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अंग 1212

अंग
1212
राग सारंग
राग: सारंग · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
कहु नानक दरसु पेखि सुखु पाइआ सभ पूरन होई आसा ॥2॥15॥38॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: हे नानक ! कह- (हे भाई ! उस परमात्मा के) दर्शन करके मैंने आत्मिक आनंद प्राप्त कर लिया है। मेरी हरेक आशा पूरी हो गई है। 2। 15। 38।
सारग महला 5 ॥
चरनह गोबिंद मारगु सुहावा ॥
आन मारग जेता किछु धाईऐ तेतो ही दुखु हावा ॥1॥ रहाउ ॥
नेत्र पुनीत भए दरसु पेखे हसत पुनीत टहलावा ॥
रिदा पुनीत रिदै हरि बसिओ मसत पुनीत संत धूरावा ॥1॥
सरब निधान नामि हरि हरि कै जिसु करमि लिखिआ तिनि पावा ॥
जन नानक कउ गुरु पूरा भेटिओ सुखि सहजे अनद बिहावा ॥2॥16॥39॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे भाई ! पैरों से (सिर्फ) परमात्मा के रास्ते (पर चलना ही) सोहाना लगता है। और अनेकों रास्तों पर जितनी भी दोड़-भाग की जाती है। उतना ही दुख लगता है। उतनी ही आहें निकलती हैं। 1। रहाउ। हे भाई ! परमात्मा के दर्शन करने से आँखें पवित्र हो जाती हैं। (परमात्मा के संत-जनों की) टहल करने से हाथ पवित्र हो जाते हैं। जिसके हृदय में परमात्मा आ बसता है वह हृदय पवित्र हो जाता है। वह माथा पवित्र हो जाता है जिस पर संतजनों की धूल लगती है। 1। हे भाई ! परमात्मा के नाम में सारे (ही) खजाने हैं। जिस मनुष्य के माथे पर (परमात्मा ने अपनी) मेहर से (नाम की प्राप्ति का लेख) लिख दिया। उस मनुष्य ने (नाम) प्राप्त कर लिया। हे नानक ! (कह- हे भाई !) जिस मनुष्य को पूरा गुरू मिल गया (उसको प्रभू का नाम मिल गया। और उसकी जिंदगी) सुख में आत्मिक अडोलता में आनंद में गुजरने लग पड़ी। 2। 16। 39।
सारग महला 5 ॥
धिआइओ अंति बार नामु सखा ॥
जह मात पिता सुत भाई न पहुचै तहा तहा तू रखा ॥1॥ रहाउ ॥
अंध कूप ग्रिह महि तिनि सिमरिओ जिसु मसतकि लेखु लिखा ॥
खूल॑े बंधन मुकति गुरि कीनी सभ तूहै तुही दिखा ॥1॥
अंम्रित नामु पीआ मनु त्रिपतिआ आघाए रसन चखा ॥
कहु नानक सुख सहजु मै पाइआ गुरि लाही सगल तिखा ॥2॥17॥40॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे भाई ! (परमात्मा का) नाम ही (असल) साथी है। (जिस मनुष्य ने) अंत के समय (इस नाम को) सिमरा। (उसका साथी बना)। हे भाई ! जहाँ माता। पिता। पुत्र। भाई कोई भी नहीं पहुँच सकता। वहाँ पर (यह हरी-नाम ही) आपको रख सकता है (आपकी रक्षा करता है)। 1। रहाउ। हे भाई ! (माया के मोह के) अंधे कूएँ हृदय-घर में (सिर्फ) उस (मनुष्य) ने (ही हरी-नाम) सिमरा है जिसके माथे पर (नाम सिमरन का) लेख (धुर से) लिखा गया। (उस मनुष्य के) माया के मोह के फंदे खुल गए। गुरू ने उसको (मोह से) खलासी दिलवा दी। उसको ऐसा दिखाई दे गया (कि हे प्रभू !) सब जगह आप ही है आप ही है। 1। हे भाई ! जिस मनुष्य ने आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल पी लिया। उसका मन शांत हो गया। उसकी जीभ नाम-जल चख के तृप्त हो गई। हे नानक ! कह- (हे भाई ! हरी-नाम की दाति दे के) गुरू ने मेरी सारी तृष्णा दूर कर दी है। मैंने सारे सुख देने वाली आत्मिक अडोलता हासिल कर ली है। 2। 17। 40।
सारग महला 5 ॥
गुर मिलि ऐसे प्रभू धिआइआ ॥
भइओ क्रिपालु दइआलु दुख भंजनु लगै न ताती बाइआ ॥1॥ रहाउ ॥
जेते सास सास हम लेते तेते ही गुण गाइआ ॥
निमख न बिछुरै घरी न बिसरै सद संगे जत जाइआ ॥1॥
हउ बलि बलि बलि बलि चरन कमल कउ बलि बलि गुर दरसाइआ ॥
कहु नानक काहू परवाहा जउ सुख सागरु मै पाइआ ॥2॥18॥41॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे भाई ! (जिस मनुष्य ने) गुरू को मिल के यूँ (हरेक साँस के साथ) परमात्मा का सिमरन किया। सारे दुखों का नाश करने वाला परमात्मा उस पर दयावान हुआ। उस मनुष्य को (सारी उम्र) गर्म-हवा नहीं लगती (कोई दुख-कलेश नहीं होता)। 1। रहाउ। हे भाई ! जितने भी सांसें हम (जीव) लेते हैं। जो मनुष्य वह सारे ही साँस (लेते हुए) परमात्मा के गुण गाता है। (जो मनुष्य परमात्मा से) आँख झपकने जितने समय के लिए भी नहीं विछुड़ता। (जिसको उसकी याद) एक घड़ी के लिए भी नहीं भूलती। वह जहाँ भी जाता है। परमात्मा सदा उसको अपने साथ दिखता है। 1। हे नानक ! कह- (हे भाई !) मैं परमात्मा के सुंदर चरणों से सदा ही सदा ही सदके जाता हूँ। गुरू के दर्शनों से बलिहार जाता हूँ। जब से मैंने (गुरू की कृपा से) सारे सुखों के समुंद्र प्रभू को पा लिया है। मुझे किसी की मुथाजी नहीं रही। 2। 18। 41।
सारग महला 5 ॥
मेरै मनि सबदु लगो गुर मीठा ॥
खुलि॑ओ करमु भइओ परगासा घटि घटि हरि हरि डीठा ॥1॥ रहाउ ॥
पारब्रहम आजोनी संभउ सरब थान घट बीठा ॥
भइओ परापति अंम्रित नामा बलि बलि प्रभ चरणीठा ॥1॥
सतसंगति की रेणु मुखि लागी कीए सगल तीरथ मजनीठा ॥
कहु नानक रंगि चलूल भए है हरि रंगु न लहै मजीठा ॥2॥19॥42॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे भाई ! मेरे मन को गुरू का शबद मीठा लग रहा है (शबद की बरकति से मेरे लिए) परमात्मा की मेहर (का दरवाजा) खुल गया है। (मेरे हृदय में आत्मिक जीवन का) प्रकाश हो गया है। मैंने हरेक शरीर में परमात्मा को (बसता) देख लिया है। 1। रहाउ। हे भाई ! (गुरू के शबद की बरकति से मुझे इस तरह दिख रहा है कि) अजूनी स्वयं भू प्रकाश पारब्रहम हरेक जगह में हरेक के शरीर में बैठा हुआ है। (गुरू के शबद से मुझे) आत्मिक जीवन देने वाला हरी-नाम मिल गया है। मैं परमात्मा के चरणों से बलिहार जा रहा हूँ। 1। हे भाई ! (गुरू की कृपा से) साध-संगति के चरणों की धूड़ मेरे माथे पर लगी है (इस चरन-धूड़ की बरकति से मैंने तो। मानो) सारे ही तीर्थों का स्नान कर लिया है। हे नानक ! कह- (हे भाई !) मैं परमात्मा के प्रेम-रंग में गाढ़ा रंगा गया हूँ। मजीठ के पक्के रंग की तरह यह हरी-प्रेम का रंग (मेरे मन से) उतरता ही नहीं। 2। 19। 42।
सारग महला 5 ॥
हरि हरि नामु दीओ गुरि साथे ॥
निमख बचनु प्रभ हीअरै बसिओ सगल भूख मेरी लाथे ॥1॥ रहाउ ॥
क्रिपा निधान गुण नाइक ठाकुर सुख समूह सभ नाथे ॥
एक आस मोहि तेरी सुआमी अउर दुतीआ आस बिराथे ॥1॥
नैण त्रिपतासे देखि दरसावा गुरि कर धारे मेरै माथे ॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे भाई ! गुरू ने परमात्मा का नाम मेरे साथ साथी (के रूप में) दे दिया है। अब परमात्मा की सिफतसालाह का शबद हर वक्त मेरे हृदय में टिका रहता है (उसकी बरकति से) मेरी माया की सारी भूख उतर गई है। 1। रहाउ। हे कृपा के खजाने ! हे सारे गुणों के मालिक ठाकुर ! हे सारे सुखों के नाथ ! हे स्वामी ! (अब हरेक सुख-दुख में) मुझे सिर्फ आपकी ही (सहायता की) आशा रहती है। कोई और दूसरी आशा मुझे व्यर्थ प्रतीत होती है। 1। हे नानक ! कह- (हे भाई !) जब से गुरू ने मेरे माथे पर अपना हाथ रखा है। मेरी आँखें (प्रभू के) दर्शन करके तृप्त हो गई हैं।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।

अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।

इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे नानक ! कह- (हे भाई ! उस परमात्मा के) दर्शन करके मैंने आत्मिक आनंद प्राप्त कर लिया है।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।