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अंग 1214

अंग
1214
राग सारंग
राग: सारंग · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
कहु नानक मिलि संतसंगति ते मगन भए लिव लाई ॥2॥25॥48॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: हे नानक ! कह- जो मनुष्य साध-संगति में मिलते हैं। वे मनुष्य परमात्मा में सुरति जोड़ के मस्त रहते हैं। 2। 25। 48।
सारग महला 5 ॥
अपना मीतु सुआमी गाईऐ ॥
आस न अवर काहू की कीजै सुखदाता प्रभु धिआईऐ ॥1॥ रहाउ ॥
सूख मंगल कलिआण जिसहि घरि तिस ही सरणी पाईऐ ॥
तिसहि तिआगि मानुखु जे सेवहु तउ लाज लोनु होइ जाईऐ ॥1॥
एक ओट पकरी ठाकुर की गुर मिलि मति बुधि पाईऐ ॥
गुण निधान नानक प्रभु मिलिआ सगल चुकी मुहताईऐ ॥2॥26॥49॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे भाई ! मालिक-प्रभू ही अपना असल मित्र है। उसकी सिफतसालाह करनी चाहिए। (परमात्मा के बिना) किसी भी और की आस नहीं करनी चाहिए। वह प्रभू ही सारे सुख देने वाला है। उसी का सिमरन करना चाहिए। 1। रहाउ। हे भाई ! जिस परमात्मा के ही घर में सारे सुख हैं खुशियाँ हैं आनंद हैं। उसकी ही शरण पड़े रहना चाहिए। हे भाई ! अगर आप उस प्रभू को छोड़ के मनुष्य की खुशामद करते फिरोगे। तो शर्मसार होने पड़ता है। 1। हे भाई ! गुरू को मिल के जिस मनुष्य ने उच्च बुद्धि प्राप्त कर ली। उसने सिर्फ मालिक-प्रभू का ही आसरा लिया। हे नानक ! सारे गुणों का खजाना प्रभू जिस मनुष्य को मिल गया। उसकी सारी मुथाजी समाप्त हो गई। 2। 26। 49।
सारग महला 5 ॥
ओट सताणी प्रभ जीउ मेरै ॥
द्रिसटि न लिआवउ अवर काहू कउ माणि महति प्रभ तेरै ॥1॥ रहाउ ॥
अंगीकारु कीओ प्रभि अपुनै काढि लीआ बिखु घेरै ॥
अंम्रित नामु अउखधु मुखि दीनो जाइ पइआ गुर पैरै ॥1॥
कवन उपमा कहउ एक मुख निरगुण के दातेरै ॥
काटि सिलक जउ अपुना कीनो नानक सूख घनेरै ॥2॥27॥50॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे प्रभू जी ! मेरे हृदय में आपका बहुत ताकतवर सहारा है। हे प्रभू ! आपके माण के आसरे आपके बड़प्पन के आसरे मैं ओर किसी को निगाह में नहीं लाता (मैं किसी की तरफ देखता भी नहीं। किसी और को आपके बराबर का नहीं समझता)। 1। रहाउ। हे भाई ! प्यारे प्रभू ने जिस मनुष्य को अंगीकार किया। उसको उस (प्रभू) ने आत्मिक मौत लाने वाली माया-जहर के घेरे में से निकाल लिया। वह मनुष्य गुरू के चरणों में जा गिरा। और। (गुरू ने उसके) मुँह में आत्मिक जीवन देने वाली नाम-दवा दी। 1। हे भाई ! गुण-हीनों को गुण देने वाले प्रभू की मैं अपने एक मुँह से कौन-कौन सी महिमा बयान करूँ। हे नानक ! जब उसने किसी भाग्यशाली को उसके माया के फंदे काट के अपना बना लिया। उसको बेअंत सुख प्राप्त हो गए। 2। 27। 50।
सारग महला 5 ॥
प्रभ सिमरत दूख बिनासी ॥
भइओ क्रिपालु जीअ सुखदाता होई सगल खलासी ॥1॥ रहाउ ॥
अवरु न कोऊ सूझै प्रभ बिनु कहु को किसु पहि जासी ॥
जिउ जाणहु तिउ राखहु ठाकुर सभु किछु तुम ही पासी ॥1॥
हाथ देइ राखे प्रभि अपुने सद जीवन अबिनासी ॥
कहु नानक मनि अनदु भइआ है काटी जम की फासी ॥2॥28॥51॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे भाई ! सारे दुखों का नाश किरने वाले प्रभू का सिमरने से प्राण देने वाला और सुख देने वाला प्रभू जिस मनुष्य पर दसावान होता है। सारे ही विकारों से उसकी खलासी हो जाती है। 1। रहाउ। हे भाई ! (हरी-नाम सिमरन वाले मनुष्य को) परमात्मा के बिना (उस जैसा) और कोई नहीं सूझता (वह सदा यही कहता है-) बता। (हे भाई ! प्रभू को छोड़ के) कौन किसके पास जा सकता है। (वह सदा अरदास करता है-) हे ठाकुर ! जैसे हो सके वैसे मेरी रक्षा कर। हरेक चीज़ आपके ही पास है। 1। प्यारे प्रभू ने जिन मनुष्यों को हाथ दे के रख लिया। वे अटल आत्मिक जीवन वाले बन गए।आत्मिक मौत उनके नजदीक नहीं फटकती। हे नानक ! कह- (हे भाई !) उनके मन में आनंद बना रहता है। उनकी जमों वाला फंदा काटा जाता है। 2। 28। 51।
सारग महला 5 ॥
मेरो मनु जत कत तुझहि सम॑ारै ॥
हम बारिक दीन पिता प्रभ मेरे जिउ जानहि तिउ पारै ॥1॥ रहाउ ॥
जब भुखौ तब भोजनु मांगै अघाए सूख सघारै ॥
तब अरोग जब तुम संगि बसतौ छुटकत होइ रवारै ॥1॥
कवन बसेरो दास दासन को थापिउ थापनहारै ॥
नामु न बिसरै तब जीवनु पाईऐ बिनती नानक इह सारै ॥2॥29॥52॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे प्रभू ! मेरा मन हर जगह आपको याद करता है। हे मेरे प्रभू पिता ! हम (आपके) गरीब बच्चे हैं। जैसे हैं सके वैसे (हमें संसार-समुंद्र से) पार लंघ्ज्ञा ले। 1। रहाउ। हे प्रभू ! जब (बच्चा) भूखा होता है तब (खाने के लिए) भोजन माँगता है। जब अघा जाता है। तब उसको सारे सुख (प्रतीत होते हैं)। (इसी तरह ये जीव) जब आपके से (आपके चरणों में) बसता है। तब इसको कोई रोग नहीं सताता। (आपसे) विछुड़ा हुआ (ये) मिट्टी हासे जाता है। 1। हे प्रभू ! आपके दासों के दास का क्या जोर चल सकता है। आप स्वयं ही पैदा करने वाला है। (आपका दास) नानक यह (ही) विनती करता है- जब आपका नाम नहीं भूलता। तब (आत्मिक) जीवन हासिल होता है। 2। 29। 52।
सारग महला 5 ॥
मन ते भै भउ दूरि पराइओ ॥
लाल दइआल गुलाल लाडिले सहजि सहजि गुन गाइओ ॥1॥ रहाउ ॥
गुर बचनाति कमात क्रिपा ते बहुरि न कतहू धाइओ ॥
रहत उपाधि समाधि सुख आसन भगति वछलु ग्रिहि पाइओ ॥1॥
नाद बिनोद कोड आनंदा सहजे सहजि समाइओ ॥
करना आपि करावन आपे कहु नानक आपि आपाइओ ॥2॥30॥53॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ तब मेरे मन से दुनिया के खतरों का सहम दूर हो गया। हे भाई ! (जब) हर वक्त आत्मिक अडोलता में टिक के सुंदर दयालु प्रेम-रस में भीगे हुए प्यारे प्रभू के गुण मैंने गाने शुरू किए। 1। रहाउ। हे भाई ! गुरू के बचनों को (प्रभू की) कृपा से कमाते हुए (गुरू के बताए हुए रास्ते पर चलते हुए अब मेरा मन) और किसी भी तरफ़ नहीं भटकता। (मेरा मन) विकारों से बच गया है। प्रभू-चरणों में लीनता के सुखों में टिक गया है। मैंने भगती से प्यार करने वाले प्रभू को हृदय-घर में पा लिया है। 1। हे नानक ! कह- (हे भाई ! अब मेरा मन) सदा ही आत्मिक अडोलता में लीन रहता है। – (मानो) सारे रागों और तमाशों के करोड़ों ही आनंद प्राप्त हो गए हैं। (अब इस प्रकार निश्चय हो गया है कि) परमात्मा स्वयं ही सब कुछ करने वाला है स्वयं ही (जीवों से) करवाने वाला है। सब जगह स्वयं ही स्वयं है। 2। 30। 53।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।

गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।

इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे नानक ! कह- जो मनुष्य साध-संगति में मिलते हैं।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।