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अंग 1221

अंग
1221
राग सारंग
राग: सारंग · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सोधत सोधत ततु बीचारिओ भगति सरेसट पूरी ॥
कहु नानक इक राम नाम बिनु अवर सगल बिधि ऊरी ॥2॥62॥85॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: हे भाई ! विचार करते-करते ये अस्लियत मिली है कि परमात्मा की भक्ति ही पूरी तरह से उक्तम (क्रिया) है। हे नानक ! कह- परमात्मा के नाम के बिना और हरेक (जीवन-) ढंग अधूरा है। 2। 62। 85।
सारग महला 5 ॥
साचे सतिगुरू दातारा ॥
दरसनु देखि सगल दुख नासहि चरन कमल बलिहारा ॥1॥ रहाउ ॥
सति परमेसरु सति साध जन निहचलु हरि का नाउ ॥
भगति भावनी पारब्रहम की अबिनासी गुण गाउ ॥1॥
अगमु अगोचरु मिति नही पाईऐ सगल घटा आधारु ॥
नानक वाहु वाहु कहु ता कउ जा का अंतु न पारु ॥2॥63॥86॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे सदा कायम रहने वाले ! हे सतिगुरू ! हे सब दातें देने वाले प्रभू ! आपके दर्शन करके (जीव के) सारे दुख नाश हैं जाते हैं। मैं आपके सुंदर चरणों से सदके जाता हूँ। 1। रहाउ। हे भाई ! परमेश्वर सदा कायम रहने वाला है। (उसके) संत जन अटल जीवन वाले होते हैं। हे भाई ! परमात्मा का नाम अटल रहने वाला है। हे भाई ! (पूरी) श्रद्धा से उस परमात्मा की भक्ति करनी चाहिए। उस कभी ना नाश होने वाले प्रभू के गुण गाया करो। 1। हे नानक ! परमात्मा अपहुँच है। उस तक ज्ञानेन्द्रियों की पहुँच नहीं हो सकती। वह कितना बड़ा है- यह अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। वह परमात्मा सारे शरीरों का आसरा है। हे भाई ! उस प्रभू की सिफत-सालाह किया करो। जिसके गुणों का अंत नहीं पाया जा सकता। जिसके गुणों का परला छोर नहीं ढूँढा जा सकता। 2। 63। 86।
सारग महला 5 ॥
गुर के चरन बसे मन मेरै ॥
पूरि रहिओ ठाकुरु सभ थाई निकटि बसै सभ नेरै ॥1॥ रहाउ ॥
बंधन तोरि राम लिव लाई संतसंगि बनि आई ॥
जनमु पदारथु भइओ पुनीता इछा सगल पुजाई ॥1॥
जा कउ क्रिपा करहु प्रभ मेरे सो हरि का जसु गावै ॥
आठ पहर गोबिंद गुन गावै जनु नानकु सद बलि जावै ॥2॥64॥87॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे भाई ! (जब से) गुरू के चरण मेरे मन में बस गए हैं। (मुझे निष्चय हो गया है कि) मालिक-प्रभू हर जगह मौजूद है। (मेरे) नजदीक बस रहा है। सबक पास बस रहा है। 1। रहाउ। (गुरू ने मेरे माया के मोह के) बंधन तोड़ के मेरी सुरति परमात्मा के साथ जोड़ दी है। हे भाई ! (जब से) गुरू के साथ मुझे प्यार हुआ है मेरा कीमती मनुष्य जनम पवित्र हो गया है। (गुरू ने) मेरी सारी मनोकामनाएं पूरी कर दी हैं। 1। हे मेरे प्रभू ! आप जिस मनुष्य पर मेहर करता है। वह। हे हरी ! आपकी सिफतसालाह के गीत गाता है। हे भाई ! जो मनुष्य आठों पहर (हर वक्त) परमात्मा के गुण गाता है। दास नानक उससे सदा कुर्बान जाता है। 2। 64। 87।
सारग महला 5 ॥
जीवनु तउ गनीऐ हरि पेखा ॥
करहु क्रिपा प्रीतम मनमोहन फोरि भरम की रेखा ॥1॥ रहाउ ॥
कहत सुनत किछु सांति न उपजत बिनु बिसास किआ सेखां ॥
प्रभू तिआगि आन जो चाहत ता कै मुखि लागै कालेखा ॥1॥
जा कै रासि सरब सुख सुआमी आन न मानत भेखा ॥
नानक दरस मगन मनु मोहिओ पूरन अरथ बिसेखा ॥2॥65॥88॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे भाई ! अगर मैं (इसी मनुष्य जन्म में) परमात्मा के दर्शन कर सकूँ। तब ही (मेरा यह असल मनुष्य) जीवन समझा जा सकता है। हे प्रीतम प्रभू ! हे मन को मोह लेने वाले प्रभू ! (मेरे मन में से पिछले जन्मों के) भटकना के संस्कार दूर कर। 1। रहाउ। हे भाई ! सिर्फ कहने-सुनने से (मनुष्य के मन में) कोई शांति पैदा नहीं होती। श्रद्धा के बिना (ज़ुबानी कहने-सुनने का) कोई लाभ नहीं होता। जो मनुष्य (ज़बानी तो ज्ञान की बहुत सारी बातें करता है। पर) प्रभू को भुला के और-और (पदार्थों की) तड़प रखता है। उसके माथे पर (माया के मोह की) कालिख लगी रहती है। 1। हे नानक ! (कह- हे भाई !) जिस मनुष्य के हृदय में सारे सुख देने वाले प्रभू के नाम का सरमाया है। वह अन्य (दिखावे के) धार्मिक भेखों को नहीं मानता फिरता। वह तो (प्रभू के) दर्शग्न में मस्त रहता है। उसका मन (प्रभू के दर्शनों से) मोहिआ जाता है। (प्रभू की कृपा से) उसकी सारी आवश्यक्ताएं विशेष तौर पर पूरी होती रहती हैं। 2। 65। 88।
सारग महला 5 ॥
सिमरन राम को इकु नाम ॥
कलमल दगध होहि खिन अंतरि कोटि दान इसनान ॥1॥ रहाउ ॥
आन जंजार ब्रिथा स्रमु घालत बिनु हरि फोकट गिआन ॥
जनम मरन संकट ते छूटै जगदीस भजन सुख धिआन ॥1॥
तेरी सरनि पूरन सुख सागर करि किरपा देवहु दान ॥
सिमरि सिमरि नानक प्रभ जीवै बिनसि जाइ अभिमान ॥2॥66॥89॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे भाई ! अगर सिर्फ परमात्मा के नाम का ही सिमरन किया जाए। तो एक छिन में (जीव के सारे) पाप जल जाते हैं (उसको। जैसे) करोड़ों दान और तीर्थ-स्नान (करने का फल मिल गया)। 1। रहाउ। हे भाई ! (अगर मनुष्य माया के ही) और-और जंजालों के लिए व्यर्थ की दौड़-भाग करता रहता है (औक्र हरी-नाम नहीं सिमरता। तो) परमात्मा के नाम के बिना (निरी) ज्ञान की बातें सभ फोकी ही हैं। जब मनुष्य परमात्मा के भजन के आनंद में सुरति जोड़ता है। तब ही वह जनम-मरण के चक्करों के कष्ट से बचता है। 1। हे नानक ! (कह-) हे सुखों के समुंद्र प्रभू ! हे पूरन प्रभू ! मैं आपकी शरण आया हूँ। मेहर कर के मुझे अपने नाम की दाति दे। आपका नाम सिमर-सिमर के आत्मिक जीवन मिलता है। और (मन में से) अहंकार नाश हैं जाता है। 2। 66। 89।
सारग महला 5 ॥
धूरतु सोई जि धुर कउ लागै ॥
सोई धुरंधरु सोई बसुंधरु हरि एक प्रेम रस पागै ॥1॥ रहाउ ॥
बलबंच करै न जानै लाभै सो धूरतु नही मूड़॑ा ॥
सुआरथु तिआगि असारथि रचिओ नह सिमरै प्रभु रूड़ा ॥1॥
सोई चतुरु सिआणा पंडितु सो सूरा सो दानां ॥
साधसंगि जिनि हरि हरि जपिओ नानक सो परवाना ॥2॥67॥90॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे भाई ! वही मनुष्य (असल) चतुर है जो जगत के मूल-प्रभू के चरणों में जुड़ा रहता है। वही मनुष्य मुखी है वही मनुष्य धनी है। जो सिर्फ परमात्मा के प्यार-रस में मस्त रहता है। 1। रहाउ। पर। हे भाई ! जो मनुष्य (औरों के साथ) ठॅगियां मारता है (वह अपना असल) लाभ नहीं समझता। वह चतुर नहीं वह मूर्ख है। वह अपने असल स्वार्थ को छोड़ के घाटे वाले काम में व्यस्त रहता है। (क्योंकि) वह सुंदर प्रभू का नाम नहीं सिमरता। 1। हे भाई ! वही मनुष्य चतुर और समझदार है। वही मनुष्य पण्डित। शूरवीर और दाना है। जिसने साध-संगति में टिक के हरी-नाम जपा है। हे नानक ! वही मनुष्य (परमात्मा की हजूरी में) कबूल होता है। 2। 67। 90।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।

अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।

इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! विचार करते-करते ये अस्लियत मिली है कि परमात्मा की भक्ति ही पूरी तरह से उक्तम (क्रिया) है।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।