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अंग 1217

अंग
1217
राग सारंग
राग: सारंग · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
जिन संतन जानिआ तू ठाकुर ते आए परवान ॥
जन का संगु पाईऐ वडभागी नानक संतन कै कुरबान ॥2॥41॥64॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: हे (मेरे) मालिक ! जिन सेत-जनों ने आपको जान लिया (आपके साथ गहरी सांझ डाल ली)। उनका ही जगत में आना सफल है। हे नानक ! (कह-) संत जनों की संगति बहुत भाग्यों से मिलती है। मैं तो संत-जनों से सदके जाता हूँ। 2। 41। 64।
सारग महला 5 ॥
करहु गति दइआल संतहु मोरी ॥
तुम समरथ कारन करना तूटी तुम ही जोरी ॥1॥ रहाउ ॥
जनम जनम के बिखई तुम तारे सुमति संगि तुमारै पाई ॥
अनिक जोनि भ्रमते प्रभ बिसरत सासि सासि हरि गाई ॥1॥
जो जो संगि मिले साधू कै ते ते पतित पुनीता ॥
कहु नानक जा के वडभागा तिनि जनमु पदारथु जीता ॥2॥42॥65॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे दया के श्रोत संतजनो ! (मेहर कर के) मेरी उच्च आत्मिक अवस्था कर दो। आप सब ताकतों के मालिक और जगत के मूल परमात्मा का रूप हैं। परमात्मा से टूटी हुई सुरति को आप ही जोड़ने वाले हैं। 1। रहाउ। हे संत जनो ! अनेकों जन्मों के विकारियों को आप (विकारों से) बचा लेते हैं। आपकी संगति में रहने से श्रेष्ठ-बुद्धि प्राप्त हैं जाती है। परमात्मा को भुला के अनेकों जूनियों में भटकते हुओं ने भी (आपकी संगति में) हरेक साँस के साथ प्रभू की सिफत-सालाह आरम्भ कर दी। 1। हे भाई ! जो जो मनुष्य गुरू की संगति में मिलते हैं। वे सारे विकारों (भरे जीवन) से (हट कर) स्वच्छ जीवन वाले बन जाते हैं। हे नानक ! कह- जिस मनुष्य के बड़े भाग्य जाग उठे। उसने (संत जनों की संगति में रह के) ये कीमती मनुष्य जन्म (विकारों के आगे) हारने से बचा लिया। 2। 42। 65।
सारग महला 5 ॥
ठाकुर बिनती करन जनु आइओ ॥
सरब सूख आनंद सहज रस सुनत तुहारो नाइओ ॥1॥ रहाउ ॥
क्रिपा निधान सूख के सागर जसु सभ महि जा को छाइओ ॥
संतसंगि रंग तुम कीए अपना आपु द्रिसटाइओ ॥1॥
नैनहु संगि संतन की सेवा चरन झारी केसाइओ ॥
आठ पहर दरसनु संतन का सुखु नानक इहु पाइओ ॥2॥43॥66॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे (मेरे) मालिक-प्रभू ! (आपका) दास (आपके दर पे) विनती करने आया है। आपका नाम सुनते हुए आत्मिक अडोकलता के सारे सुख सारे आनंद सारे रस (मिल जाते हैं)। 1। रहाउ। हे दया के खजाने ! हे सुखों के समुंद्र ! (आप ऐसा है) जिसकी शोभा सारी सृष्टि में अपना प्रभाव डालती है। संतों की संगति में आप अनेकों आनंद-करिश्मे करता है। और। अपने आप को प्रकट करता है। 1। आँखों से (दर्शन कर के) मैं संत जनों की सेवा करता रहूँ। उनके चरन अपने केसों से झाड़ता रहूँ। हे नानक ! (कह- हे प्रभू ! मेहर कर) मैं आठों पहर संत जनों के दर्शन करता रहूँ। मुझे यह सुख मिला रहे। 2। 43। 66।
सारग महला 5 ॥
जा की राम नाम लिव लागी ॥
सजनु सुरिदा सुहेला सहजे सो कहीऐ बडभागी ॥1॥ रहाउ ॥
रहित बिकार अलप माइआ ते अहंबुधि बिखु तिआगी ॥
दरस पिआस आस एकहि की टेक हीऐं प्रिअ पागी ॥1॥
अचिंत सोइ जागनु उठि बैसनु अचिंत हसत बैरागी ॥
कहु नानक जिनि जगतु ठगाना सु माइआ हरि जन ठागी ॥2॥44॥67॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे भाई ! जिस मनुष्य की लगन परमात्मा के नाम के साथ लग जाती है। वह भला मनुष्य बन जाता है। वह सुंदर हृदय वाला हो जाता है। वह सुखी हो जाता है। वह आत्मिक अडोलता में टिका रहता है। उसको बहुत भाग्यशाली कहना चाहिए। 1। रहाउ। हे भाई ! (जिस मनुष्य की सुरति परमात्मा के नाम में जुड़ती है। वह) विकारों से बचा रहता है। माया से निर्लिप रहता है। आत्मिक मौत लाने वाला अहंकार-जहर वह त्याग देता है। उसको सिर्फ परमात्मा के दर्शनों की तमन्ना और इन्तजार बना रहता है। वह मनुष्य अपने हृदय में प्यारे प्रभू के चरणों का आसरा बनाए रखता है। 1। हे भाई ! (परमात्मा के नाम में सुरति जोड़ के रखने वाला मनुष्य) सोता-जागता उठता-बैठता। हसता। वैराग करता – हर वक्त ही चिंता-रहित रहता है। हे नानक ! कह-जिस माया ने सारे जगत को भरमाया है। संत जनों ने उस माया को अपने वश में रखा हुआ है। 2। 44। 67।
सारग महला 5 ॥
अब जन ऊपरि को न पुकारै ॥
पूकारन कउ जो उदमु करता गुरु परमेसरु ता कउ मारै ॥1॥ रहाउ ॥
निरवैरै संगि वैरु रचावै हरि दरगह ओहु हारै ॥
आदि जुगादि प्रभ की वडिआई जन की पैज सवारै ॥1॥
निरभउ भए सगल भउ मिटिआ चरन कमल आधारै ॥
गुर कै बचनि जपिओ नाउ नानक प्रगट भइओ संसारै ॥2॥45॥68॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे भाई ! (जब मनुष्य गुरू के वचनों पर चल कर हरी-नाम जपता है) तब उस सेवक पर कोई मनुष्य कोई दूषण नहीं लगा सकता। जो मनुष्य प्रभू के सेवक पर दूषणबाज़ी का यतन करता है। गुरू परमात्मा उसका आत्मिक जीवन नीच कर देता है। 1। रहाउ। हे भाई ! जो मनुष्य कभी किसी के साथ वैर नहीं करता। उसके साथ जो भी वैर कमाता है। वह मनुष्य परमात्मा की दरगाह में आत्मिक जीवन की कसौटी पर पूरा नहीं उतरता। हे भाई ! जगत के आरम्भ से। जुगों की शुरूवात से ही परमात्मा का यह गुण (बिरद) चला कि वह अपने सेवक की लाज रखता है। 1। हे भाई ! परमात्मा के सुदर चरणों का आसरा लेने से प्रभू का सेवक निर्भय हो जाता है। उसका (दुनियावी) हरेक डर मिट जाता है। हे नानक ! (कह-) गुरू के उपदेश पर चल के जिसने भी परमात्मा का नाम जपा। वह जगत में नामवर (मशहूर) हो गया। 2। 45। 68।
सारग महला 5 ॥
हरि जन छोडिआ सगला आपु ॥
जिउ जानहु तिउ रखहु गुसाई पेखि जीवां परतापु ॥1॥ रहाउ ॥
गुर उपदेसि साध की संगति बिनसिओ सगल संतापु ॥
मित्र सत्र पेखि समतु बीचारिओ सगल संभाखन जापु ॥1॥
तपति बुझी सीतल आघाने सुनि अनहद बिसम भए बिसमाद ॥
अनदु भइआ नानक मनि साचा पूरन पूरे नाद ॥2॥46॥69॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे प्रभू ! (जैसे) आपके भक्तों ने स्वै भाव त्यागा होता है (और। आपके दर पर आरजू करते हैं वैसे ही मैं भी स्वै-भाव छोड़ के विनती करता हूँ-) हे जगत के पति ! जैसे हो सके वैसे (इस माया के हाथ से) मेरी रक्षा कर। आपका प्रताप देख के मैं आत्मिक जीवन हासिल करता रहूँ। 1। रहाउ। हे भाई ! गुरू के उपदेश से। साध-संगति की बरकति से (जिस मनुष्य के अंदर से) सारा दुख-कलेश नाश हो जाता है। वह अपने मित्रों-वैरियों को देख के (सबमें प्रभू की ही जोति) एक-समान समझता है। परमात्मा के नाम का सिमरन ही उसकी हर वक्त की बोलचाल है। 1। हे नानक ! (जिन मनुष्यों के) मन में सदा-स्थिर प्रभू आ बसता है। (उनके अंदर की) जलन बुझ जाती है। (उनका हृदय) शांत हो जाता है। वह (माया की तृष्णा की ओर से) तृप्त हो जाते हैं; एक-रस नाम की धुनि सुन के वह आश्चर्य हुए रहते हैं। उनके अंदर आत्मिक आनंद बना रहता है (जैसे कि उनके अंदर) पूरे तौर पर शंख आदि नाद बज रहे हैं। 2। 46। 69।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।

गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।

इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे (मेरे) मालिक ! जिन सेत-जनों ने आपको जान लिया (आपके साथ गहरी सांझ डाल ली)।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।