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अंग 121

अंग
121
राग माझ
राग: माझ · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
नानक नामि रते वीचारी सचो सचु कमावणिआ ॥8॥18॥19॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: हे नानक ! जो मनुष्य परमात्मा के नाम (-रंग) में रंगे जाते हैं, वे अच्छी-बुरी करतूत को परखने के लायक हो जाते हैं, और वे सदा कायम रहने वाले परमात्मा के नाम सिमरन की कमाई करते हैं। 8। 18। 19।
माझ महला 3 ॥
निरमल सबदु निरमल है बाणी ॥
निरमल जोति सभ माहि समाणी ॥
निरमल बाणी हरि सालाही जपि हरि निरमलु मैलु गवावणिआ ॥1॥
हउ वारी जीउ वारी सुखदाता मंनि वसावणिआ ॥
हरि निरमलु गुर सबदि सलाही सबदो सुणि तिसा मिटावणिआ ॥1॥ रहाउ ॥
निरमल नामु वसिआ मनि आए ॥
मनु तनु निरमलु माइआ मोहु गवाए ॥
निरमल गुण गावै नित साचे के निरमल नादु वजावणिआ ॥2॥
निरमल अंम्रितु गुर ते पाइआ ॥
विचहु आपु मुआ तिथै मोहु न माइआ ॥
निरमल गिआनु धिआनु अति निरमलु निरमल बाणी मंनि वसावणिआ ॥3॥
जो निरमलु सेवे सु निरमलु होवै ॥
हउमै मैलु गुर सबदे धोवै ॥
निरमल वाजै अनहद धुनि बाणी दरि सचै सोभा पावणिआ ॥4॥
निरमल ते सभ निरमल होवै ॥
निरमलु मनूआ हरि सबदि परोवै ॥
निरमल नामि लगे बडभागी निरमलु नामि सुहावणिआ ॥5॥
सो निरमलु जो सबदे सोहै ॥
निरमल नामि मनु तनु मोहै ॥
सचि नामि मलु कदे न लागै मुखु ऊजलु सचु करावणिआ ॥6॥
मनु मैला है दूजै भाइ ॥
मैला चउका मैलै थाइ ॥
मैला खाइ फिरि मैलु वधाए मनमुख मैलु दुखु पावणिआ ॥7॥
मैले निरमल सभि हुकमि सबाए ॥
से निरमल जो हरि साचे भाए ॥
नानक नामु वसै मन अंतरि गुरमुखि मैलु चुकावणिआ ॥8॥19॥20॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: माझ महला 3 ॥ उसकी सिफत सालाह का शबद (सबको) पवित्र करने वाला है। परमात्मा की पवित्र ज्योति सब जीवों में समाई हुई है। उसकी सिफत सालाह की बाणी (सबको) पवित्र करने वाली है। (हे भाई !) मैं उस हरी की पवित्र बाणी के द्वारा उसकी सिफत सालाह करता हूँ। परमात्मा का नाम जप के हम पवित्र हो जाते हैं। (विकारों की) मैल (मन से) दूर कर लेते हैं। 1। मैं उनके सदके हूँ कुर्बान हूँ, जो सुख देने वाले परमात्मा को अपने मन में बसाते हैं। मैं गुरू के शबद में जुड़ के पवित्र परमात्मा की सिफत सालाह करता हूँ। गुरू का शबद ही सुन के मैं (अपने अंदर से माया की) तृष्णा को मिटाता हूँ। 1। रहाउ। (जिस मनुष्य के) मन में पवित्र परमात्मा का नाम आ बसता है, उसका मन पवित्र हो जाता है, उसका तन पवित्र हो जाता है। (वह अपने अंदर से) माया का मोह दूर कर लेता है। वह मनुष्य सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा के पवित्र गुण सदैव गाता है (जैसे जोगी नाद बजाता है) वह मनुष्य सिफत सालाह का (जैसे) नाद बजाता है। 2। जिस मनुष्य ने गुरू से पवित्र परमात्मा का आत्मिक जीवन देने वाला नाम जल प्राप्त कर लिया, उसके अंदर से स्वै भाव (अहम्) खत्म हो जाता है, उसके हृदय में माया का मोह नहीं रह जाता। (ज्यों ज्यों वह मनुष्य) परमात्मा के सिफत सालाह वाली पवित्र बाणी अपने मन में बसाता है, परमात्मा के साथ उसका पवित्र गहरा अपनापन बनता है, उसकी सुरति प्रभू चरणों से जुड़ती है जो उसे (और भी) पवित्र करती है। 3। जो मनुष्य पवित्र परमात्मा का सिमरन करता है, वह (स्वयं भी) पवित्र हो जाता है। गुरू के शबद की बरकति से वह (अपने मन में से) अहंकार की मैल धो लेता है। उस मनुष्य के अंदर एक रस लगन पैदा करने वाली सिफत सालाह की पवित्र बाणी अपना प्रभाव बनाए रखती है, और वह सदा स्थिर प्रभू के दर पे शोभा पाता है। 4। पवित्र परमात्मा के (नाम की) छोह से सारी लोकाई पवित्र हो जाती है। (ज्यों ज्यों मनुष्य अपने मन को) परमात्मा के सिफत सालाह के शबद में परोता है (त्यों त्यों उसका) मन पवित्र होता जाता है। बहुत भाग्यशाली मनुष्य ही प्रभू के नाम में लीन होते हैं। जो मनुष्य नाम में जुड़ता है, वह पवित्र जीवन वाला बन जाता है, वह सुंदर जीवन वाला बन जाता है। 5। वही मनुष्य पवित्र जीवन वाला बनता है, जो गुरू के शबद में जुड़ कर सुंदर जीवन वाला बनता है। पवित्र प्रभू के नाम में उसका मन मस्त रहता है, उसका तन (भाव, हरेक ज्ञान इंद्रियां) मस्त रहता है। सदा स्थिर परमात्मा के नाम में जुड़ने के कारण उसे (विकारों की) मैल कभी नहीं लगती। सदा स्थिर रहने वाला प्रभू उसका मुंह (लोक परलोक में) उज्जवल कर देता है। 6। पर, जो मनुष्य माया के प्यार में मस्त रहता है, उसका मन (विकारों की मैल से) मैला (ही) रहता है। (वह लकीरें खीच खीच के बेशक स्वच्छ चौके बनाएं, पर उसके हृदय का) चौका मैला ही रहता है। (उसकी सुरति सदा) मैली जगह पर ही टिकी रहती है। वह मनुष्य (विकारों की) मैल को ही अपनी आत्मिक खुराक बनाए रखता है (जिस करके वह अपने अंदर) और और (विकारों की) मैल बढ़ाता जाता है। (इस तरह) अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य (विकारों की) मैल (बढ़ा बढ़ा के) दुख सहता है। 7। (पर जीवों के भी क्या वश?) विकारी जीव और पवित्र आत्मा जीव सारे परमात्मा के हुकम में (ही चल रहे हैं)। जो लोग सदा स्थिर हरी को प्यारे लगने लगते हैं, वे पवित्र जीवन वाले हो जाते हैं। हे नानक ! जो मनुष्य गुरू के बताए रास्ते पर चलता है, उसके मन में परमात्मा का नाम बसता है, वह (अपने अंदर से विकार आदि की) मैल दूर कर लेता है। 8। 19। 20।
माझ महला 3 ॥
गोविंदु ऊजलु ऊजल हंसा ॥
मनु बाणी निरमल मेरी मनसा ॥
मनि ऊजल सदा मुख सोहहि अति ऊजल नामु धिआवणिआ ॥1॥
हउ वारी जीउ वारी गोबिंद गुण गावणिआ ॥
गोबिदु गोबिदु कहै दिन राती गोबिद गुण सबदि सुणावणिआ ॥1॥ रहाउ ॥
गोबिदु गावहि सहजि सुभाए ॥
गुर कै भै ऊजल हउमै मलु जाए ॥
सदा अनंदि रहहि भगति करहि दिनु राती सुणि गोबिद गुण गावणिआ ॥2॥
मनूआ नाचै भगति द्रिड़ाए ॥
गुर कै सबदि मनै मनु मिलाए ॥
सचा तालु पूरे माइआ मोहु चुकाए सबदे निरति करावणिआ ॥3॥
ऊचा कूके तनहि पछाड़े ॥
माइआ मोहि जोहिआ जमकाले ॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: माझ महला 3 ॥ वे पवित्र गोविंद का रूप हो जाते है, जो मनुष्य परमात्मा का नाम सिमरते हैं वे बहुत पवित्र आत्मा के हो जाते हैं। उनके मन में (भी) शुद्ध (फुरने, विचार) उठते हैं उनका मन पवित्र हो जाता है। उनके मुंह (भी) सुंदर दिखाई देते हैं। परमात्मा सरोवर के वह, (जैसे) सुंदर हंस बन जाते हैं। 1। मैं सदा उस मनुष्य के सदके वारने जाता हूँ, जो गोबिंद के गुण सदा गाता है। जो दिन रात गोबिंद का नाम उचारता है। जो गुरू के शबद द्वारा (औरों को भी) गोबिंद के गुण सुनाता है। 1। रहाउ। जो मनुष्य गोबिंद (के गुण) आत्मिक अडोलता में (प्रभू के चरणों के) प्रेम में (टिक के) गाते हैं, गुरू के डर अदब में रह के वे (लोक परलोक में) सुर्ख-रू हो जाते हैं, (उनके अंदर से) अहम् की मैल दूर हो जाती है। वे दिन रात परमात्मा की भगती करते हैं, सदा आत्मिक आनंद में मगन रहते हैं। वे (औरों से) सुन के (भाव, वे गोबिंद के गुण सुनते भी हैं, और) गोबिंद के गुण गाते (भी) हैं। 2। ज्यों ज्यों मनुष्य भगती दृढ़ करता है उसका मन हुलारे में आता है। गुरू के शबद द्वारा वह अपने मन को उधर ही टिकाए रखता है (बाहर भटकने से बचाए रखता है)। (जैसे कोई रास-धारिया रास डालने के समय राग व साज़ के साथ साथ मिल के नृत्य करता है, वैसे ही) वह मनुष्य (जैसे) सच्चा नाच करता है (जब वह अपने अंदर से) माया का मोह दूर करता है। गुरू के शबद में जुड़ के वह (आत्मिक) नृत्य करता है। 3। पर, जो मनुष्य (रास आदि डालने के समय) ऊँचे-ऊँचे सुर में बोलता है और अपने शरीर को (किसी चीज से) पटकाता है। (वैसे वह) माया के मोह में (फंसा हुआ) है। उसे आत्मिक मौत ने अपनी निगाह (पहुँच, सीमा) में रखा हुआ है।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर वर्ष की आयु में गुरु-गद्दी सँभाली, 1552 में, और 1574 तक रहे। उनकी वाणी में बुढ़ापे, समाज की संरचना, और संगति की चिन्ताएँ बार-बार लौटती हैं। उन्होंने ही लंगर (साझा-भोजन) की व्यवस्था मज़बूत की, और देश-भर में बाईस मंजी (केन्द्र) स्थापित किए।

इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे नानक ! जो मनुष्य परमात्मा के नाम (-रंग) में रंगे जाते हैं, वे अच्छी-बुरी करतूत को परखने के लायक हो जाते हैं, और वे सदा कायम रहने वाले परमात्मा के नाम सिमरन की कमाई करते हैं।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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