Lulla Family

अंग 1216

अंग
1216
राग सारंग
राग: सारंग · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
तिन सिउ राचि माचि हितु लाइओ जो कामि नही गावारी ॥1॥
हउ नाही नाही किछु मेरा ना हमरो बसु चारी ॥
करन करावन नानक के प्रभ संतन संगि उधारी ॥2॥36॥59॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: हे गवार ! तूने उनके साथ परच के प्यार डाला हुआ है जो (आखिर) आपके काम नहीं आ सकते। 1। मेरी कोई बिसात नहीं। (माया के मुकाबले में) मेरा कोई वश नहीं चलता मेरा कोई जोर नहीं चलता। हे सब कुछ केर सकने की समर्था वाले ! हे सब कुछ करा सकने वाले ! हे नानक के प्रभू ! मुझे अपने संतों की संगति में रख के (इस संसार-समुंद्र से) मेरा पार-उतारा कर। 2। 36। 59।
सारग महला 5 ॥
मोहनी मोहत रहै न होरी ॥
साधिक सिध सगल की पिआरी तुटै न काहू तोरी ॥1॥ रहाउ ॥
खटु सासत्र उचरत रसनागर तीरथ गवन न थोरी ॥
पूजा चक्र बरत नेम तपीआ ऊहा गैलि न छोरी ॥1॥
अंध कूप महि पतित होत जगु संतहु करहु परम गति मोरी ॥
साधसंगति नानकु भइओ मुकता दरसनु पेखत भोरी ॥2॥37॥60॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे भाई ! मोहनी माया (जीवों को) अपने मोह में फसाती रहती है। किसी भी तरफ से रोकने से नहीं रुकती। योग-साधना करने वाले साधू। जोग-साधना में सिद्ध-हस्त योगी- (माया इन) सबकी ही प्यारी है। किसी भी तरह से (उसका प्यार) तोड़ने से नहीं टूटता। 1। रहाउ। हे भाई ! छह शास्त्र मॅुंह-ज़बानी उचारने से। तीर्थों का रटन करने से भी (माया वाली प्रीति) कम नहीं होती। अनेकों लोग हैं देव-पूजा करने वाले। (अपने शरीर के गणेश आदि के) निशान लगाने वाले। व्रत आदि के नियम निभाने वाले। तपक रने वाले। पर माया वहाँ भी पीछा नहीं छोड़ती (माया से मुक्ति नहीं मिलती)। 1। हे संत जनो ! जगत माया के मोह के अंधे कूएँ में गिर रहा है (आप मेहर करो) मेरी उच्च आत्मिक अवस्था बनाओ (और मुझे माया के पँजे में से बचाओ)। हे नानक ! जो मनुष्य साध-संगति में (परमात्मा का) थोड़ा-जितना भी दर्शन करता है। (वह माया के पंजे से) आजाद हो जाता है। 2। 37। 60।
सारग महला 5 ॥
कहा करहि रे खाटि खाटुली ॥
पवनि अफार तोर चामरो अति जजरी तेरी रे माटुली ॥1॥ रहाउ ॥
ऊही ते हरिओ ऊहा ले धरिओ जैसे बासा मास देत झाटुली ॥
देवनहारु बिसारिओ अंधुले जिउ सफरी उदरु भरै बहि हाटुली ॥1॥
साद बिकार बिकार झूठ रस जह जानो तह भीर बाटुली ॥
कहु नानक समझु रे इआने आजु कालि खुल॑ै तेरी गांठुली ॥2॥38॥61॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे (मूर्ख) ! (माया वाली) कोझी कमाई कमा के आप क्या करता रहता है। हे मूर्ख ! (आप ध्या नही नहीं देता कि) हवा से आपकी चमड़ी फूली हुई है। और। आपका शरीर बहुत जरज़रा हैं जा रहा है। 1। रहाउ। हे मूर्ख ! जैसे बाशा माँस के लिए झपट्टा मारता है। वैसे ही आप भी धरती से ही (धन झपट मार के) छीनता है। और। धरती में ही संभाल के रखता है। हे (माया के मोह में) अंधें हुए मनुष्य ! तूने सारे पदार्थ देने वाले प्रभू को भुला दिया है। जैसे कोई राही किसी दुकान पर बैठ के अपना पेट भरे जाता है (और। यह चेता ही बिसार देता है कि मेरा राह खोटा हो रहा है)। 1। हे मूर्ख ! आप विकारों के स्वादों में नाशवंत पदार्थों के रसों में (मस्त है) जहाँ तूने जाना है। वह रास्ता (इन रसों के स्वादों के कारण) मुश्किल होता जा रहा है। हे नानक ! कह- हे मूर्ख ! जल्द ही आपके प्राणों की गाँठ खुल जानी है। 2। 38। 61।
सारग महला 5 ॥
गुर जीउ संगि तुहारै जानिओ ॥
कोटि जोध उआ की बात न पुछीऐ तां दरगह भी मानिओ ॥1॥ रहाउ ॥
कवन मूलु प्रानी का कहीऐ कवन रूपु द्रिसटानिओ ॥
जोति प्रगास भई माटी संगि दुलभ देह बखानिओ ॥1॥
तुम ते सेव तुम ते जप तापा तुम ते ततु पछानिओ ॥
करु मसतकि धरि कटी जेवरी नानक दास दसानिओ ॥2॥39॥62॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे सतिगुरू जी ! आपकी संगति में (रह के) ये समझ आई है कि (जो जगत में) करोड़ों सूरमे (कहलवाते थे) उनकी जहाँ बात भी नहीं पूछी जाती (अगर आपकी संगति में टिके रहें) तो उस दरगाह में भी आदर मिलता है। 1। रहाउ। (रक्त-बिंदु का) जीव का गंदा सा ही आदि कहा जाता है (पर इस गंदे मूल से भी) कैसी सुंदर शकल दिख जाती है। जब मिट्टी के अंदर (प्रभू की) जोति का प्रकाश होता है। तो इसको दुर्लभ (मनुष्य का) शरीर कहते हैं। 1। हे नानक ! (कह- हे सतिगुरू !) आपसे ही (मैंने) सेवा-भगती की जाच सीखी। आपसे ही जप-तप की समझ आई। आपसे ही सही जीवन रास्ता समझा। हे गुरू ! मेरे माथे पर तूने अपना हाथ रख के मेरे माया के मोह के फंदे को काट दिया है। मैं आपके दासों का दास हूँ। 2। 39। 62।
सारग महला 5 ॥
हरि हरि दीओ सेवक कउ नाम ॥
मानसु का को बपुरो भाई जा को राखा राम ॥1॥ रहाउ ॥
आपि महा जनु आपे पंचा आपि सेवक कै काम ॥
आपे सगले दूत बिदारे ठाकुर अंतरजाम ॥1॥
आपे पति राखी सेवक की आपि कीओ बंधान ॥
आदि जुगादि सेवक की राखै नानक को प्रभु जान ॥2॥40॥63॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे भाई ! अपने सेवक को परमात्मा अपना नाम स्वयं देता है। हे भाई ! जिस मनुष्य का रखवाला परमात्मा स्वयं बनता है। मनुष्य किसका बेचारा है (कि उसका कुछ बिगाड़ सके।)। 1। रहाउ। हे भाई ! परमात्मा स्वयं ही अपने सेवक के काम आता है। स्वयं ही (उसके वास्ते) मुखिया है। अंतरजामी मालिक-प्रभू स्वयं ही (अपने सेवक के) सारे बैरी समाप्त कर देता है। 1। हे भाई ! परमात्मा स्वयं ही अपने सेवक की इज्जत रखता है। (उसकी इज्जत बचाने के लिए) स्वयं ही पक्के नियम घड़ देता है। हे भाई ! नानक का जानी-जान प्रभू आदि से जुगादि से अपने सेवक की इज्जत रखता आया है। 2। 40। 63।
सारग महला 5 ॥
तू मेरे मीत सखा हरि प्रान ॥
मनु धनु जीउ पिंडु सभु तुमरा इहु तनु सीतो तुमरै धान ॥1॥ रहाउ ॥
तुम ही दीए अनिक प्रकारा तुम ही दीए मान ॥
सदा सदा तुम ही पति राखहु अंतरजामी जान ॥1॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे हरी ! आप ही मेरा मित्र है। आप ही मेरे प्राणों का सहाई है। मेरा यह मेन धन मेरी ये जिंद ये शरीर – सब कुछ आपका ही दिया हुआ है। मेरा यह शरीर आपकी ही बख्शी हुई ख़ुराक से पला है। 1। रहाउ। हे प्रभू ! हे जानी-जान ! मुझे आप ही अनेकों किस्मों के पदार्थ देता है। हे दिल के जानने वाले ! आप ही सदा-सदा मेरी इज्जत रखता है। 1।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।

अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।

इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे गवार ! तूने उनके साथ परच के प्यार डाला हुआ है जो (आखिर) आपके काम नहीं आ सकते।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।