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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 1217 · सारंग

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अंग
1217
सारंग
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  1. जिन संतन जानिआ तू ठाकुर ते आए परवान ॥
  2. करहु गति दइआल संतहु मोरी ॥
  3. ठाकुर बिनती करन जनु आइओ ॥
  4. जा की राम नाम लिव लागी ॥
  5. अब जन ऊपरि को न पुकारै ॥
  6. हरि जन छोडिआ सगला आपु ॥

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग सारंग

जिन संतन जानिआ तू ठाकुर ते आए परवान ॥

अंग 1216 से चला आ रहा अंश

जिन संतन जानिआ तू ठाकुर ते आए परवान ॥
जन का संगु पाईऐ वडभागी नानक संतन कै कुरबान ॥2॥41॥64॥

हिन्दी अर्थ: हे (मेरे) मालिक! जिन सेत-जनों ने आपको जान लिया (आपके साथ गहरी सांझ डाल ली)। उनका ही जगत में आना सफल है। हे नानक! (कहें:) संत जनों की संगति बहुत भाग्यों से मिलती है। मैं तो संत-जनों से सदके जाता हूँ। 2। 41। 64।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग सारंग

करहु गति दइआल संतहु मोरी ॥

सारग महला 5 ॥
करहु गति दइआल संतहु मोरी ॥
तुम समरथ कारन करना तूटी तुम ही जोरी ॥1॥ रहाउ ॥
जनम जनम के बिखई तुम तारे सुमति संगि तुमारै पाई ॥
अनिक जोनि भ्रमते प्रभ बिसरत सासि सासि हरि गाई ॥1॥
जो जो संगि मिले साधू कै ते ते पतित पुनीता ॥
कहु नानक जा के वडभागा तिनि जनमु पदारथु जीता ॥2॥42॥65॥

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे दया के श्रोत संतजनो! (मेहर कर के) मेरी उच्च आत्मिक अवस्था कर दें। आप सब ताकतों के मालिक और जगत के मूल परमात्मा का रूप हैं। परमात्मा से टूटी हुई सुरति को आप ही जोड़ने वाले हैं। 1। रहाउ। हे संत जनो! अनेकों जन्मों के विकारियों को आप (विकारों से) बचा लेते हैं। आपकी संगति में रहने से श्रेष्ठ-बुद्धि प्राप्त हो जाती है। परमात्मा को भुला के अनेकों जूनियों में भटकते हुओं ने भी (आपकी संगति में) हरेक साँस के साथ प्रभू की सिफत-सालाह आरम्भ कर दी। 1। हे भाई! जो जो मनुष्य गुरू की संगति में मिलते हैं। वे सारे विकारों (भरे जीवन) से (हट कर) स्वच्छ जीवन वाले बन जाते हैं। हे नानक! कहें: जिस मनुष्य के बड़े भाग्य जाग उठे। उसने (संत जनों की संगति में रह के) ये कीमती मनुष्य जन्म (विकारों के आगे) हारने से बचा लिया। 2। 42। 65।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग सारंग

ठाकुर बिनती करन जनु आइओ ॥

सारग महला 5 ॥
ठाकुर बिनती करन जनु आइओ ॥
सरब सूख आनंद सहज रस सुनत तुहारो नाइओ ॥1॥ रहाउ ॥
क्रिपा निधान सूख के सागर जसु सभ महि जा को छाइओ ॥
संतसंगि रंग तुम कीए अपना आपु द्रिसटाइओ ॥1॥
नैनहु संगि संतन की सेवा चरन झारी केसाइओ ॥
आठ पहर दरसनु संतन का सुखु नानक इहु पाइओ ॥2॥43॥66॥

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे (मेरे) मालिक-प्रभू! (आपका) दास (आपके दर पे) विनती करने आया है। आपका नाम सुनते हुए आत्मिक अडोकलता के सारे सुख सारे आनंद सारे रस (मिल जाते हैं)। 1। रहाउ। हे दया के खजाने! हे सुखों के समुंद्र! (आप ऐसे हैं) जिसकी शोभा सारी सृष्टि में अपना प्रभाव डालती है। संतों की संगति में आप अनेकों आनंद-करिश्मे करते हैं। और, अपने आप को प्रकट करते हैं। 1। आँखों से (दर्शन कर के) मैं संत जनों की सेवा करता रहूँ। उनके चरन अपने केसों से झाड़ता रहूँ। हे नानक! (कहें: हे प्रभू! मेहर करें) मैं आठों पहर संत जनों के दर्शन करता रहूँ। मुझे यह सुख मिला रहे। 2। 43। 66।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग सारंग

जा की राम नाम लिव लागी ॥

सारग महला 5 ॥
जा की राम नाम लिव लागी ॥
सजनु सुरिदा सुहेला सहजे सो कहीऐ बडभागी ॥1॥ रहाउ ॥
रहित बिकार अलप माइआ ते अहंबुधि बिखु तिआगी ॥
दरस पिआस आस एकहि की टेक हीऐं प्रिअ पागी ॥1॥
अचिंत सोइ जागनु उठि बैसनु अचिंत हसत बैरागी ॥
कहु नानक जिनि जगतु ठगाना सु माइआ हरि जन ठागी ॥2॥44॥67॥

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे भाई! जिस मनुष्य की लगन परमात्मा के नाम के साथ लग जाती है। वह भला मनुष्य बन जाता है। वह सुंदर हृदय वाला हो जाता है। वह सुखी हो जाता है। वह आत्मिक अडोलता में टिका रहता है। उसको बहुत भाग्यशाली कहना चाहिए। 1। रहाउ। हे भाई! (जिस मनुष्य की सुरति परमात्मा के नाम में जुड़ती है। वह) विकारों से बचा रहता है। माया से निर्लिप रहता है। आत्मिक मौत लाने वाला अहंकार-जहर वह त्याग देता है। उसको सिर्फ परमात्मा के दर्शनों की तमन्ना और इन्तजार बना रहता है। वह मनुष्य अपने हृदय में प्यारे प्रभू के चरणों का आसरा बनाए रखता है। 1। हे भाई! (परमात्मा के नाम में सुरति जोड़ के रखने वाला मनुष्य) सोता-जागता उठता-बैठता। हसता, वैराग करता, हर वक्त ही चिंता-रहित रहता है। हे नानक! कहें-जिस माया ने सारे जगत को भरमाया है। संत जनों ने उस माया को अपने वश में रखा हुआ है। 2। 44। 67।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग सारंग

अब जन ऊपरि को न पुकारै ॥

सारग महला 5 ॥
अब जन ऊपरि को न पुकारै ॥
पूकारन कउ जो उदमु करता गुरु परमेसरु ता कउ मारै ॥1॥ रहाउ ॥
निरवैरै संगि वैरु रचावै हरि दरगह ओहु हारै ॥
आदि जुगादि प्रभ की वडिआई जन की पैज सवारै ॥1॥
निरभउ भए सगल भउ मिटिआ चरन कमल आधारै ॥
गुर कै बचनि जपिओ नाउ नानक प्रगट भइओ संसारै ॥2॥45॥68॥

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे भाई! (जब मनुष्य गुरू के वचनों पर चल कर हरी-नाम जपता है) तब उस सेवक पर कोई मनुष्य कोई दूषण नहीं लगा सकता। जो मनुष्य प्रभू के सेवक पर दूषणबाज़ी का यतन करता है। गुरू परमात्मा उसका आत्मिक जीवन नीच कर देता है। 1। रहाउ। हे भाई! जो मनुष्य कभी किसी के साथ वैर नहीं करता। उसके साथ जो भी वैर कमाता है। वह मनुष्य परमात्मा की दरगाह में आत्मिक जीवन की कसौटी पर पूरा नहीं उतरता। हे भाई! जगत के आरम्भ से। जुगों की शुरूवात से ही परमात्मा का यह गुण (बिरद) चला आ रहा है कि वह अपने सेवक की लाज रखता है। 1। हे भाई! परमात्मा के सुदर चरणों का आसरा लेने से प्रभू का सेवक निर्भय हो जाता है। उसका (दुनियावी) हरेक डर मिट जाता है। हे नानक! (कहें:) गुरू के उपदेश पर चल के जिसने भी परमात्मा का नाम जपा। वह जगत में नामवर (मशहूर) हो गया। 2। 45। 68।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग सारंग

हरि जन छोडिआ सगला आपु ॥

सारग महला 5 ॥
हरि जन छोडिआ सगला आपु ॥
जिउ जानहु तिउ रखहु गुसाई पेखि जीवां परतापु ॥1॥ रहाउ ॥
गुर उपदेसि साध की संगति बिनसिओ सगल संतापु ॥
मित्र सत्र पेखि समतु बीचारिओ सगल संभाखन जापु ॥1॥
तपति बुझी सीतल आघाने सुनि अनहद बिसम भए बिसमाद ॥
अनदु भइआ नानक मनि साचा पूरन पूरे नाद ॥2॥46॥69॥

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे प्रभू! (जैसे) आपके भक्तों ने स्वै भाव त्यागा होता है (और, आपके दर पर आरजू करते हैं वैसे ही मैं भी स्वै-भाव छोड़ के विनती करता हूँ-) हे जगत के पति! जैसे हो सके वैसे (इस माया के हाथ से) मेरी रक्षा करें। आपका प्रताप देख के मैं आत्मिक जीवन हासिल करता रहूँ। 1। रहाउ। हे भाई! गुरू के उपदेश से। साध-संगति की बरकति से (जिस मनुष्य के अंदर से) सारा दुख-कलेश नाश हो जाता है। वह अपने मित्रों-वैरियों को देख के (सबमें प्रभू की ही जोति) एक-समान समझता है। परमात्मा के नाम का सिमरन ही उसकी हर वक्त की बोलचाल है। 1। हे नानक! (जिन मनुष्यों के) मन में सदा-स्थिर प्रभू आ बसता है। (उनके अंदर की) जलन बुझ जाती है। (उनका हृदय) शांत हो जाता है। वह (माया की तृष्णा की ओर से) तृप्त हो जाते हैं; एक-रस नाम की धुनि सुन के वह आश्चर्य हुए रहते हैं। उनके अंदर आत्मिक आनंद बना रहता है (जैसे कि उनके अंदर) पूरे तौर पर शंख आदि नाद बज रहे हैं। 2। 46। 69।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1217 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।