सचु धनु वणजहु सचु धनु संचहु कबहू न आवहु हारे ॥1॥
खात खरचत किछु निखुटत नाही अगनत भरे भंडारे ॥
कहु नानक सोभा संगि जावहु पारब्रहम कै दुआरे ॥2॥57॥80॥
प्रभ जी मोहि कवनु अनाथु बिचारा ॥
कवन मूल ते मानुखु करिआ इहु परतापु तुहारा ॥1॥ रहाउ ॥
जीअ प्राण सरब के दाते गुण कहे न जाहि अपारा ॥
सभ के प्रीतम स्रब प्रतिपालक सरब घटां आधारा ॥1॥
कोइ न जाणै तुमरी गति मिति आपहि एक पसारा ॥
साध नाव बैठावहु नानक भव सागरु पारि उतारा ॥2॥58॥81॥
आवै राम सरणि वडभागी ॥
एकस बिनु किछु होरु न जाणै अवरि उपाव तिआगी ॥1॥ रहाउ ॥
मन बच क्रम आराधै हरि हरि साधसंगि सुखु पाइआ ॥
अनद बिनोद अकथ कथा रसु साचै सहजि समाइआ ॥1॥
करि किरपा जो अपुना कीनो ता की ऊतम बाणी ॥
साधसंगि नानक निसतरीऐ जो राते प्रभ निरबाणी ॥2॥59॥82॥
जा ते साधू सरणि गही ॥
सांति सहजु मनि भइओ प्रगासा बिरथा कछु न रही ॥1॥ रहाउ ॥
होहु क्रिपाल नामु देहु अपुना बिनती एह कही ॥
आन बिउहार बिसरे प्रभ सिमरत पाइओ लाभु सही ॥1॥
जह ते उपजिओ तही समानो साई बसतु अही ॥
कहु नानक भरमु गुरि खोइओ जोती जोति समही ॥2॥60॥83॥
रसना राम को जसु गाउ ॥
आन सुआद बिसारि सगले भलो नाम सुआउ ॥1॥ रहाउ ॥
चरन कमल बसाइ हिरदै एक सिउ लिव लाउ ॥
साधसंगति होहि निरमलु बहुड़ि जोनि न आउ ॥1॥
जीउ प्रान अधारु तेरा तू निथावे थाउ ॥
सासि सासि सम॑ालि हरि हरि नानक सद बलि जाउ ॥2॥61॥84॥
बैकुंठ गोबिंद चरन नित धिआउ ॥
मुकति पदारथु साधू संगति अंम्रितु हरि का नाउ ॥1॥ रहाउ ॥
ऊतम कथा सुणीजै स्रवणी मइआ करहु भगवान ॥
आवत जात दोऊ पख पूरन पाईऐ सुख बिस्राम ॥1॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।
गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।
इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! (अपने अंदर से) निर्वैर हो के (दूसरों के साथ) ठॅगी करनी छोड़ो।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।