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1211
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· शबद · राग सारंग
कहु नानक मै सहज घरु पाइआ हरि भगति भंडार खजीना ॥2॥10॥33॥
कहु नानक मै सहज घरु पाइआ हरि भगति भंडार खजीना ॥2॥10॥33॥
हिन्दी अर्थ: हे नानक! कहें: (गुरू की कृपा से) मैंने आत्मिक अडोलता का श्रोत पा लिया है। मैंने परमात्मा की भक्ति के भण्डारे खजाने पा लिए हैं। 2। 10। 33।
· शबद · राग सारंग
मोहन सभि जीअ तेरे तू तारहि ॥
सारग महला 5 ॥
मोहन सभि जीअ तेरे तू तारहि ॥
छुटहि संघार निमख किरपा ते कोटि ब्रहमंड उधारहि ॥1॥ रहाउ ॥
करहि अरदासि बहुतु बेनंती निमख निमख साम॑ारहि ॥
होहु क्रिपाल दीन दुख भंजन हाथ देइ निसतारहि ॥1॥
किआ ए भूपति बपुरे कहीअहि कहु ए किस नो मारहि ॥
राखु राखु राखु सुखदाते सभु नानक जगतु तुम॑ारहि ॥2॥11॥34॥
मोहन सभि जीअ तेरे तू तारहि ॥
छुटहि संघार निमख किरपा ते कोटि ब्रहमंड उधारहि ॥1॥ रहाउ ॥
करहि अरदासि बहुतु बेनंती निमख निमख साम॑ारहि ॥
होहु क्रिपाल दीन दुख भंजन हाथ देइ निसतारहि ॥1॥
किआ ए भूपति बपुरे कहीअहि कहु ए किस नो मारहि ॥
राखु राखु राखु सुखदाते सभु नानक जगतु तुम॑ारहि ॥2॥11॥34॥
हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे मोहन प्रभू! (जगत के) सारे जीव आपके ही (पैदा किए हुए हैं)। आप ही (इनको दुखों-कलेशों आदि से) पार लंघाते हैं। आपकी थोड़ी जितनी मेहर (की निगाह) से बड़क्षे-बड़े निर्दयी लोग भी अत्याचारों से हट जाते हैं। 1। रहाउ। हे मोहन! (आपके पैदा किए हुए जीव आपके ही दर पे) अरदास विनती करते हैं। (आपको ही) पल-पल हृदय में बसाते हैं। हे गरीबों के दुख नाश करने वाले मोहन! आप जब दयावान होते हैं, तो अपना हाथ दे के (जीवों को दुखों से) पार लंघा लेते हैं। 1। हे नानक! (कहें: हे मोहन!) इन बेचारे राजाओं की कोई बिसात नहीं कि ये किसी को मार सकें (सब आपका ही खेल-तमाशा है)। हे सुखों के देने वाले! (हम जीवों की) रक्षा करें, रक्षा करें, रक्षा करें। सारा जगत आपका ही (रचा हुआ) है। 2। 11। 34।
· शबद · राग सारंग
अब मोहि धनु पाइओ हरि नामा ॥
सारग महला 5 ॥
अब मोहि धनु पाइओ हरि नामा ॥
भए अचिंत त्रिसन सभ बुझी है इहु लिखिओ लेखु मथामा ॥1॥ रहाउ ॥
खोजत खोजत भइओ बैरागी फिरि आइओ देह गिरामा ॥
गुरि क्रिपालि सउदा इहु जोरिओ हथि चरिओ लालु अगामा ॥1॥
आन बापार बनज जो करीअहि तेते दूख सहामा ॥
गोबिद भजन के निरभै वापारी हरि रासि नानक राम नामा ॥2॥12॥35॥
अब मोहि धनु पाइओ हरि नामा ॥
भए अचिंत त्रिसन सभ बुझी है इहु लिखिओ लेखु मथामा ॥1॥ रहाउ ॥
खोजत खोजत भइओ बैरागी फिरि आइओ देह गिरामा ॥
गुरि क्रिपालि सउदा इहु जोरिओ हथि चरिओ लालु अगामा ॥1॥
आन बापार बनज जो करीअहि तेते दूख सहामा ॥
गोबिद भजन के निरभै वापारी हरि रासि नानक राम नामा ॥2॥12॥35॥
हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे भाई! (गुरू की कृपा से) अब मैंने परमात्मा का धन पा लिया है। (इस धन की बरकति से) मैं बेफिक्र हो गया हूँ। (मेरे अंदर से) सारी (माया की) तृष्णा मिट गई है (धुर-दरगाह से ही) यह (प्राप्ति का) लेख माथे पर लिखा हुआ था। 1। रहाउ। हे भाई! तलाश करता-करता मैं तो वैरागी ही हो गया था। आखिर भटक-भटक के (गुरू की कृपा से) मैं शरीर-पिंड में आ पहुँचा। कृपालु गुरू ने ये वणज बना दिया कि (शरीर के अंदर से ही) मुझे परमात्मा का नाम अमूल्य लाल मिल गया। 1। हे भाई! (परमात्मा के नाम के बिना) और जो-जो भी वणज व्यापार किए जाते हैं। वे सभी दुख सहने (का सबब बन जाते हैं)। हे नानक! (कहें: हे भाई!) परमात्मा के भजन के व्यापारी लोग (दुनिया के) डरों से बचे रहते हैं। उनके पास परमात्मा के नाम का सरमाया टिका रहता है। 2। 12। 35।
· शबद · राग सारंग
मेरै मनि मिसट लगे प्रिअ बोला ॥
सारग महला 5 ॥
मेरै मनि मिसट लगे प्रिअ बोला ॥
गुरि बाह पकरि प्रभ सेवा लाए सद दइआलु हरि ढोला ॥1॥ रहाउ ॥
प्रभ तू ठाकुरु सरब प्रतिपालकु मोहि कलत्र सहित सभि गोला ॥
माणु ताणु सभु तूहै तूहै इकु नामु तेरा मै ओल॑ा ॥1॥
जे तखति बैसालहि तउ दास तुम॑ारे घासु बढावहि केतक बोला ॥
जन नानक के प्रभ पुरख बिधाते मेरे ठाकुर अगह अतोला ॥2॥13॥36॥
मेरै मनि मिसट लगे प्रिअ बोला ॥
गुरि बाह पकरि प्रभ सेवा लाए सद दइआलु हरि ढोला ॥1॥ रहाउ ॥
प्रभ तू ठाकुरु सरब प्रतिपालकु मोहि कलत्र सहित सभि गोला ॥
माणु ताणु सभु तूहै तूहै इकु नामु तेरा मै ओल॑ा ॥1॥
जे तखति बैसालहि तउ दास तुम॑ारे घासु बढावहि केतक बोला ॥
जन नानक के प्रभ पुरख बिधाते मेरे ठाकुर अगह अतोला ॥2॥13॥36॥
हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे भाई! तब से मेरे मन में प्यारे-प्रभू की सिफत-सालाह के वचन मीठे लगने लगे हैं। जब से गुरू ने (मेरी) बाँह पकड़ के (मुझे) प्रभू की सेवा-भक्ति में लगाया है। (अब मुझे ये बात समझ में आ गई है कि) प्यारा हरी सदा ही (मेरे पर) दयावान है। 1। रहाउ। हे प्रभू! (जब से गुरू ने मुझे आपकी सेवा में लगाया है। मुझे यकीन हो गया है कि) आप (हमारे) मालिक हैं। आप सब जीवों के पालनहार हैं। मैं (अपनी) स्त्री (परिवार) समेत, हम सभी आपके गुलाम हैं। हे प्रभू! आप ही मेरा माण हैं। आप ही मेरा ताण हैं। आपका नाम ही मेरा सहारा है। 1। अगर आप मुझे तख्त पर बैठा दें, तो भी मैं आपका दास हूँ। अगर आप (मुझे घसियारा बना के मुझसे) घास कटवाएँ, तो भी मुझे कोई ऐतराज नहीं। हे दास नानक के प्रभू! हे अकाल पुरख! हे रचनहार! हे मेरे अथाह और अतोल ठाकुर! हे प्रभू! 2। 13। 36।
· शबद · राग सारंग
रसना राम कहत गुण सोहं ॥
सारग महला 5 ॥
रसना राम कहत गुण सोहं ॥
एक निमख ओपाइ समावै देखि चरित मन मोहं ॥1॥ रहाउ ॥
जिसु सुणिऐ मनि होइ रहसु अति रिदै मान दुख जोहं ॥
सुखु पाइओ दुखु दूरि पराइओ बणि आई प्रभ तोहं ॥1॥
किलविख गए मन निरमल होई है गुरि काढे माइआ द्रोहं ॥
कहु नानक मै सो प्रभु पाइआ करण कारण समरथोहं ॥2॥14॥37॥
रसना राम कहत गुण सोहं ॥
एक निमख ओपाइ समावै देखि चरित मन मोहं ॥1॥ रहाउ ॥
जिसु सुणिऐ मनि होइ रहसु अति रिदै मान दुख जोहं ॥
सुखु पाइओ दुखु दूरि पराइओ बणि आई प्रभ तोहं ॥1॥
किलविख गए मन निरमल होई है गुरि काढे माइआ द्रोहं ॥
कहु नानक मै सो प्रभु पाइआ करण कारण समरथोहं ॥2॥14॥37॥
हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे भाई! परमात्मा के गुण उचारते हुए जीभ सुंदर लगती है। वह प्रभू आँख झपकने जितने समय में पैदा कर के (दोबारा अपने में जगत को) लीन कर सकता है। उसके चोज-तमाशे देख के मन मोहा जाता है। 1। रहाउ। हे प्रभू! जिस मनुष्य की प्रीति आपके साथ बन जाती है। उसका सारा दुख दूर हो जाता है। वह सदा सुख भोगता है। (हे प्रभू! आप ऐसे हैं) जिसका नाम सुनने से मन में बहुत खुशी पैदा होती है। जिसको हृदय में बसाने से सारे दुखों का नाश हो जाता है। 1। हे भाई! (जिस मनुष्य ने जीभ से राम-गुण गाए। उसके अंदर से) गुरू ने माया के छल निकाल दिए। उसके सारे पाप दूर हो गए। उसका मन पवित्र हो गया। हे नानक! कहें: (हे भाई! गुरू की कृपा से) मैंने वह परमात्मा पा लिया है। जो जगत का मूल है जो सारी ताकतों का मालिक है। 2। 14। 37।
· शबद · राग सारंग
नैनहु देखिओ चलतु तमासा ॥
सारग महला 5 ॥
नैनहु देखिओ चलतु तमासा ॥
सभ हू दूरि सभ हू ते नेरै अगम अगम घट वासा ॥1॥ रहाउ ॥
अभूलु न भूलै लिखिओ न चलावै मता न करै पचासा ॥
खिन महि साजि सवारि बिनाहै भगति वछल गुणतासा ॥1॥
अंध कूप महि दीपकु बलिओ गुरि रिदै कीओ परगासा ॥
नैनहु देखिओ चलतु तमासा ॥
सभ हू दूरि सभ हू ते नेरै अगम अगम घट वासा ॥1॥ रहाउ ॥
अभूलु न भूलै लिखिओ न चलावै मता न करै पचासा ॥
खिन महि साजि सवारि बिनाहै भगति वछल गुणतासा ॥1॥
अंध कूप महि दीपकु बलिओ गुरि रिदै कीओ परगासा ॥
हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे भाई! (मैंने अपनी) आँखों से (परमातमा का अजब) करिश्मा देखा है (अजब) तमाशा देखा है। वह परमात्मा (निर्लिप होने के कारण) सब जीवों से दूर (अलग) है। (सर्व-व्यापक होने के कारण वह) सब जीवों के नजदीक। वह अगम है अपहुँच है। पर वैसे सब शरीरों में उसका निवास है। 1। रहाउ। हे भाई! वह परमात्मा भूलों से रहित है। वह कभी कोई गलती नहीं करता। ना वह कोई लिखा हुआ हुकम चलाता है। ना वह बहुत सलाहें ही करता है। वह तरे एक छिन में पैदा करके सुंदर बना के (एक छिन में ही) नाश कर देता है। वह परमात्मा भक्ति से प्यार करने वाला है। और (बेअंत) गुणों का खजाना है। 1। हे भाई! गुरू ने (जिस मनुष्य के) हृदय में (परमात्मा के नाम का) प्रकाश कर दिया (वहाँ मानो) घोर अंधेरे वाले कूएँ में दीया जल उठा।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1211 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।