हरि के नाम की गति ठांढी ॥
बेद पुरान सिम्रिति साधू जन खोजत खोजत काढी ॥1॥ रहाउ ॥
सिव बिरंच अरु इंद्र लोक ता महि जलतौ फिरिआ ॥
सिमरि सिमरि सुआमी भए सीतल दूखु दरदु भ्रमु हिरिआ ॥1॥
जो जो तरिओ पुरातनु नवतनु भगति भाइ हरि देवा ॥
नानक की बेनंती प्रभ जीउ मिलै संत जन सेवा ॥2॥52॥75॥
जिहवे अंम्रित गुण हरि गाउ ॥
हरि हरि बोलि कथा सुनि हरि की उचरहु प्रभ को नाउ ॥1॥ रहाउ ॥
राम नामु रतन धनु संचहु मनि तनि लावहु भाउ ॥
आन बिभूत मिथिआ करि मानहु साचा इहै सुआउ ॥1॥
जीअ प्रान मुकति को दाता एकस सिउ लिव लाउ ॥
कहु नानक ता की सरणाई देत सगल अपिआउ ॥2॥53॥76॥
होती नही कवन कछु करणी ॥
इहै ओट पाई मिलि संतह गोपाल एक की सरणी ॥1॥ रहाउ ॥
पंच दोख छिद्र इआ तन महि बिखै बिआधि की करणी ॥
आस अपार दिनस गणि राखे ग्रसत जात बलु जरणी ॥1॥
अनाथह नाथ दइआल सुख सागर सरब दोख भै हरणी ॥
मनि बांछत चितवत नानक दास पेखि जीवा प्रभ चरणी ॥2॥54॥77॥
फीके हरि के नाम बिनु साद ॥
अंम्रित रसु कीरतनु हरि गाईऐ अहिनिसि पूरन नाद ॥1॥ रहाउ ॥
सिमरत सांति महा सुखु पाईऐ मिटि जाहि सगल बिखाद ॥
हरि हरि लाभु साधसंगि पाईऐ घरि लै आवहु लादि ॥1॥
सभ ते ऊच ऊच ते ऊचो अंतु नही मरजाद ॥
बरनि न साकउ नानक महिमा पेखि रहे बिसमाद ॥2॥55॥78॥
आइओ सुनन पड़न कउ बाणी ॥
नामु विसारि लगहि अन लालचि बिरथा जनमु पराणी ॥1॥ रहाउ ॥
समझु अचेत चेति मन मेरे कथी संतन अकथ कहाणी ॥
लाभु लैहु हरि रिदै अराधहु छुटकै आवण जाणी ॥1॥
उदमु सकति सिआणप तुम॑री देहि त नामु वखाणी ॥
सेई भगत भगति से लागे नानक जो प्रभ भाणी ॥2॥56॥79॥
धनवंत नाम के वणजारे ॥
सांझी करहु नाम धनु खाटहु गुर का सबदु वीचारे ॥1॥ रहाउ ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।
अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।
इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “सारग महला 5 ॥ हे भाई ! परमात्मा का नाम शांति देने वाली गति है- यही बातें वेदों-पुराणों-स्मृतियों और साधु-जनों ने खोज-खोज के बताई हैं।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।