ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मोहन घरि आवहु करउ जोदरीआ ॥
मानु करउ अभिमानै बोलउ भूल चूक तेरी प्रिअ चिरीआ ॥1॥ रहाउ ॥
निकटि सुनउ अरु पेखउ नाही भरमि भरमि दुख भरीआ ॥
होइ क्रिपाल गुर लाहि पारदो मिलउ लाल मनु हरीआ ॥1॥
एक निमख जे बिसरै सुआमी जानउ कोटि दिनस लख बरीआ ॥
साधसंगति की भीर जउ पाई तउ नानक हरि संगि मिरीआ ॥2॥1॥24॥
अब किआ सोचउ सोच बिसारी ॥
करणा सा सोई करि रहिआ देहि नाउ बलिहारी ॥1॥ रहाउ ॥
चहु दिस फूलि रही बिखिआ बिखु गुर मंत्रु मूखि गरुड़ारी ॥
हाथ देइ राखिओ करि अपुना जिउ जल कमला अलिपारी ॥1॥
हउ नाही किछु मै किआ होसा सभ तुम ही कल धारी ॥
नानक भागि परिओ हरि पाछै राखु संत सदकारी ॥2॥2॥25॥
अब मोहि सरब उपाव बिरकाते ॥
करण कारण समरथ सुआमी हरि एकसु ते मेरी गाते ॥1॥ रहाउ ॥
देखे नाना रूप बहु रंगा अन नाही तुम भांते ॥
देंहि अधारु सरब कउ ठाकुर जीअ प्रान सुखदाते ॥1॥
भ्रमतौ भ्रमतौ हारि जउ परिओ तउ गुर मिलि चरन पराते ॥
कहु नानक मै सरब सुखु पाइआ इह सूखि बिहानी राते ॥2॥3॥26॥
अब मोहि लबधिओ है हरि टेका ॥
गुर दइआल भए सुखदाई अंधुलै माणिकु देखा ॥1॥ रहाउ ॥
काटे अगिआन तिमर निरमलीआ बुधि बिगास बिबेका ॥
जिउ जल तरंग फेनु जल होई है सेवक ठाकुर भए एका ॥1॥
जह ते उठिओ तह ही आइओ सभ ही एकै एका ॥
नानक द्रिसटि आइओ स्रब ठाई प्राणपती हरि समका ॥2॥4॥27॥
मेरा मनु एकै ही प्रिअ मांगै ॥
पेखि आइओ सरब थान देस प्रिअ रोम न समसरि लागै ॥1॥ रहाउ ॥
मै नीरे अनिक भोजन बहु बिंजन तिन सिउ द्रिसटि न करै रुचांगै ॥
हरि रसु चाहै प्रिअ प्रिअ मुखि टेरै जिउ अलि कमला लोभांगै ॥1॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।
अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।
इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “सारग महला 5 दुपदे घरु 4 सतिगुर प्रसादि ॥ हे मोहन प्रभू ! मैं मिन्नत करती हॅूँ मेरे हृदय-घर में आ बस।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।