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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 1214 · सारंग

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अंग
1214
सारंग
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  1. कहु नानक मिलि संतसंगति ते मगन भए लिव लाई ॥2॥25॥48॥
  2. अपना मीतु सुआमी गाईऐ ॥
  3. ओट सताणी प्रभ जीउ मेरै ॥
  4. प्रभ सिमरत दूख बिनासी ॥
  5. मेरो मनु जत कत तुझहि सम॑ारै ॥
  6. मन ते भै भउ दूरि पराइओ ॥

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग सारंग

कहु नानक मिलि संतसंगति ते मगन भए लिव लाई ॥2॥25॥48॥

अंग 1213 से चला आ रहा अंश

कहु नानक मिलि संतसंगति ते मगन भए लिव लाई ॥2॥25॥48॥

हिन्दी अर्थ: हे नानक! कहें: जो मनुष्य साध-संगति में मिलते हैं। वे मनुष्य परमात्मा में सुरति जोड़ के मस्त रहते हैं। 2। 25। 48।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग सारंग

अपना मीतु सुआमी गाईऐ ॥

सारग महला 5 ॥
अपना मीतु सुआमी गाईऐ ॥
आस न अवर काहू की कीजै सुखदाता प्रभु धिआईऐ ॥1॥ रहाउ ॥
सूख मंगल कलिआण जिसहि घरि तिस ही सरणी पाईऐ ॥
तिसहि तिआगि मानुखु जे सेवहु तउ लाज लोनु होइ जाईऐ ॥1॥
एक ओट पकरी ठाकुर की गुर मिलि मति बुधि पाईऐ ॥
गुण निधान नानक प्रभु मिलिआ सगल चुकी मुहताईऐ ॥2॥26॥49॥

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे भाई! मालिक-प्रभू ही अपना असल मित्र है। उसकी सिफतसालाह करनी चाहिए। (परमात्मा के बिना) किसी भी और की आस नहीं करनी चाहिए। वह प्रभू ही सारे सुख देने वाला है। उसी का सिमरन करना चाहिए। 1। रहाउ। हे भाई! जिस परमात्मा के ही घर में सारे सुख हैं खुशियाँ हैं आनंद हैं। उसकी ही शरण पड़े रहना चाहिए। हे भाई! अगर आप उस प्रभू को छोड़ के मनुष्य की खुशामद करते फिरेंगे, तो शर्मसार होने पड़ता है। 1। हे भाई! गुरू को मिल के जिस मनुष्य ने उच्च बुद्धि प्राप्त कर ली। उसने सिर्फ मालिक-प्रभू का ही आसरा लिया। हे नानक! सारे गुणों का खजाना प्रभू जिस मनुष्य को मिल गया। उसकी सारी मुथाजी समाप्त हो गई। 2। 26। 49।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग सारंग

ओट सताणी प्रभ जीउ मेरै ॥

सारग महला 5 ॥
ओट सताणी प्रभ जीउ मेरै ॥
द्रिसटि न लिआवउ अवर काहू कउ माणि महति प्रभ तेरै ॥1॥ रहाउ ॥
अंगीकारु कीओ प्रभि अपुनै काढि लीआ बिखु घेरै ॥
अंम्रित नामु अउखधु मुखि दीनो जाइ पइआ गुर पैरै ॥1॥
कवन उपमा कहउ एक मुख निरगुण के दातेरै ॥
काटि सिलक जउ अपुना कीनो नानक सूख घनेरै ॥2॥27॥50॥

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे प्रभू जी! मेरे हृदय में आपका बहुत ताकतवर सहारा है। हे प्रभू! आपके माण के आसरे आपके बड़प्पन के आसरे मैं ओर किसी को निगाह में नहीं लाता (मैं किसी की तरफ देखता भी नहीं। किसी और को आपके बराबर का नहीं समझता)। 1। रहाउ। हे भाई! प्यारे प्रभू ने जिस मनुष्य को अंगीकार किया। उसको उस (प्रभू) ने आत्मिक मौत लाने वाली माया-जहर के घेरे में से निकाल लिया। वह मनुष्य गुरू के चरणों में जा गिरा। और, (गुरू ने उसके) मुँह में आत्मिक जीवन देने वाली नाम-दवा दी। 1। हे भाई! गुण-हीनों को गुण देने वाले प्रभू की मैं अपने एक मुँह से कौन-कौन सी महिमा बयान करूँ। हे नानक! जब उसने किसी भाग्यशाली को उसके माया के फंदे काट के अपना बना लिया। उसको बेअंत सुख प्राप्त हो गए। 2। 27। 50।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग सारंग

प्रभ सिमरत दूख बिनासी ॥

सारग महला 5 ॥
प्रभ सिमरत दूख बिनासी ॥
भइओ क्रिपालु जीअ सुखदाता होई सगल खलासी ॥1॥ रहाउ ॥
अवरु न कोऊ सूझै प्रभ बिनु कहु को किसु पहि जासी ॥
जिउ जाणहु तिउ राखहु ठाकुर सभु किछु तुम ही पासी ॥1॥
हाथ देइ राखे प्रभि अपुने सद जीवन अबिनासी ॥
कहु नानक मनि अनदु भइआ है काटी जम की फासी ॥2॥28॥51॥

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे भाई! सारे दुखों का नाश किरने वाले प्रभू का सिमरने से प्राण देने वाला और सुख देने वाला प्रभू जिस मनुष्य पर दसावान होता है। सारे ही विकारों से उसकी खलासी हो जाती है। 1। रहाउ। हे भाई! (हरी-नाम सिमरन वाले मनुष्य को) परमात्मा के बिना (उस जैसा) और कोई नहीं सूझता (वह सदा यही कहता है:) बताएँ। (हे भाई! प्रभू को छोड़ के) कौन किसके पास जा सकता है। (वह सदा अरदास करता है-) हे ठाकुर! जैसे हो सके वैसे मेरी रक्षा करें। हरेक चीज़ आपके ही पास है। 1। प्यारे प्रभू ने जिन मनुष्यों को हाथ दे के रख लिया। वे अटल आत्मिक जीवन वाले बन गए। आत्मिक मौत उनके नजदीक नहीं फटकती। हे नानक! कहें: (हे भाई!) उनके मन में आनंद बना रहता है। उनकी जमों वाला फंदा काटा जाता है। 2। 28। 51।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग सारंग

मेरो मनु जत कत तुझहि सम॑ारै ॥

सारग महला 5 ॥
मेरो मनु जत कत तुझहि सम॑ारै ॥
हम बारिक दीन पिता प्रभ मेरे जिउ जानहि तिउ पारै ॥1॥ रहाउ ॥
जब भुखौ तब भोजनु मांगै अघाए सूख सघारै ॥
तब अरोग जब तुम संगि बसतौ छुटकत होइ रवारै ॥1॥
कवन बसेरो दास दासन को थापिउ थापनहारै ॥
नामु न बिसरै तब जीवनु पाईऐ बिनती नानक इह सारै ॥2॥29॥52॥

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे प्रभू! मेरा मन हर जगह आपको याद करता है। हे मेरे प्रभू पिता! हम (आपके) गरीब बच्चे हैं। जैसे हो सके वैसे (हमें संसार-समुंद्र से) पार लंघ्ज्ञा लें। 1। रहाउ। हे प्रभू! जब (बच्चा) भूखा होता है तब (खाने के लिए) भोजन माँगता है। जब अघा जाता है, तब उसको सारे सुख (प्रतीत होते हैं)। (इसी तरह ये जीव) जब आपके से (आपके चरणों में) बसता है, तब इसको कोई रोग नहीं सताता। (आपसे) विछुड़ा हुआ (ये) मिट्टी हासे जाता है। 1। हे प्रभू! आपके दासों के दास का क्या जोर चल सकता है। आप स्वयं ही पैदा करने वाले हैं। (आपका दास) नानक यह (ही) विनती करता है: जब आपका नाम नहीं भूलता, तब (आत्मिक) जीवन हासिल होता है। 2। 29। 52।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग सारंग

मन ते भै भउ दूरि पराइओ ॥

सारग महला 5 ॥
मन ते भै भउ दूरि पराइओ ॥
लाल दइआल गुलाल लाडिले सहजि सहजि गुन गाइओ ॥1॥ रहाउ ॥
गुर बचनाति कमात क्रिपा ते बहुरि न कतहू धाइओ ॥
रहत उपाधि समाधि सुख आसन भगति वछलु ग्रिहि पाइओ ॥1॥
नाद बिनोद कोड आनंदा सहजे सहजि समाइओ ॥
करना आपि करावन आपे कहु नानक आपि आपाइओ ॥2॥30॥53॥

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ तब मेरे मन से दुनिया के खतरों का सहम दूर हो गया। हे भाई! (जब) हर वक्त आत्मिक अडोलता में टिक के सुंदर दयालु प्रेम-रस में भीगे हुए प्यारे प्रभू के गुण मैंने गाने शुरू किए। 1। रहाउ। हे भाई! गुरू के बचनों को (प्रभू की) कृपा से कमाते हुए (गुरू के बताए हुए रास्ते पर चलते हुए अब मेरा मन) और किसी भी तरफ़ नहीं भटकता। (मेरा मन) विकारों से बच गया है। प्रभू-चरणों में लीनता के सुखों में टिक गया है। मैंने भगती से प्यार करने वाले प्रभू को हृदय-घर में पा लिया है। 1। हे नानक! कहें: (हे भाई! अब मेरा मन) सदा ही आत्मिक अडोलता में लीन रहता है। (मानो) सारे रागों और तमाशों के करोड़ों ही आनंद प्राप्त हो गए हैं। (अब इस प्रकार निश्चय हो गया है कि) परमात्मा स्वयं ही सब कुछ करने वाला है स्वयं ही (जीवों से) करवाने वाला है। सब जगह स्वयं ही स्वयं है। 2। 30। 53।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1214 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।