Lulla Family

अंग 1213

अंग
1213
राग सारंग
राग: सारंग · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
कहु नानक मै अतुल सुखु पाइआ जनम मरण भै लाथे ॥2॥20॥43॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: मैंने इतना सुख पा लिया है कि वह तोला-नापा नहीं जा सकता। मेरे पैदा होने-मरने के भी सारे डर उतर गए हैं। 2। 20। 43।
सारग महला 5 ॥
रे मूड़॑े आन काहे कत जाई ॥
संगि मनोहरु अंम्रितु है रे भूलि भूलि बिखु खाई ॥1॥ रहाउ ॥
प्रभ सुंदर चतुर अनूप बिधाते तिस सिउ रुच नही राई ॥
मोहनि सिउ बावर मनु मोहिओ झूठि ठगउरी पाई ॥1॥
भइओ दइआलु क्रिपालु दुख हरता संतन सिउ बनि आई ॥
सगल निधान घरै महि पाए कहु नानक जोति समाई ॥2॥21॥44॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे मूर्ख ! आप और कहीं क्यों भटकता फिरता है। आत्मिक जीवन देने वाला सुंदर हरी-नाम-जल आपके साथ है। तूने उससे टूट-टूट के (अब तक) आत्मिक मौत लाने वाला जहर ही खाया है। 1। रहाउ। हे बावरे ! परमात्मा सुंदर है। सुजान है। उपमा-रहित है। रचनहार है- उसके साथ रक्ती भर भी प्रीति नहीं। मन को मोह लेने वाली माया से आपका मन परचा रहता है। नाशवंत जगत में फसाने वाली यह ठॅग-बूटी ही तूने संभाल के रखी है। 1। हे नानक ! कह- (हे भाई !) सारे दुखों को नाश करने वाला परमात्मा जिस मनुष्य पर दयावान हो गया। उसकी प्रीति संत-जनों के साथ बन गई। उसने सारे खजाने हृदय-घर में ही पा लिए। परमात्मा की जोति में उसकी (सदा के लिए) लीनता हैं गई। 2। 21। 44।
सारग महला 5 ॥
ओअं प्रिअ प्रीति चीति पहिलरीआ ॥
जो तउ बचनु दीओ मेरे सतिगुर तउ मै साज सीगरीआ ॥1॥ रहाउ ॥
हम भूलह तुम सदा अभूला हम पतित तुम पतित उधरीआ ॥
हम नीच बिरख तुम मैलागर लाज संगि संगि बसरीआ ॥1॥
तुम गंभीर धीर उपकारी हम किआ बपुरे जंतरीआ ॥
गुर क्रिपाल नानक हरि मेलिओ तउ मेरी सूखि सेजरीआ ॥2॥22॥45॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे सतिगुरू ! (वैसे तो मेरे) चित्त में प्यारे की प्रीति शुरू की ही (आदि-कदीमों से) (टिकी हुई है)। पर जब तूने उपदेश दिया (वह प्रीति जाग उठी। और) मेरा आत्मिक जीवन सुंदर बन गया। 1। रहाउ। हे गुरू ! हम जीव (सदा) भूलें करते हैं। आप सदा अभुल है। हम जीव विकारों में गिरे रहते हैं। आप विकारियों को बचाने वाला है। हम (अरिण्ड जैसे) नीच वृक्ष हैं आप चंदन है। जो साथ बसने वाले पौधों को भी सुगंधित कर देता है। हे गुरू ! आप अपने चरणों में रहने वालों की इज्जत रखने वाला है । 1। हे गुरू ! आप जिगरे वाला है। धैर्यवान है। उपकार करने वाला है। हम निमाणें जीवों की कोई बिसात नहीं। हे नानक ! (कह-) हे कृपालु गुरू ! जब से तूने मेरा प्रभू से मेल करवाया। तब से मेरी हृदय-सेज सुख-भरपूर हो गई है। 2। 22। 45।
सारग महला 5 ॥
मन ओइ दिनस धंनि परवानां ॥
सफल ते घरी संजोग सुहावे सतिगुर संगि गिआनां ॥1॥ रहाउ ॥
धंनि सुभाग धंनि सोहागा धंनि देत जिनि मानां ॥
इहु तनु तुम॑रा सभु ग्रिहु धनु तुमरा हींउ कीओ कुरबानां ॥1॥
कोटि लाख राज सुख पाए इक निमख पेखि द्रिसटानां ॥
जउ कहहु मुखहु सेवक इह बैसीऐ सुख नानक अंतु न जानां ॥2॥23॥46॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे मन ! वह दिन भाग्यशाली होते हैं। (प्रभू के दर पर) कबूल होते हैं। (जिंदगी की) वह घड़ियाँ सफल हैं। (गुरू से) मेल के वह पल खूबसूरत होते हैं। जब गुरू की संगति में (रह के) आत्मिक जीवन की सूझ प्राप्त होती है। 1। रहाउ। हे प्रभू ! जिन मनुष्यों को आप (अपने दर पर) आदर देता है। वे धन्य हैं। भाग्यशाली हैं। किस्मत वाले हैं। हे प्रभू ! मेरा यह शरीर आपके हवाले है। मेरा सारा घर और धन आप पर से बलिहार है। मैं अपना हृदय (आपके चरणों में) सदके करता हूँ। 1। हे नानक ! (कह- हे प्रभू !) आँख झपकने जितने समय के लिए आपके दर्शन करके (मानो) राज-भाग के लाखों-करोड़ों सुख प्राप्त हैं जाते हैं। अगर आप मुँह से कहे। ‘हे सेवक ! यहाँ बैठ’। (मुझे इतना आनंद आता है कि उस) आनंछ का मैं अंत नहीं जान सकता। 2। 23। 46।
सारग महला 5 ॥
अब मोरो सहसा दूखु गइआ ॥
अउर उपाव सगल तिआगि छोडे सतिगुर सरणि पइआ ॥1॥ रहाउ ॥
सरब सिधि कारज सभि सवरे अहं रोग सगल ही खइआ ॥
कोटि पराध खिन महि खउ भई है गुर मिलि हरि हरि कहिआ ॥1॥
पंच दास गुरि वसगति कीने मन निहचल निरभइआ ॥
आइ न जावै न कत ही डोलै थिरु नानक राजइआ ॥2॥24॥47॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ (गुरू की शरण की बरकति से) अब मेरा हरेक सहम हरेक दुख दूर हो गया है। हे भाई ! (जब से) मैं गुरू की शरण पड़ा हूँ। (मैंने मन को काबू करने के) और सारे उपाय छोड़ दिए हैं। 1। रहाउ। मुझे सारी रिद्धियाँ-सिद्धियाँ प्राप्त हो गई हैं। मेरे सारे काम सँवर गए हैं। मेरे अंदर से अहंकार का रोग सारा ही मिट गया है। हे भाई ! जब से मैंने गुरू को मिल के परमात्मा का नाम जपना शुरू किया है। एक छिन में ही मेरे करोड़ों अपराधों का नाश हो गया है। 1। हे भाई ! गुरू ने (कामादिक) पाँचों को मेरा दास बना दिया है। मेरे वश में कर दिया है। (इनके मुकाबले पर) मेरा मन अहिल हो गया है निडर हो गया है। हे नानक ! (कह- गुरू की कृपा से मेरा मन अब) कहीं दौड़-भाग नहीं करता। कहीं नहीं डोलता (इसको। जैसे) सदा कायम रहने वाला राज मिल गया है। 2। 24। 47।
सारग महला 5 ॥
प्रभु मेरो इत उत सदा सहाई ॥
मनमोहनु मेरे जीअ को पिआरो कवन कहा गुन गाई ॥1॥ रहाउ ॥
खेलि खिलाइ लाड लाडावै सदा सदा अनदाई ॥
प्रतिपालै बारिक की निआई जैसे मात पिताई ॥1॥
तिसु बिनु निमख नही रहि सकीऐ बिसरि न कबहू जाई ॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे भाई ! मेरा प्रभू। इस लोक में और परलोक में सदा सहायता करने वाला है। मेरे मन को मोहने वाला वह मेरा प्रभू मेरे प्राणों का प्यारा है। मैं उसके कौन-कौन से गुण गा के बताऊँ। 1। रहाउ। वह हमें (जगत-) तमाशे में खेलाता है। लाड-लडाता है। वह सदा ही सुख देने वाला है। हे भाई ! जैसे माता-पिता अपने बच्चे की पालना करते हैं। वैसे ही हमारा लालन-पालन करता है। 1। हे भाई ! उस (परमात्मा की याद) के बिना आँख झपकने जितनें समय के लिए भी नहीं रहा जा सकता। उसको कभी भुलाया नहीं जा सकता।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।

अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।

इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “मैंने इतना सुख पा लिया है कि वह तोला-नापा नहीं जा सकता।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।