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1216
सारंग
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· शबद · राग सारंग
तिन सिउ राचि माचि हितु लाइओ जो कामि नही गावारी ॥1॥
तिन सिउ राचि माचि हितु लाइओ जो कामि नही गावारी ॥1॥
हउ नाही नाही किछु मेरा ना हमरो बसु चारी ॥
करन करावन नानक के प्रभ संतन संगि उधारी ॥2॥36॥59॥
हउ नाही नाही किछु मेरा ना हमरो बसु चारी ॥
करन करावन नानक के प्रभ संतन संगि उधारी ॥2॥36॥59॥
हिन्दी अर्थ: हे गवार! आपने उनके साथ परच के प्यार डाला हुआ है जो (आखिर) आपके काम नहीं आ सकते। 1। मेरी कोई बिसात नहीं। (माया के मुकाबले में) मेरा कोई वश नहीं चलता मेरा कोई जोर नहीं चलता। हे सब कुछ कर सकने की सामर्थ्य वाले! हे सब कुछ करा सकने वाले! हे नानक के प्रभू! मुझे अपने संतों की संगति में रख के (इस संसार-समुंद्र से) मेरा पार-उतारा करें। 2। 36। 59।
· शबद · राग सारंग
मोहनी मोहत रहै न होरी ॥
सारग महला 5 ॥
मोहनी मोहत रहै न होरी ॥
साधिक सिध सगल की पिआरी तुटै न काहू तोरी ॥1॥ रहाउ ॥
खटु सासत्र उचरत रसनागर तीरथ गवन न थोरी ॥
पूजा चक्र बरत नेम तपीआ ऊहा गैलि न छोरी ॥1॥
अंध कूप महि पतित होत जगु संतहु करहु परम गति मोरी ॥
साधसंगति नानकु भइओ मुकता दरसनु पेखत भोरी ॥2॥37॥60॥
मोहनी मोहत रहै न होरी ॥
साधिक सिध सगल की पिआरी तुटै न काहू तोरी ॥1॥ रहाउ ॥
खटु सासत्र उचरत रसनागर तीरथ गवन न थोरी ॥
पूजा चक्र बरत नेम तपीआ ऊहा गैलि न छोरी ॥1॥
अंध कूप महि पतित होत जगु संतहु करहु परम गति मोरी ॥
साधसंगति नानकु भइओ मुकता दरसनु पेखत भोरी ॥2॥37॥60॥
हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे भाई! मोहनी माया (जीवों को) अपने मोह में फसाती रहती है। किसी भी तरफ से रोकने से नहीं रुकती। योग-साधना करने वाले साधू। जोग-साधना में सिद्ध-हस्त योगी, (माया इन) सबकी ही प्यारी है। किसी भी तरह से (उसका प्यार) तोड़ने से नहीं टूटता। 1। रहाउ। हे भाई! छह शास्त्र मुँह-ज़बानी उच्चारने से, तीर्थों की यात्रा करने से भी (माया वाली प्रीति) कम नहीं होती। अनेकों लोग हैं देव-पूजा करने वाले, (अपने शरीर पर गणेश आदि के) निशान लगाने वाले, व्रत आदि के नियम निभाने वाले, तप करने वाले। पर माया वहाँ भी पीछा नहीं छोड़ती (माया से मुक्ति नहीं मिलती)। 1। हे संत जनो! जगत माया के मोह के अंधे कुएँ में गिर रहा है। (आप मेहर करें) मेरी उच्च आत्मिक अवस्था बनाएँ (और मुझे माया के पँजे में से बचाएँ)। हे नानक! जो मनुष्य साध-संगति में (परमात्मा का) थोड़ा-जितना भी दर्शन करता है, (वह माया के पंजे से) आजाद हो जाता है। 2। 37। 60।
· शबद · राग सारंग
कहा करहि रे खाटि खाटुली ॥
सारग महला 5 ॥
कहा करहि रे खाटि खाटुली ॥
पवनि अफार तोर चामरो अति जजरी तेरी रे माटुली ॥1॥ रहाउ ॥
ऊही ते हरिओ ऊहा ले धरिओ जैसे बासा मास देत झाटुली ॥
देवनहारु बिसारिओ अंधुले जिउ सफरी उदरु भरै बहि हाटुली ॥1॥
साद बिकार बिकार झूठ रस जह जानो तह भीर बाटुली ॥
कहु नानक समझु रे इआने आजु कालि खुल॑ै तेरी गांठुली ॥2॥38॥61॥
कहा करहि रे खाटि खाटुली ॥
पवनि अफार तोर चामरो अति जजरी तेरी रे माटुली ॥1॥ रहाउ ॥
ऊही ते हरिओ ऊहा ले धरिओ जैसे बासा मास देत झाटुली ॥
देवनहारु बिसारिओ अंधुले जिउ सफरी उदरु भरै बहि हाटुली ॥1॥
साद बिकार बिकार झूठ रस जह जानो तह भीर बाटुली ॥
कहु नानक समझु रे इआने आजु कालि खुल॑ै तेरी गांठुली ॥2॥38॥61॥
हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे (मूर्ख)! (माया वाली) बुरी कमाई कमा के आप क्या करते रहते हैं? हे मूर्ख! (आप ध्यान ही नहीं देते कि) हवा से आपकी चमड़ी फूली हुई है और आपका शरीर बहुत जर्जर हो जा रहा है। 1। रहाउ। हे मूर्ख! जैसे बाशा (शिकारी पक्षी) माँस के लिए झपट्टा मारता है, वैसे ही आप भी धरती से ही (धन झपट मार के) छीनते हैं और धरती में ही संभाल के रखते हैं। हे (माया के मोह में) अंधे हुए मनुष्य! आपने सारे पदार्थ देने वाले प्रभू को भुला दिया है। जैसे कोई राही किसी दुकान पर बैठ के अपना पेट भरे जाता है (और यह याद ही भुला देता है कि मेरी यात्रा का समय व्यर्थ जा रहा है)। 1। हे मूर्ख! आप विकारों के स्वादों में नाशवंत पदार्थों के रसों में (मस्त हैं)। जहाँ आपको जाना है, वह रास्ता (इन रसों के स्वादों के कारण) मुश्किल होता जा रहा है। हे नानक! कहें: हे मूर्ख! समझें, जल्द ही आपके प्राणों की गाँठ खुल जानी है। 2। 38। 61।
· शबद · राग सारंग
गुर जीउ संगि तुहारै जानिओ ॥
सारग महला 5 ॥
गुर जीउ संगि तुहारै जानिओ ॥
कोटि जोध उआ की बात न पुछीऐ तां दरगह भी मानिओ ॥1॥ रहाउ ॥
कवन मूलु प्रानी का कहीऐ कवन रूपु द्रिसटानिओ ॥
जोति प्रगास भई माटी संगि दुलभ देह बखानिओ ॥1॥
तुम ते सेव तुम ते जप तापा तुम ते ततु पछानिओ ॥
करु मसतकि धरि कटी जेवरी नानक दास दसानिओ ॥2॥39॥62॥
गुर जीउ संगि तुहारै जानिओ ॥
कोटि जोध उआ की बात न पुछीऐ तां दरगह भी मानिओ ॥1॥ रहाउ ॥
कवन मूलु प्रानी का कहीऐ कवन रूपु द्रिसटानिओ ॥
जोति प्रगास भई माटी संगि दुलभ देह बखानिओ ॥1॥
तुम ते सेव तुम ते जप तापा तुम ते ततु पछानिओ ॥
करु मसतकि धरि कटी जेवरी नानक दास दसानिओ ॥2॥39॥62॥
हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे सतिगुरू जी! आपकी संगति में (रह के) ये समझ आई है कि (जो जगत में) करोड़ों सूरमे (कहलवाते थे) उनकी जहाँ बात भी नहीं पूछी जाती (अगर आपकी संगति में टिके रहें) तो उस दरगाह में भी आदर मिलता है। 1। रहाउ। जीव का मूल (रक्त-बिंदु) गंदा सा ही कहा जाता है (पर इस गंदे मूल से भी) कैसी सुंदर शकल दिख जाती है। जब मिट्टी के अंदर (प्रभू की) जोति का प्रकाश होता है, तो इसको दुर्लभ (मनुष्य का) शरीर कहते हैं। 1। हे नानक! (कहें: हे सतिगुरू!) आपसे ही (मैंने) सेवा-भगती की रीति सीखी। आपसे ही जप-तप की समझ आई। आपसे ही सही जीवन रास्ता समझा। हे गुरू! मेरे माथे पर आपने अपना हाथ रख के मेरे माया के मोह के फंदे को काट दिया है। मैं आपके दासों का दास हूँ। 2। 39। 62।
· शबद · राग सारंग
हरि हरि दीओ सेवक कउ नाम ॥
सारग महला 5 ॥
हरि हरि दीओ सेवक कउ नाम ॥
मानसु का को बपुरो भाई जा को राखा राम ॥1॥ रहाउ ॥
आपि महा जनु आपे पंचा आपि सेवक कै काम ॥
आपे सगले दूत बिदारे ठाकुर अंतरजाम ॥1॥
आपे पति राखी सेवक की आपि कीओ बंधान ॥
आदि जुगादि सेवक की राखै नानक को प्रभु जान ॥2॥40॥63॥
हरि हरि दीओ सेवक कउ नाम ॥
मानसु का को बपुरो भाई जा को राखा राम ॥1॥ रहाउ ॥
आपि महा जनु आपे पंचा आपि सेवक कै काम ॥
आपे सगले दूत बिदारे ठाकुर अंतरजाम ॥1॥
आपे पति राखी सेवक की आपि कीओ बंधान ॥
आदि जुगादि सेवक की राखै नानक को प्रभु जान ॥2॥40॥63॥
हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे भाई! अपने सेवक को परमात्मा अपना नाम स्वयं देता है। हे भाई! जिस मनुष्य का रखवाला परमात्मा स्वयं बनता है, कोई बेचारा मनुष्य उसका क्या बिगाड़ सकता है? 1। रहाउ। हे भाई! परमात्मा स्वयं ही अपने सेवक के काम आता है। स्वयं ही (उसके वास्ते) मुखिया है। अंतरजामी मालिक-प्रभू स्वयं ही (अपने सेवक के) सारे बैरी समाप्त कर देता है। 1। हे भाई! परमात्मा स्वयं ही अपने सेवक की इज्जत रखता है। (उसकी इज्जत बचाने के लिए) स्वयं ही पक्के नियम घड़ देता है। हे भाई! नानक का जानी-जान प्रभू आदि से जुगादि से अपने सेवक की इज्जत रखता आया है। 2। 40। 63।
· शबद · राग सारंग
तू मेरे मीत सखा हरि प्रान ॥
सारग महला 5 ॥
तू मेरे मीत सखा हरि प्रान ॥
मनु धनु जीउ पिंडु सभु तुमरा इहु तनु सीतो तुमरै धान ॥1॥ रहाउ ॥
तुम ही दीए अनिक प्रकारा तुम ही दीए मान ॥
सदा सदा तुम ही पति राखहु अंतरजामी जान ॥1॥
तू मेरे मीत सखा हरि प्रान ॥
मनु धनु जीउ पिंडु सभु तुमरा इहु तनु सीतो तुमरै धान ॥1॥ रहाउ ॥
तुम ही दीए अनिक प्रकारा तुम ही दीए मान ॥
सदा सदा तुम ही पति राखहु अंतरजामी जान ॥1॥
हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे हरी! आप ही मेरे मित्र हैं। आप ही मेरे प्राणों के सहाई हैं। मेरा यह मन धन मेरी ये जिंद ये शरीर, सब कुछ आपका ही दिया हुआ है। मेरा यह शरीर आपकी ही बख्शी हुई ख़ुराक से पला है। 1। रहाउ। हे प्रभू! हे जानी-जान! मुझे आप ही अनेकों किस्मों के पदार्थ देते हैं। हे दिल के जानने वाले! आप ही सदा-सदा मेरी इज्जत रखते हैं। 1।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1216 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।