मेरै गुरि मोरो सहसा उतारिआ ॥
तिसु गुर कै जाईऐ बलिहारी सदा सदा हउ वारिआ ॥1॥ रहाउ ॥
गुर का नामु जपिओ दिनु राती गुर के चरन मनि धारिआ ॥
गुर की धूरि करउ नित मजनु किलविख मैलु उतारिआ ॥1॥
गुर पूरे की करउ नित सेवा गुरु अपना नमसकारिआ ॥
सरब फला दीन॑े गुरि पूरै नानक गुरि निसतारिआ ॥2॥47॥70॥
सिमरत नामु प्रान गति पावै ॥
मिटहि कलेस त्रास सभ नासै साधसंगि हितु लावै ॥1॥ रहाउ ॥
हरि हरि हरि हरि मनि आराधे रसना हरि जसु गावै ॥
तजि अभिमानु काम क्रोधु निंदा बासुदेव रंगु लावै ॥1॥
दामोदर दइआल आराधहु गोबिंद करत सोुहावै ॥
कहु नानक सभ की होइ रेना हरि हरि दरसि समावै ॥2॥48॥71॥
अपुने गुर पूरे बलिहारै ॥
प्रगट प्रतापु कीओ नाम को राखे राखनहारै ॥1॥ रहाउ ॥
निरभउ कीए सेवक दास अपने सगले दूख बिदारै ॥
आन उपाव तिआगि जन सगले चरन कमल रिद धारै ॥1॥
प्रान अधार मीत साजन प्रभ एकै एकंकारै ॥
सभ ते ऊच ठाकुरु नानक का बार बार नमसकारै ॥2॥49॥72॥
बिनु हरि है को कहा बतावहु ॥
सुख समूह करुणा मै करता तिसु प्रभ सदा धिआवहु ॥1॥ रहाउ ॥
जा कै सूति परोए जंता तिसु प्रभ का जसु गावहु ॥
सिमरि ठाकुरु जिनि सभु किछु दीना आन कहा पहि जावहु ॥1॥
सफल सेवा सुआमी मेरे की मन बांछत फल पावहु ॥
कहु नानक लाभु लाहा लै चालहु सुख सेती घरि जावहु ॥2॥50॥73॥
ठाकुर तुम॑ सरणाई आइआ ॥
उतरि गइओ मेरे मन का संसा जब ते दरसनु पाइआ ॥1॥ रहाउ ॥
अनबोलत मेरी बिरथा जानी अपना नामु जपाइआ ॥
दुख नाठे सुख सहजि समाए अनद अनद गुण गाइआ ॥1॥
बाह पकरि कढि लीने अपुने ग्रिह अंध कूप ते माइआ ॥
कहु नानक गुरि बंधन काटे बिछुरत आनि मिलाइआ ॥2॥51॥74॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।
अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।
इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “सारग महला 5 ॥ हे भाई ! मेरे गुरू ने (मेरे अंदर से हर वक्त का) सहम दूर कर दिया है।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।