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अंग 1210

अंग
1210
राग सारंग
राग: सारंग · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
गुण निधान मनमोहन लालन सुखदाई सरबांगै ॥
गुरि नानक प्रभ पाहि पठाइओ मिलहु सखा गलि लागै ॥2॥5॥28॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: हे नानक ! (कह-) हे गुणों के खजाने ! हे मन को मोहने वाले ! हे सोहणे लाल ! ळे सारे सुख देने वाले ! हे सब जीवों में व्यापक ! हे प्रभू ! हे मित्र प्रभू ! मुझे गुरू ने (आपके) पास भेजा है। मुझे गले लग के मिल। 2। 5। 28।
सारग महला 5 ॥
अब मोरो ठाकुर सिउ मनु मानां ॥
साध क्रिपाल दइआल भए है इहु छेदिओ दुसटु बिगाना ॥1॥ रहाउ ॥
तुम ही सुंदर तुमहि सिआने तुम ही सुघर सुजाना ॥
सगल जोग अरु गिआन धिआन इक निमख न कीमति जानां ॥1॥
तुम ही नाइक तुम॑हि छत्रपति तुम पूरि रहे भगवाना ॥
पावउ दानु संत सेवा हरि नानक सद कुरबानां ॥2॥6॥29॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ अब मेरा मन मालिक-प्रभू के साथ (सदा) रीझा रहता है। हे भाई ! जब संतजन मेरे पर प्रसन्न हुए। दयावान हुए। (तब मैंने अपने अंदर से परमात्मा से) यह दुष्ट बेगानगी को काट डाला। 1। रहाउ। अब। हे प्रभू ! आप ही मुझे सुंदर लगता है। आप ही समझदार प्रतीत होता है। आप ही सुंदर आत्मिक घाड़त वाला और सुजान दिखता है। जोग-साधन। ज्ञान-चर्चा करने वाले और समाधियाँ लगाने वाले- इन सभी ने। हे प्रभू ! आँख झपकने जितने समय के लिए भी आपकी कद्र नहीं समझी। 1। हे भगवान ! आप ही (सब जीवों का) मालिक है। आप ही (सब राजाओं का) राजा है। आप सारी सृष्टि में व्यापक है। हे नानक ! (कह-) हे हरी ! (मेहर कर। आपके दर से) मैं संत जनों की सेवा की ख़ैर हासिल करूँ। मैं संत जनों से सदा सदके जाऊँ। 2। 6। 29।
सारग महला 5 ॥
मेरै मनि चीति आए प्रिअ रंगा ॥
बिसरिओ धंधु बंधु माइआ को रजनि सबाई जंगा ॥1॥ रहाउ ॥
हरि सेवउ हरि रिदै बसावउ हरि पाइआ सतसंगा ॥
ऐसो मिलिओ मनोहरु प्रीतमु सुख पाए मुख मंगा ॥1॥
प्रिउ अपना गुरि बसि करि दीना भोगउ भोग निसंगा ॥
निरभउ भए नानक भउ मिटिआ हरि पाइओ पाठंगा ॥2॥7॥30॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे भाई ! (जब सें साध-संगति की बरकति से) प्यारे प्रभे करिश्मे मेरे मन में मेरे चित्त में आ बसे हैं। मुझे माया वाली भटकना भूल गई है। माया के मोह की फाही समाप्त हो गई है। मेरी सारी उम्र-रात (विकारों से) जंग करती हुई बीत रही है। 1। रहाउ। हे भाई ! जब से मैंने प्रभू की साध-संगति प्राप्त की है। मैं परमात्मा का सिमरन करता रहता हूँ। मैं परमात्मा को अपने हृदय में बसाए रखता हूँ। मन को मोहने वाला प्रीतम-प्रभू इस तरह मुझे मिल गया है कि मैंने मुँह-माँगे सुख हासिल कर लिए हैं। 1। हे भाई ! गुरू ने प्यारा प्रभू मेरे (प्यार के) वश में कर दिया है। अब (कामादिकों की) रुकावट के बिना मैं उसके मिलाप का आत्मिक आनंद लेता रहता हूँ। हे नानक ! (कह-) मैंने (जीवन का) आसरा प्रभू पा लिया है। मेरा हरेक डर मिट गया है। मैं (कामादिकों के हमलों के खतरे से) निडर हो गया हूँ। 2। 7। 30।
सारग महला 5 ॥
हरि जीउ के दरसन कउ कुरबानी ॥
बचन नाद मेरे स्रवनहु पूरे देहा प्रिअ अंकि समानी ॥1॥ रहाउ ॥
छूटरि ते गुरि कीई सोुहागनि हरि पाइओ सुघड़ सुजानी ॥
जिह घर महि बैसनु नही पावत सो थानु मिलिओ बासानी ॥1॥
उन॑ कै बसि आइओ भगति बछलु जिनि राखी आन संतानी ॥
कहु नानक हरि संगि मनु मानिआ सभ चूकी काणि लोुकानी ॥2॥8॥31॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे भाई ! मैं प्रभू जी के दर्शनों से सदके हूँ। उसकी सिफतसालाह के गीत मेरे कानों में भरे रहते हैं। मेरा शरीर उसकी गोद में लीन रहता है (यह सारी गुरू की ही कृपा है)। 1। रहाउ। हे भाई ! गुरू ने मुझे छॅुटड़ से सोगनि बना दिया है। मैंने सुंदर आत्मिक घाड़त वाले सुजान प्रभू का मिलाप हासिल कर लिया है। (मेरे मन को) वह (हरी-चरण-) स्थल बसने के लिए मिल गया है। जिस जगह पर (पहले कभी यह) टिकता ही नहीं था। 1। हे भाई ! भक्ति से प्यार करने वाला परमात्मा जिसने (सदा अपने) संतों की लाज रखी है उन संत-जनों के प्यार के वश में आया रहता है। हे नानक ! कह- (संत-जनों की कृपा से) मेरा मन परमात्मा के साथ रीझ गया है। (मेरे अंदर से) लोगों की मुथाजी समाप्त हो गई है। 2। 8। 31।
सारग महला 5 ॥
अब मेरो पंचा ते संगु तूटा ॥
दरसनु देखि भए मनि आनद गुर किरपा ते छूटा ॥1॥ रहाउ ॥
बिखम थान बहुत बहु धरीआ अनिक राख सूरूटा ॥
बिखम गार्ह करु पहुचै नाही संत सानथ भए लूटा ॥1॥
बहुतु खजाने मेरै पालै परिआ अमोल लाल आखूटा ॥
जन नानक प्रभि किरपा धारी तउ मन महि हरि रसु घूटा ॥2॥9॥32॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे भाई ! गुरू की मेहर से मैं (कामादिक की मार से) बच गया हूँ। अब (कामादिक) पाँचों से मेरा साथ समाप्त हो गया है (मेरे अंद रनाम-खजाना छुपा पड़ा था। गुरू के माध्यम से उसके) दर्शन करके मेरे मन में खुशियाँ ही खुशियाँ बन गई हैं। 1। रहाउ। हे भाई ! जिस जगह नाम-खजाने रखे हुए थे। वहाँ पहुँचना बहुत ही मुश्किल था (क्योंकि कामादिक) अनेकों सूरमे (राह में) रखवाले बने हुए थे (पहरेदार बन के खड़े थे)। (उसके चारों तरफ माया के मोह की) बड़ी गहरी खाई बनी हुई थी। (उस खजाने तक) हाथ नहीं था पहुँचता। जब संत-जन मेरे साथी बन गए। (वह ठिकाना) लूट लिया। 1। (संत जनों की किरपा से) हरी-नाम के अमूल्य लालों के बहुत सारे खजाने मुझे मिल गए। हे दास नानक ! (कह-) जब प्रभू ने मेरे ऊपर मेहर की। तब मैं अपने मन में हरी-नाम का रस पीने लग गया। 2। 9। 32।
सारग महला 5 ॥
अब मेरो ठाकुर सिउ मनु लीना ॥
प्रान दानु गुरि पूरै दीआ उरझाइओ जिउ जल मीना ॥1॥ रहाउ ॥
काम क्रोध लोभ मद मतसर इह अरपि सगल दानु कीना ॥
मंत्र द्रिड़ाइ हरि अउखधु गुरि दीओ तउ मिलिओ सगल प्रबीना ॥1॥
ग्रिहु तेरा तू ठाकुरु मेरा गुरि हउ खोई प्रभु दीना ॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ अब मेरा मन ठाकुर-प्रभू के साथ ऐक-मेक हुआ रहता है। हे भाई ! पूरे गुरू ने मुझे आत्मिक जीवन की दाति बख्शी है। मुझे ठाकुर प्रभू के साथ यूँ जोड़ दिया है जैसे मछली पानी के साथ। 1। रहाउ। मैंने (अपने अंदर से) काम क्रोध लोभ अहंकार ईष्या (आदि सारे विकार) सदा के लिए निकाल दिए हैं। हे भाई ! जब से गुरू ने (अपना) उपदेश मेरे हृदय में पक्का कर के मुझे हरी-नाम की दवाई दी है। तब से मुझे सारे गुणों में प्रवीण गुरू मिल गया है। 1। हे प्रभू ! (अब मेरा हृदय) आपका घर बन गया है। आप (सचमुच) मेरे (इस घर का) मालिक बन गया है। हे भाई ! गुरू ने मेरे अहंकार को दूर कर दिया है। मुझे प्रभू से मिला दिया है।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।

अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।

इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे नानक ! (कह-) हे गुणों के खजाने ! हे मन को मोहने वाले ! हे सोहणे लाल ! ळे सारे सुख देने वाले ! हे सब जीवों में व्यापक ! हे प्रभू ! हे मित्र प्रभू ! मुझे गुरू ने (आपके) पास भेजा ह।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।