गुरि नानक प्रभ पाहि पठाइओ मिलहु सखा गलि लागै ॥2॥5॥28॥
अब मोरो ठाकुर सिउ मनु मानां ॥
साध क्रिपाल दइआल भए है इहु छेदिओ दुसटु बिगाना ॥1॥ रहाउ ॥
तुम ही सुंदर तुमहि सिआने तुम ही सुघर सुजाना ॥
सगल जोग अरु गिआन धिआन इक निमख न कीमति जानां ॥1॥
तुम ही नाइक तुम॑हि छत्रपति तुम पूरि रहे भगवाना ॥
पावउ दानु संत सेवा हरि नानक सद कुरबानां ॥2॥6॥29॥
मेरै मनि चीति आए प्रिअ रंगा ॥
बिसरिओ धंधु बंधु माइआ को रजनि सबाई जंगा ॥1॥ रहाउ ॥
हरि सेवउ हरि रिदै बसावउ हरि पाइआ सतसंगा ॥
ऐसो मिलिओ मनोहरु प्रीतमु सुख पाए मुख मंगा ॥1॥
प्रिउ अपना गुरि बसि करि दीना भोगउ भोग निसंगा ॥
निरभउ भए नानक भउ मिटिआ हरि पाइओ पाठंगा ॥2॥7॥30॥
हरि जीउ के दरसन कउ कुरबानी ॥
बचन नाद मेरे स्रवनहु पूरे देहा प्रिअ अंकि समानी ॥1॥ रहाउ ॥
छूटरि ते गुरि कीई सोुहागनि हरि पाइओ सुघड़ सुजानी ॥
जिह घर महि बैसनु नही पावत सो थानु मिलिओ बासानी ॥1॥
उन॑ कै बसि आइओ भगति बछलु जिनि राखी आन संतानी ॥
कहु नानक हरि संगि मनु मानिआ सभ चूकी काणि लोुकानी ॥2॥8॥31॥
अब मेरो पंचा ते संगु तूटा ॥
दरसनु देखि भए मनि आनद गुर किरपा ते छूटा ॥1॥ रहाउ ॥
बिखम थान बहुत बहु धरीआ अनिक राख सूरूटा ॥
बिखम गार्ह करु पहुचै नाही संत सानथ भए लूटा ॥1॥
बहुतु खजाने मेरै पालै परिआ अमोल लाल आखूटा ॥
जन नानक प्रभि किरपा धारी तउ मन महि हरि रसु घूटा ॥2॥9॥32॥
अब मेरो ठाकुर सिउ मनु लीना ॥
प्रान दानु गुरि पूरै दीआ उरझाइओ जिउ जल मीना ॥1॥ रहाउ ॥
काम क्रोध लोभ मद मतसर इह अरपि सगल दानु कीना ॥
मंत्र द्रिड़ाइ हरि अउखधु गुरि दीओ तउ मिलिओ सगल प्रबीना ॥1॥
ग्रिहु तेरा तू ठाकुरु मेरा गुरि हउ खोई प्रभु दीना ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।
अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।
इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे नानक ! (कह-) हे गुणों के खजाने ! हे मन को मोहने वाले ! हे सोहणे लाल ! ळे सारे सुख देने वाले ! हे सब जीवों में व्यापक ! हे प्रभू ! हे मित्र प्रभू ! मुझे गुरू ने (आपके) पास भेजा ह।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।