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अंग 1220

अंग
1220
राग सारंग
राग: सारंग · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
छोडहु कपटु होइ निरवैरा सो प्रभु संगि निहारे ॥
सचु धनु वणजहु सचु धनु संचहु कबहू न आवहु हारे ॥1॥
खात खरचत किछु निखुटत नाही अगनत भरे भंडारे ॥
कहु नानक सोभा संगि जावहु पारब्रहम कै दुआरे ॥2॥57॥80॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: हे भाई ! (अपने अंदर से) निर्वैर हो के (दूसरों के साथ) ठॅगी करनी छोड़ो। वह परमात्मा (आपके) साथ (बसता हुआ। आपके हरेक काम को) देख रहा है। सदा कायम रहने वाले धन का व्यापार करो। सदा कायम रहने वाला धन एकत्र करो। कभी भी जीवन बाजी हार के नहीं आओगे। 1। हे भाई ! (प्रभू के दर पर नाम-धन के) अनगिनत खजाने भरे हुए हैं। इसको स्वयं इस्तेमाल करने से व औरों को इस्तेमाल करवाने से कोई कमी नहीं आती। हे नानक ! कह- (हे भाई !) (नाम-धन कमा के) परमात्मा के दर पर इज्जत के साथ जाएँगे। 5। 57। 80।
सारग महला 5 ॥
प्रभ जी मोहि कवनु अनाथु बिचारा ॥
कवन मूल ते मानुखु करिआ इहु परतापु तुहारा ॥1॥ रहाउ ॥
जीअ प्राण सरब के दाते गुण कहे न जाहि अपारा ॥
सभ के प्रीतम स्रब प्रतिपालक सरब घटां आधारा ॥1॥
कोइ न जाणै तुमरी गति मिति आपहि एक पसारा ॥
साध नाव बैठावहु नानक भव सागरु पारि उतारा ॥2॥58॥81॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे प्रभू जी ! (आपकी मेहर के बिना) मेरी कोई बिसात नहीं। मैं तो बेचारा अनाथ ही हूँ। किस मूल से (एक बूँद से) तूने मुझे मनुष्य बना दिया। यह आपका ही प्रताप है। 1। रहाउ। हे जिंद देने वाले ! हे प्राण दाते ! हे सब पदार्थ देने वाले ! आपके गुण बेअंत हैं। बयान नहीं किए जा सकते। हे सब जीवों के प्व्यारे ! हे सबके पालनहार ! आप सब शरीरों को आसरा देता है। 1। हे प्रभू ! आप कैसा है और कितना बड़ा है- कोई जीव यह नहीं जान सकता। आप स्वयं इस जगत-पसारे को पसारने वाला है। हे नानक ! (कह- हे प्रभू !) मुझे साध-संगति की बेड़ी में बैठा और संसार-समुंद्र से पार लंघा दे। 2। 58। 81।
सारग महला 5 ॥
आवै राम सरणि वडभागी ॥
एकस बिनु किछु होरु न जाणै अवरि उपाव तिआगी ॥1॥ रहाउ ॥
मन बच क्रम आराधै हरि हरि साधसंगि सुखु पाइआ ॥
अनद बिनोद अकथ कथा रसु साचै सहजि समाइआ ॥1॥
करि किरपा जो अपुना कीनो ता की ऊतम बाणी ॥
साधसंगि नानक निसतरीऐ जो राते प्रभ निरबाणी ॥2॥59॥82॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे भाई ! कोई बड़े भाग्यों वाला मनुष्य ही परमात्मा की शरण आता है। एक परमात्मा की शरण के बिना वह मनुष्य कोई और उपाय नहीं जानता। वह और सारे तरीके त्याग देता है। 1। रहाउ। हे भाई ! (प्रभू की शरण आने वाला मनुष्य) अपने से वचन से काम से परमात्मा की ही आराधना करता है। वह गुरू की संगति में टिक के आत्मिक आनंद पाता है। (उसके हृदय में) आत्मिक आनंद व खुशियां बनी रहती हैं। वह अकथ प्रभू की सिफतसालाह का स्वाद (लेता रहता है)। वह मनुष्य सदा कायम रहने वाले प्रभू में और आत्मिक अडोलता में लीन रहता है। 1। हे भाई ! (प्रभू) मेहर करके जिस मनुष्य को अपना (सेवक) बना लेता है। उसकी ऊँची शोभा होती है। हे नानक ! जो साध-जन निर्लिप प्रभू (के प्रेम-रंग) में रंगे रहते हैं उनकी संगति में (रहने से संसार-समुंद्र से) पार लांघा जाता है। 2। 59। 82।
सारग महला 5 ॥
जा ते साधू सरणि गही ॥
सांति सहजु मनि भइओ प्रगासा बिरथा कछु न रही ॥1॥ रहाउ ॥
होहु क्रिपाल नामु देहु अपुना बिनती एह कही ॥
आन बिउहार बिसरे प्रभ सिमरत पाइओ लाभु सही ॥1॥
जह ते उपजिओ तही समानो साई बसतु अही ॥
कहु नानक भरमु गुरि खोइओ जोती जोति समही ॥2॥60॥83॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे भाई ! जब से (मैंने) गुरू का पल्ला पकड़ा है। (मेरे) मन में शांति और आत्मिक अडोलता पैदा हो गई है। (मेरे) मन में आत्मिक जीवन का प्रकाश हो गया है। (मेरे मन में) कोई दुख-दरद नहीं रह गया। 1। रहाउ। हे भाई ! जब से मैं गुरू के दर पर आया हूँ तब से (प्रभू दर पर) यही अरदास करता रहता हूँ- ‘हे प्रभू ! दयावान हो। मुझे अपना नाम बख्श’। हे भाई ! प्रभू का सिमरने से और और व्यवहारों में मेरा मन खचित नहीं होता (और-और व्यवहार मुझे भूल गए हैं)। मैंने असल कमाई कर ली है। 1। जिस प्रभू से ये जिंदड़ी पैदा हुई थी उएसी में टिकी रहती है। मुझे अब यह (नाम-) वस्तु ही अच्छी लगती है। हे नानक ! कह- हे भाई ! गुरू ने (मेरे मन की) भटकना दूर कर दी है। मेरी जिंद प्रभू की जोति में लीन रहती है। 2। 60। 83।
सारग महला 5 ॥
रसना राम को जसु गाउ ॥
आन सुआद बिसारि सगले भलो नाम सुआउ ॥1॥ रहाउ ॥
चरन कमल बसाइ हिरदै एक सिउ लिव लाउ ॥
साधसंगति होहि निरमलु बहुड़ि जोनि न आउ ॥1॥
जीउ प्रान अधारु तेरा तू निथावे थाउ ॥
सासि सासि सम॑ालि हरि हरि नानक सद बलि जाउ ॥2॥61॥84॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे भाई ! (अपनी) जीभ से परमात्मा की सिफतसालाह गाया कर। (नाम के बिना) और सारे स्वाद भुला दे। (परमात्मा के) नाम का स्वाद (सब स्वादों से) अच्छा है। 1। रहाउ। हे भाई ! परमात्मा के सुंदर चरण (अपने) हृदय में टिकाए रख। सिर्फ परमात्मा से सुरति जोड़े रख। साध-संगति में रहके पवित्र जीवन वाला हो जाएगा। बार-बार जूनियों में नहीं आएगा। 1। हे नानक ! (कह-) हे हरी ! मेरी जिंद और प्राणों को आपका ही आसरा है। जिसका और कोई सहारा ना हैं। आप उसका सहारा है। हे हरी ! मैं तो अपनी हरेक सांस के साथ आपको याद करता हूँ। और आप पर से बलिहार जाता हूँ। 2। 61। 84।
सारग महला 5 ॥
बैकुंठ गोबिंद चरन नित धिआउ ॥
मुकति पदारथु साधू संगति अंम्रितु हरि का नाउ ॥1॥ रहाउ ॥
ऊतम कथा सुणीजै स्रवणी मइआ करहु भगवान ॥
आवत जात दोऊ पख पूरन पाईऐ सुख बिस्राम ॥1॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे भाई ! मैं तो सदा परमात्मा के चरणों का ध्यान धरता हूँ- (यह मेरे लिए) बैकुंठ है। गुरू की संगति में टिके रहना – (मेरे लिए चारों पदार्थों में से श्रेष्ठ) मुक्ति पदार्थ है। परमात्मा का नाम ही (मेरे लिए) आत्मिक जीवन देने वाला जल है। 1। रहाउ। हे भगवान ! (मेरे पर) मेहर कर। (ताकि) आपकी उक्तम सिफॅतसालाह कानों से सुनी जा सके। हे भाई ! (सिफतसालाह की बरकति से) पैदा होना और मरना- ये दोनों पक्ष खत्म हो जाते हैं। सुखों के मूल परमात्मा के साथ मिलाप हो जाता है। 1।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।

गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।

इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! (अपने अंदर से) निर्वैर हो के (दूसरों के साथ) ठॅगी करनी छोड़ो।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।