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1220
सारंग
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· शबद · राग सारंग
छोडहु कपटु होइ निरवैरा सो प्रभु संगि निहारे ॥
छोडहु कपटु होइ निरवैरा सो प्रभु संगि निहारे ॥
सचु धनु वणजहु सचु धनु संचहु कबहू न आवहु हारे ॥1॥
खात खरचत किछु निखुटत नाही अगनत भरे भंडारे ॥
कहु नानक सोभा संगि जावहु पारब्रहम कै दुआरे ॥2॥57॥80॥
सचु धनु वणजहु सचु धनु संचहु कबहू न आवहु हारे ॥1॥
खात खरचत किछु निखुटत नाही अगनत भरे भंडारे ॥
कहु नानक सोभा संगि जावहु पारब्रहम कै दुआरे ॥2॥57॥80॥
हिन्दी अर्थ: हे भाई! (अपने अंदर से) निर्वैर हो के (दूसरों के साथ) ठॅगी करनी छोड़ें। वह परमात्मा (आपके) साथ (बसता हुआ। आपके हरेक काम को) देख रहा है। सदा कायम रहने वाले धन का व्यापार करें। सदा कायम रहने वाला धन एकत्र करें। कभी भी जीवन बाजी हार के नहीं आएँगे। 1। हे भाई! (प्रभू के दर पर नाम-धन के) अनगिनत खजाने भरे हुए हैं। इसको स्वयं इस्तेमाल करने से व औरों को इस्तेमाल करवाने से कोई कमी नहीं आती। हे नानक! कहें: (हे भाई!) (नाम-धन कमा के) परमात्मा के दर पर इज्जत के साथ जाएँगे। 2। 57। 80।
· शबद · राग सारंग
प्रभ जी मोहि कवनु अनाथु बिचारा ॥
सारग महला 5 ॥
प्रभ जी मोहि कवनु अनाथु बिचारा ॥
कवन मूल ते मानुखु करिआ इहु परतापु तुहारा ॥1॥ रहाउ ॥
जीअ प्राण सरब के दाते गुण कहे न जाहि अपारा ॥
सभ के प्रीतम स्रब प्रतिपालक सरब घटां आधारा ॥1॥
कोइ न जाणै तुमरी गति मिति आपहि एक पसारा ॥
साध नाव बैठावहु नानक भव सागरु पारि उतारा ॥2॥58॥81॥
प्रभ जी मोहि कवनु अनाथु बिचारा ॥
कवन मूल ते मानुखु करिआ इहु परतापु तुहारा ॥1॥ रहाउ ॥
जीअ प्राण सरब के दाते गुण कहे न जाहि अपारा ॥
सभ के प्रीतम स्रब प्रतिपालक सरब घटां आधारा ॥1॥
कोइ न जाणै तुमरी गति मिति आपहि एक पसारा ॥
साध नाव बैठावहु नानक भव सागरु पारि उतारा ॥2॥58॥81॥
हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे प्रभू जी! (आपकी मेहर के बिना) मेरी कोई बिसात नहीं। मैं तो बेचारा अनाथ ही हूँ। किस मूल से (एक बूँद से) आपने मुझे मनुष्य बना दिया। यह आपका ही प्रताप है। 1। रहाउ। हे जिंद देने वाले! हे प्राण दाते! हे सब पदार्थ देने वाले! आपके गुण बेअंत हैं। बयान नहीं किए जा सकते। हे सब जीवों के प्व्यारे! हे सबके पालनहार! आप सब शरीरों को आसरा देते हैं। 1। हे प्रभू! आप कैसे हैं और कितने बड़े हैं, कोई जीव यह नहीं जान सकता। आप स्वयं इस जगत-पसारे को पसारने वाले हैं। हे नानक! (कहें: हे प्रभू!) मुझे साध-संगति की बेड़ी में बैठाएँ और संसार-समुंद्र से पार लंघा दें। 2। 58। 81।
· शबद · राग सारंग
आवै राम सरणि वडभागी ॥
सारग महला 5 ॥
आवै राम सरणि वडभागी ॥
एकस बिनु किछु होरु न जाणै अवरि उपाव तिआगी ॥1॥ रहाउ ॥
मन बच क्रम आराधै हरि हरि साधसंगि सुखु पाइआ ॥
अनद बिनोद अकथ कथा रसु साचै सहजि समाइआ ॥1॥
करि किरपा जो अपुना कीनो ता की ऊतम बाणी ॥
साधसंगि नानक निसतरीऐ जो राते प्रभ निरबाणी ॥2॥59॥82॥
आवै राम सरणि वडभागी ॥
एकस बिनु किछु होरु न जाणै अवरि उपाव तिआगी ॥1॥ रहाउ ॥
मन बच क्रम आराधै हरि हरि साधसंगि सुखु पाइआ ॥
अनद बिनोद अकथ कथा रसु साचै सहजि समाइआ ॥1॥
करि किरपा जो अपुना कीनो ता की ऊतम बाणी ॥
साधसंगि नानक निसतरीऐ जो राते प्रभ निरबाणी ॥2॥59॥82॥
हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे भाई! कोई बड़े भाग्यों वाला मनुष्य ही परमात्मा की शरण आता है। एक परमात्मा की शरण के बिना वह मनुष्य कोई और उपाय नहीं जानता। वह और सारे तरीके त्याग देता है। 1। रहाउ। हे भाई! (प्रभू की शरण आने वाला मनुष्य) अपने से वचन से काम से परमात्मा की ही आराधना करता है। वह गुरू की संगति में टिक के आत्मिक आनंद पाता है। (उसके हृदय में) आत्मिक आनंद व खुशियां बनी रहती हैं। वह अकथ प्रभू की सिफतसालाह का स्वाद (लेता रहता है)। वह मनुष्य सदा कायम रहने वाले प्रभू में और आत्मिक अडोलता में लीन रहता है। 1। हे भाई! (प्रभू) मेहर करके जिस मनुष्य को अपना (सेवक) बना लेता है। उसकी ऊँची शोभा होती है। हे नानक! जो साध-जन निर्लिप प्रभू (के प्रेम-रंग) में रंगे रहते हैं उनकी संगति में (रहने से संसार-समुंद्र से) पार लांघा जाता है। 2। 59। 82।
· शबद · राग सारंग
जा ते साधू सरणि गही ॥
सारग महला 5 ॥
जा ते साधू सरणि गही ॥
सांति सहजु मनि भइओ प्रगासा बिरथा कछु न रही ॥1॥ रहाउ ॥
होहु क्रिपाल नामु देहु अपुना बिनती एह कही ॥
आन बिउहार बिसरे प्रभ सिमरत पाइओ लाभु सही ॥1॥
जह ते उपजिओ तही समानो साई बसतु अही ॥
कहु नानक भरमु गुरि खोइओ जोती जोति समही ॥2॥60॥83॥
जा ते साधू सरणि गही ॥
सांति सहजु मनि भइओ प्रगासा बिरथा कछु न रही ॥1॥ रहाउ ॥
होहु क्रिपाल नामु देहु अपुना बिनती एह कही ॥
आन बिउहार बिसरे प्रभ सिमरत पाइओ लाभु सही ॥1॥
जह ते उपजिओ तही समानो साई बसतु अही ॥
कहु नानक भरमु गुरि खोइओ जोती जोति समही ॥2॥60॥83॥
हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे भाई! जब से (मैंने) गुरू का पल्ला पकड़ा है। (मेरे) मन में शांति और आत्मिक अडोलता पैदा हो गई है। (मेरे) मन में आत्मिक जीवन का प्रकाश हो गया है। (मेरे मन में) कोई दुख-दरद नहीं रह गया। 1। रहाउ। हे भाई! जब से मैं गुरू के दर पर आया हूँ तब से (प्रभू दर पर) यही अरदास करता रहता हूँ: 'हे प्रभू! दयावान हो। मुझे अपना नाम बख्श'। हे भाई! प्रभू का सिमरने से और और व्यवहारों में मेरा मन खचित नहीं होता (और-और व्यवहार मुझे भूल गए हैं)। मैंने असल कमाई कर ली है। 1। जिस प्रभू से ये जिंदड़ी पैदा हुई थी उएसी में टिकी रहती है। मुझे अब यह (नाम-) वस्तु ही अच्छी लगती है। हे नानक! कहें: हे भाई! गुरू ने (मेरे मन की) भटकना दूर कर दी है। मेरी जिंद प्रभू की जोति में लीन रहती है। 2। 60। 83।
· शबद · राग सारंग
रसना राम को जसु गाउ ॥
सारग महला 5 ॥
रसना राम को जसु गाउ ॥
आन सुआद बिसारि सगले भलो नाम सुआउ ॥1॥ रहाउ ॥
चरन कमल बसाइ हिरदै एक सिउ लिव लाउ ॥
साधसंगति होहि निरमलु बहुड़ि जोनि न आउ ॥1॥
जीउ प्रान अधारु तेरा तू निथावे थाउ ॥
सासि सासि सम॑ालि हरि हरि नानक सद बलि जाउ ॥2॥61॥84॥
रसना राम को जसु गाउ ॥
आन सुआद बिसारि सगले भलो नाम सुआउ ॥1॥ रहाउ ॥
चरन कमल बसाइ हिरदै एक सिउ लिव लाउ ॥
साधसंगति होहि निरमलु बहुड़ि जोनि न आउ ॥1॥
जीउ प्रान अधारु तेरा तू निथावे थाउ ॥
सासि सासि सम॑ालि हरि हरि नानक सद बलि जाउ ॥2॥61॥84॥
हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे भाई! (अपनी) जीभ से परमात्मा की सिफतसालाह गाया करें। (नाम के बिना) और सारे स्वाद भुला दें। (परमात्मा के) नाम का स्वाद (सब स्वादों से) अच्छा है। 1। रहाउ। हे भाई! परमात्मा के सुंदर चरण (अपने) हृदय में टिकाए रखें। सिर्फ परमात्मा से सुरति जोड़े रखें। साध-संगति में रहके पवित्र जीवन वाले हो जाएँगे। बार-बार जूनियों में नहीं आएँगे। 1। हे नानक! (कहें:) हे हरी! मेरी जिंद और प्राणों को आपका ही आसरा है। जिसका और कोई सहारा ना हो। आप उसका सहारा हैं। हे हरी! मैं तो अपनी हरेक सांस के साथ आपको याद करता हूँ। और आप पर से बलिहार जाता हूँ। 2। 61। 84।
· शबद · राग सारंग
बैकुंठ गोबिंद चरन नित धिआउ ॥
सारग महला 5 ॥
बैकुंठ गोबिंद चरन नित धिआउ ॥
मुकति पदारथु साधू संगति अंम्रितु हरि का नाउ ॥1॥ रहाउ ॥
ऊतम कथा सुणीजै स्रवणी मइआ करहु भगवान ॥
आवत जात दोऊ पख पूरन पाईऐ सुख बिस्राम ॥1॥
बैकुंठ गोबिंद चरन नित धिआउ ॥
मुकति पदारथु साधू संगति अंम्रितु हरि का नाउ ॥1॥ रहाउ ॥
ऊतम कथा सुणीजै स्रवणी मइआ करहु भगवान ॥
आवत जात दोऊ पख पूरन पाईऐ सुख बिस्राम ॥1॥
हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे भाई! मैं तो सदा परमात्मा के चरणों का ध्यान धरता हूँ, (यह मेरे लिए) बैकुंठ है। गुरू की संगति में टिके रहना, (मेरे लिए चारों पदार्थों में से श्रेष्ठ) मुक्ति पदार्थ है। परमात्मा का नाम ही (मेरे लिए) आत्मिक जीवन देने वाला जल है। 1। रहाउ। हे भगवान! (मेरे पर) मेहर करें। (ताकि) आपकी उक्तम सिफॅतसालाह कानों से सुनी जा सके। हे भाई! (सिफतसालाह की बरकति से) पैदा होना और मरना, ये दोनों पक्ष खत्म हो जाते हैं। सुखों के मूल परमात्मा के साथ मिलाप हो जाता है। 1।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1220 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।