हउ नाही नाही किछु मेरा ना हमरो बसु चारी ॥
करन करावन नानक के प्रभ संतन संगि उधारी ॥2॥36॥59॥
मोहनी मोहत रहै न होरी ॥
साधिक सिध सगल की पिआरी तुटै न काहू तोरी ॥1॥ रहाउ ॥
खटु सासत्र उचरत रसनागर तीरथ गवन न थोरी ॥
पूजा चक्र बरत नेम तपीआ ऊहा गैलि न छोरी ॥1॥
अंध कूप महि पतित होत जगु संतहु करहु परम गति मोरी ॥
साधसंगति नानकु भइओ मुकता दरसनु पेखत भोरी ॥2॥37॥60॥
कहा करहि रे खाटि खाटुली ॥
पवनि अफार तोर चामरो अति जजरी तेरी रे माटुली ॥1॥ रहाउ ॥
ऊही ते हरिओ ऊहा ले धरिओ जैसे बासा मास देत झाटुली ॥
देवनहारु बिसारिओ अंधुले जिउ सफरी उदरु भरै बहि हाटुली ॥1॥
साद बिकार बिकार झूठ रस जह जानो तह भीर बाटुली ॥
कहु नानक समझु रे इआने आजु कालि खुल॑ै तेरी गांठुली ॥2॥38॥61॥
गुर जीउ संगि तुहारै जानिओ ॥
कोटि जोध उआ की बात न पुछीऐ तां दरगह भी मानिओ ॥1॥ रहाउ ॥
कवन मूलु प्रानी का कहीऐ कवन रूपु द्रिसटानिओ ॥
जोति प्रगास भई माटी संगि दुलभ देह बखानिओ ॥1॥
तुम ते सेव तुम ते जप तापा तुम ते ततु पछानिओ ॥
करु मसतकि धरि कटी जेवरी नानक दास दसानिओ ॥2॥39॥62॥
हरि हरि दीओ सेवक कउ नाम ॥
मानसु का को बपुरो भाई जा को राखा राम ॥1॥ रहाउ ॥
आपि महा जनु आपे पंचा आपि सेवक कै काम ॥
आपे सगले दूत बिदारे ठाकुर अंतरजाम ॥1॥
आपे पति राखी सेवक की आपि कीओ बंधान ॥
आदि जुगादि सेवक की राखै नानक को प्रभु जान ॥2॥40॥63॥
तू मेरे मीत सखा हरि प्रान ॥
मनु धनु जीउ पिंडु सभु तुमरा इहु तनु सीतो तुमरै धान ॥1॥ रहाउ ॥
तुम ही दीए अनिक प्रकारा तुम ही दीए मान ॥
सदा सदा तुम ही पति राखहु अंतरजामी जान ॥1॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।
अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।
इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे गवार ! तूने उनके साथ परच के प्यार डाला हुआ है जो (आखिर) आपके काम नहीं आ सकते।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।