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अंग 1215

अंग
1215
राग सारंग
राग: सारंग · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सारग महला 5 ॥
अंम्रित नामु मनहि आधारो ॥
जिन दीआ तिस कै कुरबानै गुर पूरे नमसकारो ॥1॥ रहाउ ॥
बूझी त्रिसना सहजि सुहेला कामु क्रोधु बिखु जारो ॥
आइ न जाइ बसै इह ठाहर जह आसनु निरंकारो ॥1॥
एकै परगटु एकै गुपता एकै धुंधूकारो ॥
आदि मधि अंति प्रभु सोई कहु नानक साचु बीचारो ॥2॥31॥54॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे भाई ! आत्मिक जीवन देने वाला हरी-नाम (अब मेरे) मन का आसरा (बन गया) है। जिस (गुरू) ने (यह हरी-नाम मुझे) दिया है। मैं उससे सदके जाता हूँ। उस पूरे गुरू के आगे सिर झुकाता हूँ। 1। रहाउ। हे भाई ! (अमृत नाम की बरकति से) मेरी तृष्ण्एा मिट गई है। मैं आत्मिक अडोलता में (टिक के) सुखी (हो गया) हूँ। आत्मिक मौत लाने वाले क्रोध-जहर को (अपने अंदर से) जला दिया है। (अब मेरा मन) किसी भी तरफ भटकता नहीं। उस ठिकाने पर ठहरा रहता है जहाँ परमात्मा का निवास है। 1। यह प्रत्यक्ष जगह वह स्वयं ही है। (इस जगत में) छुपी हुई (आत्मा भी) वह खुद ही है। घोर अंधेरा भी (जब कोई जगत-रचना नहीं थी) वह स्वयं ही है। हे नानक ! कह- (हे भाई ! अब मेरे अंदर यह) अॅटल विश्वास (बन गया) है कि जगत के आरम्भ में। अब बीच के समय (वर्तमान) में। जगत के आखिर में परमात्मा स्वयं ही स्वयं है। 2। 31। 54।
सारग महला 5 ॥
बिनु प्रभ रहनु न जाइ घरी ॥
सरब सूख ताहू कै पूरन जा कै सुखु है हरी ॥1॥ रहाउ ॥
मंगल रूप प्रान जीवन धन सिमरत अनद घना ॥
वड समरथु सदा सद संगे गुन रसना कवन भना ॥1॥
थान पवित्रा मान पवित्रा पवित्र सुनन कहनहारे ॥
कहु नानक ते भवन पवित्रा जा महि संत तुम॑ारे ॥2॥32॥55॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ वह मनुष्य परमात्मा की याद के बिना एक घड़ी भी नहीं रह सकता। हे भाई ! जिस (मनुष्य) के हृदय में सुखों का मूल परमात्मा आ बसता है। उस मनुष्य के ही (हृदय में) सारे सुख आ बसते हैं। 1। रहाउ। हे भाई ! वह प्रभू खुशियों का रूप है। प्राणों के जीवन का आसरा है। उसको सिमरते हुए बहुत से आनंद प्राप्त होते हैं। हे भाई ! वह प्रभू बड़ी ताकतों का मालिक है। सदा ही सदा ही (हमारे) साथ रहता है। मैं अपनी जीभ के उसके कौन-कौन से गुण बयान करूँ। 1। (जहाँ आपका नाम उचारा जाता है) वह जगह पवित्र हैं जाती है। आपके नाम को मानने वाले (श्रद्धा से मन में बसाने वाले) पवित्र हैं जाते हैं। आपके नाम को सुनने वाले और जपने वाले पवित्र हैं जाते हैं। हे नानक ! कह- हे प्रभू ! जिन घरों में आपके संत जन बसते हैं वे पवित्र हैं जाते हैं। 2। 32। 55।
सारग महला 5 ॥
रसना जपती तूही तूही ॥
मात गरभ तुम ही प्रतिपालक म्रित मंडल इक तुही ॥1॥ रहाउ ॥
तुमहि पिता तुम ही फुनि माता तुमहि मीत हित भ्राता ॥
तुम परवार तुमहि आधारा तुमहि जीअ प्रानदाता ॥1॥
तुमहि खजीना तुमहि जरीना तुम ही माणिक लाला ॥
तुमहि पारजात गुर ते पाए तउ नानक भए निहाला ॥2॥33॥56॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे प्रभू ! मेरी जीभ सदा आपका जाप ही जपती है। माँ के पेट में आप ही (जीवों की) पालना करने वाला है। जगत में ही सिर्फ आप ही पालनहार है। 1। रहाउ। हे प्रभू ! आप ही हमारा पिता है। आप ही हमारी माँ भी है। आप ही मित्र है आप ही हितैषी है और आप ही भाई है। आप ही हमारा परिवार है। आप ही आसरा है। आप ही जिंद देने वाला है। आप ही प्राण देने वाला है। 1। हे प्रभू ! आप ही (मेरे लिए) खजाना है। आप ही मेरा धन-दौलत है। आप ही (मेरे लिए) हीरे-मोती है। आप ही (स्वर्ग का) पारजात वृक्ष है। हे नानक ! (कह- हे प्रभू !) जब आप गुरू के माध्यम से मिल जाता है। तब प्रसन्न-चित्त हुआ जाता है। 2। 33। 56।
सारग महला 5 ॥
जाहू काहू अपुनो ही चिति आवै ॥
जो काहू को चेरो होवत ठाकुर ही पहि जावै ॥1॥ रहाउ ॥
अपने पहि दूख अपुने पहि सूखा अपने ही पहि बिरथा ॥
अपुने पहि मानु अपुने पहि ताना अपने ही पहि अरथा ॥1॥
किन ही राज जोबनु धन मिलखा किन ही बाप महतारी ॥
सरब थोक नानक गुर पाए पूरन आस हमारी ॥2॥34॥57॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे भाई ! हर किसी को (कोई) अपना ही (प्यारा) चित्त में आता है। जो मनुष्य किसी का सेवक होता है। (वह सेवक अपने) मालिक के पास ही (जरूरत पड़ने पर) जाता है। 1। रहाउ। हे भाई ! अपने स्नेही के पास दुख फोले जाते हैं अपने स्नेही के पास ही सुख की बातें की जाती हैं। अपने स्नेही के पास दिल का दुख बताया जाता है। अपने स्नेही पर मान किया जाता है। अपने ही स्नेही का आसरा देखा जाता है। अपने स्नेही को ही अपने जरूरतें बताई जाती हैं। 1। हे भाई ! किसी ने राज का मान किया। किसी ने जवानी को (अपनी समझा)। किसी ने धन-धरती का मान किया। किसी ने पिता-माता का आसरा देखा। हे नानक ! (कह-) हे गुरू ! मैंने सारे पदार्थ आपसे प्राप्त कर लिए हैं। मेरी हरेक आशा (आपके दर से) पूरी होती है। 2। 34। 47।
सारग महला 5 ॥
झूठो माइआ को मद मानु ॥
ध्रोह मोह दूरि करि बपुरे संगि गोपालहि जानु ॥1॥ रहाउ ॥
मिथिआ राज जोबन अरु उमरे मीर मलक अरु खान ॥
मिथिआ कापर सुगंध चतुराई मिथिआ भोजन पान ॥1॥
दीन बंधरो दास दासरो संतह की सारान ॥
मांगनि मांगउ होइ अचिंता मिलु नानक के हरि प्रान ॥2॥35॥58॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे अंजान ! माया का नशा माया का अहंकार झूठा है (सदा कायम रहने वाला नहीं)। (माया का) मोह (अपने अंदर से) दूर कर। (माया की खातिर) द्रोह करना दूर कर। परमात्मा को हमेशा अपने साथ बसता समझ। 1। रहाउ। हे भाई ! राज नाशवंत है जवानी नाशवंत है। अमीर बादशाह मालिक खान सभ नाशवंत हैं (इन हकूमतों का नशा सदा कायम नहीं रहेगा)। ये कपड़े और सुगंधियाँ सब नाशवान हैं (इनके आसरे) चतुराई करना झूठा काम है। खाने-पीने के (बढ़िया) पदार्थ सब नाशवान हैं। 1। हे गरीबों के मददगार ! मैं आपके दासों का दास हूँ। मैं आपके संतों की शरण हूँ। हे नानक की जिंद-जान हरी ! अन्य आसरे छोड़ के मैं (आपके दर से) माँग माँगता हूँ कि मुझे दर्शन दे। 2। 35। 58।
सारग महला 5 ॥
अपुनी इतनी कछू न सारी ॥
अनिक काज अनिक धावरता उरझिओ आन जंजारी ॥1॥ रहाउ ॥
दिउस चारि के दीसहि संगी ऊहां नाही जह भारी ॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे गवार ! (जो आत्मिक जायदाद) अपनी (बनती थी। उसकी) रक्ती भर भी संभाल नहीं की। (तूने सारी उम्र) अनेकों कामों में। अनेकों दौड़-भागों में व अन्य जंजालों में ही फसा रहा। 1। रहाउ। हे गवार ! (दुनिया वाले यह) साथी चार दिनों के ही (साथी) दिखते हैं। जहाँ बिपता पड़ती है। वहाँ ये (सहायता) नहीं (कर सकते)।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।

अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।

इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “सारग महला 5 ॥ हे भाई ! आत्मिक जीवन देने वाला हरी-नाम (अब मेरे) मन का आसरा (बन गया) है।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।