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1219
सारंग
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· शबद · राग सारंग
हरि के नाम की गति ठांढी ॥
सारग महला 5 ॥
हरि के नाम की गति ठांढी ॥
बेद पुरान सिम्रिति साधू जन खोजत खोजत काढी ॥1॥ रहाउ ॥
सिव बिरंच अरु इंद्र लोक ता महि जलतौ फिरिआ ॥
सिमरि सिमरि सुआमी भए सीतल दूखु दरदु भ्रमु हिरिआ ॥1॥
जो जो तरिओ पुरातनु नवतनु भगति भाइ हरि देवा ॥
नानक की बेनंती प्रभ जीउ मिलै संत जन सेवा ॥2॥52॥75॥
हरि के नाम की गति ठांढी ॥
बेद पुरान सिम्रिति साधू जन खोजत खोजत काढी ॥1॥ रहाउ ॥
सिव बिरंच अरु इंद्र लोक ता महि जलतौ फिरिआ ॥
सिमरि सिमरि सुआमी भए सीतल दूखु दरदु भ्रमु हिरिआ ॥1॥
जो जो तरिओ पुरातनु नवतनु भगति भाइ हरि देवा ॥
नानक की बेनंती प्रभ जीउ मिलै संत जन सेवा ॥2॥52॥75॥
हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे भाई! परमात्मा का नाम शांति देने वाली गति है, यही बातें वेदों-पुराणों-स्मृतियों और साधु-जनों ने खोज-खोज के बताई हैं। 1। रहाउ। हे भाई! शिव-लोक, ब्रहम-लोक, इन्द्र-लोक, इन (लोकों) में पहुँच हुआ भी तृष्णा की आग में जलता ही फिरता है। स्वामी-प्रभू का नाम सिमर-सिमर के जीव शांत मन हो जाते हैं। (सिमरन की बरकति से) सारा दुख-दर्द और भटकना दूर हो जाता है। 1। हे भाई! पुराने समय का चाहे नए समय का जो जो भी (भगत) संसार-समुंद्र से पार लांघा है। वह प्रभू-देव की भक्ति की बरकति से प्रेम की बरकति से ही लांघा है। हे प्रभू जी! (आपके दास) नानक की (आपके दर पर यही) बिनती है कि (मुझे आपके) संतजनों की (शरण में रह के) सेवा करने का मौका मिल जाए। 2। 52। 75।
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जिहवे अंम्रित गुण हरि गाउ ॥
सारग महला 5 ॥
जिहवे अंम्रित गुण हरि गाउ ॥
हरि हरि बोलि कथा सुनि हरि की उचरहु प्रभ को नाउ ॥1॥ रहाउ ॥
राम नामु रतन धनु संचहु मनि तनि लावहु भाउ ॥
आन बिभूत मिथिआ करि मानहु साचा इहै सुआउ ॥1॥
जीअ प्रान मुकति को दाता एकस सिउ लिव लाउ ॥
कहु नानक ता की सरणाई देत सगल अपिआउ ॥2॥53॥76॥
जिहवे अंम्रित गुण हरि गाउ ॥
हरि हरि बोलि कथा सुनि हरि की उचरहु प्रभ को नाउ ॥1॥ रहाउ ॥
राम नामु रतन धनु संचहु मनि तनि लावहु भाउ ॥
आन बिभूत मिथिआ करि मानहु साचा इहै सुआउ ॥1॥
जीअ प्रान मुकति को दाता एकस सिउ लिव लाउ ॥
कहु नानक ता की सरणाई देत सगल अपिआउ ॥2॥53॥76॥
हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे (मेरी) जीभ! परमात्मा के आत्मिक जीवन देने वाले आत्मिक गुण गाया करें। हे भाई! परमात्मा का नाम उचारा करें। प्रभू की सिफत सालाह सुना करें। प्रभू का नाम उचारा करें। 1। रहाउ। हे भाई! परमात्मा का नाम ही कीमती धन है। ये धन एकत्र किया करें। अपने मन में अपने हृदय में प्रभू का प्यार बनाया करें। हे भाई! (नाम के बिना) और सारे धन-पदार्थों को नाशवंत समझें। (परमात्मा का नाम ही) सदा कायम रहने वाला जीवन-मनोरथ है। 1। हे भाई! सिर्फ परमात्मा (के नाम) से लगन पैदा करें। परमात्मा ही जिंद देने वाला है। प्राण देने वाला है। मुक्ति (उच्च आत्मिक दशा) देने वाला है। हे नानक! कहें: (हे भाई!) उस परमात्मा की शरण पड़ा रह जो सारे खाने-पीने के पदार्थ देता है। 2। 53। 76।
· शबद · राग सारंग
होती नही कवन कछु करणी ॥
सारग महला 5 ॥
होती नही कवन कछु करणी ॥
इहै ओट पाई मिलि संतह गोपाल एक की सरणी ॥1॥ रहाउ ॥
पंच दोख छिद्र इआ तन महि बिखै बिआधि की करणी ॥
आस अपार दिनस गणि राखे ग्रसत जात बलु जरणी ॥1॥
अनाथह नाथ दइआल सुख सागर सरब दोख भै हरणी ॥
मनि बांछत चितवत नानक दास पेखि जीवा प्रभ चरणी ॥2॥54॥77॥
होती नही कवन कछु करणी ॥
इहै ओट पाई मिलि संतह गोपाल एक की सरणी ॥1॥ रहाउ ॥
पंच दोख छिद्र इआ तन महि बिखै बिआधि की करणी ॥
आस अपार दिनस गणि राखे ग्रसत जात बलु जरणी ॥1॥
अनाथह नाथ दइआल सुख सागर सरब दोख भै हरणी ॥
मनि बांछत चितवत नानक दास पेखि जीवा प्रभ चरणी ॥2॥54॥77॥
हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे भाई! मुझसे कोई सही काम नहीं हो सकता। संत जनों को मिल के सिर्फ परमात्मा की शरण पड़े रहना, सिर्फ यही आसरा मैंने ढूँढा है। 1। रहाउ। हे भाई! (कामादिक) पाँचों विकार व अन्य ऐब (जीव के) इस शरीर में टिके रहते हैं। विषौ-विकारों वाली करणी (जीव की) बनी रहती है। (जीव की) आशाएं बेअंत होती हैं। पर जिंदगी के दिन गिने-चुने होते हैं। बुढ़ापा (जीव के शारीरिक) बल को खाए जाता है। 1। हे दास नानक! (कहें:) हे अनाथों के नाथ प्रभू! हे दया के सोमे प्रभू! हे सुखों के समुंद्र! हे (जीवों के) सारे विकार और डर दूर करने वाले! (आपका दास आपके दर से यह) मन-माँगी मुराद चाहता है कि हे प्रभू! आपके चरणों के दर्शन करके मैं आत्मिक जीवन प्राप्त करता रहूँ। 2। 54। 77।
· शबद · राग सारंग
फीके हरि के नाम बिनु साद ॥
सारग महला 5 ॥
फीके हरि के नाम बिनु साद ॥
अंम्रित रसु कीरतनु हरि गाईऐ अहिनिसि पूरन नाद ॥1॥ रहाउ ॥
सिमरत सांति महा सुखु पाईऐ मिटि जाहि सगल बिखाद ॥
हरि हरि लाभु साधसंगि पाईऐ घरि लै आवहु लादि ॥1॥
सभ ते ऊच ऊच ते ऊचो अंतु नही मरजाद ॥
बरनि न साकउ नानक महिमा पेखि रहे बिसमाद ॥2॥55॥78॥
फीके हरि के नाम बिनु साद ॥
अंम्रित रसु कीरतनु हरि गाईऐ अहिनिसि पूरन नाद ॥1॥ रहाउ ॥
सिमरत सांति महा सुखु पाईऐ मिटि जाहि सगल बिखाद ॥
हरि हरि लाभु साधसंगि पाईऐ घरि लै आवहु लादि ॥1॥
सभ ते ऊच ऊच ते ऊचो अंतु नही मरजाद ॥
बरनि न साकउ नानक महिमा पेखि रहे बिसमाद ॥2॥55॥78॥
हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे भाई! परमात्मा के नाम के बिना (मायावी पदार्थों के) स्वाद फीके हैं। हे भाई! प्रभू का कीर्तन ही आत्मिक जीवन देने वाला रस है। हरी का कीर्तन ही गाना चाहिए (जो मनुष्य गाता है। उसके अंदर) दिन-रात आत्मिक आनंद के बाजे बजते रहते हैं। 1। रहाउ। हे भाई! परमात्मा का नाम सिमरने से आत्मिक शांति मिलती है बहुत सुख प्राप्त होता है। (अंदर से) सारे दुख-कलेश मिट जाते हैं। पर परमात्मा का नाम सिमरने का यह लाभ साध-संगति में ही मिलता है। (जो मनुष्य गुरू की संगति में मिल के बैठते हैं वह) अपने हृदय-घर में ये कमाई कर के ले आते हैं। 1। हे नानक! (कहें: हे भाई!) परमात्मा सबसे ऊँचा है। ऊँचों से भी ऊँचा है। उसकी सीमाओं का अंत नहीं पाया जा सकता। मैं उसकी महिमा (वडिआई) बयान नहीं कर सकता। देख के ही हैरान रह जाता हूँ। 2। 55। 78।
· शबद · राग सारंग
आइओ सुनन पड़न कउ बाणी ॥
सारग महला 5 ॥
आइओ सुनन पड़न कउ बाणी ॥
नामु विसारि लगहि अन लालचि बिरथा जनमु पराणी ॥1॥ रहाउ ॥
समझु अचेत चेति मन मेरे कथी संतन अकथ कहाणी ॥
लाभु लैहु हरि रिदै अराधहु छुटकै आवण जाणी ॥1॥
उदमु सकति सिआणप तुम॑री देहि त नामु वखाणी ॥
सेई भगत भगति से लागे नानक जो प्रभ भाणी ॥2॥56॥79॥
आइओ सुनन पड़न कउ बाणी ॥
नामु विसारि लगहि अन लालचि बिरथा जनमु पराणी ॥1॥ रहाउ ॥
समझु अचेत चेति मन मेरे कथी संतन अकथ कहाणी ॥
लाभु लैहु हरि रिदै अराधहु छुटकै आवण जाणी ॥1॥
उदमु सकति सिआणप तुम॑री देहि त नामु वखाणी ॥
सेई भगत भगति से लागे नानक जो प्रभ भाणी ॥2॥56॥79॥
हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे भाई! (जगत में जीव) परमात्मा की सिफतसालाह सुनने-पढ़ने के लिए आया है (यही है इसका असल जनम-मनोरथ)। पर, जो प्राणी (परमात्मा का) नाम भुला के और ही लालच में लगे रहते हैं। उनका मनुष्य जन्म व्यर्थ चला जाता है। 1। रहाउ। हे मेरे गाफिल मन! होश करें। अकथ प्रभू की जो सिफतसालाह संत जनों ने बताई है उसको याद किया करें। हे भाई! परमात्मा को अपने हृदय में बसाएँ। यह लाभ कमाएँ। (इस लाभ से) जनम-मरण का चक्र समाप्त हो जाता है। 1। हे नानक! (कहें:) हे प्रभू! आपका ही दियश हुआ उद्यम आपकी ही दी हुई शक्ति और समझदारी (हम जीव बरत सकते हैं)। अगर आप (उद्यम-शक्ति-समझदारी) बख्शे, तब ही मैं नाम जप सकता हूँ। हे भाई! वही मनुष्य भगत (बन सकते हैं) वही परमात्मा की भक्ति में लग सकते हैं। जो प्रभू को पसंद आ जाते हैं। 2। 56। 79।
· शबद · राग सारंग
धनवंत नाम के वणजारे ॥
सारग महला 5 ॥
धनवंत नाम के वणजारे ॥
सांझी करहु नाम धनु खाटहु गुर का सबदु वीचारे ॥1॥ रहाउ ॥
धनवंत नाम के वणजारे ॥
सांझी करहु नाम धनु खाटहु गुर का सबदु वीचारे ॥1॥ रहाउ ॥
हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे भाई! असल धनाढ मनुष्य वे हैं जो परमात्मा के नाम का व्यापार करते हैं। उनके साथ सांझ बनाएँ। और गुरू का शबद अपने मन में बसा के परमात्मा का नाम-धन कमाएँ। 1। रहाउ।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1219 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।