लुल्ला परिवारLULLA FAMILY, शुरुआतEnglish
सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 1210 · सारंग

इस पृष्ठ पर
अंग
1210
सारंग
अंग बदलें या अंश चुनें · 6 अंश

1 से 1430 तक कोई अंक लिखिए।

  1. गुण निधान मनमोहन लालन सुखदाई सरबांगै ॥
  2. अब मोरो ठाकुर सिउ मनु मानां ॥
  3. मेरै मनि चीति आए प्रिअ रंगा ॥
  4. हरि जीउ के दरसन कउ कुरबानी ॥
  5. अब मेरो पंचा ते संगु तूटा ॥
  6. अब मेरो ठाकुर सिउ मनु लीना ॥

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग सारंग

गुण निधान मनमोहन लालन सुखदाई सरबांगै ॥

अंग 1209 से चला आ रहा अंश

गुण निधान मनमोहन लालन सुखदाई सरबांगै ॥
गुरि नानक प्रभ पाहि पठाइओ मिलहु सखा गलि लागै ॥2॥5॥28॥

हिन्दी अर्थ: हे नानक! (कहें:) हे गुणों के खजाने! हे मन को मोहने वाले! हे सोहणे लाल! ळे सारे सुख देने वाले! हे सब जीवों में व्यापक! हे प्रभू! हे मित्र प्रभू! मुझे गुरू ने (आपके) पास भेजा है। मुझे गले लग के मिलें। 2। 5। 28।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग सारंग

अब मोरो ठाकुर सिउ मनु मानां ॥

सारग महला 5 ॥
अब मोरो ठाकुर सिउ मनु मानां ॥
साध क्रिपाल दइआल भए है इहु छेदिओ दुसटु बिगाना ॥1॥ रहाउ ॥
तुम ही सुंदर तुमहि सिआने तुम ही सुघर सुजाना ॥
सगल जोग अरु गिआन धिआन इक निमख न कीमति जानां ॥1॥
तुम ही नाइक तुम॑हि छत्रपति तुम पूरि रहे भगवाना ॥
पावउ दानु संत सेवा हरि नानक सद कुरबानां ॥2॥6॥29॥

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ अब मेरा मन मालिक-प्रभू के साथ (सदा) रीझा रहता है। हे भाई! जब संतजन मेरे पर प्रसन्न हुए। दयावान हुए। (तब मैंने अपने अंदर से परमात्मा से) यह दुष्ट बेगानगी को काट डाला। 1। रहाउ। अब। हे प्रभू! आप ही मुझे सुंदर लगते हैं। आप ही समझदार प्रतीत होते हैं। आप ही सुंदर आत्मिक घाड़त वाले और सुजान दिखते हैं। जोग-साधन, ज्ञान-चर्चा करने वाले और समाधियाँ लगाने वाले, इन सभी ने। हे प्रभू! आँख झपकने जितने समय के लिए भी आपकी कद्र नहीं समझी। 1। हे भगवान! आप ही (सब जीवों के) मालिक हैं। आप ही (सब राजाओं के) राजा हैं। आप सारी सृष्टि में व्यापक हैं। हे नानक! (कहें:) हे हरी! (मेहर करें। आपके दर से) मैं संत जनों की सेवा की ख़ैर हासिल करूँ। मैं संत जनों से सदा सदके जाऊँ। 2। 6। 29।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग सारंग

मेरै मनि चीति आए प्रिअ रंगा ॥

सारग महला 5 ॥
मेरै मनि चीति आए प्रिअ रंगा ॥
बिसरिओ धंधु बंधु माइआ को रजनि सबाई जंगा ॥1॥ रहाउ ॥
हरि सेवउ हरि रिदै बसावउ हरि पाइआ सतसंगा ॥
ऐसो मिलिओ मनोहरु प्रीतमु सुख पाए मुख मंगा ॥1॥
प्रिउ अपना गुरि बसि करि दीना भोगउ भोग निसंगा ॥
निरभउ भए नानक भउ मिटिआ हरि पाइओ पाठंगा ॥2॥7॥30॥

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे भाई! (जब सें साध-संगति की बरकति से) प्यारे प्रभे करिश्मे मेरे मन में मेरे चित्त में आ बसे हैं। मुझे माया वाली भटकना भूल गई है। माया के मोह की फाही समाप्त हो गई है। मेरी सारी उम्र-रात (विकारों से) जंग करती हुई बीत रही है। 1। रहाउ। हे भाई! जब से मैंने प्रभू की साध-संगति प्राप्त की है। मैं परमात्मा का सिमरन करता रहता हूँ। मैं परमात्मा को अपने हृदय में बसाए रखता हूँ। मन को मोहने वाला प्रीतम-प्रभू इस तरह मुझे मिल गया है कि मैंने मुँह-माँगे सुख हासिल कर लिए हैं। 1। हे भाई! गुरू ने प्यारा प्रभू मेरे (प्यार के) वश में कर दिया है। अब (कामादिकों की) रुकावट के बिना मैं उसके मिलाप का आत्मिक आनंद लेता रहता हूँ। हे नानक! (कहें:) मैंने (जीवन का) आसरा प्रभू पा लिया है। मेरा हरेक डर मिट गया है। मैं (कामादिकों के हमलों के खतरे से) निडर हो गया हूँ। 2। 7। 30।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग सारंग

हरि जीउ के दरसन कउ कुरबानी ॥

सारग महला 5 ॥
हरि जीउ के दरसन कउ कुरबानी ॥
बचन नाद मेरे स्रवनहु पूरे देहा प्रिअ अंकि समानी ॥1॥ रहाउ ॥
छूटरि ते गुरि कीई सोुहागनि हरि पाइओ सुघड़ सुजानी ॥
जिह घर महि बैसनु नही पावत सो थानु मिलिओ बासानी ॥1॥
उन॑ कै बसि आइओ भगति बछलु जिनि राखी आन संतानी ॥
कहु नानक हरि संगि मनु मानिआ सभ चूकी काणि लोुकानी ॥2॥8॥31॥

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे भाई! मैं प्रभू जी के दर्शनों से सदके हूँ। उसकी सिफतसालाह के गीत मेरे कानों में भरे रहते हैं। मेरा शरीर उसकी गोद में लीन रहता है (यह सारी गुरू की ही कृपा है)। 1। रहाउ। हे भाई! गुरू ने मुझे छॅुटड़ से सोगनि बना दिया है। मैंने सुंदर आत्मिक घाड़त वाले सुजान प्रभू का मिलाप हासिल कर लिया है। (मेरे मन को) वह (हरी-चरण-) स्थल बसने के लिए मिल गया है। जिस जगह पर (पहले कभी यह) टिकता ही नहीं था। 1। हे भाई! भक्ति से प्यार करने वाला परमात्मा जिसने (सदा अपने) संतों की लाज रखी है उन संत-जनों के प्यार के वश में आया रहता है। हे नानक! कहें: (संत-जनों की कृपा से) मेरा मन परमात्मा के साथ रीझ गया है। (मेरे अंदर से) लोगों की मुथाजी समाप्त हो गई है। 2। 8। 31।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग सारंग

अब मेरो पंचा ते संगु तूटा ॥

सारग महला 5 ॥
अब मेरो पंचा ते संगु तूटा ॥
दरसनु देखि भए मनि आनद गुर किरपा ते छूटा ॥1॥ रहाउ ॥
बिखम थान बहुत बहु धरीआ अनिक राख सूरूटा ॥
बिखम गार्ह करु पहुचै नाही संत सानथ भए लूटा ॥1॥
बहुतु खजाने मेरै पालै परिआ अमोल लाल आखूटा ॥
जन नानक प्रभि किरपा धारी तउ मन महि हरि रसु घूटा ॥2॥9॥32॥

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे भाई! गुरू की मेहर से मैं (कामादिक की मार से) बच गया हूँ। अब (कामादिक) पाँचों से मेरा साथ समाप्त हो गया है (मेरे अंद रनाम-खजाना छुपा पड़ा था। गुरू के माध्यम से उसके) दर्शन करके मेरे मन में खुशियाँ ही खुशियाँ बन गई हैं। 1। रहाउ। हे भाई! जिस जगह नाम-खजाने रखे हुए थे। वहाँ पहुँचना बहुत ही मुश्किल था (क्योंकि कामादिक) अनेकों सूरमे (राह में) रखवाले बने हुए थे (पहरेदार बन के खड़े थे)। (उसके चारों तरफ माया के मोह की) बड़ी गहरी खाई बनी हुई थी। (उस खजाने तक) हाथ नहीं था पहुँचता। जब संत-जन मेरे साथी बन गए। (वह ठिकाना) लूट लिया। 1। (संत जनों की किरपा से) हरी-नाम के अमूल्य लालों के बहुत सारे खजाने मुझे मिल गए। हे दास नानक! (कहें:) जब प्रभू ने मेरे ऊपर मेहर की, तब मैं अपने मन में हरी-नाम का रस पीने लग गया। 2। 9। 32।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग सारंग

अब मेरो ठाकुर सिउ मनु लीना ॥

अगले अंग पर आगे पढ़िए →

सारग महला 5 ॥
अब मेरो ठाकुर सिउ मनु लीना ॥
प्रान दानु गुरि पूरै दीआ उरझाइओ जिउ जल मीना ॥1॥ रहाउ ॥
काम क्रोध लोभ मद मतसर इह अरपि सगल दानु कीना ॥
मंत्र द्रिड़ाइ हरि अउखधु गुरि दीओ तउ मिलिओ सगल प्रबीना ॥1॥
ग्रिहु तेरा तू ठाकुरु मेरा गुरि हउ खोई प्रभु दीना ॥

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ अब मेरा मन ठाकुर-प्रभू के साथ एकमेक हुआ रहता है। हे भाई! पूरे गुरू ने मुझे आत्मिक जीवन की दाति बख्शी है। मुझे ठाकुर प्रभू के साथ यूँ जोड़ दिया है जैसे मछली पानी के साथ। 1। रहाउ। हे भाई! जब से गुरू ने (अपना) उपदेश मेरे हृदय में पक्का कर के मुझे हरी-नाम की दवाई दी है, तब से मुझे सारे गुणों में प्रवीण प्रभू मिल गया है और मैंने (अपने अंदर से) काम, क्रोध, लोभ, अहंकार, ईर्ष्या (आदि सारे विकार) सदा के लिए निकाल दिए हैं। 1। हे प्रभू! (अब मेरा हृदय) आपका घर बन गया है। आप (सचमुच) मेरे (इस घर के) मालिक बन गए हैं। हे भाई! गुरू ने मेरे अहंकार को दूर कर दिया है। मुझे प्रभू से मिला दिया है।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1210 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।