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अंग 1218

अंग
1218
राग सारंग
राग: सारंग · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सारग महला 5 ॥
मेरै गुरि मोरो सहसा उतारिआ ॥
तिसु गुर कै जाईऐ बलिहारी सदा सदा हउ वारिआ ॥1॥ रहाउ ॥
गुर का नामु जपिओ दिनु राती गुर के चरन मनि धारिआ ॥
गुर की धूरि करउ नित मजनु किलविख मैलु उतारिआ ॥1॥
गुर पूरे की करउ नित सेवा गुरु अपना नमसकारिआ ॥
सरब फला दीन॑े गुरि पूरै नानक गुरि निसतारिआ ॥2॥47॥70॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे भाई ! मेरे गुरू ने (मेरे अंदर से हर वक्त का) सहम दूर कर दिया है। हे भाई ! मैं (उस गुरू से) सदा सदा ही सदके जाता हूँ। 1। रहाउ। हे भाई ! मैं दिन-रात (अपने) गुरू का नाम याद रखता हूँ। मैं अपने मन में गुरू के चरण टिकाए रखता हूँ (भाव। अदब-सत्कार से गुरू की याद हृदय में बसाए रखता हूँ)। मैं सदा गुरू के चरणों की धूड़ में स्नान करता रहता हूँ। (इस स्नान ने मेरे मन से) पापों की मैल उतार दी है। 1। हे भाई ! मैं सदा पूरे गुरू की (बताई हुई) सेवा करता हूँ। गुरू के आगे सिर झुकाए रखता हूँ। हे नानक ! (कह- हे भाई !) पूरे गुरू ने मुझे (दुनिया के) सारे (मुँह-माँगे) फल दिए हैं। गुरू ने (मुझे जगत के विकारों से) पार लंघा लिया है। 2। 47। 70।
सारग महला 5 ॥
सिमरत नामु प्रान गति पावै ॥
मिटहि कलेस त्रास सभ नासै साधसंगि हितु लावै ॥1॥ रहाउ ॥
हरि हरि हरि हरि मनि आराधे रसना हरि जसु गावै ॥
तजि अभिमानु काम क्रोधु निंदा बासुदेव रंगु लावै ॥1॥
दामोदर दइआल आराधहु गोबिंद करत सोुहावै ॥
कहु नानक सभ की होइ रेना हरि हरि दरसि समावै ॥2॥48॥71॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे भाई ! परमात्मा का नाम सिमरते हुए मनुष्य जीवन की ऊँची आत्मिक अवस्था हासिल कर लेता है। जो मनुष्य साध-संगति में प्यार डालता है। उसके सारे कलेश मिट जाते हैं। उसका हरेक डर दूर हो जाता है। 1। रहाउ। हे भाई ! (जो मनुष्य) सदा (अपने) मन में परमात्मा की आराधना करता रहता है। जो अपनी जीभ से प्रभू की सिफतसालाह गाता रहता है। वह मनुष्य (अपने अंदर से) काम-क्रोध-अहंकार-निंदा (आदि विकार) दूर करके (अपने अंदर) परमात्मा का प्रेम पैदा कर लेता है। 1। हे भाई ! दया के श्रोत परमात्मा का नाम सिमरते रहा करो। गोबिंद (का नाम) सिमरते हुए ही जीवन सुंदर बनता है। हे नानक ! कह- सबकी चरण-धूल हो के मनुष्य परमात्मा के दर्शन में लीन हुआ रहता है। 2। 48। 71।
सारग महला 5 ॥
अपुने गुर पूरे बलिहारै ॥
प्रगट प्रतापु कीओ नाम को राखे राखनहारै ॥1॥ रहाउ ॥
निरभउ कीए सेवक दास अपने सगले दूख बिदारै ॥
आन उपाव तिआगि जन सगले चरन कमल रिद धारै ॥1॥
प्रान अधार मीत साजन प्रभ एकै एकंकारै ॥
सभ ते ऊच ठाकुरु नानक का बार बार नमसकारै ॥2॥49॥72॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे भाई ! मैं अपने गुरू से कुर्बान जाता हूँ। (गुरू परमात्मा के) नाम का प्रताप (जगत में) प्रसिद्ध करता है। रक्षा करने की समर्थता वाला प्रभू (नाम जपने वालों को अनेकों दुखों से) बचाता है। 1। रहाउ। हे भाई ! (गुरू की कृपा से ही) प्रभू अपने सेवकों दासों को (दुखों विकारों के मुकाबले के लिए) दलेर कर देता है। (सेवकों के) सारे दुख नाश करता है। (प्रभू का) सेवक (भी) और सारे उपाय छोड़ के परमात्मा के सुंदर चरण (अपने) हृदय में बसाए रखता है। 1। हे भाई ! (जो मनुष्य गुरू की मेहर से नाम जपते हैं। उनको ये निश्चय हो जाता है कि) सिर्फ परमात्मा ही सिर्फ प्रभू ही प्राणों का आसरा है और सज्जन-मित्र है। हे भाई ! (दास) नानक का (तो परमात्मा ही) सबसे ऊँचा मालिक है। (नानक) सदा बार-बार (परमात्मा को ही) सिर झुकाता है। 2। 49। 72।
सारग महला 5 ॥
बिनु हरि है को कहा बतावहु ॥
सुख समूह करुणा मै करता तिसु प्रभ सदा धिआवहु ॥1॥ रहाउ ॥
जा कै सूति परोए जंता तिसु प्रभ का जसु गावहु ॥
सिमरि ठाकुरु जिनि सभु किछु दीना आन कहा पहि जावहु ॥1॥
सफल सेवा सुआमी मेरे की मन बांछत फल पावहु ॥
कहु नानक लाभु लाहा लै चालहु सुख सेती घरि जावहु ॥2॥50॥73॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे भाई ! बताओ। परमात्मा के बिना और कौन (सहायता करने वाला) है और कहाँ है। वह सृजनहार सारे सुखों का श्रोत है। वह प्रभू करुणामय है। हे भाई ! सदा उसका सिमरन करते रहो। 1। रहाउ। हे भाई ! जिस परमात्मा के (हुकम-रूप) धागे में सारे जीव परोए हुए हैं। उसकी सिफत-सालाह के गीत गाते रहा करो। जिस (मालिक-प्रभू) ने हरेक चीज दी हुई है उसका सिमरन किया करो। (उसका आसरा छोड़ के) और कहाँ किसके पास जाते हैं। 1। हे भाई ! मेरे मालिक-प्रभू की ही भक्ति सारे फल देने वाली है (उसके दर से ही) मान-माँगे फल प्रासप्त कर सकते हैं। हे नानक ! कह- हे भाई ! (जगत से परमात्मा की भक्ति का) लाभ कमा के चलो। बड़े आनंद से प्रभू के चरणों में पहुँचोगे। 2। 50। 73।
सारग महला 5 ॥
ठाकुर तुम॑ सरणाई आइआ ॥
उतरि गइओ मेरे मन का संसा जब ते दरसनु पाइआ ॥1॥ रहाउ ॥
अनबोलत मेरी बिरथा जानी अपना नामु जपाइआ ॥
दुख नाठे सुख सहजि समाए अनद अनद गुण गाइआ ॥1॥
बाह पकरि कढि लीने अपुने ग्रिह अंध कूप ते माइआ ॥
कहु नानक गुरि बंधन काटे बिछुरत आनि मिलाइआ ॥2॥51॥74॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे (मेरे) मालिक-प्रभू ! (मैं) आपकी शरण आया हूँ। जब से मैंने आपके दर्शन किए हैं (तब से ही) मेरे मन से (हरेक) सहम उतर गया है। 1। रहाउ। ैहे (मेरे) मालिक-प्रभू ! तूने (सदा ही मेरे) बिना बोले मेरा दुख समझ लिया है। तूने खुद ही मुझसे अपना नाम जपाया है। जब से बड़े आनंद से मैं आपके गुण गाता हूँ। मेरे (सारे) दुख दूर हैं गए हैं। सुखों में आत्मिक अडोलता में मैं मगन रहता हूँ। 1। हे भाई ! (परमात्मा) अपने (सेवकों) की बाँह पकड़ के उनको माया के (मोह के) अंधे कूएँ में से अंधेरे घर में से निकाल लेता है। हे नानक ! कह- गुरू ने (जिस मनुष्य के माया के मोह के) फंदों को काट दिया। (प्रभू चरणों से) उस विछुड़े हुए को ला के (प्रभू चरणों में) मिला दिया। 2। 51। 74।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।

अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।

इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “सारग महला 5 ॥ हे भाई ! मेरे गुरू ने (मेरे अंदर से हर वक्त का) सहम दूर कर दिया है।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।