अपना मीतु सुआमी गाईऐ ॥
आस न अवर काहू की कीजै सुखदाता प्रभु धिआईऐ ॥1॥ रहाउ ॥
सूख मंगल कलिआण जिसहि घरि तिस ही सरणी पाईऐ ॥
तिसहि तिआगि मानुखु जे सेवहु तउ लाज लोनु होइ जाईऐ ॥1॥
एक ओट पकरी ठाकुर की गुर मिलि मति बुधि पाईऐ ॥
गुण निधान नानक प्रभु मिलिआ सगल चुकी मुहताईऐ ॥2॥26॥49॥
ओट सताणी प्रभ जीउ मेरै ॥
द्रिसटि न लिआवउ अवर काहू कउ माणि महति प्रभ तेरै ॥1॥ रहाउ ॥
अंगीकारु कीओ प्रभि अपुनै काढि लीआ बिखु घेरै ॥
अंम्रित नामु अउखधु मुखि दीनो जाइ पइआ गुर पैरै ॥1॥
कवन उपमा कहउ एक मुख निरगुण के दातेरै ॥
काटि सिलक जउ अपुना कीनो नानक सूख घनेरै ॥2॥27॥50॥
प्रभ सिमरत दूख बिनासी ॥
भइओ क्रिपालु जीअ सुखदाता होई सगल खलासी ॥1॥ रहाउ ॥
अवरु न कोऊ सूझै प्रभ बिनु कहु को किसु पहि जासी ॥
जिउ जाणहु तिउ राखहु ठाकुर सभु किछु तुम ही पासी ॥1॥
हाथ देइ राखे प्रभि अपुने सद जीवन अबिनासी ॥
कहु नानक मनि अनदु भइआ है काटी जम की फासी ॥2॥28॥51॥
मेरो मनु जत कत तुझहि सम॑ारै ॥
हम बारिक दीन पिता प्रभ मेरे जिउ जानहि तिउ पारै ॥1॥ रहाउ ॥
जब भुखौ तब भोजनु मांगै अघाए सूख सघारै ॥
तब अरोग जब तुम संगि बसतौ छुटकत होइ रवारै ॥1॥
कवन बसेरो दास दासन को थापिउ थापनहारै ॥
नामु न बिसरै तब जीवनु पाईऐ बिनती नानक इह सारै ॥2॥29॥52॥
मन ते भै भउ दूरि पराइओ ॥
लाल दइआल गुलाल लाडिले सहजि सहजि गुन गाइओ ॥1॥ रहाउ ॥
गुर बचनाति कमात क्रिपा ते बहुरि न कतहू धाइओ ॥
रहत उपाधि समाधि सुख आसन भगति वछलु ग्रिहि पाइओ ॥1॥
नाद बिनोद कोड आनंदा सहजे सहजि समाइओ ॥
करना आपि करावन आपे कहु नानक आपि आपाइओ ॥2॥30॥53॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।
गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।
इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे नानक ! कह- जो मनुष्य साध-संगति में मिलते हैं।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।