरे) साथ है, (जिस मनुष्य को यही निश्चय बन जाता है। उसको) मालिक-प्रभू का नाम सिमरते हुए परलोक और इस लोक में सदा सुख-आनंद बना रहता है। 1। रहाउ।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1222 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।