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अंग 1209

अंग
1209
राग सारंग
राग: सारंग · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सारग महला 5 दुपदे घरु 4
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मोहन घरि आवहु करउ जोदरीआ ॥
मानु करउ अभिमानै बोलउ भूल चूक तेरी प्रिअ चिरीआ ॥1॥ रहाउ ॥
निकटि सुनउ अरु पेखउ नाही भरमि भरमि दुख भरीआ ॥
होइ क्रिपाल गुर लाहि पारदो मिलउ लाल मनु हरीआ ॥1॥
एक निमख जे बिसरै सुआमी जानउ कोटि दिनस लख बरीआ ॥
साधसंगति की भीर जउ पाई तउ नानक हरि संगि मिरीआ ॥2॥1॥24॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 दुपदे घरु 4 सतिगुर प्रसादि ॥ हे मोहन प्रभू ! मैं मिन्नत करती हॅूँ मेरे हृदय-घर में आ बस। हे मोहन ! मैं (सदा) मान करती रहती हूँ। मैं (सदा) अहंकार की बात करती हूँ। मैं बहुत सारी भूलें-चूकें करती हूँ। (फिर भी) हे प्यारे ! मैं आपकी (ही) दासी हूँ। 1। रहाउ। हे मोहन ! मैं सुनती हूँ (आप) नजदीक (बसता है)। पर मैं (आपको) देख नहीं सकती। सदा भटक-भटक के मैं दुखों में फसी रहती हूँ। हे गुरू ! अगर आप दयावान हैं के (मेरे अंदर से माया के मोह का) पर्दा दूर कर दे। मैं (सुंदर) लाल (प्रभू) को मिल जाऊँ। और। मेरा मन (आत्मिक जीवन से) हरा-भरा हो जाए। 1। हे भाई ! अगर आँख झपकने जितने समय के लिए भी मालिक-प्रभू (मन से) भूल जाए। तो मैं ऐसे समझती हूँ कि करोड़ों दिन लाखों वर्ष गुजर गए हैं। हे नानक ! (कह-) जब मुझे साध-संगति का समागम प्राप्त हुआ। तब परमात्मा से मेल हो गया। 2। 1। 24।
सारग महला 5 ॥
अब किआ सोचउ सोच बिसारी ॥
करणा सा सोई करि रहिआ देहि नाउ बलिहारी ॥1॥ रहाउ ॥
चहु दिस फूलि रही बिखिआ बिखु गुर मंत्रु मूखि गरुड़ारी ॥
हाथ देइ राखिओ करि अपुना जिउ जल कमला अलिपारी ॥1॥
हउ नाही किछु मै किआ होसा सभ तुम ही कल धारी ॥
नानक भागि परिओ हरि पाछै राखु संत सदकारी ॥2॥2॥25॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ (आपके नाम की बरकति से) अब मैं और कौ-कौन सी सोचें सोचूँ। मैंने हरेक सोच बिसयार दी है। (हे भाई ! उसके नाम के सदका अब मुझे यकीन बन गया है कि) जो कुछ करना चाहता हूँ वही कुछ वह कर रहा है। हे प्रभू ! मुझे अपना नाम बख्श। मैं कुर्बान जाता हूँ। 1। रहाउ। हे भाई ! सारे जगत में माया (सर्पनी) की जहर बढ़-फूल रही है (इससे वही बचता है जिसके) मुँह में गुरू के उपदेश (वाला) गरुड़-मंत्र है। हे भाई ! जिस मनुष्य को प्रभू अपना हाथ दे के अपना बना के रक्षा करता है। वह जगत में इस प्रकार निर्लिप रहता है जैसे पानी में कमल का फूल। 1। हे नानक ! (कह- हे प्रभू !) ना तो अब ही मेरी कोई बिसात है। ना ही आगे मेरी कोई समर्थता हैं सकती है। हर जगह तूने ही अपनी सक्ता टिकाई हुई है। हे हरी ! (माया सर्पनी से बचने के लिए) मैं भाग के आपके संतों की शरण पड़ा हूँ। संत-शरण के सदके मेरी रक्षा कर। 2। 2। 25।
सारग महला 5 ॥
अब मोहि सरब उपाव बिरकाते ॥
करण कारण समरथ सुआमी हरि एकसु ते मेरी गाते ॥1॥ रहाउ ॥
देखे नाना रूप बहु रंगा अन नाही तुम भांते ॥
देंहि अधारु सरब कउ ठाकुर जीअ प्रान सुखदाते ॥1॥
भ्रमतौ भ्रमतौ हारि जउ परिओ तउ गुर मिलि चरन पराते ॥
कहु नानक मै सरब सुखु पाइआ इह सूखि बिहानी राते ॥2॥3॥26॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ (गुरू को मिल के) अब मैंने और सारे उपाय त्याग दिए हैं। हे जगत के मूल हरी ! हे सारी ताकतों के मालिक स्वामी ! (मुझे निश्चय हो गया है कि) सिर्फ आपके दर से ही मेरी ऊँची आत्मिक अवस्था बन सकती है। 1। रहाउ। हे प्रभू ! मैंने (जगत के) अनेकों कई किस्मों के रूप-रंग देख लिए हैं। आपके जैसा (सुंदर) और कोई नहीं। हे ठाकुर ! हे जिंद के दाते ! हे प्राण दाते ! हे सुख दाते ! सब जीवों को आप ही आसरा देता है। 1। हे नानक ! कह- हे भाई ! भटकते-भटकते जब मैं थक गया। तब गुरू को मिल के मैंने परमात्मा की कद्र समझ ली। अब मैंने सारे सुख देने वाले प्रभू को पा लिया है। और मेरी (जिंदगी की) रात सुख-आनंद में व्यतीत हो रही है। 2। 3। 26।
सारग महला 5 ॥
अब मोहि लबधिओ है हरि टेका ॥
गुर दइआल भए सुखदाई अंधुलै माणिकु देखा ॥1॥ रहाउ ॥
काटे अगिआन तिमर निरमलीआ बुधि बिगास बिबेका ॥
जिउ जल तरंग फेनु जल होई है सेवक ठाकुर भए एका ॥1॥
जह ते उठिओ तह ही आइओ सभ ही एकै एका ॥
नानक द्रिसटि आइओ स्रब ठाई प्राणपती हरि समका ॥2॥4॥27॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ अब मैंने परमात्मा का आसरा पा लिया है। हे भाई ! जब से सारे सुख देने वाले सतिगुरू जी (मेरे ऊपर) दयावान हुए हैं। मैं अंधे ने नाम-मोती देख लिया है। 1। रहाउ। हे भाई ! (गुरू की कृपा से मेरे अंदर से) आत्मिक जीवन से बेसमझी के के अंधेरे काटे गए हैं। मेरी बुद्धि निर्मल हो गई है। मेरे अंदर अच्छे-बुरे की परख की शक्ति का प्रकाश हो गया है। (मुझे समझ आ गया है कि) जैसे पानी की लहरें और झाग सब कुछ पानी ही हो जाता है। वैसे ही मालिक-प्रभू और उसके सेवक एक-रूप हो जाते हैं। 1। हे नानक ! (कह- गुरू की कृपा से यह समझ आ गई है कि) जिस प्रभू से यह जीव उपजता है उसमें ही लीन होता है। यह सारी रचना ही एक प्रभू का खेल-पसारा है। (गुरू की किरपा से) दिखाई दे गया है कि प्राणों का मालिक हरी सब जगह एक समान बस रहा है। 2। 4। 27।
सारग महला 5 ॥
मेरा मनु एकै ही प्रिअ मांगै ॥
पेखि आइओ सरब थान देस प्रिअ रोम न समसरि लागै ॥1॥ रहाउ ॥
मै नीरे अनिक भोजन बहु बिंजन तिन सिउ द्रिसटि न करै रुचांगै ॥
हरि रसु चाहै प्रिअ प्रिअ मुखि टेरै जिउ अलि कमला लोभांगै ॥1॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे भाई ! मेरा मन सिर्फ प्यारे प्रभू के ही दर्शन माँगता है। मैं सारे देश सारी जगह देख आया हूँ। (उनमें से कोई भी सुंदरता में) प्यारे (प्रभू) के एक रोम जितनी भी बराबरी नहीं कर सकता। 1। रहाउ। हे भाई ! मैं अनेकों भोजन। अनेकों स्वादिष्ट व्यंञन परोस के रखता हूँ। (मेरा मन) उनकी तरफ निगाह भी नहीं करता। (इसकी) उनकी ओर कोई रुचि नहीं। हे भाई ! जैसे भौरा कमल के फूल के लिए ललचाता ह। वैसे ही (मेरा मन) परमातमा (के नाम) का स्वाद (ही) माँगता है। मुँह से ‘हे प्यारे प्रभू ! हे प्यारे प्रभू !’ ही बोलता रहता है। 1।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।

अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।

इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “सारग महला 5 दुपदे घरु 4 सतिगुर प्रसादि ॥ हे मोहन प्रभू ! मैं मिन्नत करती हॅूँ मेरे हृदय-घर में आ बस।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।