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अंग 1219

अंग
1219
राग सारंग
राग: सारंग · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सारग महला 5 ॥
हरि के नाम की गति ठांढी ॥
बेद पुरान सिम्रिति साधू जन खोजत खोजत काढी ॥1॥ रहाउ ॥
सिव बिरंच अरु इंद्र लोक ता महि जलतौ फिरिआ ॥
सिमरि सिमरि सुआमी भए सीतल दूखु दरदु भ्रमु हिरिआ ॥1॥
जो जो तरिओ पुरातनु नवतनु भगति भाइ हरि देवा ॥
नानक की बेनंती प्रभ जीउ मिलै संत जन सेवा ॥2॥52॥75॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे भाई ! परमात्मा का नाम शांति देने वाली गति है- यही बातें वेदों-पुराणों-स्मृतियों और साधु-जनों ने खोज-खोज के बताई हैं। 1। रहाउ। हे भाई ! शिव-लोक। ब्रहम-लोक। इन्द्र-लोक – इन (लोकों) में पहुँच हुआ भी तृष्णा की आग में जलता ही फिरता है। स्वामी-प्रभू का नाम सिमर-सिमर के जीव शांत मन हो जाते हैं। (सिमरन की बरकति से) सारा दुख-दर्द और भटकना दूर हो जाता है। 1। हे भाई ! पुराने समय का चाहे नए समय का जो जो भी (भगत) संसार-समुंद्र से पार लांघा है। वह प्रभू-देव की भक्ति की बरकति से प्रेम की बरकति से ही लांघा है। हे प्रभू जी ! (आपके दास) नानक की (आपके दर पर यही) बिनती है कि (मुझे आपके) संतजनों की (शरण में रह के) सेवा करने का मौका मिल जाए। 2। 52। 75।
सारग महला 5 ॥
जिहवे अंम्रित गुण हरि गाउ ॥
हरि हरि बोलि कथा सुनि हरि की उचरहु प्रभ को नाउ ॥1॥ रहाउ ॥
राम नामु रतन धनु संचहु मनि तनि लावहु भाउ ॥
आन बिभूत मिथिआ करि मानहु साचा इहै सुआउ ॥1॥
जीअ प्रान मुकति को दाता एकस सिउ लिव लाउ ॥
कहु नानक ता की सरणाई देत सगल अपिआउ ॥2॥53॥76॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे (मेरी) जीभ ! परमात्मा के आत्मिक जीवन देने वाले आत्मिक गुण गाया कर। हे भाई ! परमात्मा का नाम उचारा कर। प्रभू की सिफत सालाह सुना कर। प्रभू का नाम उचारा कर। 1। रहाउ। हे भाई ! परमात्मा का नाम ही कीमती धन है। ये धन एकत्र किया कर। अपने मन में अपने हृदय में प्रभू का प्यार बनाया कर। हे भाई ! (नाम के बिना) और सारे धन-पदार्थों को नाशवंत समझ। (परमात्मा का नाम ही) सदा कायम रहने वाला जीवन-मनोरथ है। 1। हे भाई ! सिर्फ परमात्मा (के नाम) से लगन पैदा कर। परमात्मा ही जिंद देने वाला है। प्राण देने वाला है। मुक्ति (उच्च आत्मिक दशा) देने वाला है। हे नानक ! कह- (हे भाई !) उस परमात्मा की शरण पड़ा रह जो सारे खाने-पीने के पदार्थ देता है। 2। 53। 76।
सारग महला 5 ॥
होती नही कवन कछु करणी ॥
इहै ओट पाई मिलि संतह गोपाल एक की सरणी ॥1॥ रहाउ ॥
पंच दोख छिद्र इआ तन महि बिखै बिआधि की करणी ॥
आस अपार दिनस गणि राखे ग्रसत जात बलु जरणी ॥1॥
अनाथह नाथ दइआल सुख सागर सरब दोख भै हरणी ॥
मनि बांछत चितवत नानक दास पेखि जीवा प्रभ चरणी ॥2॥54॥77॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे भाई ! मुझसे कोई सही काम नहीं हो सकता। संत जनों को मिल के सिर्फ परमात्मा की शरण पड़े रहना- सिर्फ यही आसरा मैंने ढूँढा है। 1। रहाउ। हे भाई ! (कामादिक) पाँचों विकार व अन्य ऐब (जीव के) इस शरीर में टिके रहते हैं। विषौ-विकारों वाली करणी (जीव की) बनी रहती है। (जीव की) आशाएं बेअंत होती हैं। पर जिंदगी के दिन गिने-चुने होते हैं। बुढ़ापा (जीव के शारीरिक) बल को खाए जाता है। 1। हे दास नानक ! (कह-) हे अनाथों के नाथ प्रभू ! हे दया के सोमे प्रभू ! हे सुखों के समुंद्र ! हे (जीवों के) सारे विकार और डर दूर करने वाले ! (आपका दास आपके दर से यह) मन-माँगी मुराद चाहता है कि हे प्रभू ! आपके चरणों के दर्शन करके मैं आत्मिक जीवन प्राप्त करता रहूँ। 2। 58। 77।
सारग महला 5 ॥
फीके हरि के नाम बिनु साद ॥
अंम्रित रसु कीरतनु हरि गाईऐ अहिनिसि पूरन नाद ॥1॥ रहाउ ॥
सिमरत सांति महा सुखु पाईऐ मिटि जाहि सगल बिखाद ॥
हरि हरि लाभु साधसंगि पाईऐ घरि लै आवहु लादि ॥1॥
सभ ते ऊच ऊच ते ऊचो अंतु नही मरजाद ॥
बरनि न साकउ नानक महिमा पेखि रहे बिसमाद ॥2॥55॥78॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे भाई ! परमात्मा के नाम के बिना (मायावी पदार्थों के) स्वाद फीके हैं। हे भाई ! प्रभू का कीर्तन ही आत्मिक जीवन देने वाला रस है। हरी का कीर्तन ही गाना चाहिए (जो मनुष्य गाता है। उसके अंदर) दिन-रात आत्मिक आनंद के बाजे बजते रहते हैं। 1। रहाउ। हे भाई ! परमात्मा का नाम सिमरने से आत्मिक शांति मिलती है बहुत सुख प्राप्त होता है। (अंदर से) सारे दुख-कलेश मिट जाते हैं। पर परमात्मा का नाम सिमरने का यह लाभ साध-संगति में ही मिलता है। (जो मनुष्य गुरू की संगति में मिल के बैठते हैं वह) अपने हृदय-घर में ये कमाई कर के ले आते हैं। 1। हे नानक ! (कह- हे भाई !) परमात्मा सबसे ऊँचा है। ऊँचों से भी ऊँचा है। उसकी सीमाओं का अंत नहीं पाया जा सकता। मैं उसकी महिमा (वडिआई) बयान नहीं कर सकता। देख के ही हैरान रह जाता हूँ। 2। 55। 78।
सारग महला 5 ॥
आइओ सुनन पड़न कउ बाणी ॥
नामु विसारि लगहि अन लालचि बिरथा जनमु पराणी ॥1॥ रहाउ ॥
समझु अचेत चेति मन मेरे कथी संतन अकथ कहाणी ॥
लाभु लैहु हरि रिदै अराधहु छुटकै आवण जाणी ॥1॥
उदमु सकति सिआणप तुम॑री देहि त नामु वखाणी ॥
सेई भगत भगति से लागे नानक जो प्रभ भाणी ॥2॥56॥79॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे भाई ! (जगत में जीव) परमात्मा की सिफतसालाह सुनने-पढ़ने के लिए आया है (यही है इसका असल जनम-मनोरथ)। पर। जो प्राणी (परमात्मा का) नाम भुला के और ही लालच में लगे रहते हैं। उनका मनुष्य जन्म व्यर्थ चला जाता है। 1। रहाउ। हे मेरे गाफिल मन ! होश कर। अकथ प्रभू की जो सिफतसालाह संत जनों ने बताई है उसको याद किया कर। हे भाई ! परमात्मा को अपने हृदय में बसाओ। यह लाभ कमाओ। (इस लाभ से) जनम-मरण का चक्र समाप्त हो जाता है। 1। हे नानक ! (कह-) हे प्रभू ! आपका ही दियश हुआ उद्यम आपकी ही दी हुई शक्ति और समझदारी (हम जीव बरत सकते हैं)। अगर आप (उद्यम-शक्ति-समझदारी) बख्शे। तब ही मैं नाम जप सकता हूँ। हे भाई ! वही मनुष्य भगत (बन सकते हैं) वही परमात्मा की भक्ति में लग सकते हैं। जो प्रभू को पसंद आ जाते हैं। 2। 56। 79।
सारग महला 5 ॥
धनवंत नाम के वणजारे ॥
सांझी करहु नाम धनु खाटहु गुर का सबदु वीचारे ॥1॥ रहाउ ॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे भाई ! असल धनाढ मनुष्य वे हैं जो परमात्मा के नाम का व्यापार करते हैं। उनके साथ सांझ बनाओ। और गुरू का शबद अपने मन में बसा के परमात्मा का नाम-धन कमाओ। 1। रहाउ।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।

अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।

इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “सारग महला 5 ॥ हे भाई ! परमात्मा का नाम शांति देने वाली गति है- यही बातें वेदों-पुराणों-स्मृतियों और साधु-जनों ने खोज-खोज के बताई हैं।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।